गलाकाट राजनीति के बीच गलाकाट हिंसा

(कौशल किशोर) दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले द्विपक्षीय आक्रमण की राजनीति रंग दिखाने लगी है। प्याज के व्यापार के बाद खौफ के साम्राज्य की ही बारी आती है। हाल में तमाम राजनैतिक दलों ने राष्ट्रीय राजधानी में प्याज का धंधा शुरु किया। जमाखोरी में लगे पूंजी के खिलाडि़यों के इस खेल में यह नया मोड़ है। पूर्वी दिल्ली के विवेक विहार और लक्ष्मी नगर इलाके से आधे दर्जन लोगों की गलारेत कर हत्या की खबरें आ रही है। रविवार की रात लक्ष्मी नगर के एक फ्लैट से पचासीवर्षीय बुजुर्ग महिला रमापति और उनकी पचपनवर्षीय बेटी रजनी ठाकुर की लाशें बरामद हुई। फिर सोमवार की शाम बजरंगलाल बोकाडि़या के साथ उनके ड्राइवर और दो घरेलू सहायकों की लाशें विवेक विहार स्थित घर के बेडरुम से बरामद हुई है। हम तो डर ही गये।
दो ही दिनों में आधे दर्जन लोगों की गला रेत कर हत्या का सनसनीखेज मामला राजधानी की फिजां में गूंज रहा है। गैंग अपना काम करता है और पुलिस अपना। पर राजनैतिक अर्थशास्त्र का यह गणित लक्षणों को देखकर इलाज के बदले सबूतों की मौजूदगी खोजने की वकालत करती है। आजादी के बाद पैंसठ सालों में भय और बाजार ने मतदाताओं को प्रभावित करने में अहम भूमिका निभाई है। प्याज के बढ़ते भाव के बाद भय कायम करने वालों की उपयोगिता शेष रह गयी थी। बाजार और सत्ता के समीकरण का नियंत्रण भयाक्रांत करने वाले अपराधी तत्वों के सौजन्य से ही होता है। पूर्वी दिल्ली की घटना से वह कमी पूरी हो रही है।
बाजारवाद की चीख के सामने देश की राजधानी का मध्यम वर्ग दम तोड़ने को विवश है। अभाव से जूझती नई पीढ़ी के नौजवानों की क्रयक्षमता का विकास अपराधीकरण का सबब बन रहा है। भारतीय सामाजिक व्यवस्था में यह बाजारु परिवर्तन भावी अनिष्ट का सूचक है। चुनाव का समय नजदीक आने पर समीकरण सेट करने का सिलसिला और तेज हो जाता है। सत्ता हस्तांतरण के पीछे यही दस्तूर तय हुआ था। आजाद भारत का सृजन इन्हीं नीतियों के आधार पर होने से ही तो आर्थिक विकास की संभावना बनती थी। पिछले कुछ दिनों से दिल्ली के कई पॉश इलाके में पुलिस की गाडि़यां से निकलती चेतावनी की नसीहतें सुनकर आशंका खड़ी हुई थी। उत्तर प्रदेश में चड्डी-बनियान गैंग की कार्यशैली कुछ खास जुदा नहीं थी। दिल्ली का गलारेतक गैंग राजनैतिक अर्थशास्त्र की नई फसल तो नहीं ही है। जमाखोरी के बाजारवाद की कई रंगीन व्याख्या होती रही है। प्याज का संकट नया नहीं है। और पूर्वी दिल्ली में मारे गये लोग इस तरह के हादसों का पहला शिकार भी नहीं है। कड़कड़डुमा कोर्ट रोड पर लोगों ने पांच घंटे का चक्काजाम कर विरोध किया है।
विरोध के कई तरीके आजाद भारत में दिखाई देते हैं। इनमें से कुछ तो एकदम नवीन भी हैं। आखिर तकनीकि संपन्नता का युग ठहरा! राजनीति के पक्के खिलाडि़यों के असली नुमाइंदे मैदान में सत्याग्रह के बदले दुराग्रह पर ही उतारु होते हैं। राजनैतिक और आर्थिक लाभ की दृष्टि ही आधुनिक दूरदर्शिता है। गांधी के देश में गांधी को नोटछाप बनाकर सम्मानित करने का प्रचलन हो चला है। गांधीवादी सत्याग्रही तरीके से विरोध करने वालों का हश्र बुरा ही होता है। सामने ही इसके अनूठे उदाहरण मौजूद हैं। आज महान पर्यावरण वैज्ञानिक प्रो. जी.डी. अग्रवाल (स्वामी सानंद) गंगा-गंगा कर रहे हैं। गौ माता की जाप में लगे संत गोपाल दास मरने की कगार पर हैं। निगमानंद की आत्मा दोनों ही विभूतियों का बाट जोह रही है।
राष्ट्रीय राजधानी में पुराने हिंसक गैंग का नवोदय हुआ है। दो रातों से भला हो रहा है दिल्ली के गलाकाट गैंग का! निशाने और भी हैं और रातें भी। अब तो इन्हीं की असीम अनुकंपा से मालामाल होगी पुलिस और मजबूत होगी सियासत। आखिर नियामतों पर हक तो उन्हीं गलारेतू बीरों का बनता है, जिन्हें अंधेरी रात का फायदा उठाना आता हो। देश की भुल्लकड़ जनता तो तीसरे दिन पिछली बात भूल ही जाती है। अब घोड़े वाला चश्मा पहनाने में महारत प्राप्त कर चुकी संस्थानों की फौज खड़ी करने के बावजूद इतना भी न हो तो चुल्लू भर दारु में डूब मरने वाली बात ही होगी।
कौशल किशोर ‘द होली गंगा’ पुस्तक के लेखक हैं।
Courtesy: Swaraj Khabar
Image
Advertisements

गंगा का श्रृंगार

गिरीश का जन्म इमरजेंसी के दौरान डीएमसीएच में हुआ था। वह बचपन से अनुशासनप्रिय और गंभीर था। उसके पिता सिंचाइ विभाग में अभियंता थे और दादा सूर्यनारायण स्वतंत्रता सेनानी। तरुणवय में उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया था। वह मिथिला में केवटी क्षेत्र के गौरव थे। निकट के गांवों से जरुरतमंद लोग मदद की आशा लेकर बराबर पहुंचते। वह भी पूरी कोशिश करते कि गम के मारे इंसानों की आश व्यर्थ न जाए। दादा से गिरीश को विरासत में तीक्ष्ण बुद्धिदृढ़ निश्चय और अदम्य साहस मिला था।

      तीन भाइ-बहनों में सबसे छोटा गिरीश दादी के खूब करीब था। आशीष सबसे बड़ा था। उनकी एक बहन थीकंचन। बचपन में गिरीश को दादी की कहानियां प्रिय थीं। उनकी कथाएं भागिरथी से शुरु होकर गंगा में विलीन हो जाती। इन संवादों के बीच संवरते जीवन के त्रिपथगामिनी की भांति ही अनंत श्रोत थे। जयकाली देवी भी नदियों की कथाओं को परियों और देवदूतों की गाथा से भी कहीं बेहतर चित्रित करतीं। पति की सेवा के बाद जो समय बचता वह बच्चों को समर्पित था।

      कमला सातों बहनों से गिरीश बचपन में परिचित हो गया था। गांव के पूर्वी सीमा पर कमलानदी की एक धार बहती थी। बरसात के दिनों में इसमें खूब पानी बहता। पर लीनसीजन में धूल उड़ती। दादी बताती कि उनके बचपन में ‘लीनसीजन में भी नदी करीब सत्तर-अस्सी फीट चौड़ी और पंद्रह-बीस फीट गहरी होती। सदानीरा सरिता में विभिन्न प्रकार के जलयान थे। एकदा नौकायन का जिक्र कर उन्होंने कहा कि क्षेत्रिय व्यापारी यातायात हेतु नदी का प्रयोग करते। सौकोसी की छोटी धारा हृषिकेशी में समाकर कोलकाता और ढ़ाका तक का जलमार्ग सुगम करती। मिथिला के पानफल और सब्जियों के काश्तकारों के घरों में शुभ-लाभ वाले व्यापारी भी होते। वह बाजार की मांग पूरी करने हेतु इन नगरों में अपना उत्पाद बेचते थे।

      नौकाविहार प्रसंग बालहठ का कारण बना। बालक गिरीश ने जिद ठान ली तो दादी ने उसकी मंशा पूरी करने को आश्वस्त किया। वह मुस्कुराकर बोलीहम कल चलेंगें’। अगले दिन सूर्य-ग्रहण था। गिरीश समझ न सका कि ग्रहणस्नान को प्रेरित करने के उद्धेश्य से यह प्रसंग छिड़ा था। वर्षों पहले उन्होंने गिरीश को त्रिमुहानी की कथा सुनाइ थी। नदी के तीन मुखों का व्यौरा समझने में उसने भी दिलचस्पी ली थी। अगले दिन वह दादा-दादी और कंचन के साथ त्रिमुहानी पहुंचकर नौकायन के बीच नदी के मुहानें खोजता रहा। गंगा की यह सहायक नदी मिथिलावासियों द्वारा विशेष रुप से पूजित थी। सदियों से समाज के हर वर्ग और जाति के लोगों के निर्विवाद समायोजन की प्रतीक रही कमला साफ और सुंदर थी। गिरीश के दिलो-दिमाग पर इसकी आकृति बरबस खिंच गयी।

      गिरीश के पिता का स्थानांतरण अगले साल अचानक ही हुआ। वह पटना जा रहे थे। यह जानकर गिरीश को खुशी का ठिकाना न रहा। उन दिनों आशीष पटना में ही इंजिनियरिंग की तैयारी करताघर से दूर होने पर परिवार के लोग चिंता करते। परंतु इस ट्रांसफर से सभी खुश थे। अब उन्हें आशा हुइ कि आशीष फिर माता-पिता के साथ रह सकेगा। पर गिरीश की खुशी की वजह कुछ और ही थी। वह गंगातट पर रहने की कल्पना में खो गया। पाटलिपुत्र की महिमा रातभर उसके मन में कौंधती रही। पटना पहुंचने पर सब्जीबाग में किराये का एक मकान परिवार का आसियाना बना। गिरीश का दाखिला नजदीक ही सेंट जोसफ कान्वेंट में हो गया। हाइस्कूल में पहले ही दिन शशि और सानू से उसकी दोस्ती हुइ। दीर्घकाय शशि वर्षों में कक्षा उत्तीर्ण करता। उसने गिरीश को छंदगामिनी का श्रृंगार दिखाने की बात कहकर चौंका दिया था।

      शाम को सानू और शशि उसके घर पहुंचे। गिरीश की मां कल्पना झा ने दरवाजा खोला था। वह उन्हें गिरीश के कक्ष में ले गयीं। उनकी उपस्थिति से अनजान वह तन्मयता से तबला बजाता रहा। थोड़ी देर खड़ी रहने के बाद मां ने पुकारा। सानू ने उन्हें रोकने की कोशिश की पर तबतक देर हो चुकी थी। तत्क्षण गिरीश के हाथ थम गये और वह उठकर उनकी ओर बढ़ा। उसकी आंखों में मां ने दोस्तों के साथ छंदगामिनी पहुंचने की व्याकुलता को पढ़ लिया था। 

      करीब ही नदी बह रह रही थी। शीघ्र ही तीनों दोस्त जंगमतीरे परिभ्रमण कर रहे थे। चलते-चलते सानू चंपा के पेड़ के पास पहुंचकर ठहर गया। उसे वहां बैठकर जलधारा को निहारना अच्छा लगता। ऐसा करने से थकान भी मिट जाती थी। डालों पर खूब सुंदर पीले फूल खिले थे। चहुंओर खुशबू फैल रही थी। गिरीश वहीं बैठ गया। शशि और सानू भी उसके दाएं-बाएं बैठ लिये। शशि ने गिरीश की ओर गौर से देखा। उसकी आंखें दूर तक फैली नदी की धारा पर पर निश्चल भाव से टिकी थी। शशि को ऐसा लगा जैसे कोइ सिद्ध योगी समाधि में पहुंच गया हो। वह गिरीश से आपबीती सुनाने को लालायित था। परंतु कुछ भी कहने का साहस नहीं जुटा पाया। थोड़ी देर बाद कुछ विचार कर उसने सानू से बात आरंभ की। उसने कहा, ‘याद है सानू जब तुमने मुझे पहली बार छंदगामिनी का श्रृंगार दिखाने की बात कही तो मैंने सोचा किसी मदिराक्षी के दर्शन प्राप्त होंगे’।

      ‘फिर तो यहां आकर तुम्हें बड़ी निराशा हाथ लगी होगी’। सानू ने झट से कहा। नहीं! बिल्कुल नहीं। ऐसी तृपित किसी मृगनयनी के श्रृंगार में नहीं। पर गिरीश की हालत तो एकदम भिन्न है। देखकर तो ऐसा लगता जैसे इसे पहले से ही सबकुछ पता हो’। शशि बोला।

      ‘क्या पता है? गिरीश ने प्रश्न किया।

      ‘तुम्हें तो छंद और छंदगामिनी दोनों का ही ज्ञान है। ऐसा बुद्धू मैं ही निकला। उस दिन ये सानू कैसे मुझपर हंस रहा था। फिर इसने मुझे गंगा का श्रृंगार देखने की विधि सिखाया’।

      ‘और वह क्या थी?

      ‘तुम्हें तो वह भी पता ही होगा। इसने कहा था कि शांत चित्त होकर मां से श्रृंगार दिखाने का आग्रह करो और अपनी दृष्टी लहरों पर  केन्द्रित रखो तो तुम्हें अदभुद नजारा दिखेगा। शशि कहकर चुपचाप तरंगों की ओर देखने लगा।

      कलकल बहती नदी की तरंगें छंदों में गा रही थी। गिरीश को तबले की थाप जल की सतह पर खेलती दीखी। उसके लिए वह कर्णप्रिय संगीत और लहरों से उठता समीर किसी अतिन्द्रीय आकर्षण से कम नहीं था। वह सृष्टी के रहस्यों की गहराइ में खोता गया। इस बीच बरबस बुदबुदाहट सी उसके मुंह से निकली। पर वह नदी में घडि़याल के उछलने की तेज आवाज में दब गइ। तभी उन्हें जल की सतह पर एक विशालकाय जीव दिखायी दिया। किंतु यह घडि़याल नहींसूंस था। गंगानदी में दीखने के कारण इसे रिवर डॉल्फिन’ कहते हैं।

      सानू बचपन से ही नदीतट पर खेलने आता। पर इतने करीब से उसने सूंस नहीं देखा था। अचानक उसके मन में प्रोफेसर वर्मा का चित्र कौंध गया। वह पर्यावरणविद थेजो स्कूल में उसी दिन विशेष लेक्चर देने आए थे। वह कुछ आगे बढ़ता कि तपाक से शशि बोल पड़ा अरे यह वही विशाल सूंस हैअखबार में जिसकी फोटो छपी थी। इसने पिछले हफ्ते शरारती सुषमा की नाव पलट दी थी’। उसे चुप कराते हुए सानू बोला, ‘हां मोटा-ताजा तो है। पर यह वह नहीं है। तुम भी व्यर्थ में लड़कियों की कहानियों में उलझे रहते हो’।

      मां की गोद में चहकते शिशु की तरह सूंस जल में खेलता रहा। इस बीच मंत्रमुग्ध गिरीश उसे निहारता रहा। उसे जलीय श्रृष्टी बोधगम्य होने लगी। शाम ढल रही थी। सूर्य अस्त हो चला था। घर लौटना भी जरुरी था। अंधेरा होने पर मां को चिंता होती। यह सोचकर गिरीश घर की ओर लौटा। रास्ते में तीनों गंगा के इस श्रृंगार के बारे में बातें करते रहे। अलविदा कहने से पूर्व उन्होंने अगली शाम पुन: वहीं मिलने का वादा किया।

कौशल किशोर द होली गंगा पुस्तक के लेखक हैं।

First-Published-Story

The story was published in largest circulation Hindi Daily Jagran on July 1, 2013.It can be downloaded from the  following link:

http://epaper.jagran.com/epaperimages/01072013/delhi/30del-pg11-0.pdf

नदीघाटी माफिया सभ्यता का सरकारी सरोकार

(कौशल किशोर) भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल के रातोंरात निलंबन से उपजा विवाद सुरसा की तरह फैल रहा है। उत्तर प्रदेश की सरकार के इस फैसले का विरोध चहुंओर हो रहा है। केंद्र और राज्य की सरकारें आमने-सामने है। देवबंदी मुस्लिम उलेमा से लेकर इसी समुदाय के दूसरे संगठन भी सच्चाई का साथ देने मैदान में उतरने लगे हैं। इस गहराती समस्या की मुख्य वजह प्रदेश सरकार की झूठ ही है। यह ऐसा संगीन झूठ है, जिसके बाद अपराधों का सृजन होता है। इस प्रकरण में सूबे की राजनीति नैतिकता की सारी हदें पार करती जा रही है।

राज्य की सरकार दावा करती आ रही है कि इस निलंबन का खनन के कारोबार से कोई संबंध नहीं है। उपजिलाधिकारी पद पर तैनात इस महिला अधिकारी पर गौतमबुद्ध नगर के कादलपुर में निर्माणाधीन (अवैध) मसजिद की दीवार तुड़वाकर सांप्रदायिक दंगों की नौबत खड़ी करने का आरोप है। यहां दो बातें साफ हैं। नोएडा में अवैध खनन के विरुद्ध प्रशासनिक कार्यवाही के लिए दुर्गा पहले से ही चर्चा में थी। दूसरी ओर चर्चाओं में प्रदेश की सरकार भी मुस्लिम समुदाय को तुष्ट करने के लिए रही है। समुदाय विशेष के तुष्टिकरण की समाजवादी चर्चा के सामने यह मसला अब भी राई बराबर ही है। इस मसले पर जिलाधकारी की रिपोर्ट में कहा गया है कि दीवार को गांव वालों ने ही तोड़ा, दुर्गा ने नहीं। यदि सूबे की सरकार को तथाकथित आरोप पर भरोसा होता तो मौके पर दुर्गा के साथ कार्यवाही में लगे पुलिस अधिकारी पर पहली गाज गिरती। चूंकि यह सब कुछ जिलाधिकारी के आदेश पर किया गया था तो वास्तविक जिम्मेदारी भी उन्हीं की होती है। परंतु इन दोनों अधिकारियों के साथ अब तक ऐसा कुछ नहीं हुआ। अलबत्ता आनन-फानन में देर रात निलंबन आदेश भेज कर 41 मिनट में ही सारी कार्यवाही सुनिश्चित कर ली गयी। ऐसी हालत में सूबे की सरकार कठघरे में खड़ी तो होती ही है।

दुर्गा शक्ति नागपाल का मामला यहीं नहीं ठहरता है। खनन माफिया के साथ भू माफिया के खिलाफ की गई कार्यवाही भी सामने आती है। राजनीतिक दलों के साथ सुगबुगाहट दूसरे क्षेत्रों में भी दिखती है। यह स्वभाविक लोकतांत्रिक प्रतिक्रिया है। स्थानीय सामाजिक और राजनैतिक कार्यकत्ताओं से लेकर केंद्र सरकार तक सूबे की सरकार के इस निर्णय का विरोध करने लगी है। साथ ही ठीक मौके पर संरक्षण प्राप्त गुंडे भी सक्रिय हो जाते हैं। अवैध खनन की शिकायत करने वाले किसान की दिन-दहाडे़ हत्या होती है। इसी क्षेत्र के रायपुर गांव के निवासी पालेराम चैहान पिछले चार वर्षों से खनन का विरोध कर रहे थे। गंगा बेसिन में खनन के विरुद्ध संघर्ष में दो वर्ष पूर्व गंगापुत्र निगमानंद को भी जान गंवानी पड़ी थी। इनके अतिरिक्त खनन कार्यों में लगे डंपर और अन्य वाहनों द्वारा कुचले गये आम लोगों की लंबी फेहरिस्त है। पर सूबे की सरकार के पास इसका कोई स्पष्ट व्यौरा नहीं है।

खनन माफियाओं की सांठगांठ सरकार में सतत बढ़ती रही है। आज सूबे की समाजवादी सरकार में यह चरम पर दिखती है। खनन से जुड़ी प्रशासनिक समस्या नई नहीं है। और न ही दुर्गा शक्ति नागपाल इसका शिकार हुई पहली प्रशासनिक अधिकारी ही। पिछली सदी के अंतिम दिनों में गंगा में अवैध खनन का कड़ाई से विरोध करने वाले प्रशासनिक अधिकारियों को उत्तर प्रदेश सरकार का कोपभाजन बनना पड़ा था। आनन-फानन में शासन ने जिलाधिकारी और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक समेत अवैध खनन के विरुद्ध कार्य करने वाले सभी अधिकारियों को स्थानांतरित कर दिया था। उस समय 1989 बैच की महिला आईएएस आराधना शुक्ला और 1993 बैच के आईपीएस अधिकारी वितुल कुमार निशाने पर थे। इस बीच खनन का गोरख धंधा खूब फला-फूला। राष्ट्रीय राजधानी से सटे इलाके में यमुना, हिंडन, काली, आदि नदियों के तटों को साफ करने के बाद आस-पास के खेत-खलिहान भी अछूते नहीं रहे। यही हाल गंगा और उसकी दूसरी सहायक नदियों का है।

भारत की नदियों से रेत, बजरी और पत्थर उठाने का सिलसिला बहुत पुराना है। पर खनन का व्यवसायीकरण अस्सी के दशक में ही हो सका। गंगा बेसिन में बड़े पैमाने पर खनन होने लगा। एक दशक में ही नदीघाटी माफियाओं के चंगुल में था। खनन के लिए बड़ी मशीनों का इस्तेमाल किया जाने लगा। आज हजारों करोड़ का यह व्यापार सैकड़ों करोड़ की राजस्व क्षति का कारण है। बेतहाशा खनन से पेयजल और सिंचाई की समस्या खड़ी हुई। साथ ही नब्बे के दशक में खनन का व्यवसाय आम-आदमी को मौत के घाट उतारने का सबब बनने लगा। व्यावसायिक खनन गंगा और यमुना जैसी नदियों की स्व़च्छता और पवित्रता को समाप्त करने में अहम साबित हुआ है। विनिर्माण क्षेत्र में विकास के लिए नदियों को नष्ट कर दिया गया। नदीघाटी की वर्तमान हालत इतनी बुरी है कि क्षतिपूर्ति संभव नहीं है। खनन से उपजी गहरी खाईयों के भरने में भी वर्षों लगेंगे।

अंधाधुंध विकास का दो ताजा नमूना सामने है। केदारखंड तबाह हो चुका है। और अमेरिका के मिशिगन राज्य का डेट्रायट शहर दिवालिया घोषित हो चुका है। यह उसी विकास का नतीजा है, जो वास्तव में विनाश को आमंत्रित करता है। वक्त रहते नहीं चेतने से इन दोनों ही स्थितियों से कहीं गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। प्रदेश सरकार को खनन से तबाह नदीघाटी की कोई चिंता नहीं है। सूबे के अतिरिक्त देश के अन्य इलाकों में भी खनन से गंभीर समस्याऐं उपजी हैं। राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण ने देश भर में रेत, बजरी के खनन से हो रही पर्यावरण की अपूरणीय क्षति का संज्ञान लिया है। लिहाजा पर्यावरण विभाग से मंजूरी लिये बिना खनन का कार्य नहीं किया जा सकता है। परंतु इतने से ही समस्या हल नहीं होती। माफियाराज में इसका निदान आवश्यक होने के बावजूद भी बहुत मुश्किल है।

प्रदेश सरकार अपने झूठ को सच साबित करने में लगी है। इस क्रम में नित नए खुलासे हो रहे हैं। इस बीच एक वरिष्ठ समाजवादी नेता ने केंद्र को सभी आईएएस अधिकारियों को हटा लेने की चुनौती दी है। यह कोई कोरी धमकी नहीं है। सत्ताधारी पार्टी के कार्यकर्ता इस मौके का इंतजार करते रहे हैं। इन सब गतिविधियों पर गौर करने पर मुलायम नेतृत्व वाली समाजवादी योजना साफ हो सकती है। मुलायम सिंह यादव जब दूसरी बार सूबे के मुख्यमंत्री बने थे तो उनसे मिलने के लिए जग्गू को परीक्षक नियुक्त किया था। उन दिनों जगमोहन नामका नाई जग्गू नाम से ख्यात था। मुख्यमंत्री की दाढ़ी बनाने के साथ ही मसाज और सेवा में निपुण जग्गू को विशेष कार्य अधिकारी नियुक्त किया गया, जिसे खुश किये बगैर प्रशासन और पुलिस के आला अधिकारी भी मुख्यमंत्री से नहीं मिल सकते थे। समाजवादी पार्टी ने ऐसे लोगों का कैडर तैयार कर रखा है, जिसके बूते आईएएस अधिकारियों की छुट्टी की जा सकती है!

खनन माफिया का खौफ बढ़ रहा है। सम्प्रति समस्याओं को दूर करने वाली राजनीति समस्या बन रही है। देश के सर्वाधिक जनसंख्या वाले सूबे में बगावत का स्वर तीव्र होता जा रहा है। गांव के लोग राज्य सरकार को मुक्त कर स्वायतशासी ग्रामीण तंत्र की व्यवस्था की मांग पर विचार कर रहे हैं। इस सब की इकलौती वजह सरकार की झूठ है। पुराने लोग कहते थे, एक झूठ सौ झूठ की जड़ होती है और एक अपराध सौ अपराध का। ऐसा ही कुछ इस मसले में भी हो रहा है। नेतृत्व और झूठ अमेरिकी लोकतंत्र में महाभियोग का कारण बनी थी। बिल क्लिंटन के राष्ट्रपति रहते यह समस्या खड़ी हुई थी। आखिरकार क्लिंटन ने सच स्वीकार कर दुबारा सत्ता में वापसी की थी। क्या भारतीय लोकतंत्र में सच का कोई महत्व नहीं रह गया है? यह एक अहम सवाल है, जो देश के सामने मुंह बाए खड़ा है। सूबे के मुखिया इस जिम्मेदारी से बचने के लिए अभिनव प्रयोग में व्यस्त हैं। नदीघाटी माफिया सभ्यता के सरकारी सरोकार में राजहठ का यह सिलसिला कहां जाकर थमेगा दावे से कहा नहीं जा सकता है।

(कौशल किशोर ‘द होली गंगा’ पुस्तक के लेखक हैं)

Image