निष्पक्ष पत्रकारिता पर प्रहार

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कौशल किशोर (Follow @HolyGanga)

आम चुनाव के महासमर में मीडिया की निष्पक्षता पर भी प्रश्न उठे हैं। फ्री-प्रेस की अवधारणा पर कायम आधुनिक युग की पत्रकारिता में यह एक गंभीर समस्या है। लोकसभा चुनाव में राजनैतिक पार्टियों और उम्मीदवारों को रिपोर्ट में अनुकूल आंकड़े और कवरेज नहीं मिलने से ऐसे आरोपों की झड़ी लग गई। इस क्रम में अल्प अवधि में सबसे ज्यादा चर्चा बटोरने वाले आम आदमी पार्टी नेता अरविंद केजरीवाल भी मीडिया की निष्पक्षता पर खूब बरसे थे। गंभीर आरोपों के इन चर्चित मामलों में निष्पक्ष पत्रकारिता को प्रभावित करने वाले सबसे संगीन मसले नदारद ही रहे हैं। एक दशक तक ऐसा केवल इसलिए हो सका क्योंकि यह सोनिया जी की इच्छा थी और यह देश का दुर्भाग्य है कि इसे मनमोहन सरकार की मर्जी कही जाएगी। सोलहवीं लोकसभा के चुनाव में व्यस्त जनता के सामने यह एक संवेदनशील मुद्दा है। लोकतंत्र को मजबूत बनाने में अहम योगदान देने वाले प्रेस के लिए भी यह कोई शुभ संकेत नहीं है।

संप्रग सरकार के पहले कार्यकाल में सर्वोच्च न्यायालय ने युएनआई मसले में महत्वपूर्ण निर्णय दिया था। दूसरे कार्यकाल में पटियाला हाउस से लेकर दिल्ली उच्च न्यायालय तक दलित उत्पीड़न का मामला चर्चा का विषय बना तो महिला उत्पीड़न का मसला महिला आयोग की नाराजगी के बाद भी निष्प्रभावी ही रहा। कर्मचारियों को महिनांे बाद वेतन का भुगतान और उनकी भविष्य निधि के करोड़ों रुपये के घोटाले से जुड़ी फाइलें भी सरकारी कार्यालयों में धूल फांक रहा और कई मजेदार तर्क पेशकर कांग्रेस नेता इस मामले में राजनीति करते रहे हैं। यहां प्रभावी कार्यवाही नहीं होना सोनिया गांधी के उन्हीं फरमानों का नतीजा रहा, जिन्हें प्रधानमंत्री के पूर्व मीडिया सलाहकार संजय बारु और कोयला सचिव पारेख की किताबों की परतों को कुरेदने पर संभव है कि समझा जा सके। दलित और महिला उत्पीड़न से लेकर एजेंसी की सम्पत्ति पर माफियाओं की दखलंदाजी तक बहुत कुछ सरकार की ही देन है।

सैकड़ों समाचार पत्रों को मेरुदंड की तरह सहयोग करने वाली एजेंसी लंबे अर्से से गंभीर संकट के दौर से गुजर रही है। कांग्रेस की गठबंधन में निष्पक्ष आवाज को बंद करने की कोशिश किस हद तक हुई इसका अंदाजा तेलांगना मसले से लेकर एफडीआई के बीच कई मौके पर परिभाषित हुआ है। इस दौरान संसद में हुई गतिविधियों से बहुत कुछ समझा जा सकता है। मीडिया ब्लैक-आउट जैसे घटनाक्रम से कई बातों के दबे ही रहने के आसार बने रहेंगे। एक दिन प्रेस-कल्ब में आकर गरीब जनता की वकालत का श्रेय लेने वाले कांग्रेस के युवराज ने मनमोहन की तथाकथित केबिनट को धत्ता बताया था। गांधी परिवार के इशारे पर मीडिया ब्लैक-आउट का फरमान बार-बार जारी किया गया। मार्च के पहले रविवार को युएनआई बचाओ आंदोलन के कार्यकत्र्ताओं ने निष्पक्ष पत्रकारिता से जुड़े सबसे अहम मुद्दों को सोनिया गांधी के कार्यालय और आवास के बाहर व्यक्त करना शुरु किया तो मीडिया ब्लैक-आउट कुछ इसी अंदाज में हुआ जैसे सीमांध्र विवाद के दौरान संसद का सीधा प्रसारण रोक कर किया कीर्तिमान हो।

राष्ट्रप्रेम और समाजसेवा की भावना से भारत में पत्रकारिता आरंभ हुआ। शुरुआती दौर में अंग्रेजों का शासन था। देश के विभिन्न भाषाओं में पत्र छापने वाले प्रेस क्रांति के प्रभावी अग्रदूत साबित हुए। वेद की ऋचाओं का मूल-मंत्र ‘वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः’ गणेश शंकर विद्यार्थी और अरविंद घोष जैसे क्रांतिकारियों को पत्रकारिता की ओर आकृष्ट किया। वर्तमान भारतीय पत्रकारिता में वही जोश और ईमानदारी बरकरार रखने के लिए विशुद्ध देशी का विस्तार करने में सक्षम समाचार एजेंसी की जरुरत थी, जिसकी न्यूनतम कीमत निष्पक्षता ही थी। उपनिवेशवाद के युग में एसोसिएट प्रेस के सौजन्य से देश में प्रस्फुटित प्रेस ट्रस्ट आॅफ इंडिया का वर्चस्व उपमहाद्वीप के कई मुल्कों में था। बीते दिनों कांग्रेस जिस एजेंसी को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जोड़ कर तबाह करने में लगी रही, वास्तव में उसे देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु ने कांग्रेस शासित बंगाल के मुख्यमंत्री विधानचंद्र राय के नेतृत्व में शुरु किया था। सभी राजनैतिक विचारधाराओं को समायोजित करने की भावना से प्रेरित होकर डाॅ. राय को इस एजेंसी के सृजन से कुछ ही हफ्ते पहले ‘भारत-रत्न’ से भी नवाजा गया। प्रायः सभी प्रमुख भारतीय अखबारों को इसमें कुछ शेयर दिया गया, जिससे स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता का झंडा बुलंद रहे। साठ के दशक की यह संस्था आज बेदम होकर क्रंदन कर रही। इस नुकसान का समुचित व्यौरा लापता मलेशियन विमान एमएच 370 की तरह ही खोज का विषय हो सकता है।

गांधी परिवार की खुशी के लिए देश को सत्य से वंचित रखना दुर्भाग्यपूर्ण निर्णय रहा। इस क्रम में फैली लड़ाई को देखकर ही पता चलता है कि पत्रकारिता से जुड़े सबसे गंभीर स्वर को दस जनपथ तक पहुंचाने का काम उसी जनता ने किया, जिसे दिल्ली विधानसभा चुनाव में सोनिया गांधी की रैली छोड़ कर जाने पर शीला दीक्षित ने रोकने का प्रयास किया था। यहां व्यथित करने वाले सवालों के क्रम में उलझनें खूब हैं। एक बार प्रश्न उठता कि पैर पर हथौड़े की चोट का दर्द कितना त्रासदीपूर्ण हो सकता है? युएनआई के प्रायः सभी शेयरों का गोपनीय तरीके से 2007 में 32 करोड़ 4 लाख में सौदा हुआ था। इसकी जानकारी एजेंसी के लिए काम करने वाले पत्रकारों और कर्मचारियों को डीएनए में प्रकाशित एक खबर से हुई थी। फिर यह मामला उच्चतम न्यायालय पहुंचा था। एजेंसी से जुड़े पत्रकार बताते कि इस डील में पूर्वी भारत के प्रतिष्ठित अखबार ‘समाज’ जैसे शेयरधारकों ने अपना अंश नहीं बेचा था। उड़िया भाषा में कई संस्करणों के साथ आज यह बड़ा पत्र है। लोक सेवक मंडल के संस्थापक लाला लाजपत राय और उत्कलमणि गोपबंधु दास की राष्ट्रभक्ति से पनपे इस दैनिक ने बीते नौ दशकों में निष्पक्षता का इतिहास रचा है।

बीते दोनों लोकसभा के कार्यकाल में लोकतंत्र के चैथे स्तंभ को जटिल मुसिबतों से जूझना पड़ा। सरकार ने जान-बूझकर निष्पक्षता को नुकसान पहुंचाया। उत्तर प्रदेश और बिहार की राजनीति में सक्रिय क्षेत्रिय दलों के प्रतिनिधियों की इस मुद्दे पर नाराजगी जगजाहिर रही। बारु और पारेख के खुलासों से कमजोर नेतृत्व के संकट का व्यौरा कुछ नए किश्तों में सामने है। अर्से से समाज के सचिव और प्रवक्ता दीपक मालवीय और सतपाल ग्रोवर भी इससे जुड़ी समस्याओं को मजबूती से झेल रहे हैं। निष्पक्षता और शुचिता बरकरार रखते हुए राष्ट्रहित में सभी मीडिया प्रतिष्ठानों को आज मिलकर प्रयास करने की जरुरत है।

सूचना की क्रांति के युग में मीडिया ब्लैक-आउट त्रासदीपूर्ण है। ऐसी ही हालत में दुर्गति झेलने को विवश श्रमजीवी पत्रकार सामाजिक संगठनों के साथ मिलकर सड़कों पर उतरने को विवश होते। राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन, लालबहादुर शास्त्री, बलवंत राय मेहता, कृष्णकांत और गुजराल जैसे क्रियावान नेताओं द्वारा सेवित लोक सेवक मंडल और ऐसे ही प्रभावी अन्य संगठनों के सौजन्य से संभव है कि भविष्य में स्वतंत्र-संवाद के इस जंग में कोई मजबूत पहल हो। पर इस प्रहार के दूरगामी परिणामों पर गौर करने से स्पष्ट हो जाता कि भारतीय गणतंत्र आज भी संकट की काली छाया से उबर नहीं सका है।

(कौशल किशोर ‘द होली गंगा’ पुस्तक के लेखक हैं)

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वैमनस्य की राजनीति: चुनावी समर में नफरत का पैगाम

Jagran10April2014

Politics of Hatred

Kaushal Kishore

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Election campaign began with great zeal as soon as the clarion rang for 16th Lok Sabha polls. The candidates started to appeal to their voters with provocative statements, full of hatred. Leaders of all political parties are burning fumes against their opponents. This propensity is destroying Indian culture and basic pillars of the Indian Constitution. BJP’s prime ministerial candidate Narendra Modi was verbally threatened to cut into pieces, and someone retaliated it by ripping off clothes before deporting Sonia and Rahul Gandhi to Italy, regularly hate speech burns in the atmosphere after a little pause. This tendency is destructive for the society that advocates the concept of Vasudhaiva Kutumbakam; a single planetary home. In fact, this is the gift of democracy that can destroy the Indian culture. Last month, Supreme Court attempted on an unsuccessful effort to curb the menace of inflammatory speeches in public. The court of a three judge panel, comprising Justice B.S. Chauhan, M.Y. Eqbal and A.K. Sikri, after long hearing decided the public interest litigation filed by Pravasi Bhalai Sangathan in order to influence the election season, but the appeasement policy adopted by political parties to satisfy the vote bank makes a mockery of the verdict in true sense during this general elections. Hate Speech is still continued. Azam Khan, minister in Uttar Pradesh Govt. to Union Govt. minister Beniprasad Verma, there are many other names.

At least, it is proved by the statements of politicians that Hate Speech is a highly effective weapon to remain in lime-light. Recently, Congress leader from Saharanpur, Imran Masood went to jail for a short while due to his comments on prime ministerial candidate of BJP. This cycle does not end here. Politicians are sowing seeds of hatred only to win votes. This is what? Valueless politics or culmination of a deeply nourished conspiracy, all parts of this political plot can be deciphered in investigations or research, but politics based on unpleasantness and disharmony among common citizen can never be in favour of the national interests.

The rise of certain regional parties was an outcome of politics based on hatred. Public that votes on the basis of religion and caste are deeply affected by these things. Caste based equations are prevailing features of politics in certain states like Uttar Pradesh and Bihar. There was a time when migrants of Uttar Pradesh and Bihar were threatened to cut their hands on the western coast by Raj Thakre, and in South communal peace was agitated by Akabar-uddin Owaisi. Before all these Hindi Virodhi Andolan (Movement against Hindi) was on peak in the south itself. Meanwhile, Arvind Kejriwal started his politics in the national capital. He has offended certain leaders of the migrants’ welfare organization, thus supporters of the group launched movement against him before the Delhi assembly polls. The leader of the Sangathan launched protests aiming at the Aam Adami Party leader.

Politics of hatred, throughout the country, reaches its climax due to elections and burning unpleasantness. Last year, some migrants lost their hands in Maharashtra. Such actions are hammers that hurt the democratic spirit of Indian constitution. Spreading hatred by experienced leaders is not the result of an impulsive kind of reactions. In the last three decades hatred and violence sustained perpetual growth in Indian politics. The extent to which lawmakers abstained from giving priority to brotherhood and love might be ascertained from the fact that chili powder spray was used during a session in the 15th Lok Sabha. Honourable parliamentarians crossed all limits of decency in order to defeat the democratic values. The helplessness of Supreme Court of India came to light during the hearing of a case that was filed to obtain prohibition on hate speech by public figures. During the long debate in this case, the court summoned representatives of central and state governments. It was surprising to know that there is no provision in the thick books of law to curb the menace of hate speech. The arguments of Meenakshi Arora, counsel for the Election Commission, and judgment of the apex court reveal this fact. Finally, the court made ​​it clear that the parliament can only conquer this problem. In this situation, there is a serious question before the public, who is going to elect their representatives in the poll.

The problems caused by diversity of race, religion, colour, shape and breed are not new. It is not that simple now to fill the cavity between the natives and immigrants.  Vasudhaiva Kutumbakam is one of the key expressions of Indian culture, but today inflammatory speeches, under the guise of political ambitions, hurt the harmony among common citizen. Can this easy option really win the heart of Indian voters? The migrants issue can pose a major problem before the popularity of Maharashtra Navnirman Sena (MNS) and Aam Adami Party (AAP). The opposition of Arvind Kejriwal by the leaders of migrants’ organisation influenced the voters in Delhi assembly polls last year. AAP candidates lost many seats with thin margins.

Leaders and activists of the migrant community are contributing significantly to resolve this crisis. The ongoing awareness campaign in different parts of the country is a reflection of the lights in the Supreme Court judgment. This campaign for fraternity and peace can be a promise for the better future. The age-old Indian culture is needed to be preserved. It can be a worthwhile effort, if the voters think on such issues before deciding their representatives in this election season. In its absence this challenge can wipe out the bounty and generosity of Indian tradition.

[Kaushal Kishore is the author of The Holy Ganga]

http://www.jagran.com/editorial/apnibaat-politics-of-unpleasantness-11223366.html?src=HP-EDI-ART 

कौशल किशोर (Follow @HolyGanga)

16वीं लोकसभा के लिए बिगुल बजते ही चुनाव प्रचार जोर-शोर से शुरू हो गया। मतदाताओं को लुभाने के लिए उम्मीदवारों ने नफरत भड़काने वाली बयानबाजी शुरू कर दी। तमाम राजनीतिक दलों के नेता विरोधियों के खिलाफ आग उगल रहे हैं। यह प्रवृत्तिभारतीय संस्कृति और लोकतंत्र के मूल स्तंभों को ही ध्वस्त कर रही है। भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की बोटी-बोटी करने वाला बयान हो या सोनिया और राहुल गांधी के कपड़े उतार कर इटली भेज देने का, आम चुनाव में नफरत का स्वर रह-रह कर उठ रहा है। वसुधैव कुटुंबकम की पैरवी करने वाले समाज के लिए यह प्रवृत्तिबेहद घातक है। वास्तव में, यह लोकतंत्र की ही देन है जो हिंदुस्तानी संस्कृति को नष्ट कर सकती है। पिछले महीने सर्वोच्च न्यायालय ने नफरत फैलाने वाली बयानबाजी पर अंकुश लगाने का असफल प्रयास किया था। जस्टिस बीएस चौहान, एमवाई इकबाल और एके सिकरी की अदालत ने लंबी सुनवाई के बाद प्रवासी भलाई संगठन की जनहित याचिका पर विचार करते हुए चुनाव के मौसम में ऐसे भाषणों पर अंकुश लगाने की कोशिश की, परंतु सही मायने में न्यायालय के आदेश के बावजूद वोट बैंक के तुष्टीकरण के प्रयास में भड़काऊ भाषणों का सिलसिला जारी है। उत्तार प्रदेश सरकार में मंत्री आजम खान से लेकर केंद्र सरकार के मंत्री बेनीप्रसाद वर्मा तक ऐसे कई और नाम हैं। राजनेताओं के वक्तव्यों से इतना तो साफ है कि चर्चा में बने रहने के लिए भड़काऊ भाषण बेहद कारगर उपाय है। सहारनपुर के कांग्रेस नेता इमरान मसूद भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के संबंध में की गई टिप्पणी के कारण जेल की हवा खा चुके हैं। यह सिलसिला यहीं खत्म नहीं हो जाता। वोट बटोरने के लिए राजनेता घृणा और नफरत के बीज बो रहे हैं। यह विचारहीनता की परिणति है या राजनीतिक पैंतरा, यह अन्वेषण का विषय हो सकता है, पर वैमनस्यता के बूते पनपने वाली राजनीति राष्ट्रहित में कतई नहीं हो सकती।

कई क्षेत्रीय दलों का अभ्युदय घृणा के बूते पनपने वाली राजनीति के कारण हुआ। धर्म और जाति के आधार पर मतदान करने वाली जनता इन बातों से प्रभावित होती रही है। उत्तार प्रदेश और बिहार की राजनीति जातिगत समीकरणों के इर्द-गिर्द घूमती है। एक दौर ऐसा भी था कि पश्चिमी छोर पर राज ठाकरे द्वारा बिहार और उत्तार प्रदेश के प्रवासियों के हाथ काटने की कवायद हो रही थी तो दक्षिण में अकबरुद्दीन ओवैसी ने सांप्रदायिक भावनाएं भड़काने का काम किया था। इससे पहले दक्षिण में ही हिंदी विरोधी आंदोलन छेड़ा गया था। इसी बीच राष्ट्रीय राजधानी में अरविंद केजरीवाल ने राजनीति शुरू की। उनके कुछ बयानों से आहत प्रवासी भलाई संगठन के समर्थकों ने दिल्ली विधानसभा चुनाव से पूर्व आम आदमी पार्टी के नेता पर निशाना साधा था।

चुनाव के कारण देश भर में घृणा और वैमनस्य की राजनीति चरमोत्कर्ष पर पहुंच जाती है। गत वर्ष महाराष्ट्र में कुछ प्रवासियों के हाथ काट दिए थे। इस तरह की हरकतें भारतीय संविधान की लोकतांत्रिक भावना पर कुठाराघात हैं। अनुभवी नेताओं द्वारा नफरत फैलाने का काम क्षणिक आवेश में जन्मी प्रतिक्त्रिया कतई नहीं है। पिछले तीन दशकों में भारतीय राजनीति में घृणा और हिंसा की प्रवृत्तिका अनवरत विकास हुआ है। कानून निर्माता भाईचारा और प्रेम को प्राथमिकता देने से किस कदर कतराते रहे हैं, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 15वीं लोकसभा में मिर्च-पाउडर का स्प्रे तक हुआ। माननीय सांसदों ने शालीनता की सारी हदें लांघकर लोकतांत्रिक मूल्यों पर कुठाराघात किया। नफरत फैलाने वाले बयानों पर रोक लगाने के उद्देश्य से दायर किए गए एक मुकदमे की सुनवाई के दौरान उच्चतम न्यायालय की लाचारी साफ नजर आई। इस मामले में हुई लंबी बहस के दौरान केंद्र और राज्य के प्रतिनिधियों से न्यायालय ने जवाब-तलब किया था। आश्चर्य की बात है कि कानून की मोटी किताबों में नफरत फैलाने वाली आवाजों पर अंकुश लगाने का कोई प्रावधान नहीं है। चुनाव आयोग की तरफ से वकील मीनाक्षी अरोड़ा की दलीलों और न्यायालय के आदेश से यह बात स्पष्ट हुई। आखिरकार न्यायालय ने साफ कर दिया है कि संसद ही इस समस्या का निदान कर सकती है। इस स्थिति में जनप्रतिनिधियों का चुनाव करने वाली जनता के सामने यह एक गंभीर प्रश्न है।

जाति, धर्म, रंग-रूप और नस्ल की विविधता से उपजी समस्या नई नहीं है। अब मूल निवासियों और प्रवासियों के बीच की गहरी खाई को पाटना आसान नहीं रहा। वसुधैव कुटुंबकम का भाव भारतीय संस्कृति का मूल मंत्र रहा है, परंतु आज राजनीतिक महत्वाकांक्षा की आड़ में भड़काऊ भाषणों के कारण आपसी भाईचारा और सौहा‌र्द्र को ठेस पहुंच रही है। यह सुगम साधन क्या सचमुच मतदाताओं का दिल जीत सकता है? महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना और आम आदमी पार्टी की लोकप्रियता के सामने प्रवासियों का मसला एक बड़ी समस्या है। केजरीवाल के खिलाफ प्रवासी भलाई संगठन की मोर्चाबंदी के कारण दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को मिलने वाले वोटों पर असर पड़ा था। कई सीटों पर आप प्रत्याशियों को काफी कम वोटों से हार का सामना करना पड़ा था।

प्रवासी संगठन से जुड़े कार्यकर्ता इस संकट को दूर करने में अहम योगदान दे रहे हैं। देश के विभिन्न हिस्सों में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के आलोक में जागरूकता अभियान चलाने से सुखद भविष्य की उम्मीद बंधती है। आपसी भाईचारा और सौहा‌र्द्र कायम करने के उद्देश्य से जारी यह अभियान भारतीय संस्कृति के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है। आम चुनाव के महासमर में यदि मतदाता इस बात पर विचार कर अपने प्रतिनिधि का चुनाव करते हैं तो यह एक सार्थक प्रयास साबित होगा। ऐसा न होने से यह रोग भारतीय संस्कृति की उदारता को नष्ट कर देगा।

[लेखक कौशल किशोर, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं]

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