इरोम शर्मिला केस में मानवाधिकार आयोग जागी

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कौशल किशोर
मणिपुर में ‘आयरन लेडी’ नाम से ख्यात इरोम शर्मिला की हालत का संज्ञान मानवाधिकार आयोग ने लिया है। उन्होंने असम राइफल के जवानों द्वारा 10 नागरिकों को मारने पर विरोध प्रकट करते हुए सत्याग्रह शुरु किया था। वह 2 नवंबर 2000 से सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून को समाप्त करने की मांग को लेकर आमरण अनशन कर रही हैं। लंबे अर्से से प्रशासन ने सत्याग्रही को न्यायिक हिरासत में निरुद्ध कर रखा है। इस बीच नाक में नली लगाकर उन्हें भोजन दिया जाता रहा है। इस ऐतिहासिक मामले का राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने सुओ-मोटो संज्ञान लिया है।
हाल ही में आयोग के सदस्य इरोम शर्मिला की हालत का जायजा लेने मणिपुर पहुंचेे। विगत 23 अक्टूबर को उन्होंने आंदोलनकारी से भेंट किया था। उल्लेखनीय है कि इस दौरान आयोग के दो सदस्यों के साथ स्थानीय प्रशासन के वरीष्ठ अधिकारी भी मौजूद थे। उनके समक्ष शर्मिला ने दुहराया कि जब तक उनकी मांग पूरी नहीं हो जाती वह संघर्ष जारी रखंेगी। आयोग के सदस्यों ने उन्हें शारीरिक रुप से
कमजोर होेने के बावजूद सतर्क और जागरुक पाया है।
आयोग ने मणिपुर सरकार के मुख्य सचिव को नोटिस जारी कर इस मामले में मानवाधिकार के हनन का व्यौरा देते हुए निर्देश दिया है। साथ ही 6 दिसंबर 2013 तक निर्देशों के प्रति की गई कार्यवाही का विवरण उपलब्ध कराने को भी कहा है।
सत्याग्रह शुरु करने से पूर्व शर्मिला स्थानीय दैनिक अखबार ‘लानपाऊ’ से जुड़ी पत्रकार थीं। मणिपुर के आम लोग स्वेच्छा से उनके आंदोलन से जुड़ते रहे हैं। विरोध का स्वर तीव्र हो रहा था। स्थानीय प्रशासन की समस्या बढ़ रही थी। इसी बीच उन पर भारतीय दंड संहिता की धारा 309 के तहत आत्महत्या के प्रयास का फर्जी    मुकदमा दर्ज कर जेल में बंद कर दिया गया। उल्लेखनीय है कि इरोम शर्मिला   महिलाओं के प्रति बढ़ते अत्याचार का भी विरोध करती रही हैं। 2004 में सशस्त्र बल के जवानों द्वारा बलात्कार का मामला सामने आने पर उनके नेतृत्व में दर्जन भर महिलाओं ने सेना मुख्यालय के सामने नग्न होकर प्रदर्शन किया था।
Courtesy: Swaraj Khabar

दिल्ली में प्याज के आंसू व हर्ष की राजनीति

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कौशल किशोर
भाजपा ने हर्षवर्धन को दिल्ली के मुख्यमंत्री पद का दावेदार पेश किया है। यह अरविंद केजरीवाल के बेईमान बनाम इमानदार की जंग में बड़ी चुनौती है। आजकल नागनाथ और सांपनाथ की राजनीति का युग है। इसमें राजनाथ और दीनानाथ जैसे खिलाड़ी होते जरुर हैं। मोदी की पार्टी ने केजरीवाल के खिलाफ दिल्ली के दीनानाथ की घोषणा अच्छी मस्सकत के बाद की है। इसी बीच डाक्टर हर्षवर्धन की तुलना आप नेता ने मनमोहन सिंह से कर चुटकी भी लिया। अब मुकाबला प्याज के दाम और हर्षवर्धन के इमान के बीच है।
देश में गांधी बनाम मोदी का जंग छिड़ा है। बड़ी समस्या है कि इस जंग में असली मुद्दे गुम हो रहे हैं। प्याज अपनी जगह कायम है। लोगों ने इसकी मोटी कीमत अदाकर खास राजनैतिक दलों के चुनाव खर्च का इंतजाम कर ही दिया है। दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले बहुपक्षीय आक्रमण की राजनीति रंग में है। प्याज के व्यापार के बाद खौफ के साम्राज्य की बारी आती है। नृशंस अपराधों से दहली दिल्ली में वह कमी भी पुरी हो जाती है। राजनैतिक दलों ने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में अपराधों के बाद प्याज का धंधा शुरु किया था। इस बार एकदम जुदा अंदाज में। गांधीटोपी पर इबारतें लिखकर प्याज बेचने की राजनीति रमणीक होती है।
जमाखोरी में लगे पूंजी के खिलाडि़यों के खेल में मोड़ आया। सरकारी रिपोर्ट में भी प्याज के जमाखोरी की बात आइ। पूर्वी दिल्ली से आधे दर्जन लोगों की गलारेत कर हत्या की भी खबरें थी। ऐसी बातें देश के कइ कोने से आती रही हैं। पीछे उत्तर प्रदेश में चडडी-बनियान गैंग की र्कायशैली कुछ ऐसी ही थी। लोगों की गला रेत कर हत्या का सनसनीखेज मामला राजधानी की फिजां में गूंजती है। फिर माहौल बनता है। गैंग अपना काम करता है और पुलिस अपना। राजनैतिक अर्थशास्त्र के इस गणित में लक्षणों को देखकर इलाज का विधान नहीं है। सबूतों की मौजूदगी खोजने की वकालत के बाद न्याय की देवी द्वार खोलती है।
आजादी के बाद पैंसठ सालों में भय और बाजार ने मतदाताओं को प्रभावित करने में अहम भूमिका निभाई है। प्याज के बढ़ते भाव के बाद भय कायम करने वालों की उपयोगिता शेष रह गयी थी। बाजार और सत्ता के समीकरण का नियंत्रण भयाक्रांत करने वाले अपराधी तत्वों के सौजन्य से ही होता है। पूर्वी दिल्ली जैसी घटनाओं से वह कमी पूरी हो जाती है।
बाजारवाद की चीख के सामने देश की राजधानी का मध्यम वर्ग दम तोड़ने को विवश है। अभाव से जूझती नई पीढ़ी के नौजवानों की क्रयक्षमता का विकास अपराधीकरण का सबब बन रहा है। भारतीय सामाजिक व्यवस्था में यह बाजारु परिवर्तन भावी अनिष्ट का सूचक है। चुनाव का समय नजदीक आने पर समीकरण सेट करने का सिलसिला और तेज हो जाता है। सत्ता हस्तांतरण के पीछे यही दस्तूर तय हुआ था। आजाद भारत का सृजन इन्हीं नीतियों के आधार पर होने से ही तो आर्थिक विकास की संभावना बनती थी। आज दिल्ली के कई इलाके में पुलिस की गाडि़यों से निकलती चेतावनी की नसीहतें सुनकर चौंकना स्वभाविक प्रतिक्रिया हो गइ है। गलारेतक गैंग राजनैतिक अर्थशास्त्र की नई फसल तो नहीं है। इस जमाखोरी के बाजारवाद की कई रंगीन व्याख्या होती रही है। प्याज का संकट भी नया नहीं है। प्याज की मार खाकर भाजपा पहले भी सरकार गंवा चुकी। पूर्वी दिल्ली में मारे गये लोग इन हादसों का पहला शिकार भी नहीं हैं। कड़कड़डुमा कोर्ट रोड पर लोगों ने पांच घंटे का चक्काजाम कर विरोध भी किया था। अब भी कुछ शेष बचता है, क्या?
विरोध के कई तरीके आजाद भारत में दिखते हैं। इनमें से कुछ तो एकदम नवीन हैं। आखिर तकनीकि संपन्नता का युग ठहरा! राजनीति के पक्के खिलाडि़यों के असली नुमाइंदे मैदान में सत्याग्रह के बदले दुराग्रह पर उतारु होते हैं। तभी फैलिन जैसा चक्रवात भी मददगार साबित होता है। राजनैतिक और आर्थिक लाभ की दृष्टि ही आधुनिक दूरदर्शिता है। गांधी के देश में गांधी को नोटछाप बनाकर सम्मानित करने का प्रचलन है। अब गांधीवादी सत्याग्रही तरीके से विरोध करने वालों का हश्र बुरा होता है। सामने इसके अनूठे उदाहरण मौजूद हैं। पर्यावरण वैज्ञानिक जी.डी. अग्रवाल (स्वामी सानंद) गंगा-गंगा करने को अभिशप्त हैं। गौ माता की जाप में लगे संत गोपाल दास गंगालाभ की कगार पर हैं। गंगापुत्र की आत्मा दोनों ही विभूतियों का बाट जोह रही होगी। अवसरवाद का वक्त है! चंद्रबाबू नायडू और जगन ने तेलांगना मुद्दे पर सत्याग्रहियों की जमात का परिचय दुहराकर फिर साबित किया है। पर मोर्चे पर प्याज की कीमत के विरुद्ध कोइ  अभियान खास कारगर नहीं हो सका।
अब भाजपा ने मुख्यमंत्री की घोषणा कर हर्षवर्धन को पेश किया है। क्या महानगर के लोग अपराध, महंगाइ और जमाखोरी जैसे आफतों से राहत पा सकेगें? अपराध से मालामाल होती पुलिस और मजबूत होती सियासत बंद होगी। वैसे नियामतों पर हक तो उन्हीं गलारेतू बीरों का है। और अंधेरी रात का फायदा उठाने वालों की राजनीति है। देश की भुल्लकड़ जनता तो तीसरे दिन पिछली बात भूल ही जाती है। घोड़े वाला चश्मा पहनाने में महारत प्राप्त कर चुकी संस्थानों की फौज खड़ी करने के बावजूद इतना न हो तो डूब मरने वाली बात होगी। खैर! भाजपा को दिल्ली का मुख्यमंत्री चुनने में लगा वक्त कइ बातें जाहिर करता है। वैसे पार्टी की प्रदेश इकाई में हर्षवर्धन के मुकाबले कम ही लोग ईमान और धर्म के मामले में भी दमदार हैं।
कौशल किशोर ‘द होली गंगा’ पुस्तक के लेखक हैं।
Swaraj 25Oct13

खनन माफिया सभ्यता का सरकारी सरोकार

SwarajKhabar24Oct13
कौशल किशोर 

कोयले की दलाली में मुंह कला करने की दास्तान नई नहीं है।  देश के राजनैतिक अर्थशास्त्र में खनन व्यवसाय की अहमियत वर्षों से रही है। खनन रेत बजरी का हो या लोयाले का। धंधा है बड़े फायदे का। गंगापुत्र निगमानंद शहीद हो गए इस जंग में। पीछे भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल के रातोंरात निलंबन से उपजा विवाद सुरसा के मुंह की तरह फैल रहा था। उत्तर प्रदेश की सरकार के इस फैसले का विरोध चहुंओर हो रहा है। केंद्र और राज्य की सरकारें आमने-सामने है। देवबंदी मुस्लिम उलेमा से लेकर इसी समुदाय के दूसरे संगठन भी सच्चाई का साथ देने मैदान में उतरने लगे हैं। इस गहराती समस्या की मुख्य वजह प्रदेश सरकार की झूठ ही है। यह ऐसा संगीन झूठ है, जिसके बाद अपराधों का सृजन होता है। इस प्रकरण में सूबे की राजनीति नैतिकता की सारी हदें पार करती जा रही है।

राज्य की सरकार दावा करती आ रही है कि इस निलंबन का खनन के कारोबार से कोई संबंध नहीं है। उपजिलाधिकारी पद पर तैनात इस महिला अधिकारी पर गौतमबुद्ध नगर के कादलपुर में निर्माणाधीन (अवैध) मसजिद की दीवार तुड़वाकर सांप्रदायिक दंगों की नौबत खड़ी करने का आरोप है। यहां दो बातें साफ हैं। नोएडा में अवैध खनन के विरुद्ध प्रशासनिक कार्यवाही के लिए दुर्गा पहले से ही चर्चा में थी। दूसरी ओर चर्चाओं में प्रदेश की सरकार भी मुस्लिम समुदाय को तुष्ट करने के लिए रही है। समुदाय विशेष के तुष्टिकरण की समाजवादी चर्चा के सामने यह मसला अब भी राई बराबर ही है। इस मसले पर जिलाधकारी की रिपोर्ट में कहा गया है कि दीवार को गांव वालों ने ही तोड़ा, दुर्गा ने नहीं। यदि सूबे की सरकार को तथाकथित आरोप पर भरोसा होता तो मौके पर दुर्गा के साथ कार्यवाही में लगे पुलिस अधिकारी पर पहली गाज गिरती। चूंकि यह सब कुछ जिलाधिकारी के आदेश पर किया गया था तो वास्तविक जिम्मेदारी भी उन्हीं की होती है। परंतु इन दोनों अधिकारियों के साथ अब तक ऐसा कुछ नहीं हुआ। अलबत्ता आनन-फानन में देर रात निलंबन आदेश भेज कर 41 मिनट में ही सारी कार्यवाही सुनिश्चित कर ली गयी। ऐसी हालत में सूबे की सरकार कठघरे में खड़ी तो होती ही है।

दुर्गा शक्ति नागपाल का मामला यहीं नहीं ठहरता है। खनन माफिया के साथ भू माफिया के खिलाफ की गई कार्यवाही भी सामने आती है। राजनीतिक दलों के साथ सुगबुगाहट दूसरे क्षेत्रों में भी दिखती है। यह स्वभाविक लोकतांत्रिक प्रतिक्रिया है। स्थानीय सामाजिक और राजनैतिक कार्यकत्ताओं से लेकर केंद्र सरकार तक सूबे की सरकार के इस निर्णय का विरोध करने लगी है। साथ ही ठीक मौके पर संरक्षण प्राप्त गुंडे भी सक्रिय हो जाते हैं। अवैध खनन की शिकायत करने वाले किसान की दिन-दहाडे़ हत्या होती है। इसी क्षेत्र के रायपुर गांव के निवासी पालेराम चैहान पिछले चार वर्षों से खनन का विरोध कर रहे थे। गंगा बेसिन में खनन के विरुद्ध संघर्ष में दो वर्ष पूर्व गंगापुत्र निगमानंद को भी जान गंवानी पड़ी थी। इनके अतिरिक्त खनन कार्यों में लगे डंपर और अन्य वाहनों द्वारा कुचले गये आम लोगों की लंबी फेहरिस्त है। पर सूबे की सरकार के पास इसका कोई स्पष्ट व्यौरा नहीं है।

खनन माफियाओं की सांठगांठ सरकार में सतत बढ़ती रही है। आज सूबे की समाजवादी सरकार में यह चरम पर दिखती है। खनन से जुड़ी प्रशासनिक समस्या नई नहीं है। और न ही दुर्गा शक्ति नागपाल इसका शिकार हुई पहली प्रशासनिक अधिकारी ही। पिछली सदी के अंतिम दिनों में गंगा में अवैध खनन का कड़ाई से विरोध करने वाले प्रशासनिक अधिकारियों को उत्तर प्रदेश सरकार का कोपभाजन बनना पड़ा था। आनन-फानन में शासन ने जिलाधिकारी और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक समेत अवैध खनन के विरुद्ध कार्य करने वाले सभी अधिकारियों को स्थानांतरित कर दिया था। उस समय 1989 बैच की महिला आईएएस आराधना शुक्ला और 1993 बैच के आईपीएस अधिकारी वितुल कुमार निशाने पर थे। इस बीच खनन का गोरख धंधा खूब फला-फूला। राष्ट्रीय राजधानी से सटे इलाके में यमुना, हिंडन, काली, आदि नदियों के तटों को साफ करने के बाद आस-पास के खेत-खलिहान भी अछूते नहीं रहे। यही हाल गंगा और उसकी दूसरी सहायक नदियों का है।

भारत की नदियों से रेत, बजरी और पत्थर उठाने का सिलसिला बहुत पुराना है। पर खनन का व्यवसायीकरण अस्सी के दशक में ही हो सका। गंगा बेसिन में बड़े पैमाने पर खनन होने लगा। एक दशक में ही नदीघाटी माफियाओं के चंगुल में था। खनन के लिए बड़ी मशीनों का इस्तेमाल किया जाने लगा। आज हजारों करोड़ का यह व्यापार सैकड़ों करोड़ की राजस्व क्षति का कारण है। बेतहाशा खनन से पेयजल और सिंचाई की समस्या खड़ी हुई। साथ ही नब्बे के दशक में खनन का व्यवसाय आम-आदमी को मौत के घाट उतारने का सबब बनने लगा। व्यावसायिक खनन गंगा और यमुना जैसी नदियों की स्व़च्छता और पवित्रता को समाप्त करने में अहम साबित हुआ है। विनिर्माण क्षेत्र में विकास के लिए नदियों को नष्ट कर दिया गया। नदीघाटी की वर्तमान हालत इतनी बुरी है कि क्षतिपूर्ति संभव नहीं है। खनन से उपजी गहरी खाईयों के भरने में भी वर्षों लगेंगे।

अंधाधुंध विकास का दो ताजा नमूना सामने है। केदारखंड तबाह हो चुका है। और अमेरिका के मिशिगन राज्य का डेट्रायट शहर दिवालिया घोषित हो चुका है। यह उसी विकास का नतीजा है, जो वास्तव में विनाश को आमंत्रित करता है। वक्त रहते नहीं चेतने से इन दोनों ही स्थितियों से कहीं गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। प्रदेश सरकार को खनन से तबाह नदीघाटी की कोई चिंता नहीं है। सूबे के अतिरिक्त देश के अन्य इलाकों में भी खनन से गंभीर समस्याऐं उपजी हैं। राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण ने देश भर में रेत, बजरी के खनन से हो रही पर्यावरण की अपूरणीय क्षति का संज्ञान लिया है। लिहाजा पर्यावरण विभाग से मंजूरी लिये बिना खनन का कार्य नहीं किया जा सकता है। परंतु इतने से ही समस्या हल नहीं होती। माफियाराज में इसका निदान आवश्यक होने के बावजूद भी बहुत मुश्किल है।

प्रदेश सरकार अपने झूठ को सच साबित करने में लगी है। इस क्रम में नित नए खुलासे हो रहे हैं। इस बीच एक वरिष्ठ समाजवादी नेता ने केंद्र को सभी आईएएस अधिकारियों को हटा लेने की चुनौती दी है। यह कोई कोरी धमकी नहीं है। सत्ताधारी पार्टी के कार्यकर्ता इस मौके का इंतजार करते रहे हैं। इन सब गतिविधियों पर गौर करने पर मुलायम नेतृत्व वाली समाजवादी योजना साफ हो सकती है। मुलायम सिंह यादव जब दूसरी बार सूबे के मुख्यमंत्री बने थे तो उनसे मिलने के लिए जग्गू को परीक्षक नियुक्त किया था। उन दिनों जगमोहन नामका नाई जग्गू नाम से ख्यात था। मुख्यमंत्री की दाढ़ी बनाने के साथ ही मसाज और सेवा में निपुण जग्गू को विशेष कार्य अधिकारी नियुक्त किया गया, जिसे खुश किये बगैर प्रशासन और पुलिस के आला अधिकारी भी मुख्यमंत्री से नहीं मिल सकते थे। समाजवादी पार्टी ने ऐसे लोगों का कैडर तैयार कर रखा है, जिसके बूते आईएएस अधिकारियों की छुट्टी की जा सकती है!

खनन माफिया का खौफ बढ़ रहा है। सम्प्रति समस्याओं को दूर करने वाली राजनीति समस्या बन रही है। देश के सर्वाधिक जनसंख्या वाले सूबे में बगावत का स्वर तीव्र होता जा रहा है। गांव के लोग राज्य सरकार को मुक्त कर स्वायतशासी ग्रामीण तंत्र की व्यवस्था की मांग पर विचार कर रहे हैं। इस सब की इकलौती वजह सरकार की झूठ है। पुराने लोग कहते थे, एक झूठ सौ झूठ की जड़ होती है और एक अपराध सौ अपराध का। ऐसा ही कुछ इस मसले में भी हो रहा है। नेतृत्व और झूठ अमेरिकी लोकतंत्र में महाभियोग का कारण बनी थी। बिल क्लिंटन के राष्ट्रपति रहते यह समस्या खड़ी हुई थी। आखिरकार क्लिंटन ने सच स्वीकार कर दुबारा सत्ता में वापसी की थी। क्या भारतीय लोकतंत्र में सच का कोई महत्व नहीं रह गया है? यह एक अहम सवाल है, जो देश के सामने मुंह बाए खड़ा है। सूबे के मुखिया इस जिम्मेदारी से बचने के लिए अभिनव प्रयोग में व्यस्त हैं। राजहठ का यह सिलसिला कहां जाकर थमेगा दावे से कहा नहीं जा सकता है।

(कौशल किशोर ‘द होली गंगा’ पुस्तक के लेखक हैं)

उत्तराखंड में पनबिजली परियोजनाओं पर रोक

HolyGanga

SwarajKhabar22Oct

कौशल किशोर [22.10.2013]

हिमालय में केदारखंड की त्रासदी के बाद हिन्द महासागर के निकटवर्ती प्रदेशों में तबाही  मंजर गंभीर खतरों के सन्देश हैं। समुद्र तट और हिमालय की वादियों में वायु और जल का कोप! विकास और विनाश की आबोहवा भी कैसी जटिल है।  उच्चतम न्यायलय ने इन बातो पर गौर किया है। पीछे श्रीनगर जलविद्युत परियोजना मसले की सुनवाई के दौरान विशेष रुप से इस हादसे का संज्ञान लिया। चोरबाड़ी की तबाही के चातुर्मास में न्यायालय ने उत्तराखंड में अल्प अवधि में तेजी से बढ़ती पनबिजली परियोजनाओं पर गंभीर चिंता व्यक्त किया है। कोर्ट ने केंद्र और राज्य की सरकारों को उत्तराखंड में नवीन जलविद्युत परियोजनाओं पर रोक लगाने का स्पष्ट निर्देश देकर मध्य जून की आपदा में हजारों लोगों की अकाल मृत्यु के प्रति संजीदगी दिखाई है। न्यायपालिका राजकाज को बेहतर और जनहितकारी बनाने के उद्देश्य से कुछ प्रभावी कदम उठाती रही है। भविष्य में यह निर्णय उसी कड़ी का अहम…

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भीड़-भगदड़ और हिंसा की राजनीति

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कौशल किशोर [23 अक्टूबर 2013]
मध्य प्रदेश में दशहरा के मेले पर भीड़ और भगदड़ में सौ से ज्यादा लोगों के मरने की खबरें थी। पीछे जाटों और मुस्लिमों के बीच हिंसा से देश दहल उठा था। साल के आरंभ में प्रयाग कुंभ से मौनी अमावस्या पर हादसों की खबर थी। देश में माहौल गमगीन शुरु हुआ। बाद में हिंसा की राजनीति ने देश में मुश्किल हालात पैदा किये हैं।

इलाहाबाद जंक्शन पर मची भगदड़ में 35 से ज्यादा लोग मारे गए थे। साथ ही कुंभनगर में मची भगदड़ में दो लोगों की जान गयी थी। पुलिस बल द्वारा लाठी चार्ज करने की घटना और रेल्वे स्टेशन पर पुल की रेलिंग टूटने से मची भगदड़ को हादसा से जोड़कर देखा जा रहा था। कुंभ कमिटी के अध्यक्ष आजम खान ने दुर्घटना से आहत होकर त्याग पत्र का एलान कर दिया था। प्रदेश सरकार के नगर विकास मंत्री के इस कदम से राजनीतिक गहमागमी तेज हो गयी। मकर संक्रान्ति और बसंत पंचमी के बीच मौनी अमावस्या का शाहीस्नान प्रयाग कुंभ पर्व का अतिमहत्वपूर्ण अवसर होता है। इस अवसर पर गंगास्नान हेतु देश-दुनिया के श्रद्धालुओं की सबसे बड़ी भीड़ यहां जुटती है। मेला प्रशासन ने करीब तीन करोड़ लोगों के त्रिवेणी संगम पर एकत्रित होने का अनुमान किया था। इसकी व्यस्था में एक अर्से से अहम तैयारियां भी होती रही। फिर भी मुख्य स्नान पर्व पर गंभीर हादसा होता है। यह व्यवस्था की कमी को उजागर करता है। साथ ही कई ओर ईशारा भी करता है। फिर मध्य प्रदेश में नवरात्रों के मेले में पांच लाख लोगों की व्यवस्था में सौ से ज्यादा लोग मारे गए थे। राज्य सरकार की अपनी पार्टी ने इतने ही लोगों की भीड़ का आयोजन किया था। क्या खूब चाक-चैबंद थी। राजनीतिक आयोजनों और आम लागों के मेलों में फर्क साफ दिखता है। लोगों के मरने से सरकार की सेहत पर कोई खास फर्क नहीं पड़ता है।

पिछले कई ऐसे आयोजनों में ज्यादा दुघर्टनाएं भीड़ और भगदड़ की वजह से ही हुई। भारत मेें प्रायः इस तरह की घटना में मरनेवाले लोगों की सही जानकारी विवाद की बात होती। विभिन्न एजेंसियां भिन्न आंकड़े पेश करती है। कुम्भ के अमृतकाल में मौत के विषय में कई तरह की बातें उठी। तटिय हिस्सों में फैलिन तुफान से मुक्ति को व्यग्र होती है जनता। तो मध्य भारत में प्रशासनिक अक्षमता के कारण मेले में लोगों को जान गंवानी पड़ती है।

प्रयाग महाकुंभ के इतिहास में पहले से कई ऐसे हादसे दर्ज थे। वही हाल क्षेत्रिय मेलों का भी रहा है। बड़ी-छोटी व्यवस्था की खामियां पूर्व में भी उजागर होती रही हैं। आजादी के बाद भारतीय गणतंत्र का पहला प्रयाग कुम्भ 500 से ज्यादा लोगों के मारे जाने के करण याद किया जाता। 1954 के हादसे में तीर्थयात्रियों को शाही सवारों ने हाथी-घोड़ों से रौंदा था। इसके बाद 1986 के हरिद्वार कुम्भ में पुल टूटने से हुई दुर्घटना में अनेक यात्री मारे गए। पिछले हरिद्वार कुंभ में मध्य अप्रैल 2010 के मुख्य शाही स्नान पर कई तीर्थयात्री मारे गए थे। इसी तरह भीड़ और भगदड़ के बीच वह हादसा भी हुआ था।

2010 में अखड़ा के एक महामण्डलेश्वर की कार के नीचे बुढि़या और बच्चा के दब जाने से भगदड़ मची। मेले से भीड़ छटने के बाद करीब 40-50 और लाशें बरामद होने की खबरें आई। इस तरह की घटना में जमा लोगों की भी जिम्मेदारी बनती है। श्रद्धालुओं और तीर्थयात्रियों की बड़ी भीड़ में भगदड़ मचना खतरनाक होता है। कई लोगों की जानें जाती हैं। अमूमन बच्चे और बूढ़े दब-कुचल कर जान गवां बैठते हैं। पिछले धमिक आयोजनों में इस तरह के हादसों का इतिहास है। फिर भी इसे रोकने का कोई ठोस प्रयास नहीं किया गया है। बीते इतिहास और वर्तमान में हिंसक वारदातों की छाप साफ अंकित है। आस्था और धर्म की राजनीति में गोधरा जैसा कांड ही पनपता है। हाल में उत्तर प्रदेश की जातिय हिंसा तटिय प्रदेश में फैलिन का कोप और उसी समय मध्य प्रदेश में मेले में भगदड़ राजनीति क्या कुछ अंदेशा व्यक्त करती है। अब समय आ गया है कि सरकार स्थानीय समुदाय के साथ मिलकर इस तरह के हादसे रोकने की कारगर पहल  करे।

Courtsy: Swaraj Khabar