पंचायती राज के बिना ग्रामोदय से भारतोदय का सपना अधूरा

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​आज महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज के सपने को साकार करने की कोशिशों को सौ साल से ज्यादा वक्त बीत चुका है। इस क्रम में हुए कार्यों पर गौर करने पर लोकनायक जयप्रकाश नारायण, बलवंतराय मेहता और पंडित बिनोदानंद झा का नाम सबसे ऊपर मिलता है। इन विभूतियों का अविस्ममरणीय योगदान है कि देशभर की पंचायतों को एकसूत्र में बांधने के लिये पंचायतों की परिषद बनाई गई। दरअ़सल 1958 में ही अखिल भारतीय पंचायत परिषद की स्थापना हुई थी। तब से अब तक परिषद की महासमिति ने कुल 91 बैठकें की हैं। इन बैठकों को महापंचायत कहा जाता है। इन्हीं महापंचायतों का नतीजा है कि पंचायती राज को तीसरी सरकार के रुप में संवैधानिक दर्जा प्राप्त हुआ। हाल में हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में हुई पिछली महापंचायत में साफ हो गया था कि यह उपलब्धि इस संकल्प का आखिरी विराम कतई नहीं है।

ग्राम स्वराज ही गांधी के हिन्द स्वराज का मूलमंत्र है। इस सपने को साकार करने के लिए पंचायत परिषद के नेताओं का बलिदान सर्वोच्च कोटि का माना जाता है। आज अखिल भारतीय पंचायत परिषद ग्राम स्वराज के सपने को जमीन पर उतारने के लिए पूरी निष्ठा के साथ प्रतिबद्ध है। हाल में इन्हीं विषयों में गंभीर विचार-विमर्श पर बल दिया गया है। पिछली महासमिति में संविधान के 73वें संशोधन और 14वें वित्त आयोग की सिफारिशों पर जोरदार बहस हुआ और कई अतिमहत्वपूर्ण निर्णय लिए गए। इन्हें जमीन पर उतारने के लिए आज देशभर में जन जागरण अभियान चलाया जा रहा है।

नब्बे के दशक में नरसिंह राव सरकार के दौरान 73वां संविधान संशोधन किया गया था। तभी से इसे लागू करने की बातें चल रही हैं। पंचायतों की सूची में शामिल 29 विभागों की स्थिति पर केन्द्र सरकार का रुख सामने है। बीते पंचायती राज दिवस पर वैंकैया नायडू ने भी एक बार फिर इसे दुहराया था। परिषद का मानना है कि संविधान के इस संशोधन को सही मायनों में जमीन पर उतारे बगैर ग्राम स्वराज का स्वप्न साकार नही हो सकेगा। महापंचयत में परिषद ने सभी राज्यों में इस व्यवस्था को लागू कराने का निर्णय लिया है। इसके लिए अब एक मात्र संघर्ष का रास्ता ही शेष बचा है। उत्तर प्रदेश में पंचायत के सभी स्तरों पर योग्य लोगों को जिम्मेदारियां सौंपी जा रही है, तो पंजाब और दिल्ली ने इस कवायद को दुहराने की जरुरत पर बल देना शुरु किया है। इस सूची में देश के सभी राज्य और केन्द्रशासित प्रदेश शामिल हैं। आज व्यापक जन संपर्क की जरुरत है। पंचायती राज संस्थानों की मजबूती और ग्राम-स्वराज के लिये एक प्रभावी आंदोलन की आवश्यकता है।

ऐसा प्रतीत होता है कि पिछले साल डा. वाई.वी. रेड्डी ने 14वें वित्त आयोग की सिफारिशों में पंचायतों के लिए 10 फिसदी बजट बढ़ा कर उन्हें मजबूत करने का प्रयास किया है। निश्चय केन्द्र ने पंचायतों को दो लाख दो सौ बिरानवे करोड़ की बड़ी रकम उपलब्ध कराने का प्रावधान किया है। क्या इसमें पांच सालों के लिए निर्धारित रकम को एक मुस्त दर्शाने से वाहवाही की मंशा जाहिर होती है? महापंचायत में पहुंचे पंचायतों की राजनीति में सक्रिय प्रतिनिधियों की दिन भर चली चर्चा में प्रायः सभी विद्वानों का मतेक्य इस बात में था कि वित्त आयोग ने जिला परिषद को किनारे करने का काम कर पंचायती राज संस्थानों को कमजोर किया है। इसी वजह से आज परिषद के लोग भाजपा से जुड़े स्वदेशी जागरण मंच और मजदूर तथा किसानों के हितों की पैरोकार उनके अनुसांगिक संगठनों की तरह ही जनविरोधी नीतियों के प्रति खुलकर नाराजगी जाहिर कर रहे हैं। सरकार की लोकप्रियता को प्रभावित करने वाले मसलों में निश्चय ही इसकी अपनी अहमियत है। किसी भी सूरत में इसे नकारना अनुचित ही होगा।

इक्कीसवीं सदी में कुपोषण की समस्या विकाराल हो रही है। इसे दूर करने के लिए आंगनवाडी नामक कार्यक्रम शुरु किया गया। वर्ल्ड बैंक पोषित इस स्कीम का बजट 2000 से 2013 के बीच बीस हजार करोड़ तक पहुंच गया था। सोलहवीं लोक सभा चुनाव के बाद सत्ता में आई सरकार ने इसे आधा से भी कम कर दिया। यह एक ऐसी समस्या है, जिसका विरोध मेनका गांधी जैसे सरकार के अपने सहयोगियों ने भी किया है। झारखंड जैसे सूबे में आज भी तीस फिसदी बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। आंकड़े बताते हैं कि विकास के दौर में पिछड़े राज्यों की हालत ज्यादा खराब है। कुपोषण के शिकार भूखे बच्चों की समस्या का संज्ञान लेकर परिषद ने सभी स्तरों पर इसे उठाने का निर्णय लिया है।

देश में भूखमरी की स्थिति दिन-ब-दिन भयावह होती जा रही है। रिपोर्ट में दर्ज है कि आज हिन्दुस्तान में भूखे सोने को विवश कितने लोग हैं। करीब सत्तर लाख भारतीय पीने के लिए स्वच्छ जल से भी वंचित हैं। एक व्यक्ति भोजन व्यर्थ करते हुए सोचता नहीं है कि दूसरा व्यक्ति ऐसा भी है, जिसके पास दो जून की सूखी रोटी भी नहीं है। यह किसी भी सभ्य समाज की गरिमा के अनुकूल नहीं माना जा सकता है। पिछले साल न्यूयार्क में हुए संयुक्त राष्ट्र के सत्तरवें शिखर सम्मेलन के दौरान अगले 15 सालों में भूख को एकदम निर्मूल करने का संकल्प लिया गया था। यह संकल्प सरहानीय है, परंतु केन्द्र और राज्य की सरकारों के बूते इस जंग को जीतना संभव नहीं है। पंचायत परिषद इस विषय में की जा रही कोशिशों को प्रभावी और व्यापक बनाने की दिशा में सतत प्रयत्नशील है। तीनों स्तरों पर कार्यरत पंचायत प्रतिनिधियों की प्राथमिकताओं में यह अग्रणी है। इस विषय में सफलता अर्जित करने के लिए अभिजात्य वर्ग की उदासीनता दूर होनी चाहिए। परिषद ने भोजन और काम के अधिकारों को मौलिक आवश्यकता के रुप में चिन्हित किया है। वंचित ग्रामीण समाज इस समस्या के कारण पलायन को विवश है। यह महानगरों पर बढ़ते बोझ की एक बड़ी वजह साबित होती है। सरकारों को इस विषय में गंभीरता दिखानी होगी। ‘राइट टू फूड’ और ‘राइट टू वर्क’ को देश-विदेश में सराहा गया। इसे मजबूत और प्रभावी बनाने की जरुरत है।

दिल्ली में तीन सौ से ज्यादा पंचायतें हैं। ग्रामीण और शहरी का भेद दिल्ली के इन गांवों में साफ दृष्टिगोचर होता है। अस्सी के दशक में इन पंचायतों में आखिरी बार चुनाव हुए थे। 1983 से अब तक इन गांवों में पंचायत चुनाव नहीं हुए हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ग्राम सभा के सापेक्ष मोहल्ला सभा की पैरवी कर रहे हैं। यह इस क्षेत्र में एक गंभीर मामला है। गांवों को पंचायत के अधीन ही होना चाहिए। राज्य पंचायत परिषद से जुड़े नेताओं मानना है कि दिल्ली की पंचायतें लोकनायक, बलवंतराय मेहता और महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज के सपनों को साकार करने के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। इस लड़ाई को लड़ने की योजना पर दिल्ली राज्य पंचायत परिषद काम कर रही है। अखिल भारतीय पंचायत परिषद ने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के सभी सहमना संस्थानों को एकजुट होकर इस मुद्दे पर सक्रिय होने की अपील किया है।

हाल में केन्द्र और राज्य की सरकार में शामिल जनप्रतिनिधियों की वित्तीय क्षमता में अभिवृद्धि हुई है। विधायकों और सांसदों को प्राप्त होने वाले भत्तों में हुई अप्रत्याशित वृद्धि सुर्खियों में रही है। पंचायतों के लिए चुने गए जनप्रतिनिधि गांव, ब्लॉक और जिला स्तर पर सतत कार्यरत हैं। उन्हें विधायकों और सांसदों की तरह वित्तीय सुविधाएं नहीं प्राप्त हैं। अर्थाभाव के कारण विभिन्न सामाजिक-राजनैतिक कार्याें पर इसका सीधा असर पड़ता है। अखिल भारतीय पंचायत परिषद देशभर के पंचायत प्रतिनिधियों को बेहतर वेतन-भत्ता दिए जाने की पूरजोर पैरवी करती है। राज्य और केन्द्र की सरकारों को इस विषय में सहानुभूतिपूर्वक विचार करना चाहिए। ग्रामोदय से भारतोदय का सपना ऐसा किए बगैर सपना ही रह जाएगा। इसे साकार करने और परिषद के अन्य कार्यों को सुचारु रुप से जारी रखने के लिए नए पदाधिकारियों को नियुक्त किया गया है।

अखिल भारतीय पंचायत परिषद के अध्यक्ष सुबोधकांत सहाय वर्षों से कांग्रेस पार्टी से जुड़े हैं। यहां 2003 से लगातार तीन बार चुनाव जीतने का रिकार्ड उनके नाम है। हालांकि इस बीच हुए कई कार्यों पर सवाल भी खड़े होते हैं, जिन्हें दूर करने के लिए सार्थक पहल भी नहीं हुए। इसका मतलब यह भी नहीं है कि एक गैर-राजनीतिक संस्थान को किसी पार्टी से जोड़ने से समस्याएं हल होने वाली हैं। परिषद यह बात बार-बार दुहराती रही है कि यह न कांग्रेस पार्टी की है और न ही किसी दूसरी पार्टी की है। इसमें हर पार्टी के लोग हो सकते हैं। दलीय राजनीति के दलदल से दूर मूलतः पंचायतों के लिए समर्पित यह एक स्वायत्तशासी संस्थान है, जो केरल और पश्चिम बंगाल की पंचायतों में बढ़े राजनैतिक दलों के हस्तक्षेप का भी समर्थन नहीं करती है। इसकी स्थापना तीनों स्तरों पर कार्यरत पंचायती राज संस्थानों को मजबूती प्रदान करने के लिए हुई। इस कार्य के लिए देशभर की पंचायतों से प्रतिनिधियों को चुनने का काम राज्य की स्थानीय परिषदों को दिया गया है। मेहता के संविधान में तीन प्रतिशत ब्लॉक के प्रतिनिधित्व का प्रावधान किया गया था। संसद और विधान भवनों में मौजूद दलों को अभी तक इस परिषद की व्यवस्था में पैठ बनाने में सफलता नहीं मिली है। परंतु क्या राजनैतिक दलों ने पंचायत परिषद में पैठ बनाने का निर्णय लिया है? आज पंचायत परिषद इस सवाल से जूझते हुए ग्राम स्वराज के सपने को साकार करने में लगी है।

Published in Hindi Monthly PAHAL 

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महापंचायत की बैठक

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हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में पहले से तयशुदा एजेंडों पर विभिन्न प्रांतों की पंचायत से जुड़े सामाजिक-राजनैतिक लोगों की बैठक हुई। पंचायती राज संस्थानों की पैरोकार आल इंडिया पंचायत परिषद 1958 से इस तरह का अयोजन करती रही है। इसे महासमिति की बैठक या महापंचायत कहते हैं। इस बैठक में 73वें संविधान संशोधन और 14वें वित्त आयोग की सिफारिशों के अलावा कई अन्य महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा हुई। एक ओर आतंक की आग में जल रहे जम्मू-कश्मीर से पहुंचे पंचायत प्रतिनिधि की दबी आवाज सुनाई दी। तो उत्तर प्रदेश में पंचायत के स्तर पर योग्य लोगों को परिषद से जोड़ने की कोशिश को देशभर में दुहराने की जरुरत पर चर्चा हुई। महासमिति पंचायती राज संस्थानों को मजबूत बनाने के लिए एक व्यापक जन आंदोलन को खड़ा करने की कोशिश करती दिखी

कुछ दिन पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी झारखंड में पंचायती राज दिवस मना रहे थे। उन दिनों ग्रामसभा और लोकसभा की तुलना होने लगी, तो ग्रामोदय से भारतोदय तक का सपना भी दिखाया गया। 2015 में चौदहवें वित्त आयोग की सिफारिशों में डा. वाई.वी. रेड्डी ने पंचायतों को आवंटित किए जाने वाले बजट में अप्रत्याशित रुप से वृद्धि की थी। आज मोदी सरकार दो लाख दो सौ बिरानवे करोड़ की मोटी रकम पंचायतों के विकास के लिए सीधा मुहैया कराने को प्रतिबद्ध है। इन सब के बावजूद पंचायत परिषद से जुड़े लोग भाजपा से जुड़े ‘स्वदेशी जागरण मंच’ और ‘भारतीय किसान संघ’ जैसे संगठनों की तरह नाराजगी जाहिर कर रहे हैं। लगभग चालीस विद्वानों में इस बात पर सहमति थी कि वित्त आयोग ने जिला परिषद को किनारे कर पंचायती राज संस्थानों को कमजोर किया है। 

हिमाचल प्रदेश राज्य पंचायत परिषद की प्रमुख प्रेमलता ठाकुर वित्त आयोग के प्रभावी पंचवर्षी प्रावधानों की ओर इंगित कर बड़े तीखे सवाल उठाते हुए कहा कि जिला स्तर पर पंचायत प्रतिनिधियों को पूर्व में प्राप्त वित्तीय शक्तियों को कम किया गया है। सूचनाओं को आॅनलाइन करने के क्रम में होने वाली त्रुटियों से होने वाली समस्याओं से वंचित लोगों को कष्ट पहुंचता है। आॅनलाइन डाटा और आधार कार्ड के इस्तेमाल से लोगों को रिलीफ पहुंचाने के क्रम में होने वाली समस्याओं पर गंभीर मंथन हुआ। राजस्थान की चुनिंदा घटनाओं का हवाला भी दिया गया। सामाजसेवी अरुणा राय औ पत्रकार रवीश कुमार ने बेबश और लाचार लोगों को आधार डाटा मिसमैच से होने वाली असुविधाओं पर विचार करने को प्रेरित किया है। यह एक ऐसी समस्या है, जिसे देखकर पंचायतों से जुड़े लोगों का छुब्ध होना लाजिमी है। इन्हीं तथ्यों का संज्ञान लेकर ग्रामसभा से जुड़े कुछ लोग अब तकनीकी और समस्या के बीच का समीकरण समझने में लगे हैं। उन्हें पता है कि कंप्युटर टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कई जगह अच्छा है। पर इसके नुकसान भी हैं। 

यहां एक सवाल उठता है कि क्या सरकार तकनीकी का व्यापार करने का साधन मात्र बन कर रह गई है? या फिर सचमुुच अंतिम जन की सेवा के प्रयासों में होने वाले त्रुटियों से लोग रु-ब-रु हो रहे हैं। यदि तकनीकी लोगों के पास पहुंच कर उनकी सेवा करने में सक्षम बनाती है, तो निश्चय ही उसका इस्तेमाल होना चाहिए। पर यदि वही वंचित तबके की सेवा में बाधा बन रही हो, तो निश्चित तौर पर उस तकनीकी का विरोध होना चाहिए। ‘अतिथि देवो भव’ और ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की पैरवी करने वाले समाज में यह वंचितों को जीवन की आधारभूत जरुरतों से मरहूम होते हुए दिन-ब-दिन देखने का मामला है। नब्बे के दशक में नरसिंह राव सरकार ने 73वां संविधान संशोधन किया। तभी से इसे लागू करने की बातें चल रही हैं। पंचायतों की सूची में शामिल 29 विभागों की स्थिति पर केन्द्र सरकार का रुख सामने है। ग्राम स्वराज के स्वप्न का साकार होना आसान नहीं होगा। महापंचयत में परिषद ने सभी राज्यों में इस व्यवस्था को लागू कराने के लिए संघर्ष का रास्ता चुना है। 

महासमिति गैरबराबरी को ग्रामीण और शहरी नामक दो वर्ग में बांटती है। कुपोषण और भूख से तड़पती जनता के दर्द का विश्लेषण होता है। साथ ही भोजन का अधिकार से लेकर काम के अधिकार तक की तमाम बातों पर चर्चा हुई।

महापंचयत के बाद आखिरी घोषणा में कहा गया था कि पंचायत परिषद न तो कांग्रेस पार्टी या न ही किसी दूसरे पार्टी की है, इसमें हर पक्ष और पार्टी के लोग हैं। 

(लेखक आल इंडिया पंचायत परिषद और बलवंत राय मेहता पंचायती राज संस्थान से जुड़े हैं)

This article is published in the 2nd fortnight issue of October 2016 @Yathavat, the prestigious fortnightly Hindi magazine, on page 39

हिमालय में महापंचायत की बैठक

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अलसुबह उड़ी में सेना के कैंप पर हमला हुआ। और उस दिन एक महापंचायत भी हिमालय में हुई। वास्तव में यह हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में पहले से तयशुदा एजेंडे पर विभिन्न प्रांतों की पंचायत से जुड़े सामाजिक-राजनैतिक लोगों की लंबी बैठक थी। देश में पंचायती राज संस्थानों की पैरोकार आल इंडिया पंचायत परिषद 1958 से इस तरह का अयोजन करती आ रही है। इसे महासमिति की बैठक या महापंचायत कहते हैं। यहां 73वें संविधान संशोधन और 14वें वित्त आयोग की सिफारिशों के अलावा कई अन्य महत्वपूर्ण मामला भी छाया रहा। एक ओर दहशतगर्दी की आग में जल रहे जम्मू-कश्मीर से पहुंचे पंचायत प्रतिनिधि की दबी आवाज सुनाई दी। तो उत्तर प्रदेश में पंचायत के स्तर पर योग्य लोगों को परिषद से जोड़ने की कवायद को देशभर में दुहराने की जरुरत पर चर्चा होती है। साथ ही यह महासमिति पंचायती राज संस्थानों को मजबूत बनाने के लिए एक व्यापक जन आंदोलन को खड़ा करने की कोशिश करती प्रतीत होती है।

दरअ़सल महापंचायत की इन बैठकों का असर आजादी के बाद के इतिहास में पंचायती राज संस्थानों के क्रियाकलापों के रुप में साफ दिखता है। स्वतंत्र भारत में स्वराज, पंचायती राज अथवा तीसरी सरकार (डेमोक्रेटिक डिसेंट्रलाइजेशन) के नाम पर जो कुछ भी हुआ, उसके पीछे जो शक्तियां रही, वही महापंचायत के कर्त्ता-धर्त्ता, पुरोधा और फाउडिंग फादर्स माने जाते हैं। इसमें सबसे भारी योगदान देने वालों ने तो अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया। स्वराज के इसी सपने को साकार करने के लिए आजादी से पहले लाला लाजपत राय, भगत सिंह और आजाद जैसे शहीद हुए तो स्वतंत्र भारत में मेहता, शास्त्री और जयप्रकाश जैसे विभूतियों का जीवनदान देखने को मिलता है। महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज के सपनों को पंख लगाने के लिए लोक नायक जयप्रकाश नारायण, गुजरात के दूसरे मुख्यमंत्री बलवंतराय मेहता और बिहार के तीसरे मुख्यमंत्री पंडित बिनोदानंद झा का योगदान अनुकरण के योग्य माना जाता है। उन्होंने ही पंचायतों की परिषद बनाई, जिसकी इससे पहले ऐसे 90 और बैठकों के रिकार्ड मिलते हैं। आज भी इनके प्रभावों को नकारना संभव नहीं है। 1957 की बलवंतराय मेहता कमिटी और फिर बीस साल बाद अशोक मेहता कमिटी की सिफारिशों के अभाव में क्या नब्बे के दशक में हुए 73वें संविधान संशोधन की चर्चा भी संभव थी? भारतीय राजनीति में हुए रिफार्म की इन ईबारतों को गढ़ने में महती भूमिका अदा करने वाली महासमिति भविष्य में क्या करने जा रही है? इसे समझना सरकार और नागरिक समाज के लिए आज बेहद जरुरी है। 

अभी बहुत वक्त नहीं बीता है। प्रधानमंत्री झारखंड में पंचायती राज दिवस मना रहे थे। उन दिनों ग्रामसभा और लोकसभा की तुलना होने लगी, तो ग्रामोदय से भारतोदय तक का सपना भी आकार-प्रकार लेने लगा। पिछले साल चौदहवें वित्त आयोग की सिफारिशों में डा. वाई.वी. रेड्डी ने पंचायतों को आवंटित किए जाने वाले बजट में अप्रत्याशित रुप से वृद्धि किया था। आज मोदी सरकार दो लाख दो सौ बिरानवे करोड़ की मोटी रकम पंचायतों के विकास के लिए सीधा मुहैया कराने को प्रतिबद्ध है। इन सब के बावजूद पंचायत परिषद से जुड़े लोग भाजपा से जुड़े स्वदेशी जागरण मंच और भारतीय किसान संघ जैसे अनुसांगिक संगठनों की तरह नाराजगी जाहिर कर रहे हैं। सरकार की लोकप्रियता को प्रभावित करने वाले मसलों में निश्चय ही यह भी अपनी अहमियत रखता है। यहां पहुंचे पंचायतों की राजनीति में सक्रिय प्रतिनिधियों की दिन भर चली चर्चा में मैंने चालीस के करीब विद्वानों की बातों पर गौर किया। उनका मतेक्य इस बात में था कि वित्त आयोग ने जिला परिषद को किनारे करने का काम कर पंचायती राज संस्थानों को कमजोर किया है। 

हिमाचल प्रदेश राज्य पंचायत परिषद की प्रमुख प्रेमलता ठाकुर वित्त आयोग के प्रभावी पंचवर्षी प्रावधानों की ओर इंगित कर बड़े तीखे सवाल उठाती हैं। उनकी नाराजगी ब्लॉक और जिला स्तर पर पंचायत प्रतिनिधियों को पूर्व में प्राप्त वित्तीय शक्तियों को कम करने के कारण है। सूचनाओं को आनलाइन करने के क्रम में होने वाली त्रुटियों से उपजने वाली समस्याओं से वंचित लोगों को कष्ट पहुंचता है। यह दूसरी जटिल समस्या है। इसके निराकरण के लिए कोई सार्थक प्रयास नहीं किया गया। यहां आनलाइन डाटा और आधार कार्ड के इस्तेमाल से लोगों को रिलीफ पहुंचाने के क्रम में होने वाली समस्याओं पर गंभीर मंथन चला। राजस्थान की चुनिंदा घटनाओं का हवाला भी दिया गया। विख्यात सामाजसेवी अरुणा राय और वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार ने बेवश और लाचार लोगों को आधार डाटा मिसमैच से होने वाली असुविधाओं पर विचार करने को प्रेरित किया है। यह एक ऐसी समस्या है, जिसे देखकर पंचायतों से जुड़े लोगों का छुब्ध होना लाजिमी है। इन्हीं तथ्यों का संज्ञान लेकर ग्रामसभा से जुड़े कुछ लोग अब तकनीकी और समस्या के बीच का समीकरण समझने में लगे हैं। उन्हें पता है कि कंप्युटर टेक्नोलोजी का इस्तेमाल कई जगह अच्छा है। पर इसके नुकसान भी हैं। यहां एक सवाल उठता है कि क्या सरकार तकनीकी का व्यापार करने का साधन मात्र बन कर रह गई है? या फिर सचमुुच अंतिम जन की सेवा के प्रयासों में होने वाले त्रुटियों से लोग रु-ब-रु हो रहे हैं। यदि तकनीकी लोगों के पास पहुंच कर उनकी सेवा करने में सक्षम बनाती है, तो निश्चय ही उसका इस्तेमाल होना चाहिए। पर यदि वही वंचित तबके की सेवा में बाधा बन रही हो, तो निश्चित तौर पर उस तकनीकी का विरोध होना चाहिए। इस विषय में सरकार को भारतीय परंपरा का अनुकरण करना चाहिए, जो सबसे पहले वंचितों और दिव्यांगों की सेवा सुनिश्चित करने की पैरवी करता है। अतिथि देवो भव और वसुधैव कुटुम्बकम की पैरवी करने वाले समाज में यह वंचितों को जीवन की आधारभूत जरुरतों से मरहूम होते हुए दिन-ब-दिन देखने का मामला है। 

नब्बे के दशक में राव सरकार के दौरान 73वां संविधान संशोधन किया गया था। तभी से इसे लागू करने की बातें चल रही हैं। पंचायतों की सूची में शामिल 29 विभागों की स्थिति पर केन्द्र सरकार का रुख सामने है। बीते पंचायती राज दिवस पर वैंकैया नायडू ने राज्यों से पैरवी की जरुरत को रेखांकित कर इसे एक बार फिर दुहराया था। सही मायनों में इन शक्तियों के अभाव में ग्राम स्वराज के स्वप्न का साकार होना आसान नहीं होगा। इस महापंचयत में परिषद ने सभी राज्यों में इस व्यवस्था को लागू कराने के लिए संघर्ष का रास्ता चुना है। आशा  के अनुरुप ही मैंने उनकी प्रतिति को यथार्थ में परिवर्तित करने से जुडे़ महत्वपूर्ण पहलुओं पर प्रकाश डाला था। इस क्रम में पिछले पांच सालों में हुए कुछ छोटे, मंझोले और बड़े कद-काठी के आंदोलनों का जिक्र जरुरी था। ऐसा करते हुए मैंने यह बताने का जतन किया कि किस तरह से इन आंदोलनों में सक्रिय लोगों का समर्थन और सहयोग हासिल किया जाय। और इससे ग्राम स्वराज का लक्ष्य अर्जित करने के प्रयासों को बल मिले। 

महासमिति गैरबराबरी को ग्रामीण और शहरी नामक दो किश्मों में विभाजित करती है। इस क्रम में कुपोषण और भूख से तड़पती जनता के दर्द का विश्लेषण होता है। साथ ही भोजन का अधिकार से लेकर काम के अधिकार तक की तमाम बातों पर चर्चा छिड़ती है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के तीन सौ से ज्यादा ग्राम पंचायतों के लिए नई मुहिम शुरु करने की बात भी उठती है। दिल्ली के ग्रामीण क्षेत्र का दुर्भाग्य है कि यहां 1983 से ही पंचायतों के चुनाव नहीं होते। परंतु पंचायतों को मिलने वाले बजट को खर्च करने के लिए विभाग बदस्तूर कायम है। अरविन्द केजरीवाल के मोहल्ला सभा के सामने पंचायत परिषद की मुहिम वास्तव में कैसी होगी? यह अभी नहीं कहा जा सकता है। पर इस मामले पर अब चर्चाएं लगातार होने लगी हैं। 

केन्द्र और राज्य की सरकारों को पंचायती राज प्रतिष्ठानों की समस्या दूर करने में सहयोग का रुख अख्तियार करने की जरुरत है। इस क्रम में उन्हें पंचायत प्रतिनिधियों के असंतोष को भी समझना होगा। आज वस्तुस्थिति ऐसी है कि जमीन पर पंचायती राज संस्थान और इनके प्रतिनिधि राज्य और केन्द्र की योजनाओं को लागू करने की एजेंसी के रुप में सिमटने को विवष हैं। इस महासभा के बाद हुए प्रेस वार्ता की आखिरी घोषणा मुझे साफ-साफ याद है। सभापति ने कहा था कि पंचायत परिषद कोई कांग्रेस पार्टी या किसी दूसरे पार्टी का नहीं है, इसमें हर पार्टी के लोग हैं। यही बात मेरे केविएट का सार था। और ऐसा कायम नहीं रहने की ददशा में गांधी, मेहता, शास्त्री, बिनोदानंद झा और लोक नायक के सपनों की एक साथ हत्या होगी। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51 में वर्णित दायित्वों का निर्वहण करने के लिए इस थाती को सहेजना बेहद आवश्यक है। यह कार्य सरकार, समाज और व्यक्ति विषेष के स्तर पर बेहतर तारतम्य स्थापित कर ही सुनिश्चित हो सकती है।