तीसरी सरकार बनाम पहली सरकार

कौशल किशोर | Follow @HolyGanga

balvantray_mehtaआज भारत-पाक युद्ध के दौरान शहीद हुए बलवन्त राय मेहता का 116वां जन्मदिन है। पाकिस्तानी सेना ने कश्मीर में घुसपैठ और कब्जे की नीयत से अप्रैल 1965 में ‘आॅपरेशन जिब्राल्टर’ शुरु किया था। बाद में यह भारत-पाकिस्तान युद्ध के रुप में परिणत हुआ। नतीजतन भारत को एशिया में शाक्तिशाली राष्ट्र होने का गौरव मिला। इसी महाभारत के दौरान एक पाकिस्तानी फाइटर जेट ने 19 सितम्बर को सिविलियन बीचक्राफ्ट को हवा में अवरुद्ध कर उड़ा दिया। इसमें मेहता दम्पति समेत कुल आठ लोगों की मौत हुई। इस घटना को पचास साल बीत चुके हैं। उनकी शहादत के चैथे दिन अमेरिका, तत्कालीन सोवियत संघ और संयुक्त राष्ट्र के दखल से सीजफायर की घोषणा हुई। एक बार फिर पाकिस्तान के साथ तनाव बढ़ रहा है। पठानकोट में हुए आतंकवादी हमला और डेविड कोलमेन हेडली (दाउद गिलानी) की गवाही से भारत को अस्थिर करने में पाकिस्तान की भूमिका का पर्दाफास होता है। सवालों की फेहरिस्त दिन-ब-दिन लंबी हो रही है। इसी बीच उपद्रवी तत्वों ने भारत की बरबादी और पाकिस्तान जिन्दाबाद के नारे भी लगाए हैं। शान्ति स्थापित करने की तमाम कोशिशों के बीच तनाव बढ़ाने वाली घटनाएं अनवरत हो रही हैं। ये सभी घटनाक्रम अच्छे दिनों का प्रतीक नहीं है। 
 
बलवन्त राय मेहता स्वतंत्र भारत में पंचायती राज के जनक माने जाते हैं। शहादत से ठीक दो साल पूर्व उन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री का पद संभाला था। इसके अतिरिक्त लोक सेवक मंडल और अखिल भारतीय पंचायत परिषद जैसी महत्वपूर्ण संस्थाओं के अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी बखूबी निभाते रहे। उनकी शहादत से सामाजिक समरसता कायम रखने में अहम भूमिका निभाने वाली इन संस्थाओं को बड़ा झटका लगा। उनके बाद लाल बहादूर शास्त्री ने लोक सेवक मंडल के अध्यक्ष का पद संभाला। ताशकंद समझौते के अगले ही दिन उनका असामयिक निधन तथाकथित हृदयाघात से हुआ। तो दूसरी ओर पंचायती राज और स्वराज का स्वदेशी सपना भी बिखरने लगा। बिहार राज्य की सुव्यवस्थित पंचायत परिषद को देखकर मेहताजी ने पंचायतों के राष्ट्रव्यापी संगठन की स्थापना का बीड़ा उठाया था। जिसे बाद में जय प्रकाश नारायण ने आगे अवश्य बढ़ाया। परंतु उनके बाद बिहार में ही दो दशकों से भी ज्यादा समय तक पंचायतों के चुनाव नहीं हुए। दूसरे प्रदेशों में भी पंचायतों की दशा ढुलमुल नीतियों का शिकार होती रही। जो अबतक बरकरार है।
 
गांधीवादी समाजसेवियों ने मेहताजी के जन्मदिन पर पंचायत दिवस मनाने की परंपरा शुरु किया। कई दशकों से यह आज भी बदस्तूर जारी है। परंतु मनमोहन सिंह सरकार ने इसके बदले 24 अप्रैल को राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस मनाना प्रारंभ किया। इस परिवर्तन से जुड़ी कड़ियां परत-दर-परत विकसित हुईं। इन्हीं परतों में पंचायतों का राष्ट्रीय संगठन अखिल भारतीय पंचायत परिषद दम तोड़ता प्रतीत होता है। इस क्रम में नेशनल हेराल्ड मामले जैसा हजारों करोड़ की पंचायती सम्पत्ति के हेड़ाफेरी का प्रयास भी सामने आता है। आज फिर इस विषय में मोदी सरकार का रुख आशा जगाती है। पूर्व भाजपा अध्यक्ष और केन्द्र सरकार में प्रभावशाली मंत्री नितिन गडकरी और राजनाथ सिंह ने तीसरी सरकार को मजबूत बनाने और पंचायत परिषद को पुनः जीवित करने का प्रयास आरंभ किया है। 
 
महात्मा गांधी हिन्द स्वराज की बात करते हैं। दीनदयाल उपाध्याय ने सत्ता के विकेन्द्रीकरण की पैरोकारी किया। वास्तव में दोनों विभूतियों ने आम जनता को शक्ति संपन्न बनाने की पूरजोर कोशिश किया था। परंतु राज्यों और केन्द्र की सरकारों का रुख हैरान करता है। इमरजेंसी के बाद से सरकारें इस मामले में प्रायः उदासीन बनी रही। संविधान के 73वें और 74वें संशोधन के माध्यम से इस कमी को पूरा करने का खोखला प्रयास अवश्य किया गया। केन्द्र, राज्य और समवर्ती सूची की तरह पंचायत सूची के अभाव में यह खोखलापन दूर हो, इसकी कोई संभावना दूर-दूर तक नहीं है। अन्ना आन्दोलन के छुपे रुस्तम सुरेश शर्मा और पंचायत परिषद के अध्यक्ष वाल्मीकि सिंह तीसरी सरकार को पहली सरकार मानते हैं। ग्राम पंचायत और नगर पंचायत से जुड़े मुद्दों पर सक्रिय जय हिन्द मंच ने पिछले महीने हरियाणा में हुए पंचायत चुनावों में 300 सीटों पर उम्मीदवार खड़े कर 241 सीटों पर जीत हासिल किया है। इन प्रयासों से उम्मीद जग सकती है। पर क्या व्यवस्था की कमियां सचमुच दूर होंगी? और क्या स्वराज का सपना साकार होगा? ऐसे कई बेहद जटिल प्रश्न हैं।  
 
आशा की किरणें कभी अस्त नहीं होती। पाकिस्तानी एयर फोर्स के पायलट कैज हुसैन ने बीचक्राफ्ट का मार्ग अवरुद्ध कर हत्याकांड को अंजाम दिया था। उस समय वह आदेश का पालन कर रहे थे। रिटायरमेंट के बाद करीब पांच साल पहले हुसैन ने बीचक्राफ्ट के शहीद पायलट जहांगीर इंजीनियर की बेटी फरीदा सिंह को ई-मेल भेजकर शोक प्रकट किया। इससे नागरिक और सरकार के बीच का फासला उजागर होता है। यह लोकतंत्र की कामयाबी का सूचक नहीं है। पिछली बार राजग सरकार ने नई दिल्ली और लाहौर के बीच यात्रा सेवा शुरु किया और कारगिल की लड़ाई भी लड़ी। आज फिर विरोधाभाषों के बीच संकट गहरा रहा है। निश्चय ही यह भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं है। आशा की किरणों को तलाशना होगा।
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