अनर्थशास्त्र का अर्थ 

कौशल किशोर |Follow @HolyGanga

आपको पता है। यह कहावत किसकी है? ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा।’ क्या आपको यह भी पता है कि अमेरिका की कांग्रेस में किस व्यक्ति ने कहा था, ‘हमें राष्ट्र के पैसे पर कंट्रोल करने दो, और फिर परवाह नहीं, इसके कानून कौन बनाता है।’ क्या आज इस सवाल से रु-ब-रु होने की जरुरत नहीं है? खैर, अब भारत में लोग जियो की इंटरनेट सुविधा से वंचित नहीं रह गए। और ‘गुगल देव’ ने ऐसे सवालों का जवाब देने से मना भी नहीं किया है। सोसल मीडिया पर ‘बागों में बहार है’ के बाद शहर की गलियों में कतार पर कतार है। क्योंकि उस रात टी.वी. पर ‘साहब’ का हुक्म सुनकर पैसा, पैसा ना रहा। क्या गज़ब का करिश्मा हुआ? करेंशी महज कागज का टुकड़ा हो गया! 

अब आप समझ सकते हैं कि यहां नेताजी और ‘करेंशी-किंग’ की कहावतों से बात शुरु करने की क्या जरुरत थी। यह केन्द्र सरकार का एक अहम फैसला है। क्या यह भारतीय गणराज्य में अलोकतांत्रिक तरीके से लिए गए आदेशों की श्रेणी में गिना जाएगा? इसका असर निश्चय ही बहुत व्यापक और मुश्किलों से भरा है। यह एक ऐसा मामला है, जो देश में ‘सिविल-वार’ की हालत पैदा करने में सक्षम है। सरकार को यह बात समझना चाहिए। इसके कारण कई जगहों पर भाजपा कार्यकर्ताओं की पिटाई तक हो चुकी है। महाराष्ट्र के पनवेल में नवंबर के तीसरे हफ्ते में हुई कृषि उत्पाद बाजार समिति के चुनाव में न सिर्फ भापजा को सभी 17 सीटों पर हार का सामना करना पड़ा, बल्कि पार्टी कार्यकर्ताओं को लोगों ने मारने-पीटने में भी कसर बाकी नहीं रखा है। 

यह घोषणा भारत के प्रधानमंत्री ने की है। इस घोषणा के बाद क्या भारतीय रिजर्व बैंक का वह वचन खारिज हो जाता है, जिसमें धारक को नोट पर अंकित मूल्य को चुकाने की बात कही गई है। परिचालन में हजार और पांच सौ के अधिकांश नोट जाली हैं, जिनकी सरलता से पहचान करना कठिन है। इस आशय की बात 8 नवंबर 2016 को जारी राजपत्र संख्या 2652 में कहा गया है। क्या यह फैसला भारत की लोकतांत्रिक सरकार का माना जाएगा? इस सवाल से हैरत हो सकती है। पर बचा नहीं जा सकता है। व्यक्ति व समाज ही नहीं संसद और सर्वोच्च न्यायालय भी इस मामले पर विचार कर रहा है। इस कदम से जाली नोट, काला धन और आतंकवाद की फंडिंग बंद करने का दावा केन्द्र सरकार ने किया है। तीनों ही समस्याएं बेहद जटिल हैं। यदि ये दूर हो जाऐं तो सचमुच देश का भला हो। इसे स्वागत के योग्य कदम माना जाएगा। पर क्या सचमुच सरकार के दावे पूरे होंगे? क्या यह इस कदर जरुरी था, अच्छे दिनों के लिए? फिर तो संभावना यह भी है कि भारत के प्रधानमंत्री अमेरिकी राष्ट्रपतियों की तरह गरीब जनता में अब खैरात बांटें। इसी बीच ब्रिटीश प्रधानमंत्री ने ‘साहब’ की नपे-तुले शब्दों में तारीफ की है। इसे कहते हैं सोने पर सुहागा। “क्वीन के सिर पर ताज रहे, और मोदी जी का राज रहे।” अब ऐसा नारा सहज सुलभ हो गया है।

आज इन मामलों में कम लोग दुरुस्त जानकारी रखते हैं। वास्तव में इस विमुद्रीकरण को जाली नोट के कारोबर का क्षणिक समाधान माना जाता है। इससे कर की चोरी पर तुरंत असर पड़ता है। साथ ही केन्द्रीय बैंक को लाखों करोड़ का फायदा होता है। अर्थशास्त्रियों के अनुसार यह आंकड़ा करीब साढ़े तीन लाख करोड़ का होगा। केन्द्रीय बैंक के पूर्व गवर्नर डी.सुब्बाराव जैसे विशेषज्ञों ने इस मुनाफे की प्रकृति पर सवाल किया है। साथ ही प्रशासन इस आदेश की तामील करते हुए अधूरी और मुक्कमल तैयारी के बीच झूल रही है, जिसका नतीजा सामने है। इसकी वजह क्या है? यह तो ‘साहब’ ही कह सकते हैं। पर क्या हो सकता है, इसकी चर्चा नहीं करें। यह भी यहां मुमकिन नहीं है। सबसे जरुरी बातों का संज्ञान लेकर ही आगे की ओर बढ़ें।

इस सदमे से चालीस साल की एक महिला बेमौत मारी गई। यह गौतम बुद्ध के निर्वाणस्थल के समीप पूर्वी उत्तर प्रदेश का मामला है। वह कपड़े धोकर जीवन-यापन करती थी। इसी क्षेत्र में आठ साल का एक बच्चा भी करेंशी-नोट और दवाई के खेल में शहीद हो गया। फिर मुंबई में बैंक की कतार में खड़े तिहत्तर साल के वृद्ध विश्वनाथ वर्तक के मौत की खबर आई। इस बीच कम से कम सैंतीस ऐसी ही और घटनाएं प्रकाशित हुई हैं। आज इन सभी निर्दोष हमवतन लोगों की मौत पर एकसाथ मातम मनाने का दिन है। आप जानते हैं ऐसा किन हालातों में हुआ। और मैं यह जानना चाहता हूं कि क्यों हुआ? क्या पता आज आपके मन में भी यह सवाल उठे। सरकार इन चालीस मौतों को भी महज संयोग मान सकती है। क्योंकि उस रात टी.वी. पर इस लोकतांत्रिक देश में एक बार फिर साकार हुआ कि सरकार आखिरकार ‘सरकार’ ही है। 

इसे महज संयोग मानने से पहले मेरे सामने पैसा, कानून और कंट्रोल का तिलिस्मी खेल आ जाता है। जिसकी परतों में उलझने पर आपका आमना-सामना भी इन पंक्तियों में वर्णित तथ्यों से होगा। इसलिए अपनी बात शुरु करते हुए दो बातों को याद करने की जरुरत महसूस हुई। अब एक सरसरी निगाह देश, दुनिया और समाज के विस्तृत परिदृष्य पर डालते हैं। ऐसा करते हुए आपसे मेरा निवेदन है कि महज संयोग की स्थितियों पर गौर फरमाएं। 

नवंबर के दूसरे हफ्ते की शुरुआत निश्चय ही चैंकाने वाली घटनाओं से हुई है। आठ नवंबर की रात आठ बजे भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पांच सौ और हजार रुपये के करेंसी नोट की कानूनी वैधता खत्म कर दी। दिन में ही महात्मा गांधी सीरिज के इन नोटों को बंद करने के लिए एक अधिसूचना जारी किया गया था। फिर दुनिया भर में सबसे बड़ी खबर थी कि डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका के नए राष्ट्रपति चुने गए। उम्मीद के विपरीत डेमोक्रेटिक पार्टी की महिला प्रत्याशी हिलेरी क्लिंटन से ज्यादा मतदान उनके पक्ष में हुआ। दोनों छोर पर एक साथ अचरज में डालने वाली खबरें हैं। इनके अलावा एक तीसरी बात भी है, जिसे नजरअंदाज करना आसान नहीं है। ब्रेक्सिट के बाद ब्रिटेन की प्रधानमंत्री बनीं श्रीमती थेरेसा मे ने इन धमाकेदार खबरों का लुत्फ इंग्लैंड में उठाने की बजाय इंडिया में उठाया है। ये क्या गज़ब हुआ? ये क्या जुल्म हुआ?… अब थोड़ा रुकना होगा। डर है। आप पूछ न बैठें, गीत क्यों गाने लगे हो? 

ये तीनों ही घटनाक्रम महज संयोग हो सकते हैं। पर क्या इस बात से इंकार किया जा सकता है कि दुनिया में कुछ ऐसे भी लोग हैं, जिन्हें इन बातों का पुर्वानुमान था, या फिर इसकी दुरुस्त जानकारी थी। राजनैतिक-अर्थशास्त्र का औसत दर्जे का विद्यार्थी भी यह न्यूनतम जानकारी रखता है कि कुछ लोगों ने इन तीनों ही घटनाओं को कार्यरुप देने के लिए विधिवत तैयारी किया था। क्या उनके बीच कोई सीधा संबंध है? क्या कोई समीकरण इन्हें आपस में जोड़ता है? देश में चहुंओर अफरा-तफरी मची है। ऐसे में इनकी गहराई नापने की फुर्सत कम ही लोगों को है। परंतु मैं दावे से कह सकता हूं कि इस घड़ी में इन्हीं बातों का रहस्य जानने-समझने वाले लोग राहत की सांस ले रहे हैं । 

सटीक और सधे हुए क्रम में घटित होने के कारण तीनों बातें एक साथ सामने आती हैं। यहां मैं इन्हें मजह संयोग ही कहता हूं। इसके बावजूद भी विचार करने योग्य बातें यहां मौजूद हैं। मुकेश अंबानी समूह में रिलायंस इंडस्ट्रीज के पूर्व प्रेसिडेंट उर्जित पटेल केन्द्रीय बैंक के गर्वनर बनाए गए। सरकार पर सवाल उठे थे। दो हजार और पांच सौ के नए नोट इन्हीं महोदय के हस्ताक्षर से जारी हुए हैं। एक रुपये का नोट भारत सरकार जारी करती है। यह पांच सौ, हजार और दो हजार रुपये की करेंशी का मामला है। इस विषय में केन्द्रीय बैंक को घोषणा करना चाहिए था। प्रधानमंत्री की घोषणा के पीछे क्या रहस्य है? इतनी बात साफ है कि 1934 के रिजर्व बैंक आॅफ इंडिया एक्ट के तहत जारी अधिसूचना में नोटबदली का जिक्र है। परंतु प्रधानमंत्री की बुलंद आवाज के बूते इसे नोटबंदी के प्रपंच में तब्दील कर दिया गया है। दो बार विस्तार देने से यह स्पष्ट है कि सरकार भी मानती है कि ऐसा कर पाना मुमकिन नहीं है। लोगों को राहत मिलेगी यदि सरकार 31 मार्च 2017 तक नोटबदली की पाबंदी पर कायम रहते हुए नोटबंदी की सीमा भी इसी तिथि तक बढ़ा दे। साथ ही फंड-फ्लो पर लगे रोक को हटाकर कारोबार की मंदी भी काफी हद तक कम किया जा सकता है। ऐसा करने से संभव है कि गतिरोध खत्म हो, परंतु सहमति की इस संभावना के जनहित में होने के बावजूद भी कोई राजनेता इसकी सचमुच पैरवी नहीं कर रहा है। 

विमुद्रीकरण के विषय में दैनिक जागरण ने 27 अक्टूबर को बृजेश दूबे की कानपुर से रिपोर्ट छापी है। बाद में 17 नवंबर को इसे लागू करने की योजना भी खबरों में रही है। इस बीच तमाम मीडिया प्रतिष्ठानों के पास प्रशांत भूषण द्वारा भेजे गए कुछ कागजात पहुंचे हैं। इनमें गुजरात के मुख्यमंत्री रहते नरेंद्र मोदी द्वारा करोड़ों का कालाधन कारोबारियों से लेने का खुलासा किया गया है। आज जायसवाल की हवाला डायरी के पन्ने हवा में तैर रहे हैं। इन सभी तथ्यों का संज्ञान लेने से प्रतीत होता है कि चालीस साल पहले इंदिरा गांधी की हालत और आज के नरेंद्र मोदी एक जैसी दशा में मजबूर हैं। 

इसी मजबूरी का नतीजा है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में आम लोगों का जीवन कई महीनों तक अस्त-व्यस्त रहेगा। इसका व्यौरा आस-पास हो रही घटनाओं पर नजर डालने पर होता है। रही-सही कोर-कसर इलेक्ट्रानिक मीडिया से लेकर सोसल मीडिया तक पूरी कर रही है। अफवाहों का बाजार गरम है। एक दिन नमक की कीमत आसमान छूने लगी। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में लोगों की भीड़ ने एक बैंक लूट लिया। तो पोस्ट-आफिस पर हाथ साफ करने की दूसरी घटना भी सामने आई है। पूर्वी उत्तर प्रदेश में कई एटीएम मशीनों में सप्लाई किया जाने वाला सौ करोड़ से ज्यादा का रकम गायब हो चुका है। 20 नवंबर के इंडियन एक्सप्रेस में मिथुन एमके की रिपोर्ट पर गौर करें। हैदराबाद से 168 किलोमीटर दूर कर्नाटक बार्डर के पास खारमुंगी में तीन रुपये सैकड़ा मासिक पर किसानों से सूद वसूलने वाले दो लोग सौ रुपये के कमीशन पर हजार और पांच सौ के नोट बदल रहे हैं। यह एक लंबी सूची से ली गई चुनिंदा सूचनाएं हैं। जस्टिन रौलेट की बीबीसी रिपोर्ट में इसे मोदी सरकार का आर्थिक ‘शाॅक एंड औ’ पालिसी कहा गया है। साथ ही ऐसे सभी रिपोर्ट में उपरोक्त घटनाओं की जानकारी का सर्वथा लोप है। जाहिर है कि आज ऐसे भी लोग हैं, जो सच का संज्ञान तक नहीं लेना चाहते हैं। साथ ही ललित मोदी और विजय माल्या ही नहीं, बल्कि पनामा पेपर में वर्णित अमिताभ बच्चन, ऐश्वर्या राय बच्चन और अजय देवगन जैसे चर्चित लोग इस नीति का समर्थन कर रहे हैं। 

इन सबके बीच बाजार की सारी बातें काले और सफेद नामक दो ध्रुवों पर सिमट गया है। इसमें बस दो ही रंगों के लिए जगह है। बाकी रंगों के प्रति चेतना नगन्य है। यह शोक संदेश इन दो ध्रुवों पर प्रवास करने वाले लोगों के लिए निश्चय ही नहीं है। वास्तव में यह इंद्रधनुषी रंगों को समझने वाले लोगों के लिए है, जिनको पीले, हरे, नीले जैसे और रंगों की भी बराबर समझ हो। यों तो अपने गांव में सफेद और काला भी कई जातियों, प्रजातियों और उपजातियों में विभाजित है। सुबह गोपाल के दुधिया सफेदी से होती, तो दिन ढ़लने से पहले मोतिया सफेदी की चमक भी नजरों के सामने जगमगा उठती है। वस्तुस्थिति देखकर मुझे दूसरे विश्व युद्ध के एक अमेरिकी महावीर जार्ज स्मिथ पैटन की बात याद आती है। उन्होंने कहा था, ‘जब सभी लोग एक जैसा सोच रहे हैं, तो कुछ लोग नहीं सोच रहे हैं।’ यह नहीं सोचने वाले लोगों से एक अपील भी है। क्योंकि ऐसे लोगों के जीवन में इसी वजह से दुश्वारियां पैदा हुईं। 

आज सचमुच उन्हें ही गंभीर विचार-विमर्श करने की जरुरत है। इस क्रम में यह भी ध्यान रखना होगा कि प्रधानमंत्री ने नोटबदली के लिए नोटबंदी की घोषणा क्यों किया? और इसके बाद जापान की यात्रा पर क्यों चले गए? इस रहस्य की ओर आउटलुक में बीते 17 नवंबर को प्रकाशित मन मोहन की रिपोर्ट में इशारा किया गया है। नरसिंह राव सरकार के दौरान देश की करेंशी जैसी सिक्युरिटी प्रिंटिंग से जुड़े कारोबार में जापान की कंपनी को शामिल किया गया। इस पर युरोपियन कंपनी डेलारु जियोरी ने भारत सरकार को जाली-नोट को लेकर चेतावनी दिया था। आखिर इसी वजह से नोटबदली का मसौदा तैयार किया गया है। 

कालाधन और सफेदधन का मामला पेंचीदा है। जिस पैसे का लेन-देन बैंक के माध्यम से नहीं हुआ वह कालेधन की जद में है। प्रधानमंत्री की नोटबंदी संबंधी घोषणा के बाद यह धन एक बार फिर परिभाषित हो रहा है। बाजार में मची अफरा-तफरी में एक सवाल है कि क्या जिस धन का आदान-प्रदान बैंकों के माध्यम से नहीं हुआ है, वह सचमुच काला धन है? इसी धन के कारण बैंक और डाकघर में ठसाठस भीड़ है। कतार पर कतार है। इस भीड़ में होने वाले उत्पात का कोई ठिकाना नहीं है। कम ही बातें मीडिया रिपार्ट का हिस्सा बन सकी है। कलह और उत्पात की ऐसी स्थिति बनी हुई है कि लोग काले और सफेद धन के सही मायने भी भूल गए हैं। राजनीति और अर्थशास्त्र से जुड़ा यह प्रपंच दिन-ब-दिन विशाल हो रहा है। चिंगारी सुलग उठी है। यह दहकते अंगारे में बदल कर कभी भी गृह-युद्ध में तब्दील हो सकता है। अच्छा होगा, यदि इसे रोकने की कोशिश में लगी जमात के लोग अचूक हों। 

विमुद्रीकरण के विरोध में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की आवाज उभरती है। इस बीच उन्होंने एटीएम की नई परिभाषा गढ़ा है, आएगा तो मिलेगा। राजनैतिक दलों ने मिलकर संसद में इसका विरोध शुरु किया है। सहमति की आषा चिह्न दिख नहीं रही है। राहुल गांधी ने लोगों के साथ कतार में खड़े होकर इसका विरोध किया, और फिर इस मामले में घोटाले की संभावना भी व्यक्त किया है। अरविन्द केजरीवाल ने चिंगारी सुलगाने का काम किया है। इसी बीच सोसल मीडिया में मुलायम सिंह यादव के ‘बगावत’ का शोर भी उभरा। कहा गया कि ऊत्तर प्रदेश में रुपया बन्दी का आदेश लागू नहीं होने दिया जाएगा। हकीकत यह रही कि सूबे के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने 24 नवंबर 2016 तक जमीन खरीदने में हजार और पांच सौ रुपये के नोट का इस्तेमाल करने की छूट देने का जिक्र किया है। आम लोगों की मौत, अफवाह, अफरा-तफरी और लूट-खसोट का सिलसिला चल पड़ा है। यह सब एक अलोकतांत्रिक निर्णय का नतीजा है। इसे रोकने के लिए नोटबदली को नोटबंदी बनने से रोकना था। यह वही कर्म है, जिसकी वजह से केन्द्रीय बैंक मुनाफाखोर साबित हो गया है। 

आज विमुद्रीकरण के परिणाम सामने हैं। भारत में ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। इमरजेंसी के बाद मोरारजी देसाई की सरकार बनी। उस दौर में 1000, 5000 और 10000 के नोटों को बंद करने का फैसला लिया गया। पर वह एक लंबी लोकतांत्रिक प्रक्रिया थी। 16 जनवरी 1978 को बड़े मूल्य के नोटों का चलन बंद हो गया। बाद में इसी मामले में संसद ने 30 मार्च 1978 को डिमोनेटाइजेशन एक्ट भी पारित किया। इस विषय में कहा गया कि पिछली सरकार से जुड़े अभिजात्य वर्ग के लोगों ने अकूत धन जमा कर रखा है। इसे आम जनता के हित में उपयोग करने का सुझाव राजनेताओं के दिमाग की उपज थी। दरअसल पहली बार 1938 में ऐसे बड़े नोट छापे गए। आजादी से पहले 1946 में बनी अंतरिम सरकार ने इसे बंद कर दिया था। फिर 1954 में जवाहरलाल नेहरु के कार्यकाल में इन्हें पुनः प्रयोग में लाया गया। अंत में इन्हें 1978 में बंद कर दिया गया था। आज भी युरोप के क्लबों में इन नोटों की खुलेआम निलामी होती है। इनके लिए लगने वाली बोली की रकम पर आप सहसा यकीन भी नहीं कर सकेंगे। 

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के जस्टिस जगमोहन की गौरव गाथा आप अभी तक भूल नहीं सके होंगे। सत्तर के दशक में उन्होंने भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को कटघरे में खड़ा किया था। और जिसकी वजह से इमरजेंसी की कील जबरदस्ती ठोेंक दी गई थी। इन पंक्तियों को पढ़कर शायद आप मान बैठें कि मेरी दिलचस्पी भी इस मामले में रही है। दरअ़सल मेरे दोस्तों में ऐसे नाम भी हैं, जो इस मामले में बेहद अहम रही नीली डायरी और लाल डायरी को सामने लाने वालों में से रहे। मेरी साधारण समझ से इस विषय में ठीक-ठीक जानकारी रखने में शायद सबसे सक्षम व्यक्ति। इस मामले को भी समझना जरुरी है।

रायबरेली लोकसभा सीट से इंदिरा गांधी और राज नारायण चुनाव मैदान में आमने-सामने थे। उनके बीच कांटे की टक्कर थी। ईमानदारी और बेइमानी की जंग तो चल रही थी पर आज की तरह सोसल मीडिया और इलेक्ट्राॅनिक मीडिया का प्रभाव नहीं था। इंदिरा गांधी के समर्थन में प्रचार करने वाले लोगों ने अपने पक्ष में मतदान करने के लिए 1000, 5000 और 10000 रुपये के नोट गरीब लोगों के बीच खुलेआम बांटे। जिन लोगों ने ऐसे नोट कभी नहीं देखे थे, उन्होंने इसे रद्दी समझ कर फेंक दिया। राज नारायण के प्रचार दल में शामिल एक चैदह साल के बीर बालक ने ऐसे 49 करेंशी नोट बीन लिए। बालक ने लोगों से इस विषय में जानकारी की। फिर सारी बातें राज नारायण को बताया। परंतु उन्हें भी ऐसे नोट के विषय में जानकारी नहीं थी। इसलिए यकीन ही नहीं हुआ। बीर बालक ने स्टेट बैंक की शाखा में जाकर इसकी सच्चाई जानने का निश्चय किया। कई हफ्तों की जद्दोजहद के बाद पता चला कि सभी नोट असली थे। 

वोट खरीदने की इसी कोशिश का नतीजा था कि इंदिरा गांधी के खिलाफ जगमोहन की अदालत में केस चला। और नौबत इमरजेंसी तक पहुंच गई। मोरारजी देसाई सरकार ने राज नारायण के सुझाव पर अमल किया। उन दिनों ऐसे बड़े नोट धनकुबेरों के पास ही कालेधन के रुप में संचित था। इस फैसले का नतीजा हुआ कि दानपेटियों में इन नोटों के अंबार लग गए और धर्मस्थानों के नाम पर बड़ी-बड़ी अट्टालिकाएं भी खड़ी हो गई। यद्यपि ऐसा कहना मुमकिन नहीं है कि काला धन समाप्त हो गया। हां, आम लोगों को कोई तकलीफ या नुकसान नहीं झेलना पड़ा था। सरकार को देश की जनता का सहयोग मिला। परंतु आज ऐसा नहीं है। आम जनता का सहयोग लेना मुनासिब नहीं समझा गया। इसकी एक वजह यह भी हो सकती है कि बाजार में जितना पैसा होने का दावा केन्द्रीय बैंक ने किया है, उससे ज्यादा रकम मौजूद हो। किसी दूसरी वजह से भला बैंक अफरा-तफरी मचाने के लिए क्यों राजी होने लगा!

आज की परिस्थिति ठीक विपरीत है। काले धन को सोने-चांदी और दूसरे रुपों में तब्दील करने की प्रक्रिया जोर-शोर से चल रही है। इसका व्यौरा भी आने वाले वक्त में आसानी से उपलब्ध हो जाएगा। प्लास्टिक मनी के इस युग में सीसीटीवी और आधार कार्ड का उपयोग हो रहा है। लोगों की जेब से निकलने वाले धन का आंकड़ा उपलब्ध हो रहा है। बैंकों ने लोगों को कतार में खड़ा कर पांच लाख करोड़ रुपये दस दिनों में ही जमा कर लिए हैं। मैं इसे जन-धन योजना की प्यास बुझाने का जरिया नहीं मानता हूं। यहां दो बातों का ध्यान रखना जरुरी है। आजादी के 69 सालों बाद भी देश में होने वाले कुल व्यापार का तीन चैथाई हिस्सा बुक्स में नहीं है। दूसरी बात काले धन के प्रबंधन की कारगर योजनाओं को सरकार ने बखूबी प्रचारित किया है। इसके प्रबंधन की बेहतर युक्ति आयकर अधिनियम की धाराओं से निकल कर फाॅरेन डायरेक्ट इंवेस्टमेंट की व्यवस्था में समा चुकी है। एफडीआई के प्रावधानों ने इसके लिए सबसे कारगर युक्ति को संभव किया है। एक ऐसा कारगर तरीका इजाद हुआ है, जिसके माध्यम से विदेशों में जमा काला धन सफेद होकर स्वदेश में लौट सकता है। इसमें स्वदेश में जमा काले धन को विदेश भेजने की सुविधा भी उपलब्ध है। प्रधानमंत्री ने स्टार्टअप इंडिया अभियान की शुरुआत भी कालेधन की समस्या को हल करने के लिए ही किया। इसलिए इसमें टैक्स की छूट का प्रावधान किया गया। वित्त मंत्रालय द्वारा 30 सितंबर 2016 तक कालाधन जमा करने की समय सीमा तय कर खूब प्रचारित किया गया था। इसके कारण बैंकों में जुलाई से सितंबर की तिमाही में औसत से ज्यादा धन जमा हुआ।

इस कड़ी में ऐसी कोशिश हो रही है, जिसकी दुरुस्त जानकारी आम लोगों को आसानी से नहीं होगी। दिल्ली के चांदनी चैक जैसे पुराने बाजार में होने वाले कारोबार का 80 प्रतिशत हिस्सा बिना बिल के ही होता रहा। प्रधानमंत्री की घोषणा के तत्काल बाद ऐसे सभी बाजारों में दर्ज होने वाली बिक्री में अप्रत्याशित रुप से वृद्धि देखा गया। गौर करने की बात है कि यहां वास्तविक सेल और बुक्स में हुए सेल के बीच कई गुणा का फासला रहा। इस कार्य को अंजाम देने वाले व्यापारियों ने कम से कम 10 फीसदी आयकर बचाने के लिए यह हेराफेरी किया। इस आदेश के बाद हवाला करोबार में लगे लोगों की चिंता बढ़ी। इन करोबारियों की प्राथमिकता गुप्त-गोदामों में पड़े धन को अतिशीघ्र ठिकाने लगाने की है। इस प्रक्रिया को समझना आसान है। पर ऐसे काले धन को निकालना बेहद मुश्किल। भारत की करेंशी का इस्तेमाल श्रीलंका, नेपाल, भूटान और बांग्लादेश जैसे देशों में बखूबी होता है। थाईलेंड में फुर्राट मार्केट और सिंगापुर में मुस्तफा मार्केट जैसे जगह भी हैं। इनके अतिरिक्ति पनामा पेपर में कर चोरों के जन्नत का विस्तृत वर्णन है। ये सभी वे रुट हैं, जिनके माध्यम से हवाला करोबारियों का धन सफेद होता है। यह प्रक्रिया चल रही है। और तब तक बंद नहीं होगी, जब तक चुनिंदा करोबारियों का धन सफेद होकर पुनः एफडीआई के माध्यम से स्वदेश न लौट आए। इन सब के बाद भी जिनके हाथों में पांच सौ और हजार के नोट दिख रहे हैं, क्या वो सचमुच काले धन के स्वामी हैं? ऐसे मेहनतकश लोग उत्पीड़न अथवा हास्य के पात्र बने हुए हैं। पता नहीं ये लोग कब तक ऐसी विकट स्थिति में बने रहेंगे।  

सरकार की तमाम सुविधाओं का लाभ लेने से वंचित रह गए लोग आज दानपेटियों की ओर रुख करने को भी स्वतंत्र नहीं रह गए हैं। नोटबंदी ने आदान-प्रदान बंद कर दिया है। इस कड़ी में ऐसी खबरें हैं कि कहीं सरकारी दुकानें पुराने नोट नहीं लेकर परेशानी खड़ी कर रही है, तो कहीं छोट-छोटे व्यापारी भी लोगों की तकलीफ कम करने की नीयत से प्रधानमंत्री का फरमान भूल रहे हैं। भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गर्वनर रघुराम राजन ने विमुद्रीकरण और कालाधन पर टिप्पणी की थी। वस्तुतः कालेधन के मालिक इसका प्रबंधन करना भी जानते हैं। 

नोटबंदी और नोटबदली की इस घटना को दूसरा सर्जिकल स्ट्राइक कहा जा रहा है। केन्द्र की सत्ता में काबिज दलों से जुड़े नेताओं ने इसी तरह इसे प्रचारित करना शुरु किया है। क्या सचमुच मोदीजी ने दूसरा सर्जिकल स्ट्राइक किया है? इसके भुक्तभोगी आज बैंक और डाकघर के अलावा तमाम तरह के व्यायवसायिक प्रतिष्ठानों में दिख रहे हैं। देश का कोई कोना और समाज का कोई वर्ग शायद ही अछूता रह गया हो। इसकी चपेट में आए लोगों की संख्या और प्रभाव क्षेत्र का दायरा बहुत विशाल है। वास्तव में रणनीति की भाषा में सर्जिकल स्ट्राइक एकदम सटीक प्रहार को कहा जाता है। इसमें लक्ष्य भेदने के अलावा किसी अन्य स्थान पर कोई नुकसान नहीं हो, यह सुनिश्चित करना सर्वोपरि होता है। इसके ठीक विपरीत रणनीति को कारपेट स्ट्राइक कहा जाता है, जिसका प्रभाव क्षेत्र बहुत व्यापक होता है। मरने वाले कौन होंगे, इसकी पुख्ता जानकारी पहले से नहीं होती है। दोनों ही रणनीति में एक समानता हो सकती है, जिसे गोपनीयता कहते हैं। इस प्रहार का दंश झेलने वाले कौन हैं, कहां हैं और कितने हैं? इन प्रश्नों का उत्तर पब्लिक डोमेन में है। एकदम साफ और बिल्कुल स्पष्ट। इस पर गौर करने के बाद कोई इसे सर्जिकल स्ट्राइक शायद ही कहे। दूसरी बात इस स्ट्राइक का स्पष्ट मतलब निकलता है कि केन्द्र सरकार ने विश्वनाथ वर्तक जैसे निर्दोष और असहाय लोगों को बेमौत मारने की योजना बनाई है।

यहां तीन और बातों पर गौर करने की कोशिश करें। ये नफा-नुकसान की अहम बातें हैं। आर्थिक मामलों के सचिव शशिकांत दास द्वारा नोट चेंज करने पर निशान लगाने की घोषणा की गई। आपको याद है मतदान के बाद स्याही लगाया जाता है। अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर को इस स्याही की आपूर्ति एक मात्र कंपनी मैसूर पेंट्स एंड वार्निश लिमिटेड से होती है। नए नोटों के साईज में फर्क है। अब देश भर में दो लाख एटीएम ठीक काम नहीं करेंगे। इनमें फेर-बदल का नया काम निकला है। इस बाजार पर काबिज कंपनियों को फायदा पहुंचेगा। नए नोट करोड़ों की संख्या में और अरबों-खरबों के मूल्य में छापा गया है। इसमें बारह हजार करोड़ रुपये खर्च हुए हैं। आपको करेंशी छपाई के काम का ब्रेक-अप पता है। मुझे नहीं पता था तो दोस्तों से पूछा। पता चला कि पूरी पांच आयतों वाला काम है। कागज सप्लाई करने वाली कंपनी, फिर नोट छापने वाली दूसरी कंपनी, इस बीच थागा जैसे उपस्करों की आपूर्ति करने वाली तीसरी कंपनी और स्याही की आपूर्ति के लिए चैथी कंपनी। इन सभी सुविधाओं को एक साथ मुहैया कराने वाली एक और कंपनी मिलकर इसे पूरा करती है। नए करेंशी नोट छापने वाली इन सभी कंपनी का व्यौरा दी हिन्दू में प्रकाशित विजेता सिंह की रिपोर्ट में मैंने पढ़ा है। इन्हीं में एक एक युरोपियन कंपनी है, डेलारु जियोरी। यह लंबे समय से दुनिया के 90 फीसदी करेंशी बिजनस पर काबिज है। पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी को जाली नोट सप्लाई करने के कारण पिछली सरकार ने इसे ब्लैकलिस्ट भी कर दिया था। इसके वापसी की कहानी आश्चर्यजनक है।

कालाधन के मामले में अर्थशास्त्रियों की बातों और भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों पर गौर करना चाहिए। वर्ष 2015-16 में सकल घरेलु उत्पाद लगभग 150 लाख करोड़ रुपये का रहा, जिसका न्यूनतम 20 फीसदी हिस्सा कालाधन माना गया है। इसी वित्त वर्ष में 30 लाख करोड़ रुपये मूल्य का कालाधन पैदा हुआ। पंद्रह वर्ष पूर्व यही आंकड़ा 40 फीसदी का आंका गया था। हिसाब-किताब की सामान्य समझ के अनुसार पिछले पंद्रह वर्षों में न्यूनतम 400 लाख करोड़ रुपये का कालाधन पैदा हुआ। भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार बीते मार्च तक बाजार में उपलब्ध पांच सौ और हजार के नोटों का कुल मूल्य बारह लाख करोड़ है। यह कुल नोटों का 86 फीसदी है। बाजार में मौजूद यह धन आने वाले दिनों में बैंकों अथवा डाकघरों में जमा हो जाएगा। शेष 388 लाख करोड़ मूल्य का कालाधन कहां गया? यह आपके लिए खोज का विषय हो सकता है। जाली नोट के विषय में एफआईसीएन और भारतीय सांख्यिकी संस्थान की रिपोर्ट को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। इनके अवलोकन से स्पष्ट होता है कि एक समय में देश में 400 करोड़ रुपये मूल्य से ज्यादा नकली नोट नहीं हो सकती है। ऐसी दशा में केन्द्रीय बैंक के इस निर्णय के क्या मायने हैं? कुछ और स्पष्ट होता है। 

अंग्रेजी राज में क्राउन एजेंट करेंशी का व्यापार संभालते थे। पैसे छापकर विलायत से भारत भेजा जाता था। अंग्रेजों ने 1928 में नासिक में पहला छापाखाना लगाया। फिर देश में पैसे की छपाई शुरु हुई। परंतु आज भी इस व्यापार में 70 फीसदी भागीदारी विदेशी ही है। ब्रिटेन की प्रधानमंत्री के तीन दिनों के भारत प्रवास प्रसंग को ठीक से समझने की जरुरत है। उनकी इस यात्रा से पूर्व 10 डाउनिंग स्ट्रीट की विज्ञप्ति में दुविधा की स्थिति दिखती है। पहले उनके साथ आने वाले मेहमानों की संख्या 100 बताया गया। बाद में यह सिमट कर 40 हो गई। कभी लंदन के एक गली में 40 व्यापारियों ने मिलकर ईस्ट इंडिया कंपनी शुरु किया था, जिसमें बैंक आॅफ इंग्लैंड के नीति-नियंता शामिल थे। आप जानते हैं कि किन परिस्थितियों में कंजरवेटिव पार्टी का नेतृत्व थेरेसा मे को सौंपा गया था। उनके पति फिलीप जाॅन मे का इंवेस्टमेंट बैंकिंग सेक्टर और कंजरवेटिव पार्टी में नाम है। सन 1979 में फिलीप आक्सफोर्ड युनियन सोसाइटी के प्रेसिडेंट हुआ करते थे। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि इन्हें बेनजीर भुट्टो, जो बाद में पाकिस्तान की प्रधानमंत्री बनीं, ने कंजरवेटिव पार्टी स्टूडेंट डिस्को में मिलवाया था। थेरेसा ने आक्सफोर्ड युनिवर्सिटी से भूगोल में स्नातक करने के बाद बैंक आॅफ इंग्लैंड से कैरियर की शुरुआत किया। इस बैंक के लिए डेलारु जियोरी ही करेंशी छापती है। विदा होने से पूर्व उन्होंने इस विषय पर भी प्रकाश डाला कि नरेन्द्र मोदी की स्वतंत्र भारत के प्रधानमंत्रियों के बीच क्या स्थिति है। इससे साफ है कि ब्रिटेन के प्रधानमंत्री के पास कामनवेल्थ देशों के राष्ट्राध्यक्षों की ग्रेडिंग करने की भी शक्ति है। 

इस विषय में कोई राय कायम करने से पहले दो और तथ्यों का संज्ञान रखना आवष्यक है। संभव है कि इन दोनों बातों पर सहसा आपको यकीन नहीं हो। इसलिए इन्हें लिखने से पहले अंग्रेजी के दी हिन्दू, इंडियन एक्सप्रेस, गार्जियन और टेलीग्राफ जैसे प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में प्रकाशित खबरों के आधार पर मिली जानकारियों को जहां तक संभव हो सका है, विश्वस्त श्रोतों से सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया है। मैंने प्रिंट मीडिया में योगदान देते हुए डेढ़ साल व्यतीत किया था। यह घटना राजग सरकार के पिछले कार्यकाल के दौरान घटित हुई थी। इंडियन एयरलाइंस की काठमांडू से दिल्ली आ रहे विमान आईसी-814 का अपहरण हो गया। क्रिसमस से एक दिन पहले ऐसा हुआ था। और नए सहस्त्राब्दि की शुरुआत से पहले छः दिनों तक हाईप्रोफाइल ड्रामा चलता रहा। आतंकवादियों ने कई मुल्क के राजनेताओं की नींद उड़ा दिया था। 

उन दिनों जसवंत सिंह विदेश मंत्री थे। इसमें मसूद अजहर समेत तीन आतंकवादियों को तालीबान को सौंपा गया था। आतंकवादियों ने एक नवयुवक को मार दिया था और शेष 155 लोगों की जान बचाने में मिली सफलता को प्रचारित किया गया। भारत के इस मामले में स्वीट्जरलेंड की सरकार ने विशेष रुचि लिया था। इस कांड में मौत का शिकार हुए नवयुवक रुपीन कात्यान के अलावा एक ऐसा नाम भी उभरा था, जिसे पब्लीसिटी बिल्कुल ही नहीं पसंद है। दरअ़सल उस दिन करेंशी किंग राॅबर्टो जियोरी और उनकी महिला साथी क्रिश्चियाना कालेब्रेसी इसी विमान में मौजूद थे। 150 देशों की करेंशी के बेताज बादशाह जियोरी इटली में जन्मे और स्वीट्जरलेंड के रईस हैं। इसलिए स्वीस डिमांड के तहत यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना सर्वोपरि हो गया था। आप इस महानुभाव की एक तस्वीर तक ‘गुगल देव’ से नहीं प्राप्त कर सकते हैं। जियोरी जानते हैं कि उस यात्रा से दुरुस्त लौट कर आने की क्या कीमत थी। याद रहे कि इसके पूर्व ही उन्होंने राव सरकार को चेताया था। 

दूसरा वाकया समझना थोड़ा जटिल है। ब्रिटीश दैनिक गार्जियन में 12 अगस्त 2010 को डेलारु के विषय में प्रकाशित जो वूड और ग्रीमी वेर्डन की रिपोर्ट पर गौर करें। इसमें कंपनी के शेयर में गिरावट और चेयरमैन जेम्स हसी के त्यागपत्र का जिक्र है। चूंकि इस मामले को भारतीय लोगों से छिपाने की कोशिश की गई है, इसलिए इसकी जानकारी सत्ता को करीब से परखने वाले चुनिंदा लोगों को ही है। साल 2009-2010 के दौरान सीबीआई ने जाली नोट के सिलसिले में भारत नेपाल बाॅर्डर के पास 70 बैंक शाखाओं में छापेमारी की, जहां उन्हें नकली नोट बरामद हुए। प्रबंधकों ने बताया कि पैसे उन्हें भारतीय रिजर्व बैंक से प्राप्त हुए। फिर सीबीआई ने आरबीआई के तहखानों में छापेमारी की, जहां उन्हें बड़ी मात्रा में हजार और पांच सौ के जाली नोट प्राप्त हुए। नतीजा गार्जियन की रिपोर्ट में वर्णित है। विदित हो कि जेम्स हसी ब्रिटिश क्वीन एलिजाबेथ द्वितीय के धर्मपुत्र हैं। त्यागपत्र से पिछले वित्त-वर्ष में उन्होंने वेतन भत्ते के रुप में छत्तीस करोड़ रुपये प्राप्त किया था। डेलारु छोड़कर इसी धंधे की दूसरी युरोपियन कंपनी में चेयरमैन के विशेष सलाहकार की हैसियत से ज्वाइन किया।

उन्हीं दिनों की बात है तत्कालीन वित्त मंत्री ने नोटबदली लागू करने की योजना बनाई थी। परंतु अमली-जामा पहनाने में असफल रहे। आज केन्द्रीय बैंक जाली-नोट के धंधे से अपना दामन साफ करने में लगी है। आम लोग मारे जा रहे हैं। विपक्षी दल के नेताओं को कालेधन की चिंता सता रही है। कोई यह कहने को तैयार नहीं जब केन्द्रीय बैंक ही काला धन बैंको में भेज रहा था, तो काले और सफेद के बीच भेद ही खत्म हो गया। भूमंडलीकरण की शुरुआत के बाद यह तीसरा मौका है, जब भारत में लोग करेंशी-किंग की शक्तियों को अनजाने ही सही, पर झेल जरुर रहे हैं। कालेधन को खत्म करने वाले व्यक्ति अथवा समूह वर्षों से छोटे मूल्य के नोटों की पैरवी कर रहे हैं। यह कार्य उनकी अवधारणाओं के भी ठीक उलट ही है। इसके विश्लेषण से केन्द्रीय बैंक की मंशा स्पष्ट होती है। साथ ही यह भी स्पष्ट होता है कि ऐसा करने का लाभ किसे मिलेगा। 

भारतीय पारंपरिक अर्थशास्त्र की अवधारणा को कौटिल्य ने लिपिबद्ध किया था। वस्तुतः अर्थ का यह शास्त्र चाणक्य से भी पुराना है। वस्तु विनिमय के क्रम में एक वस्तु के सापेक्ष दूसरी वस्तु किस परिमाण (मात्रा, वजन व मूल्य) में होगा। इन्हीं बातों का विश्लेषण करने वाला विषय अर्थशास्त्र कहलाता है। गांवों की पुरानी व्यवस्था वस्तु विनिमय की प्रक्रिया को स्पष्ट रेखांकित करती है। कई लोगों को आज भी ध्यान होगा कि गांवों के दुकानदारों ने क्या व्यवस्था अपना रखी थी? खेतों में उपजने वाले अनाज अथवा दूसरी वस्तुओं के बदले इन दुकानों में ग्रामीणों को वांछित वस्तु की प्राप्ति हो जाती रही। इस अर्थशास्त्र में वह दोष नहीं था, जिसका सामना आज आम लोग यत्र, तत्र, सर्वत्र कर रहे हैं। अफरा-तफरी और गृह-युद्ध की स्थिति के कारक शास्त्र को अनर्थशास्त्र  ही कहा जाता है। फुर्सत नहीं निकाल पाने के कारण नोबल पुरस्कार नहीं लेने वाले अर्थशास्त्री ने इसका अर्थ बताते हुए कहा कि सरकार ने 125 करोड़ लोगों के साथ जुआ खेला है। जियां द्रेज साहब इसे शायद अर्थशास्त्र का अनर्थ कहें। मेरे गांव में तो लोग इसे ही अनर्थशास्त्र का अर्थ मानते हैं। क्या यह एडम स्मिथ का अर्थशास्त्र है? या फिर केन्द्रीय बैंकों का अर्थशास्त्र? सचमुच यह गंभीर समस्याओं का कारक साबित हुआ है। यह तो मौलिक अर्थशास्त्र भी नहीं है। खून से रंगी मुनाफाखोरी को हम अर्थशास्त्र कैसे कह सकते हैं। 

आधुनिक अर्थशास्त्र आधारहीन मुद्रा विनिमय की व्यवस्था पर आधारित है। सोने के बराबर मूल्य का टोकन मनी छापने की व्यवस्था खत्म हो चुकी है। उन्नीसवीं सदी में गढ़वाल के पहाड़ों में एक बिना ताज का बादशाह अपना सिक्का चलाया करता था। फ्रेडरिक विल्सन को स्थानीय लोग हुल सिंह कहते थे। आज भी भारत में अपनी करेंशी चलाने वाले लोग हैं। पिछले दिसंबर में भारतीय न्याय मंच ने अर्थशास्त्री रोशनलाल अग्रवाल के सम्मान में दो दिनों की परिचर्चा रखा था। इस दौरान भरत गांधी का व्याख्यान सुनने को मिला। उन्होंने बीते सालों में करोड़ों रुपये मूल्य की अपनी करेंशी जारी करने के विषय में जानकारी देकर मुझे चैंका दिया था। परंतु यह सब करेंशी-किंग जियोरी के साम्राज्य के सामने नगण्य ही है। 

इस प्रसंग में अमेरिका के नए राष्ट्रपति के विषय में जिक्र किया गया है। इस संयोग की पड़ताल में इंडिया फस्ट या अमेरिका फस्ट जैसा मिलता-जुलता जुमला याद कर सकते हैं। पर यह महज संयोग है, कोई समीकरण नहीं। करेंशी बदलने के सवाल से इसका कोई संबंध स्थापित करना मुश्किल है। हालांकि वहां साठ के दशक के अंत में तत्कालीन राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने डिमोनेटाइजेशन का फार्मूला लागू कर सौ डॉलर से ज्यादा मूल्य की करेंशी को चलन से बाहर कर दिया था। अब तक के अमेरिकी इतिहास में वही एक राजनेता हैं, जिसे महाभियोग से बचने के लिए त्यागपत्र देना पड़ा हो। डोनाल्ड ट्रंप के इस जीत की भविष्यवाणी करने वाले विशेषज्ञ एलन लिचमैन ने उन पर महाभियोग चलने के विषय में भी दावे से कहा है। पर यहां मुझे अमेरिका के तीसरे राष्ट्रपति थोमस जेफरसन की बात याद आती है। अट्ठारहवीं सदी में ही उन्होंने कहा था, ‘मैं समझता हूं कि बैंकिंग संस्थान हमारी स्वतंत्रता के लिए सेवारत सैनिकों से भी ज्यादा खतरनाक हैं’। जेफरसन अमेरिका के राष्ट्र निर्माताओं में से एक थे। डिक्लेरेसन आॅफ इंडिपेंडेंस का मूल ड्राफ्ट उन्होंने ही लिखा था। कर्ज और करेंशी के बूते राज करने वाले युरोपियन क्राउन एजेंट्स का मुकाबला करने में एंड्रयु जैक्सन और अब्राहम लिंकन जैसे अमेरिकी राष्ट्रपति के नाम गौरव से लिए जाते हैं। इन महान राजनेताओं ने पूंजी के साम्राज्य को चैलेंज किया था। अमेरिकी स्वतंत्रता के पुरोधाओं को इसकी समुचित जानकारी थी। 

आज वहां भी कम ही लोग इस विषय में दुरुस्त जानकारी रखते हैं। पूंजी से जीतना आसान नहीं है। बैंकनोट प्रिंटिंग के रहस्यों को उजागर करने के लिए 1983 में अमेरिकी लेखक टेरी ब्लूम ने एक किताब, ‘दी ब्रदरहुड आॅफ मनीः दी सीक्रेट वर्ल्ड आॅफ बैंकनोट प्रिंटर्स’ लिखी थी। करेंशी व्यापार को नियंत्रित करने वाले प्रतिष्ठान से जुड़े दो प्रतिनिधियों ने प्रिंटिंग प्रेस से सारी की सारी किताबें उठा लिया था। आज तक यह किताब बाजार का मुंह नहीं देख सका है। इसके पूर्व कूगन द्वारा 1935 में लिखी ‘मनी क्रियेटर्स’ जैसी थोड़ी सी किताबें ही उपलब्ध रही हैं। हालांकि सूचना-क्रांति के काल में इस विषय में ज्ञान को लेकर अकाल कायम नहीं रहा। कई विद्वानों ने जान की परवाह न कर ज्ञान को आम लोगों तक पहुंचाने का काम किया है। इस विषय में क्लाउज बेंडर की ‘मनी-मेकर्सः दी सीक्रेट वर्ल्ड आॅफ बैंकनोट प्रिटिंग’ ज्ञान का भंडार है। पिछले साल दिसंबर में प्रकाशित इतिहासकार पाॅल कहन की किताब ‘दी बैंक वार’ की विषयवस्तु भी यही है। यह अमेरिकी बैंक को बराबर मूल्य के सोना और चांदी की डिपोजिट के लिए बाध्य करने वाले राष्ट्रपति एंड्रयु जैक्सन और सेंट्रल बैंक की योजना को मूर्तरुप देने में लगे बैंकर निकोलस बीडल के बीच की जंग का व्यौरा प्रस्तुत करता है। यह वही योजना थी, जिसने एक सदी बाद संयुक्त राज्य अमेरिका के आम लोगों का सारा सोना (गोल्ड) हड़प लिया था।

अमेरिकी कांग्रेस में एक सुनवाई के दौरान सन 1911 में टी.कशिंग डेनियल ने कहा था कि हमें राष्ट्र के पैसे पर कंट्रोल करने दो, और फिर परवाह नहीं, कानून कौन बनाता है। दरअ़सल बैंकर और फाइनेंसर धन आपूर्ति को नियंत्रित कर व्यापार रोकने में लगे थे। इस विषय में संसदीय कार्यवाही चल रही थी। डेनियल ने ऐसा पूंजी के साम्राज्य पर काबिज बैंक आफ इंग्लैंड के नियंताओं के बीच लंबे समय से प्रचलित कहावत को याद करते हुए कहा था। अट्ठारहवीं सदी के युरोपिन बैंकर मेयेर एंसेल रेडशिल्ड को उद्धृत कर यहां तक कहा जाता है, ‘मुझे राष्ट्र का धन निर्गत और नियंत्रित करने दो, और मुझे कोई परवाह नहीं, कानून कौन बनाता है’। यहां ‘हम’ से ‘मैं’ के बीच का जटिल फासला है। मुनाफाखोरी की मंशा इन्हीं शब्दों में निहित है। आधुनिक लोकतंत्र के सामने मुंह बाए सवालों की जड़ में यही संकट है। 

वास्तव में पूंजी के नियंताओं ने कवियों की उक्तियों में अपनी युक्ति फिट कर नया मंत्र पेश किया था। मेरे ताऊजी कवियों की बातों का अक्सर जिक्र करते हैं। सोलहवीं शताब्दि के कवि सर फिलीप सिडनी के बारे में प्रसिद्ध है कि क्वीन एलिजाबेथ के कोर्ट में उनका जादूई प्रभाव था। उन्होंने कहा, ‘मुझे राष्ट्र के गीत गढ़ने दो, और फिर परवाह नहीं, कानून कौन बनाता है’। सत्तरहवीं शताब्दि में स्काॅटलेंड के प्रसिद्ध लेखक और राजनेता एंड्रयु फ्लेचर ने भी उनकी बातों को दुहराया है। शहर के सफेदपोशों के बीच एक ऐसी ही पुरानी कहावत है, ‘हमें शहर का कोतवाल नियुक्त करने दो, और हमें परवाह नहीं, कानून कौन बनाता है’। ये बातें शक्ति के केन्द्र की ओर इंगित करता है। इन तीनों बातों के इर्द-गिर्द पसरे तथ्यों को ध्यान में रखकर आज की परिस्थिति पर गौर करना चाहिए। फिर स्पष्ट होगा कि करेंशी-किंग सचमुच बेताज-बादशाह हैं। इस बादशाह को चैलेंज करना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन हो गया है।

भारत के प्रधानमंत्री ने एक गोपनीय निर्णय को टी.वी. पर घोषित किया है। यह अपराध से अर्जित कालेधन को खत्म करने की कथित मुहिम है। ऐसा करने वाले ‘साहब’ शायद यही समझते हैं कि इन लोगों को जमीन, मकान, पेंटिंग्स और दूसरे ऐसे निवेशों के विषय में कोई जानकारी ही नहीं है। ऐसा करने से पहले ‘साहब’ को अपने ही दल के चुनावों में कालेधन का प्रयोग सख्ती से बंद कर साहबी दिखानी थी। आखिरकार सवाल वहीं है कि यह आदेश सचमुच किसने जारी किया? क्या नेताजी सुभाष चंद्र बोस के मुल्क को यह जानने का अधिकार भी नहीं रह गया है? इसी देश की आजादी के लिए उन्होंने खून मांगा था।

अफ्रीकी विद्वान इब्न बतूता ने भारत के एक विद्वान मुस्लिम बादशाह का जिक्र किया है। इस बादशाह ने अपनी राजधानी दिल्ली से देवगिरि (दौलताबाद) निर्धारित किया। एक व्यक्ति चलने में असमर्थ था। अपाहिज की फरियाद बादशाह तक पहुंचने पर फरमान जारी हुआ कि इसे हाथी के पांव में बांध कर वहां भेजा जाय। बादशाह ने फिर राजधानी दिल्ली शिफ्ट करने का भी आदेश दिया था। नोटबंदी के आदेश के बाद ‘साहब’ की तुलना उसी बादशाह से हो रही है। परंतु ‘साहब’ के पास इससे बचने का एक मौका अभी भी शेष है। भाजपा के पूर्व महासचिव गोविंदाचार्य ने इस विषय में कहा है, ‘खोदा पहाड़ निकली चुहिया’। उन्होेंने रेल हादसा में मारे गए लोगों की तरह इस आदेश के कारण मौत का शिकार हुए चालीस लोगों को मुआवजा देने की मांग किया है। भाजपा भी लोगों को राहत देने के लिए नई युक्तियों को अपनाने में लगी है। यह अजीबोगरीब स्थिति है। जिसमें बातें राहत देने की होती है, और कोशिशें जान लेने की।

कुछ महीनों बाद यह अफरा-तफरी खत्म हो चुकी होगी। फिर देश में आम लोगों का क्या हाल होगा, इसका अंजादा भी कतार में खड़े लोगों को शायद नहीं है। इस आंधी के थमने पर घोर सन्नाटा पसरने वाला है। स्वदेशी व्यापार की रीढ़ टूट जाएगी। बाजार में महामंदी पैर पसार चुकी होगी। और मंहगाई का आलम पिछला सभी रिकार्ड तोड़ चुका होगा। पर एक दिन उत्पात थम जाएगा और शांति भी अवश्य होगी। यह आज तभी संभव है, जब सभी सहमति का मार्ग खोजने की ओर चलें। राजनीतिक लाभ के हथकंडे अपनाने में लोग पीड़ित जनता की तकलीफ कम करने को तैयार नहीं प्रतीत होते हैं। स्वाधीनता का स्वांग सजाने से ऐसे अत्यंत दुखद अन्याय भी लाजिमी हो जाते हैं । 

इस मामले में भारतीय न्याय मंच की अनुशंसा निश्चय ही गौर करने योग्य है। इसमें सहमति का ऐसा मार्ग प्रस्तुत किया गया है, जिसमें सांप भी मर जाए और लाठी भी नहीं टूटे। इसके लिए सरकार को नोटबदली अमल में लाना होगा, नोटबंदी नहीं। आखिर टैक्स डिपार्टमेंट की अक्षमता का खामियाजा कब तक आम लोगों को चुकाना होगा? यदि जनहित में सरकार 31 मार्च 2017 के समय सीमा तक लोगों को पुरानी करेंशी में फंड-फ्लो के लिए अधिकृत करे तो निश्चय ही अफरा-तफरी से निजात मिल सकती है। ऐसा करने से वास्तव में ‘साहब’ की साहबी पर कोई आंच नहीं आएगी और गृह-युद्ध के बादल भी छंट जाऐंगे। 

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(यह आलेख नोटबंदी के फरमान से व्यथित पंचायती लोगों के आग्रह पर कौशल किशोर द्वारा आॅल इंडिया पंचायत परिषद के मुखपत्र ‘पंचायत संदेश’ के लिए लिखा गया है। जनहित में इसे साझा करने पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है। बल्कि हमें अच्छा लगेगा। सूचित भी करें तो बहुत अच्छा।)

गौवंश रक्षा मुहिम 

कौशल किशोर | Follow @HolyGanga

सात नवंबर का दिन गौवंश रक्षा आंदोलन के इतिहास में अहम है। ठीक पचास साल पहले इसी दिन गौवंश रक्षा हेतु साधु-संतों ने बलिदान दिया था। 7 नवंबर 1966 के आंदोलन में प्रभुदत्त ब्रह्मचारी, करपात्री महाराज, विनोबा भावे और तत्कालीन संघ प्रमुख गोलवरकर प्रमुख नेता थे। समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया इस मुहिम को समर्थन देने वालों में प्रमुख थे। देश के विभिन्न भागों से दिल्ली पहुंचने वाले आम लोगों की संख्या लाखों में थी। सभी ने मिलकर संसद भवन घेरकर तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार के हाथ-पांव फूला दिए थे। आखिर उस दिन हुतात्मा चौक पर ऐसा क्या हुआ कि सरकार ने प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलवाई और कुर्बानियों का सिलसिला शुरू हुआ। गौवंश रक्षा की इस मुहिम के शहीदों की संख्या खुला-रहस्य है।

आज इस आंदोलन की पृष्ठभूमि, वर्तमान स्थिति और भविष्य की रूपरेखा के विषय में गौर करने का दिन है। हजारों लोग इसी उद्देश्य से दिल्ली पहुंचे हैं। 1857 की क्रांति के पीछे एक प्रमुख वजह गौवंश रही है। महर्षि दयानन्द सरस्वती का आर्य समाज 1875 से इसकी पैरवी कर रहा है। आजादी की लड़ाई के अंतिम कालखंड में महात्मा गांधी ने गौवंश रक्षा की बात को अंग्रेजी राज का खात्मा करने से भी यादा जरूरी करार दिया था। इसी मुद्दे पर स्वतंत्र भारत का सबसे विशाल जन आंदोलन दर्ज है। आज गो भक्त उस आंदोलन के हुतात्माओं की याद में गोल्डन जुबली मना रहे हैं। 

इस बीच फर्जी गौरक्षकों का मामला भी उछला है। गुजरात के ऊना में गौरक्षा के नाम पर सक्रिय बदमाशों ने दलितों की बेतहाशा पिटाई कर बवाल मचाया था। इस घटना से प्रधानमंत्री का दुखी होना लाजिमी है। उन्होंने 80 फीसदी गौरक्षकों को फर्जी बताकर राय सरकारों को डोजियर तैयार करने का निर्देश दिया था। इस बीच, गौरक्षा आंदोलन के गोल्डन जुबली का दायरा फिजां में पनपने लगा। पचास साल पहले चंद फर्जी गौरक्षकों ने उत्पात मचाया था। क्या सचमुच अब गौरक्षकों के बीच फर्जी लोगों की भागीदारी 80 फीसदी तक पहुंच गई है? या फिर टाउनहाल में प्रधानमंत्री की जुबान फिसल गई थी? प्रधानमंत्री ने अपने उसी संबोधन में पॉलिथिन खाकर मरने वाली गायों की ओर गो रक्षकों का ध्यान आकृष्ट किया था। इन पचास सालों में पैदा हुई यह नई समस्या है। इसे नजरअंदाज कर सचमुच गो रक्षा की बात नहीं हो सकेगी। यह गायों का दुर्भाग्य है कि वास्तव में इस विषय में मजबूरी और पाखंड गड्डमड्ड हो गया है। संत गोपाल दास और भाजपा के पूर्व महासचिव गोविंदाचार्य जैसे लोग सचमुच इस आंदोलन को गति देने में लगे हैं। लेकिन दुर्भाग्यवश इस पर राजनीति ही होती रही है।