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ईवीएम पर छिड़ी रार

कौशल किशोर | Follow @HolyGanga
 
चुनाव आयोग ने दिल्ली के मुख्यमंत्री को वोटिंग मशीन हैक करने की चुनौती दी है। चुनौती और ललकार लगाने में अव्वल नेता को उन्हीं के अंदाज में यह चुनौती पहली बार मिली है। पर चुनाव आयोग की ईवीएम पर चुनौती नई कतई नहीं है। नगर निगम चुनाव में इसी मशीन के नाम पर खलबली मची है। दिल्ली के मुख्यमंत्री की बात नहीं मान कर चुनाव आयोग ने बैलट पेपर पर चुनाव कराने से इंकार कर दिया। उन्होंने तैयारियां पूरी होने तक के लिए इस चुनाव पर रोक लगाने को कहा था। हालांकि आईआईटी खड़गपुर से अभियांत्रिकी की पढ़ाई करने वाले अरविन्द केजरीवाल ने चुनौती स्वीकार नहीं किया। संभव है, उन्हें पता हो कि आयोग की यह चुनौती उनकी पहली ताजपोशी के बाद जारी उसी बयान के समान है, जिसमें उन्होंने बिना किसी तैयारी के दिल्ली की जनता का बिजली बिल माफ कर दिया था। उन्होंने ईवीएम की ईमानदारी पर सवाल उठाया है। मध्य प्रदेश के अटेर विधानसभा में हाल में हुए परीक्षण के दौरान ईवीएम ने भाजपा प्रत्याशी के पक्ष में गलत नतीजा देकर इस चर्चा को गरमाने की सामग्री उपलब्ध कराया है। केजरीवाल की ईमानदारी इस बात से भी जाहिर होती है कि चुनौती के जवाब में उन्होंने वीवीपीएटी युक्त ईवीएम से चुनाव कराने के विषय में आयोग को लिखा है। 
 
पिछले कई हफ्तों से इलेक्ट्राॅनिक वोटिंग मशीन सुर्खियों में है। 11 मार्च 2017 को आए विधानसभा चुनावों के नतीजों ने इन मशीनों को अचानक बहस का विषय बना दिया। चुनावों में हार का ठीकरा राजनेताओं ने इन्हीं मशीनों पर फोड़ना मुनासिब समझा था। बसपा सुप्रिमो मायावती, कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी, समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव और आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविन्द केजरीवाल ने एक साथ ईवीएम में गड़बड़ी की ओर इंगित किया। इन आरोपों से कुल इतनी ही बात साफ होती कि ईवीएम में हेराफेरी की संभावना है। इस संभावना के बूते चुनाव परिणामों को बदलने की आशा करने वाले नेता भविष्य में भी हार का सामना करेंगे। क्या यह विवाद अपनी कमियों को छिपाने की असफल कोशिश नहीं है? ईवीएम को दोषी ठहराने वाले इस सत्य को नकार रहे हैं कि इन दिनों भाजपा बेहतर रणनीति के साथ मैदान में उतर रही है। 
 
विधानसभा चुनावों में नोटबंदी से नाराज व्यापारी वर्ग भाजपा के खिलाफ मतदान करती है। परंतु मोदी, जेटली और शाह की टीम इसी नोटबंदी को गरीब जनता के हित में कालेधन के मालिकों को परेशान करने का मंत्र साबित करने में सफल होती है। गरीबों का विशाल जनसमूह भाजपा के पक्ष में मतदान करती है। तीन तलाक के मामले पर उन्होंने मुस्लिम महिलाओं की नजर में दूसरी पार्टियों के मुकाबले बेहतर मुकाम बनाया है। इस सोसल इंजीनियरिंग का मुकाबला किए बगैर बैलट पेपर की पैरोकारी करने से ईवीएम का दोष नहीं सिद्ध होता है। पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कहा, ‘अगर इवीएम में गड़बड़ी हुई होती तो मैं मुख्यमंत्री नहीं होता।’ इस बीच कांग्रेस नेता वीरप्पा मोइली ने पुराने दिनों की ओर नहीं लौटने की पैरवी करते हुए बैलेट पेपर पर चुनाव नहीं कराने की पैरोकारी किया है। इन तथ्यों ने साफ कर दिया कि कांग्रेस के नेताओं में इस मामले में कोई आम सहमति नहीं कायम हो सकी है।
 
इन मशीनों की दक्षता के साथ ही खूबियों को बखान करने वाला एक वर्ग वर्षों से सक्रिय है। ‘ईवीएम डेमोक्रेसी’ के पैरोकार इन्हीं के बूते लोकतांत्रिक देशों की सरकार चलाने की मंशा रखते हैं। करीब एक दशक से इस मामले पर कार्यरत गोविन्द यादव जैसे सामाजिक कार्यकर्ता और विधि विशेषज्ञ ‘ईवीएम डेमोक्रेसी’ को परिभाषित कर इसके विरोध में ‘वोट बचाओ-देश बचाओ’ अभियान शुरु करते हैं। मध्य प्रदेश के कई हिस्सों में इस मामले में गतिविधियां चलती रही है। वर्षों से उनकी शिकायत अनसुनी होती रही। बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने हितों को साधने के लिए ‘ईवीएम डेमोक्रेसी’ को प्रभावी तरीके से लागू करने में लगी है। इस अभियान के पैरोकार जापान और जर्मनी जैसे तकनीकी संपन्न लोकतांत्रिक देशों में स्वीकृत मतपत्र व्यवस्था की वकालत भी करते हैं। भाजपा के एक विद्वान प्रवक्ता ने साल 2010 में ‘डेमोक्रेसी एट रिस्क’ नामक एक किताब लिखी थी, जिसकी विषयवस्तु यही थी। लालकृष्ण आडवाणी ने इस पुस्तक की पैरवी किया और भाजपा के कई दिग्गज नेताओं ने इसमें वर्णित बातों का जिक्र कर ओजपूर्ण भाषण दिए। इस सैद्धान्तिक विमर्श के पक्ष-विपक्ष में कई राजनैतिक दलों से जुड़े लोग शामिल रहे हैं। इन सब के बावजूद पहले यह मामला कभी मुख्यधारा के बहस का हिस्सा नहीं हो सका था। अचानक एक दिन यह भारतीय राजनीति का सबसे मुखर सवाल बन जाता है। इस मामले की पृष्ठभूमि और वर्तमान परिदृष्य को समझना जरुरी है। 
 
बाहुबलियों के बूते मतपेटियों के लूट की कहानी को ईवीएम के इस्तेमाल ने रोक दिया। ऐसी युक्तियों को अपनाकर विधानभवन पहुंचने वाले माननीयों से लोकतंत्र को बचाना जरुरी है। और इसी धांधली को रोकने के लिए ईवीएम का उपयोग शुरु करने की बात कही गई। इस मामले में वी.पी. सिंह की सरकार ने जनवरी 1990 में तत्कालीन विधि मंत्री दिनेश गोस्वामी के नेतृत्व में 11 सदस्यीय चुनाव सुधार समिति बनाई थी। इस समिति की रिपोर्ट मई 1990 में संसद के पटल पर रखा गया, जिसमें ईवीएम के इस्तेमाल की बात कही गई है। परंतु ईवीएम का इस्तेमाल इस सिफारिश का नतीजा नहीं है। 1988 में राजीव गांधी की सरकार ने लोक प्रतिनिधित्व कानून 1951 की धारा 61 में संशोधन कर मतपत्रों के स्थान पर ईवीएम का उपयोग करने का कानून बनाया था। गोस्वामी समिति ने इस कानून की भूमिका बाद में लिखी। इस बीच एक अति आवश्यक प्रक्रिया छूट जाती है। ईवीएम के प्रामाणिकता की जांच नहीं की जाती है। आज केजरीवाल के सामने पेश की गई चुनौती में भी इस कमी को दूर करने का प्रयास नहीं किया गया है। ऐसा लगता है जैसे को तैसा नीति अपना कर चुनाव आयोग ने एक चाल चली, जिससे उनकी उस मांग को बल मिलता है, जिसके लिए लंबे समय से कोशिश जारी है।
EVM-VVPAT
1990 के दशक में तकनीकी का इस्तेमाल कर मतदान प्रक्रिया की धांधली को रोकने की कोशिश हुई। इसके साथ छेड़छाड़ की चुनौती भी तभी से है। चुनाव आयोग और राजनीतिक दलों के अतिरिक्त सर्वोच्च न्यायालय एक अर्से से ईवीएम मामले की सुनवाई में लगी है। इसी केस में ईवीएम को वीवीपीएटी नामक एक अन्य उपकरण से जोड़ने की बात आती है। इससे यह सुनिश्चित होगा कि मतदाता ने किस बटन को दबा कर मतदान किया। इसे वोटर वेरिफिएबल पेपर आॅडिट ट्रायल (वीवीपीएटी) कहा जाता है। गोवा में हुए हालिया विधानसभा चुनाव में पहली बार सभी सीटों पर यह सिस्टम इस्तेमाल में लाया गया है। इससे पहले 16वीं लोकसभा चुनाव में 8 प्रदेशों के 8 संसदीय क्षेत्रों में इन उपकरणों का इस्तेमाल किया गया था। चुनाव आयोग को सभी ईवीएम में यह सुविधा जोड़ने के लिए करीब 3600 करोड़ रुपये की जरुरत है। इसके अर्थशास्त्र को समझना बहुत मुश्किल नहीं है। मुख्य चुनाव आयुक्त ने इस विषय में कई बार केन्द्र सरकार को पत्र लिखा है। हाल ही में उन्होंने प्रधानमंत्री से सीधी गुहार कर धन उपलब्ध कराने का निवेदन किया है। आम आदमी पार्टी के नेता ने इस चुनाव में बैलट पेपर की मांग के बदले वीवीपीएटी युक्त मशीनों से चुनाव कराने के लिए लिखकर क्या संकेत दिया है? संभव है कि चुनाव आयोग दिल्ली नगर निगम चुनाव में पेपर आडिट ट्रायल सिस्टम युक्त मशीनों का इस्तेमाल कर एक तीर से कई निशाना साधने का काम करे। 
 
आज ‘वोट बचाओ-देश बचाओ अभियान’ एक जनान्दोलन में तब्दील होने में लगी है। चंडीगढ़ में हाल में हुए निकाय चुनाव में ईवीएम के छेड़छाड़ की घटना सामने आई, जिसमें स्ट्रांग रुम में घुसकर उम्मीदवारों के शुभचिंतकों ने चुनाव आयोग को निःशब्द चुनौती दी। इस विषय में प्रिंट और इलेक्ट्राॅनिक मीडिया में कई उम्मीदवारों की शिकायतें सुनाई देती है। फिर हजारों लोगों का हुजूम वोट बचाओ-देश बचाओ नारे के साथ सड़क पर उतरने को मजबूर हो जाता है। मध्य प्रदेश की आहट पंजाब में चिंगारी का रुप ले चुकी है। पंजाब के मुख्यमंत्री भले ही ईवीएम की पैरवी कर रहे हों, पर उनके समर्थन में माहौल बनाने वाले हजारों कार्यकर्ताओं ने ईवीएम से हुए छेड़छाड़ के सवाल को गंभीरता से लिया है। इन आंदोलनकारियों का मानना है कि भारत जैसी तीसरी दुनिया के देशों में माइक्रो-प्रोसेसर जैसे उपकरण विदेशों से आयात किये जाते हैं। यहां ईवीएम फिक्स कर सरकार बनाना असंभव नहीं है। क्या ऐसी दशा में देश की जनता यह मान लेगी कि एक ऐसा उपकरण जो मतदान की प्रिंट उपलब्ध कराती है वह बैलेट पेपर के बराबर होगी? कांग्रेस और आम आदमी पार्टी का रुख सामने है। क्या आज बैलट पेपर की मांग करने वाली सभी पार्टी वीवीपीएटी की आपूर्ति से संतोष कर लेगी? क्या इस बहस का अंत इसी प्रिंटेड स्लिप के नाम पर होना है? 
 
निश्चय ही ईवीएम के टेम्पर प्रूफ होने के दावे हैं। प्रमाण नहीं। सैद्धांतिक रुप से मतपत्रों पर अंकित निशान का मुकाबला कोई इलेक्ट्राॅनिक उपकरण नहीं कर सकता है। पर इस व्यवस्था से चुनाव आयोग को मतदान से लेकर मतगणना तक आसानी होती है। इस मामले में राजनीतिक दलों को आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठकर लोकतंत्र के हित में विचार करना चाहिए। यह देशहित और आम जनता की निष्ठा से जुड़ा मामला है। इस गंभीर समस्या की आड़ में हार के दंश से उबरने की कोशिश वैमनस्य की राजनीति ही मानी जाएगी।
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