The Holy Ganga: Comment on the Book..

THG.jpgIncredible India! Over the centuries, with her incredible characteristic, India has gone through innumerable tests of patience and strengths. For a few hundred years, India was ruled by many powers. Indian democracy and secularism often misunderstood by several people worldwide. This secularistic character has been misinterpreted as her cowardice. However, the truth lies in the word: ‘tolerance’. India and the people dwelling in India are ‘tolerant’.

To me India is not merely a country; rather it is a message to the whole world. It is the message of unconditional love and human brotherhood. India‘s rich legacy of ancient spiritual heritage and socio-cultural tradition have taught the world the ideal of a ‘single planetary community’ i.e. Vasudhaiva Kutumbakam. This ideal is embedded by an ever flowing holy stream of water on her eternal journey from Gangotri to Ganga Sagar, which we call the river Ganges or the mother Ganga: the soul of India. Over the centuries, the sacred water of this river has carried the blessings of millions of great seers, saints and ascetics of the Himalayas.

The sun shines upon the river Ganges to evaporate her, but she transforms herself and returns as rain that brings life-force within all of us. Just sitting and contemplating by the banks of the holy Ganges, one might discover the divine potential within oneself. The melodious sound of the flowing Ganges teaches us that if we are here to live in peace, it will be together or not at all. While reading The Holy Ganga, I reminisced the golden times of my life on the banks of the river Ganges in the Himalayas. Each chapter of the book passionately explains the highest and most enviable qualities of the mother Ganges.

In The Holy Ganga, the author explains the mythology, history, spiritual and socio-economic significance of the river Ganges. This is a magnificent book in pursuit of the spiritual aspects of the Ganges that also discusses various problems like global warming and human values. The author explains many authentic and simple ways for fighting the menace of ever increasing pollution of the river. The pursuit ends with the firm resolution and final solution that rests on our own doorsteps. The author raises awareness about the Green Ganga Campaign, which I have been involved in for the past 22 years. The Soham Baba Mission is dedicated to the global green movement by implementing action for green care. I thus offer my wholehearted support to such an initiative by the Ganga keepers (devotees of the mother Ganges), and also praise the author for being actively involved in the preservation of the Ganges. The crisis in biodiversity, the increasing suicide rate among the indigenous people and low scale farmers, the melting ice and glaciers of the Himalayas, the rising sea level and the increasing temperature of our planet are the results of global warming. Climate change has also disrupted the livelihood of ascetics and saints living in the Himalayan region. Melting ice caps also cause the depletion of fresh water reserves at higher altitudes.

I strongly believe that the author has made enormous efforts to bring awareness about these issues amongst his readers. This is a marvelous and noble literary work. There is no doubt that the existence of the Mother Ganges might be abolished from the map of Indian subcontinent in near future, if we ignore her natural image by being engrossed in our modern lifestyle. I further believe that readers will be inspired by this book. I encourage them to visit all the holy places located on the banks of the Ganges many times to explore the beauty, tranquility and secret healing powers of the holy Ganga. At the very end, I would like to add that if all the people become true lovers of the Ganges, it would be the greatest reward to the author of this literary work.

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गंगा की व्यथा-कथा

कौशल किशोर @HolyGanga

Courtesy: News18
Courtesy: News18
मैं गंगा मुक्ति आंदोलन के विषय में कैसे कहूं। गंगा तो स्वयं ही मुक्ति देने वाली है। मेरी बात सुनकर एक मित्र जोरदार ठहाका मारते हैं। कुछ ठहर कर वह इस आन्दोलन से जुड़े पांच लोगों का नाम भी पूछते हैं। गंगापुत्र निगमानंद, बाबा नागनाथ और स्वामी सानन्द कहकर मैं चुप हो जाता हूँ। पर अब मेरे लिए हंसी रोकना आसान नहीं था। विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन से जुड़े विशेषज्ञों ने भले ही इस आन्दोलन की योजना बनाने में रुचि नहीं लिया है। गंगा की एक छोटी धार पर पेड़ की छांव में बनने वाली योजना दमदार हो सकती है। आजकल इन्हीं मसलों को लेकर वहां भी कर्इ लोग आन्दोलित हैं। इसका नतीजा भी सामने है। गंगा और हिमालय के प्रबन्धन में फेर-बदल हुआ है। यह सुनकर मित्र शान्त हो गये।
गंगा की मुä कि मार्ग अत्यंत कठिन हालातों से गुजरता है। सदियों पुराना यह आंदोलन अब नए युग में प्रवेश कर रहा है। और इस गदर के शहीदों पर हंसने वालों की कोर्इ कमी नहीं है। सच्चार्इ तो यह है कि बाजार में भी इसी गंगा की कोख से उत्पन्न हुर्इ क्रांति धूम मचा रही है। बड़े खिलाडि़यों का यह खेल भी खूब दिलचस्प है।
पिछले तीन सालों में दो बार गंगा की मुä किे लिए बलिदान सुर्खियों में रहा है। उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में जमीन लाल हो चुकी है। ऐसे में इस सत्याग्रह के बारे क्या कहा जाय! गंगा मुä कि यह आंदोलन भारतीय इतिहास में अपने किश्म का विलक्षण कार्यक्रम है। इसे व्यä करने के क्रम में बाबा नागनाथ गंगादर्शन के अंतिम-रश्म की व्याख्या कर डालते थे। मैं कानपुर के जाजमऊ क्षेत्र में जीव-जंतुओं और वनस्पतियों पर भी एक निगाह डालने का निवेदन करुंगा।
इस मामले में आम जनता की रुचि जगजाहिर है। यह व्यथा-कथा गंगा के उदभव की गाथा की तरह ही प्रतीत होती है। भागिरथी आर्यावर्त के प्रतापी सूर्यवंशी सम्राटों के त्याग और तपस्या की निशानी मानी जाती है। यहां भी अंशुमान और दिलीप की तरह निराशा और फिर घोर निराशा है। गंगा और गंगापुत्रों की व्यथा सुनने-समझने के बाद ऐसा ही लगेगा। आज उसी मुäदियिनी कही जाने वाली गंगा की मुä किे लिए बलिदानाें का क्रम जारी है। ऐसी परिसिथति में इसे गंभीरता से देखना आवश्यक है। वास्तव में नागनाथ और निगमानंद गंगा को अविरल और निर्मल देखना चाहते थे। पर बाहर उन्हें अविरल गंगा और निर्मल गंगा के बदले हर-हर गंगे का स्वर ही सुनार्इ देता रहा! समाज पर पैंनी नजर रखने वाले लोग 13 जून 2011 को गंगापुत्र निगमानंद की शहादत से सन्नाटे में थे। फिर 11 जुलार्इ 2014 को बाबा नागनाथ के बलिदान ने भी एक पल के लिए कुछ लोगों को चौंका दिया था। हरिद्वार और काशी में इन गांधीवादी सत्याग्रहियों के साथ कभी स्वामी सानंद भी तपस्या करने बैठे थे। ये सब कुछ भूदान आंदोलन के प्रणेता की स्मृतियों में ले जाने के लिए पर्याप्त है। गांधी के देश में इससे बुरा क्या हो सकता है? मुशिकल सवाल है।
गंगा नदी की हालत साफ-साफ कहती है कि इसके कछार में रहने वाले आम लोग भी ठीक वैसी ही हालत में हैं। और कमोबेश सरकारें भी वैसी ही हैं। क्या यह प्रदूषण और बदहाली देश की मजबूरी है? किसी युग में गंगा और इसकी दूसरी सहायक नदियों का जल समुची नदीघाटी में पेयजल की तरह प्रयोग के योग्य था। क्या अब इसकी कल्पना भी की जा सकती है? आज गंगा की यही सबसे जटिल व्यथा है। पूंजी के आधुनिक खेल में इसकी ओर सतत अनदेखी होती आ रही है। यह अनदेखी ही है या कुछ और? नदी में प्रवाहित जल स्नान के योग्य भी नहीं रहा। आचमन तो दूर की बात है। अब यह आंदोलित होने का विषय भी नहीं रह गया। यहां कर्इ बिन्दुओं का स्पष्ट होना आवश्यक है। अविरल और निर्मल जल से जुड़ा मुíा सर्वोपरि है। कर्इ बार इसे परिभाषित करने की जरुरत पड़ी है।
बिना किसी अवरोध के नदी का नैसर्गिक प्रवाह ही अविरल माना जाता है। जलाशय में तब्दील करने से वह शील भंग होता है। इसलिए पहले बांधों, पुलों, सुरंगों, आदि में इसे बाधित करना निषिद्ध था। निर्मल जल से आशय अक्षिंजल से है। यह पीने से इतर अन्य पवित्र कार्यों में उपयोग के योग्य होने का मानक माना जाता है। गंगा के नाम भी हजार हैं। इन सूत्रों का रहस्य बड़ा निराला है। इस अविरल प्रवाह को पापनाशिनी कहकर समाज सम्मानित करता रहा। अविरलता की तरह ही निर्मलता भी गंगा जल का प्राकृतिक गुण था।
भागिरथी सदैव अविरल और निर्मल रही होगी। ऐसा कहना संभव नहीं होगा। आजादी से पहले तक इसकी निर्मलता के प्रमाण मिलते हैं। पर अविरलता के विषय में ऐसा नहीं है। काव्यों में जा–ु की जा–वी से लेकर भीष्म के तीरों से बंधी नदी तक का व्यौरा है। आधुनिक काल में र्इस्ट इंडिया कंपनी ने गंगनहर बनाकर यह काम आरंभ किया था। हाल में सर प्रोबे काटले की यह मंहगी कृति खासा चर्चा में रही है। पहले विश्वयुद्ध के 100 साल और गंगनहर के 160 साल पूरा होने पर शुरु हुए ‘जश्न-ए-गदर में इस पर खूब हंगामा होता रहा है। दरअस़ल इससे गंगा की अविरलता प्रभावित होती थी। इस मुíे का राष्ट्रीय आंदोलनों के केंद्र में पहुंचना तय था। सिपाही विद्रोह से पूर्व के कालखंड में ही यह क्रांतिकारियों को आंदोलित करने का प्रमुख कारण बना था। आजादी से करीब सौ साल पहले गंगनहर के निर्माण (1848-1854) के दौरान ही विरोध के सबसे तीव्र स्वर उभरे थे।
उन दिनों ऐसा होना स्वभाविक था। गंगा-राइटस जनस्मृतियों में सबसे अमूल्य धरोहर की तरह रची-बसी थी। वह समाज नदी की अविरलता के महत्व को भली-भांति समझता था। आकाश गंगा को पाताल गंगा में समेटने का दुस्साध्य काम करने वाले राजा जनक के जादूर्इ सरोवरों को गढ़ने की परंपरा भी नष्ट नहीं हुर्इ थी। समाज तालाबों, कुओं और बावडि़यों को रचने-गढ़ने में माहिर था। उस दौर में हिंदु महासभा और राजवाड़े गंगनहर का घोर विरोेधी बनकर उभरे थे। कालक्रम में यह गंगा की धाराओं की तरह ही व्यापक हुआ था।
वास्तव में गंगा कोर्इ एक नदी नहीं बलिक हिमालय और हिन्द महासागर को जोड़ने वाली प्राकृतिक जलधाराओं का अतिविशिष्ट ‘गंगा रिवर सिस्टम है। इसमें भारतीय उपमहाद्वीप की कर्इ महत्वपूर्ण नदियां शामिल हैं। गोमती, रामगंगा, यमुना, चंबल, सरयु, सोन, गंडक, कोशी, बागमती और दामोदर जैसी नदियां इसमें समाकर गंगा कहलाती हंै। इन सभी नदीघाटियों में यह आंदोलन आग की तरह फैल गया था। इसकी विशालता देश की आधुनिक राजनैतिक सीमाओं का अतिक्रमण कर गया। नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, म्यांमार और चीन (तिब्बत समेत) के हिस्सों में भी चिंगारी पहुंच गर्इ। अंग्रेजों के खिलाफ कर्इ स्थानों पर छोटे-छोटे विद्रोह पहले से ही चल रहे थे। गंगा की मुä कि मसाला आंदोलनकारियों को एक करने में कारगर हुआ था। शायद आगे ऐसा कभी नहीं होगा।
आखिरकार महामना मालवीय के युग में अविरलता का मुíा परवान चढ़ा था। महामना मदन मोहन मालवीय हिंदु महासभा के प्रतिनिधि थे। उनके नेतृत्व में वायसराय से हुए समझौते के बाद 1916 में भागीरथ-बिंदु से अविरल प्रवाह पुन: स्थापित हुआ। यह र्इस्ट इंडिया कंपनी की गंगनहर परियोजना में एक मामूली सा फेर-बदल था। अंग्रेजी राज में भारतीय लोगों को इतने से काम के लिए 68 सालों तक संघर्ष करना पड़ा था। जबकि कंपनी को इसे अमलीजामा पहनाने में कुल 6 ही साल लगे थे। यही संघर्ष उस वेदना के मूल में था, जो महामना के अंतिम दिनों में काशी प्रवास के दौरान उन्हें सताता रहा था।
आजादी के बाद हालात बहुत बदले हैं। आरंभिक दो दशकों में राष्ट्रीय राजधानी में यमुना का जल मटकियों में भरकर लाने का रिवाज कायम रहा। सैकड़ों तालाबों, बावडि़यों और कुओं ने दिल्ली के लाखों लोगों को जीवनरक्षक जल देना जारी रखा था। यह ड्रेनेज सिस्टम के लिए भी अनुकूल था। यधपि इस बीच जलविधुत परियोजनाओं का श्रीगणेश हो गया था। पर तृपित पाने की पुरानी परंपरा पूर्ववत चलती रही। यह कतर्इ नहीं कह सकते कि इन दो दशकों में गंगा और यमुना जैसी पवित्र नदियां पूर्णत: स्वच्छ और निर्मल रही होगी। सत्तर के दशक में नए सिरे से गंगा की व्यथा-कथा प्रकट होना आरंभ हुआ था।
बिहार में इमरजेंसी से पहले ही गंगा में आग लगने की खबरों ने तहलका मचाया था। इस बार प्रदूषण नामक दानव गंगा की निर्मलता हरण कर बैठा था। जेपी आंदोलन से जुड़े रहे विजय कुमार प्रदूषण और जलदारी के खिलाफ कार्यकर्ताओं की सक्रियता के विषय में रोचक विवरण प्रस्तुत करते हैं। इसी दौर में पनबिजली परियोजनाओं के विरुद्ध भी आवाजें उठीं। चिपको आंदोलन से जुड़े रहे सुंदरलाल बहुगुणा सत्याग्रहियों को कुचलने की लंबी दास्तान सुनाते रहे। अस्सी के दशक में गंगा की अविरलता और निर्मलता का मुíा उत्तराखंड और बिहार में जोर-शोर से उठने लगा था। इसी कालखंड में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने इसे स्वच्छ और निर्मल बनाने की घोषणा किया था। गंगा एक्सन प्लान का सूत्रपात कर उन्होंने खूब वाहवाही लूटी। बाजार में तब से ही यह मुíा सुर्खियों में रहा है।
भूमंडलीकरण का दौर आने पर 1990 के दशक में गंगा की हत्या की गयी। कभी संपूर्ण स्वराज की मांग करने वाला समाज गंगा-राइटस से भी वंचित हो गया। इस दौर में साफ हुआ कि गंगा किस बाजार में है। वह पूंजी के हाथों की पुतली बन चुकी थी। नदी पर स्थानीय समुदाय का नियंत्रण नहीं रह गया। इस बीच जनता और जनप्रतिनिधियों के बीच भी गहरी खार्इ का निर्माण हुआ। गंगा की धाराओं को सुरंगों में जमींदोज कर विलुप्त करने का उपक्रम शुरु हुआ। क्या विश्वबैंक ने सरकारों का काम योजनाओं को अमलीजामा पहनाने तक ही सीमित नहीं कर दिया? यह कर्ज का मर्ज ही कुछ ऐसा है। अब हालात ऐसे हो गए कि कुर्बानियां ही शेष रही। यही दौर निगमानंद जैसे क्रांतिकारी चेतना का अभ्युदय काल है। गंगा के लिए उन्होंने 1998 से अंतिम क्षणों तक अनवरत संघर्ष कर मिसाल कायम किया।
एक दशक बाद काशी में बाबा नागनाथ ने आमरण-अनशन शुरु किया था। उसी साल पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने गंगा को राष्ट्रीय धरोहर घोषित किया। फिर राष्ट्रीय गंगा नदीघाटी प्राधिकरण बनाकर इसे आइआइटी कंसोर्टियम और इटीआर्इ डायनमिक्स को सफार्इ का व्यापार करने हेतु सौंप दिया। यहां ध्यान रखना चाहिए कि पहले उन्होंने इसे भारत की आत्मा का प्रतिनिधि बताया था। वर्तमान प्रधानमंत्री ने तो गंगा के लिए अलग मंत्रालय ही बना दिया। पहली बार सांसद चुने जाने से पूर्व उन्होंने बनारस में कहा था, ‘मुझे न किसी ने भेजा है, न मैं यहां आया हूं, मुझे तो मां गंगा ने बुलाया है। यह र्इशारा भविष्य की किन योजनाओं का सूचक था? अब कुछ और साफ हुआ है। यहां इतना ध्यान रखना चाहिए कि गंगा की पुकार सुनने का दावा करने वाले प्रधानमंत्री स्वयं बनारस से चुने गए हैं। इस नाते भी उनकी नैतिक जिम्मेदारी बनती थी कि व्यास-पूर्णिमा के अवसर पर गंगा की मुä किे लिए प्राणोत्सर्ग करने वाले बाबा को एकबार याद करते। इस मामले में मोदी सरकार से बेहतर मनमोहन सरकार का ही रुख रहा। आपको याद होगा प्रो. जीडी अग्रवाल (स्वामी सानंद) के अनशन के कारण उन्होंने एकबार उत्तराखंड में कुछ खास बांध परियोजनाओं पर रोक लगाया था। और एकबार तो भेंट का प्रस्ताव देकर सत्याग्रह समाप्त करने की अपील भी किया था। इस बनारसी बाबा के साथ मोदीजी ऐसा करने से भी चूक गए। गंगा मामलों की मंत्री उमा भारती भी लंबे समय से ‘मिशन-गंगा में लगी रही हैं।
गंगा एक्सन प्लान से गंगा मंत्रालय के बीच करीब तीन दशक का फासला है। इसी बीच गंगा की दुर्दशा सबसे तेज गति से हुर्इ है। वस्तुसिथति का व्यौरा तो यही सच उजागर करता है। सीवर ट्रीटमेंट की व्यवस्था के साथ ही रासायनिक खाद और कीटनाशकों का बाजार बुलंद हुआ था। गंगा की सफार्इ के नामपर कृषि-भूमि को विषैला बनाने का लक्ष्य साधा गया। नदीघाटी में किसानों के लिए आत्महत्या की नौबत आ गर्इ। तबाही का नया अध्याय कर्इ सीढि़यां तय करने के बाद पिछले साल केदारनाथ में उपसिथत हुआ था। तैरने वाला समाज आज डूब रहा है। डूब मरने का यह सिलसिला सुंदरबन से केदारनाथ तक पहुंच गया है। यह नफरत की राजनीति की उपज है।
आजादी के 67 साल बाद सरकार गंगा के लिए अलग मंत्रालय बनाकर इस व्यथा का निदान करने जा रही है। कम से कम सरकारी घोषणाएं तो गंगा का कायाकल्प करने का दावा करती ही हैं। अभी ज्यादा दिन नहीं बीते हैं, उच्चतम न्यायालय में गंगा के मुíे पर सरकार की बड़ी फजीहत हुर्इ थी। भारत सरकार के सामने आज र्इस्ट इंडिया कंपनी की जगह विश्वबैंक मौजूद है। अविरल गंगा और निर्मल गंगा की राह में सबसे बड़ी मुशिकलें वहीं से खड़ी की जाती हैं।
इस आंदोलन में सर्वत्र बेबशी और लाचारी ही विराजमान दिखेगी। आजादी से पहले गंगा की धारा से छेड़-छाड़ नदीघाटी के लोगों को पसंद नहीं था। क्या अब लोग ऐसा पसंद करने लगे हैं? निश्चय ही ऐसा भी नहीं है। पुराने राजवाड़ों से लेकर आमजन तक के रुझान को इन तीन सत्याग्रहियों का हश्र देखकर समझा जा सकता है। फिर भी अलग-अलग जगह लोग आवाजें उठा रहे हैं। लोक सेवक मंडल से जुड़े दीपक मालवीय ने कानपुर में ‘गंगा-एलायंस शुरु किया। यह गंगा के लिए संघर्षरत सभी संगठनों और विचारधाराओं को एकजुट करने का बेहद मुशिकल अभियान है।
आज नदियों की पीड़ा चर्चा में है। इस क्रम में छोटी नदियों का मामला भी ध्यान में रखने योग्य है। कल्पना में भी गंगा की शुद्धता इन सभी को स्वच्छ कर ही संभव होगी। गंगा मंत्रालय के गठन के बाद क्या भविष्य में गंगा स्वच्छ और पवित्र हो सकेगी? ‘गंगा-राइटस आचमन और स्नान के लिए शुद्ध और पवित्र जल की जरुरत को रेखांकित करता है। पर इसके लिए तैयारी का अभाव है। वर्तमान में सरकार और समाज के बीच की कड़ी भी दुरुस्त नहीं है। आज बहुत कुछ ठीक विपरीत ध्रुवों पर खड़ा है। ऐसी दशा में संभव है कि अविरल गंगा और निर्मल गंगा के बदले भविष्य में हर-हर गंगे का ही स्वर सुनार्इ दे।
लेखक सामाजिक कार्यकत्र्ता और स्वतंत्र पत्रकार हैं।
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अभिव्यक्ति की आजादी का मुद्दा 

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कौशल किशोर @HolyGanga
‘अंदाज-ए-बयां कल के बहुत खूब नहीं हैं।
शायद कि तेरे दिल में उतर जाय मेरी बात।
पता नहीं किस शायर की लाइंस हैं। पर इन्हीं खूबसूरत शब्दों से एम.ए.आलमगीर साहेब ने उस दिन अपनी बात शुरु की थी। मुझे बहुत साफ-साफ याद है। कुछ ही देर पहले मैंने उस मंच से टिप्पणी की थी। वह करीब पांच मिनट की संक्षिप्त सी बात थी। हां, उनकी शहादत से ठीक चौदह सप्ताह पहले, वह 2 मार्च 2014 का दिन था। और हम कांग्रेस मुख्यालय के सामने अभिव्यक्ति की आजादी के मुद्दे  पर धरना-प्रदर्शन कर रहे थे। सचमुच युएनआर्इ बचाओ आन्दोलन के इतिहास में वह उत्सव का दिन था। कुल छ: मिनट में ही उन्होंने आन्दोलन का रुख स्पष्ट कर दिया था। उन्हें सुनते हुए मुझे इतना अच्छा लगा कि स्पीच खत्म होने से पहले ही मैंने कुछ साथियों को छेड़ना नागवार समझा था। अब स्वतंत्र संवाद की मांग करने वाला वह मसीहा हमारे बीच नहीं है। पर इस बीच उनकी बातें बराबर मेरी स्मृतियों में उभरती रही हैं। शायद आपसे साझा कर इस रुह को कुछ राहत मिले।
अभिव्यक्ति की आजादी के मसले पर इस आन्दोलन की चर्चा के क्रम में कुछ अहम बातों को ध्यान में रखना जरुरी है। इस सन्दर्भ में एक बात जान स्वींटन की है। किसी जमाने में वह ‘द न्यूयार्क टाइम्स के चीफ आफ स्टाफ थे। उन्होंने न्यूयार्क प्रेस क्लब में अपने सम्मान में दिए गए भोज-समारोह को संबोधित करते हुए 1953 में कहा था, ‘विश्व इतिहास में आज की तारीख में अमेरिका में स्वतंत्र प्रेस नाम की कोर्इ चीज नहीं है। यह आप भी जानते हैं और मैं भी जानता हूं। आपमें कोर्इ भी ऐसा नहीं है, जो अपनी निष्पक्ष राय रखने की हिम्मत करे और यदि कोर्इ उसे प्रस्तुत करता है तो उसे पहले से ही पता होता है कि वह कभी नहीं छपेगी। मुझे हर सप्ताह इसलिए पैसे मिलते हैं कि मैं अपनी निष्पक्ष राय अपने अखबार से अलग रखूँ। सबको इसलिए वेतन दिए जाते हैं और अगर आप में से कोर्इ अपनी निष्पक्ष राय लिखने की मूर्खता करेगा तो वह पटरी पर दूसरी नौकरी तलाश करता मिलेगा। यदि मैं अपनी निष्पक्ष राय अपने अखबार के किसी अंक में डाल दूंगा तो चौबीस घंटे के अन्दर मेरी नौकरी चली जाएगी। अब युएनआर्इ की ऊर्दू सेवा से जुड़े रहे इस वरिष्ठ पत्रकार की दर्दनाक मौत को और एक कदम आगे का विकास मानने में हमें कोर्इ आपत्ति भी नहीं रही।
कृष्ण मेनन ने कहा था कि अखबार के प्रेस और जूट के प्रेस को उनके मालिक एक जैसा मानते हैं। यह मालिकों के अधिक मुनाफा कमाने की प्रवृत्ति को इंगित करता है। असली मायनों में भारतीय पत्रकारिता की शुरुआत समाजसेवा के कार्य की भांति हुआ था। टाइम्स आफ इंडिया के पूर्व एडिटर गिरिलाल जैन ने कभी इसकी मिसाल पेश किया था। उन्होंने मालिक परिवार के एक हेकड़ीबाज युवक का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं किया और संपादक पद को अलविदा कह दिया था। क्या देश की आजादी के 67 साल बाद भी ऐसा ही है? यहां पूर्व प्रधानमन्त्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के कथन पर गौर करने से पत्रकारिता में आर्इ कमियों की ओर नजर पड़ती है। उन्होंने कहा था कि जिसे कोर्इ काम नहीं मिलता वह इस पेशे में आकर दलाली करता है। इन महत्वपूर्ण बातों को ध्यान में रखकर ही आज इस मुíे की वास्तविक अहमियत समझा जा सकता है। आलमगीर साहेब की बातों पर नजर डालने से चौंकाने वाले तथ्य सामने आते हैं। उन्होंने विदेशी शकितयों द्वारा भारत में स्थापित न्यूज एजेंसी की सफलता के सापेक्ष स्वदेशी सूचना तंत्र पर कठोर आघात को कारगर ढंग से उजागर करने का कमाल कर दिखाया। बेशक उन्होंने हमारे युग का सबसे क्रांतिकारी कार्य किया है। उन्हें नहीं जानना इस युग की बड़ी भूल ही मानी जाएगी।
आज से 54 साल पहले युनाइटेड न्यूज आफ इंडिया का Üाृजन हुआ था। यह राष्ट्रहित में देश-दुनिया पर पैंनी नजर रखने के क्रम में निष्पक्षता सुनिशिचत करने का सार्थक प्रयत्न माना जाता रहा है। नाम के अनुरुप ही इसमें देश के मीडिया प्रतिषिठान साझीदार होते हैं। उस दौर में प्रिंट मीडिया का वर्चस्व था। परिणामस्वरुप समाचारपत्र प्रकाशित करने वाले समूहों ने अपने हिस्से के शेयर खरीदे। इस न्यूज एजेंसी को खड़ा काने में सत्तार्इस शेयरधारकों ने 10,189 शेयर खरीद कर कुल 10,18,900 रुपये जमा किये थे। यह अंग्रेजी हुकुमत के दूसरे विश्वयुद्ध के बाद की जरुरतों को पूरा करने के लिये बनी प्रेस ट्रस्ट आफ इंडिया के बरक्स एक विशुद्ध राष्ट्रीय एजेंसी की जरुरत को पूरा करती थी।
नेहरुजी का यह सपना आजादी के एक युग बाद जाकर ही साकार हो सका था। आजादी के बाद स्वतंत्र संवाद की Üाृंखला में इस विकास का अनूठा महत्व भी है। इस तथ्य को किसी भी सूरत में नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता है। सैकड़ों पत्रकारों और कर्मचारियों को रोजगार मुहैया कराने वाला यह संस्थान क्या सचमुच आज बेहद मुशिकल दौर से गुजर रहा है? यदि हां, तो इस ओर अनदेखी करना सदैव अनुचित ही माना जायेगा। यहां ध्यान रखना चाहिए कि भारत के पहले प्रधानमन्त्री ने नक्षत्रों की तरह सत्तार्इस सहयोगियों की पृष्ठभूमि में इसे खड़ा किया था। इन टिमटिमाते तारों पर आज भी कर्इ लोगों की नजरें टिकी हुर्इ है।
इस कार्य में पशिचम बंगाल के पहले मुख्यमन्त्री डा विधानचंद्र राय की विशेष भूमिका रही। गंभीर परामशोर्ं के बाद आखिर में उन्होंने इस योजना का संविधान तैयार किया था। इसके चेयरमेन एक विशेष क्रम में परिवर्तित होते रहें। ऐसा विधान भी किया गया था। फिर उन्हीं के नेतृत्व में इसे लागू भी किया गया। आनन्द बाजार पत्रिका समूह की इसमें एक चौथार्इ से कुछ ज्यादा की हिस्सेदारी रही। मिथिला के प्रतिनिधि राज दरभंगा की कंपनी ने इसमें सात फिसदी की अंशधारिता खरीदी, तो कलिंग के सम्मानित स्वर समाज ने भी करीब एक फिसदी का अंशदान सादर समर्पित किया था। ज्ञातव्य है कि उडि़या दैनिक समाज का स्वामित्व लोक सेवक मण्डल (सर्वेंटस आफ द पिपल सोसाइटी) के हाथों में है। उस कालखंड में इस एजेंसी को देश ने स्वतंत्र संवाद का पर्याय माना था। क्या फिर कभी ऐसा माना जाएगा? यह बेहद मुशिकल सा सवाल है। और यही प्रश्न इस आन्दोलन के मूल में है। आलमगीर साहेब का हुनर इस बात को साफ-साफ उकेरने में ही जाहिर होता है।
नैतिक रुप से इसके अंशधारक ही प्रबंधन के लिए जिम्मेदार भी होते हंै। इनमें आर्यावत्र्त जैसे प्रतिषिठत पत्र का प्रकाशन वर्षों पहले बन्द हो चुका है। फिर भी यह एजेंसी आरंभिक काल से ही बराबर तरक्की की राह पर अग्रसर रहा। वर्ष 2006 में यह सैकड़ों पत्रकारों समेत एक हजार से ज्यादा लोगों को जीविका उपलब्ध कराने में सक्षम साबित हुआ था। नो-प्रोफिट-नो-लास का बिजनस चलता रहा। पर आज यहां कामगारों की संख्या करीब आधी हो चुकी है। एकदिन इसे और उन्नत करने के लिए ≈दर्ू सेवा शुरु किया गया था। आलमगीर साहेब ने बताया था कि किस तरह राजीव गांधी ने दिलचस्पी लेकर यह कार्य किया। उनकी बातों में फिरकापरस्त और सांप्रदायिक ताकतों को नेस्तनाबूद करने का व्यौरा मिलता है। उन्होंने संस्थान के अंदर बैठकर इसे नष्ट करने में लगे लोगों के बारे में भी खुलकर कहा था। दुर्भाग्य है कि इस षडयंत्र का सार्वजनिक मंच से खुलासा करने के बाद वह सौ दिन भी जीवित नहीं रहे। क्या यह दाग भी धुलने योग्य है? इसमें मुझे शक है।
इस मुíे की तह में पहुंचने के लिए गंभीर अध्ययन की जरुरत होगी। मीडिया की रंगीन दुनिया के अन्दर की सच्चार्इ जानकर ही युएनआर्इ बचाओ आन्दोलन से जुड़ी समस्याओं की गंभीरता का खुलासा होता है। पिछले साल दानिश बुक्स ने एक पुस्तक छापी थी, सफेदपोशों का अपराध। अर्थशास्त्र के प्रोफेसर गिरीश मिश्र और राजनीतिशास्त्र के प्राध्यापक ब्रजकुमार पांडेय की इस किताब में एक पाठ का शीर्षक है, मीडिया की दुनिया। इसमें एजेंसी के सत्तार्इस अंशधारकों में से कुछ खास नाम उनके उल्लेखनीय कार्यों के साथ वर्णित हैं। इसे पढ़कर भारत के पहले राष्ट्रीय एजेंसी की दुर्दशा के विषय में बेहतर समझने की गुंजाइश बनती है। ऐसी साफगोर्इ से यहां कह पाना मेरे बूते की बात नहीं है।
पिछले सात वर्षों में यह संस्थान सतत मृत्यु की ओर बढ़ती रही है। आज युएनआर्इ प्रबंधन में लंबे अर्से से काबिज रहे प्रफुल्ल माहेश्वरी और विश्वास त्रिपाठी की युगल-जोड़ी इस दशा के लिए जिम्मेदार मानी जाती है। उन्होंने नियमों को ताक पर रखकर एजेंसी के तीन हजार करोड़ की सम्पत्ति हड़पने का प्रयास किया है। पहली नजर में यह भूमाफिया का काम प्रतीत होता है। ऐसा करने में कोर्इ कसर बाकी नहीं रखा गया है। अबतक इसे बचाए रखने में सर्वोच्च न्यायालय और इस आन्दोलन के सूत्रधार समरेंद्र पाठक की महत्वपूर्ण भूमिका नजरअंदाज करने योग्य नहीं है। यहां आज भी चातक स्वाति की बूंदों से वंचित है।
न्यायालय में एबीपी समूह ने उन्हीं बूंदों को उपलब्ध कराने का भरोसा दिया था। पर यह इस संकट से उबरने का असफल प्रयास साबित हुआ है। इसकी वजह इस प्रकरण में ढ़ेर सारी समस्याओं की मौजूदगी है। आज रायटर का करीब सात करोड़ रुपये का बकाया है। कर्मचारियों के पीएफ का भी करीब इतने ही रकम का घोटाला उजागर हुआ था। इस विषय में प्रबंधन के खिलाफ रिपार्ट भी दर्ज है। यहां यौन उत्पीड़न और दलित उत्पीड़न के भी संगीन मामले हैं। संस्थान के निदेशक विश्वास त्रिपाठी की भूमिका भी संदेह के घेरे में है। उनके खिलाफ लाखों रुपये की वित्तीय अनियमितता का मामला प्रकाश में आया है। और इन सब के विरुद्ध खड़ा होने वाले या तो एजेेंसी से गायब हो जाते हैं या फिर इस दुनिया से ही। ऐसा कब तक चलेगा? क्या ऐसी दशा में भी प्रबंधन के अलावा सरकार की मंशा पर प्रश्न नहीं उठेगा? इसका जवाब सेबी की चिट्टी में अब नजर आता है। हालांकि राष्ट्रीय महिला आयोग और दूसरी अन्य सरकारी एजेंसियों ने इन मामलाें का संज्ञान लेकर उल्लेखनीय कार्य किया है। हाल ही में दिल्ली पुलिस की विजिलेंस सेल द्वारा इन मामलों में जांच भी शुरु किया गया है।
सहारा प्रमुख को जेल भेजने के बाद अब सेबी ने इस मामले में कार्यवाही किया है। यह वही संस्थान है, जिसने शारदा (सारधा) और सहाराश्री की पोल खोलकर आम लोगों (निवेशकों) को राहत पहुंचाया है। सेबी ने ‘सेव युएनआर्इ मुवमेंट को इस मसले में पत्र लिखकर सूचित किया है। पाठक बताते हैं कि एनबी (नव भारत) प्लांटेशन नामक इस चिट-फंड कम्पनी के सैकड़ों करोड़ का घोटाला सामने आया है। युएनआर्इ के विवादित चेयरमेन आज बेहद गंभीर कानूनी समस्याओं से जूझ रहे हैं। अब अपने भी उनका साथ छोड़ने लगे हैं। हाल ही में इस विषय में सनसनीखेज खबरें प्रकाश में आर्इ है। कांग्रेस की ओर से राज्यसभा सदस्य रहे प्रफुल्ल माहेश्वरी इस एजेंसी के लंबे समय से चेयरमेन हैं। बीते दिनों मीडिया रिपोर्ट में उनके इस्तीफे जैसी एक खबर आर्इ। सबलोग आशा कर सकते हैं कि किसी दिन इस त्यागपत्र की पूरी कहानी भी सामने आएगी।
सैंतालिस सालों तक इस एजेंसी ने दुनिया भर के लोगों को ताजा घटनाक्रम से जोड़कर रखने में अहम भूमिका निभार्इ। बाद में सफेदपोशों ने इस एजेंसी को अंदर से खोखला करने का लक्ष्य साधना शुरु किया। जाहिर सी बात है कि एक अर्से से युएनआर्इ प्रबंधन में अपराधियों का गैंग काबिज रहा है। अब इस बात का अंदाजा लगाना खासा मुशिकल भी नहीं रहा। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि युएनआर्इ से जुड़ी खबरें इसी एजेंसी के लिए कार्यरत पत्रकारों और कर्मचारियों को वर्ष 2007 से बाहरी श्रोतों से मिली है। डीएनए ने 32 करोड़ 4 लाख में हुए अंशधारिता के खरीद-फरोख्त का वह व्यौरा प्रकाशित किया था, जिसे बाद में एबीपी समूह उच्चतम न्यायालय लेकर चुनौती दी। अब चेयरमेन के त्यागपत्र की यह खबर भी युएनआर्इ श्रोत से नहीं है। गौर करने की बात है कि आजकल एक वेब पोर्टल के लिए कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार राजीव शर्मा की रिपोर्ट में इस बात का जिक्र है।
विभिन्न स्तरों पर इससे जुड़े मसलों को लेकर न्याय की गुहार का असर देखा जा रहा है। इस क्रम में आलमगीर साहेब अंतिम जन साबित हो सकते हैं। आज उनकी सुध लेने वाला कोर्इ नहीं है। क्या ऐसी दशा में लोकतंत्र में आस्था रखने वालों को संतुषिट मिलेगी? सुनील दत्त और देवीलाल जैसे प्रभावी नेताओं के कर्मवीर पुत्रों को जेल भेजने वाली व्यवस्था क्या कभी इस शहीद को न्याय देगी? इस आन्दोलन से जुड़े इन्हीं प्रश्नों ने आज प्राय: सभी शेयरधारकों का मुंह बन्द कर रखा है। पर इतना तो साफ हो गया है कि प्रबन्धन में आए दोषों के कारण ही कर्मचारी संगठन ने युएनआर्इ बचाओ अभियान का सूत्रपात किया। वास्तव में इस संवाद एजेंसी को बचाने की नैतिक जिम्मेदारी इसके अंशधारकों की ही होती है।
क्या एक क्रांतिवीर पत्रकार की शहादत के बाद प्रकाश की नर्इ किरण फूटी रही है? क्या अब यह एहसास गहराने लगा है कि आने वाले समय में इसके प्रबंधन का सबसे जटिल संकट दूर होगा? इस बीच लोक सेवक मण्डल ने इस मसले में गंभीरता दिखार्इ है। आखिरकार यह चर्चा एक्जीक्युटिव काउंसिल की बैठक तक पहुंच चुकी है। बीते 26 नवम्बर को बड़ौदा में हुर्इ बैठक में दीपक मालवीय को इस मामले की जिम्मेदारी सौंपा गया है। सोसाइटी के पहले उपाध्यक्ष उत्कलमणि गोपबन्धु दास ने नौ दशक पूर्व समाज का प्रकाशन शुरु किया था। एक अर्से से भीमसेन यादव और दीपक मालवीय इस प्रतिषिठत पत्र का प्रबंधन देख रहे हैं। देश-दुनिया आज इसके एक दर्जन संस्करणों का बेहतरीन प्रकाशन देखकर उनके कौशल से रु-ब-रु होती है। समाज में ‘मजिठीया वेज लागू कर उन्होंने इसे साबित किया है। लाल-बाल-पाल के शिष्यों से ही पत्रकार भी बेहतर भविष्य का आशा करते हैं। मालवीय ने शारदा चिट-फंड घोटाले में संलिप्त भुवनेश्वर प्रेस क्लब से जुड़े मधु मोहंती के खिलाफ कड़ा रुख अखितयार कर प्रशंसनीय कार्य किया है। परंतु आज की दुरुह परिसिथति में युएनआर्इ का संकट दूर करना चुनौतियों भरा काम ही है।
खबरपालिका को शासन-व्यवस्था का चौथा अंग कहा जाता है। श्रमजीवी पत्रकारों के इस आन्दोलन से स्पष्ट हो चुका है कि आज फिर कहीं अभिव्यकित की आजादी खतरे में है। यह भारतीय लोकतंत्र के लिए कोर्इ शुभ संकेत नहीं है। पर यहां इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है कि भाविष्य में लोक सेवक मण्डल की तरह ही कोर्इ और प्रभावी अंशधारक भी अभिव्यकित की आजादी के नये शहीद को याद करने का काम करे।
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