नजरिया विदेशी और महिलाएं भारतीय

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कौशल किशोर | Follow @HolyGanga


थाॅमसन रायटर्स फाउंडेशन महिलाओं से जुड़ी बेहद सनसनीखेज रिपोर्ट मंगलवार, 26 जून को जारी करती है। इसमें भारत को महिलाओं के लिए दुनिया भर में सबसे असुरक्षित देश कहा गया है। महिला और बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने इसे सिरे से खारिज कर दिया है। इस फाउंडेशन की मुखिया मोनिक विला ने तथ्यों को सर्वेक्षण का आधार बनाने के बदले एक ऐसे जनमत संग्रह का सहारा लिया, जिसमें शामिल तथाकथित विशेषज्ञों का वाजिब व्यौरा तक उपलब्ध नहीं है। इस पर पक्ष-विपक्ष में टिका-टिप्पणी खूब हो रही है। कुछ तो इसे अंतिम सच मान कर प्रचार में लग गए हैं। यह तथाकथित ग्लोबल सर्वे एक तात्कालिक गूंज पैदा करती है। आखिर इस रिपोर्ट की वास्तविकता क्या है? इसे खूब अहम साबित करने में लगे लोग सचमुच क्या कर रहे हैं? इस हायतौबा से ग्लोबल फाउंडेशन को क्या हासिल होता है? इन सब बातों का सही आंकलन कम ही लोगों को है। इस मामले में आज-कल सोसल मीडिया में चर्चा गरम है। इस रिपोर्ट को पढ़ कर ऐसा लगता है जैसे इकलौते सवाल का मनचाहा जवाब पाने के लिए सर्वेक्षकों ने बंद गली के आखिरी मकान में 548 लोगों को बंद करना मुनासिब मान लिया हो।

दुनिया भर में महिलाओं ने भेद-भाव और दूसरी समस्याओं को समय-समय पर उठाया है। भारत इसका अपवाद कतई नहीं है। ऐसा भी नहीं है कि यहां आज कोई समस्या नहीं है। पर क्या इस मामले में भारत सचमुच में अफगानिस्तान, कांगो, सीरिया और सोमालिया समेत दुनिया के बाकी देशों से खराब है। भले ही यह चुनिंदा लोगों का मत हो। पर धर्म और संस्कृति का जिक्र कर इस रिपोर्ट में हमारे देश के बारे मे यही कहा गया है।

यहां मेहनत करने वाली भारत की आम महिलाओं को सरेआम अपमानित करने के लिए आंकड़ों का बेहतरीन इस्तेमाल किया गया है। सरकारी दस्तावेजों से कई हैरत में डालने वाली बातें पेश किया गया है। जिसमें कहा गया है कि 2007 से 2016 के बीच महिलाओं के साथ होने वाली अप्रिय घटनाओं में 80 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। यहां हर घंटे ऐसे 40 अपराध औसतन दर्ज होते हैं। दिल्ली में हुए 2012 के आंदोलन का जिक्र करते हुए मोनिक विला के सभी साथी यह क्यों भूल जाते हैं कि उसी साल सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर जेंडर जस्टिस के पैरोकारों ने कैसी हायतौबा मचाई थी। उच्चतम न्यायालय ने दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले को खारिज करते हुए कुल इतना ही तो कहा था कि कानून में बदलाव करना संसद के काम में हस्तक्षेप करना है। उस दिन जश्न मनाने जमा हुए इसी जमात के लोग सारी शालीनता ताक पर रखकर न्यायालय के खिलाफ सड़कों पर थे। यह बौखलाहट काफी कुछ जाहिर करने के काबिल है।

यह कोई पहला सर्वेक्षण नहीं है। कुछ समय पूर्व इसी जमात ने एक और रिपोर्ट प्रकाशित किया था। जिसमें कहा गया कि भारत में हर दो में से एक महिला घर-परिवार में ही यौन शोषण का शिकार होती है। यह सब एक शाजिस ही है। इस षड्यंत्र का इतिहास मौजूद है। पहले विश्व युद्ध के पहले ही अमेरिका में एक ऐसी लाॅबी सक्रिय पाई गई थी। वह प्रचार करने में लगी थी कि ईस्ट इंडिया कंपनी भारत की जनता का सिर्फ भला ही कर रही है। युद्ध के दौरान देश से निर्वासित लाला लाजपत राय अमेरिका प्रवास के दौरान इन बातों से रु-ब-रु होते हैं। सही स्थिति अमेरिकी जनता के सामने रखने के लिए उन्होंने 1915 में यंग इंडिया नामक एक किताब लिखी। भारत और ब्रिटेन में कई सालों तक इस किताब का प्रकाशन प्रतिबंधित रहा था। भविष्य में विला की यह कोशिश इंडोफाइल कैथरिन मायो का सभी रिकॉर्ड ध्वस्त कर दे तो कोई हैरत की बात नहीं होगी। वह सचमुच मायो को मात देने जा रही हैं। कम ही लोगों को पता है कि हमेशा सुर्खियों में रहने वाली उस अमेरिकी इतिहासकार ने ईस्ट इंडिया कंपनी के हितों को साधने के लिए 1927 में मदर इंडिया लिखा था। मायो का भारत में जोरदार स्वागत हुआ था। इस किताब की तुलना महात्मा गांधी ने उस बदबू से किया था, जो गंदी नाली के निरीक्षकों की मजबूरी हो सकती है। इसमें लिखी बातों का सटीक उत्तर देते हुए असली खंडन का काम तो लाला लाजपत राय ने किया था। मदर इंडिया के जवाब में लिखी लालाजी की किताब अनहैप्पी इंडिया सफलता के सारे रिकॉर्ड ध्वस्त कर देती है।

बहुराष्ट्रीय कंपनियां 2011 में इस फाउंडेशन को महिलाओं की सुरक्षा के नाम पर एक खास अभियान के लिए खूब धन देती है। यह एक ऐसी योजना की फंडिंग का मामला है, जिसका इतिहास नया नहीं है। फिर महिलाओं पर रहम का प्रदर्शन करते हुए इसके मुख्य कार्यकारी अधिकारी की योजना के अनुरूप 15 जून 2011 को एक विज्ञप्ति जारी की जाती है। देखते ही देखते महिलाओं के लिए अफगानिस्तान, कांगो, पाकिस्तान, भारत और सोमालिया दुनिया का सबसे खतरनाक पांच देश घोषित हो जाता है। फिर एक पांच सूत्रीय अभियान का सूत्रपात होता है। इसमें खूब चर्चा में रही #MeToo जैसा कैंपेन भी शामिल है। इस वर्ष तो भारत से अमेरिका तक दस देशों की सूची जारी किया गया है। इसका राजनैतिक अर्थशास्त्र बहुत गंभीर अध्ययन का विषय है। इस तरह के प्रयासों से कुछ बड़े लोगों को लाभ होता है।

भारतीय जन पार्षद मंच के संयोजक और सच के अध्यक्ष डॉ ओंकार मित्तल कई सालों से इस विषय के गंभीर अध्येता हैं। उन्होंने इस सर्वेक्षण की कार्य-प्रणाली (मेथोडोलोजी) पर सवाल उठाया है। इसकी विश्वसनीयता कायम रखने के लिए किसी विदेशी कॉर्पोरेट को भारतीय परिदृष्यों की ठीक समझ रखने वाले संस्थानों के साथ मिलकर अध्ययन करने की जरूरत को चिन्हित किया है। इस तरह के अभियानों के पोषकों ने भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के विरुद्ध आंदोलन प्रायोजित कर रखा है। वह इसका जिक्र करते हुए दो टूक बातें करते हैं। पिछले एक दशक में इसके लिए लगभग 10 हज़ार करोड़ की मोटी रकम केवल भारत में ही खर्च किया गया है। सालों से तमाम नैतिक-अनैतिक हथकंडों का इस्तेमाल करने में लगे इनके लोग सर्वोच्च न्यायालय की अवमानना करने से भी नहीं चूकते हैं। यहां डा. मित्तल एक सवाल उठाते हैं कि क्या भारत एक बार फिर उसी दौर की ओर लौट रहा है, जिसके विषय में कहा जाता है: राज बादशाह का और हुक्म कम्पनी बहादुर का।

संकटग्रस्त महिलाओं के विषय में पिछले एक दशक से सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है। वृंदावन की 25000 एकल वृद्धाओं के नाम पर शुरू हुए इस मुकदमे का दायरा सोसल जस्टिस बेंच के गठन के बाद राष्ट्रव्यापी होकर करीब पांच करोड़ तक पहुंच गया है। केन्द्र और राज्य की सरकारें मिलकर सभी संकटग्रस्त महिलाओं के लिए बेहतर जीवन सुनिश्चित करने के लिए विशेष कार्यक्रम शुरू करने की योजना पर काम कर रही है। मुझे यह जानकर आश्चर्य हुआ कि महिलाओं की समस्याओं को दूर करने का दावा करने वाले प्रतिष्ठानों ने इस मामले में उदासीन रहना ही उचित समझा है।

फ्रांसीसी मूल की मोनिक विला मूलतः एक पत्रकार हैं। नब्बे के दशक में उन्होंने एएफपी के साथ काम करना शुरू किया था। उनकी असली पहचान है, समाज का हित साधने के लिए फंड जुटाने का कौशल। मैं उनसे वृंदावन की संकटग्रस्त महिलाओं की मदद करने की अपील करता हूं। साथ ही भविष्य में भारतीय महिलाओं से जुड़े ऐसे सर्वेक्षणों के विषय में एक महत्वपूर्ण सुझाव भी देना चाहता हूं। इस मामले में सही दिशा में आगे बढ़ने के लिए जरूरी है कि इसमें ऐसे सहयोगियों को शामिल करें जिन्हें जय शंकर प्रसाद की कामायनी की इन पंक्तियों की भी बराबर समझ हो: नारी तुम केवल श्रद्धा हो, विश्वास रजत नग पग तल में / पीयूष स्रोत सी बहा करो, जीवन के सुन्दर समतल में।

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दलित समस्या और भेदभाव की राजनीति

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आज दलितों के सवाल पर पूरा देश आंदोलित है। यह सिलसिला मंगलवार, 20 मार्च को शुरू हुआ। उस दिन उच्चतम न्यायालय ने डा. सुभाष काशीनाथ महाजन की अपील का निर्णय सुनाया था। एक बार फिर जस्टिस आदर्श कुमार गोयल और जस्टिस उदय उमेश ललित की अदालत ने चौंकाने वाला फैसला सुनाया है। दहेज उत्पीडऩ मामले में हुई फजीहत के बाद अब इस अदालत ने अनुसूचित जाति व जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम में नया दिशा-निर्देश जारी किया है। उन्होंने दलित उत्पीडऩ के मामले में बिना जांच-पड़ताल के होने वाली तुरंत गिरफ्तारी पर रोक लगा दी है। अब सरकारी मुलाजिमों से जुड़े मामलों में पहले नियोक्ता की संस्तुति आवश्यक है। अन्य मामलों में वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक की स्वीकृति लेनी होगी। इस आदेश के प्रभावी रहने की दशा में डी.एस.पी. स्तर के अधिकारी द्वारा जांच के बाद ही एफ.आई.आर. दर्ज की जा सकेगी। साथ ही अभियुक्तों की अग्रिम जमानत भी अब सहज संभव है। 

न्यायालय का सम्मान करने वाली दलित जनता सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले के विरुद्ध खड़ी है। कांग्रेस अध्यक्ष ने सत्ताधारी भाजपा पर दलित विरोधी होने का आरोप लगाया है। भीम सेना जैसे राजनीतिक संगठन सड़क पर उतर आए हैं। बिहार समेत देश के कई हिस्सों में न्यायालय और सरकार के खिलाफ  प्रदर्शन शुरू हुए। सभी जगह हलचल हो रही है। सरकार के मंत्रियों की प्रतिक्रियाएं सामने आती रही हैं। मोदी सरकार के कई मंत्री और सांसद इस निर्णय से क्षुब्ध हैं। इसकी गंभीरता को समझ कर सरकार भी इसमें पुनॢवचार याचिका दाखिल करने का विचार करती है। 

दुनिया भर में चर्चा होती है कि भारत में प्रतिदिन कितने दलित व आदिवासी ज्यादती का शिकार होते हैं। दलित हितैषी संगठनों में बराबर इन आंकड़ों पर चर्चा होती है। यहां रोजाना 3 दलित महिलाओं के साथ बलात्कार और 11 दलितों की पिटाई होती है। हर हफ्ते दलितों की हत्याएं, उनके घरों को आग के हवाले करने और उनके अपहरण की खबरें आती हैं। हर साल हजारों मुकद्दमे दर्ज होते हैं। इनमें पैरवी करने वाले न के बराबर हैं। बड़ी मुश्किल से सजा हो पाती है। क्या इनका मतलब यह है कि इस कानून का दुरुपयोग नहीं हो रहा है? 

वस्तुस्थिति क्या है, इस पर संसद तक में चर्चा हो चुकी है। कोर्ट के सामने अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट के साथ विशेषज्ञों की राय भी मौजूद है। सत्य और न्याय की रक्षा करना ही न्यायपालिका का धर्म है। क्या सचमुच अदालत ने यही काम नहीं किया है? यहां झूठा मुकद्दमा दर्ज कराने के दोषी को मुकम्मल सजा देकर दूरगामी संदेश दिया जा सकता था किंतु नया विधान रचने के क्रम में हुई भूल यहां साफ दिख रही है। यह दलीलों और आंकड़ों के जाल में उलझ कर भावना में बहने का नतीजा हो सकता है। इस निर्णय को त्रुटिहीन कराने की नीयत से रामदास अठावले और रामविलास पासवान के दलों ने पुनॢवचार याचिका दाखिल करने का फैसला किया है। मोदी सरकार के रविशंकर प्रसाद और थावरचंद गहलोत जैसे जिम्मेदार मंत्रीगण इस कार्य में लगे हैं। उन्हें पता है कि 16वें लोकसभा चुनाव में दलितों के बड़े वर्ग के समर्थन से ही भाजपा गठबंधन सत्तारूढ़ हो सका है।

वस्तुत: यह कानून का दुरुपयोग कर प्रशासन को सुचारू रूप से चलाने के लिए जिम्मेदार लोगों को परेशान करने का मामला है। यह महाराष्ट्र के सतारा जिले के कराड तालुका का एक दशक पुराना मामला है। राज्य सरकार द्वारा संचालित फार्मेसी कालेज में कार्यरत अनुसूचित जाति के एक स्टोरकीपर के ईमान और चरित्र का जिक्र विभागीय अधिकारी द्वारा गोपनीय वार्षिक रिपोर्ट में किया गया। इसका पता लगने पर तथाकथित दलित कर्मचारी ने थाने में उत्पीडऩ की शिकायत दर्ज करा दी। फिर सी.आर.पी.सी. की धारा 197 की प्रक्रिया कई सालों बाद पूरी हुई। आखिरकार 28 मार्च, 2016 को इस मामले में एफ.आई.आर. दर्ज की गई। न्यायालय के समक्ष मौजूद तथ्यों से साफ  है कि इस केस में प्रथम दृष्टया बदनीयती साबित नहीं होती है। क्या महज इस कानून के प्रयोग की संभावना को आधार मानकर किसी सरकारी अधिकारी के खिलाफ  कार्रवाई की जा सकती है? महाराष्ट्र के तकनीकी शिक्षा विभाग के कई निर्दोष अधिकारी एक दशक से इस मुकद्दमे में उलझे हैं। इन निर्दोष प्रशासनिक अधिकारियों की रक्षा कौन करेगा? इस फैसले में साफ  कहा गया है कि किस तरह इस कानून के दुरुपयोग से अदालतों का समय खराब होता रहा है। वस्तुत: यह दलित उत्पीडऩ रोकने के लिए बनाए गए कानून के दुरुपयोग का संवेदनशील मामला है परंतु कोई यह नहीं बता रहा कि ऐसे मामलों से निपटने के लिए पीड़ितों को क्या करना चाहिए? इन प्रश्नों को निरुत्तरित छोडऩे से दलितों को भी नुक्सान ही होगा। 

आज सुप्रीम कोर्ट के फैसले की आलोचना करने में लगी जमात के लोग अप्रत्यक्ष रूप से भेदभाव की राजनीति को बढ़ावा दे रहे हैं। क्या सचमुच दलितों के बीच निराशा का माहौल नहीं है? इस एक्ट के नियमों में ढील होने पर दलितों के खिलाफ अत्याचार के मामले बढऩे की आशंका निर्मूल नहीं है। पहले गिरफ्तारी के भय से लोग कमजोर दलित लोगों पर अत्याचार करने से दूर रहते थे मगर गिरफ्तारी में मुश्किल और जमानत के नए प्रावधान के बाद लोगों का यह डर खत्म हो गया है। नख और दंतविहीन होने के बाद इस कानून की प्रासंगिकता पर प्रश्न चिन्ह लग गया है। फलत: भविष्य में ऐसे मामलों में होने वाली वृद्धि को रोकना सहज नहीं होगा।

मेरी समझ से जस्टिस गोयल और जस्टिस ललित को भीम की तरह गदा भांजने की अपेक्षा अर्जुन की तरह पैने तीर से निशाना साधना चाहिए। यदि यह मामला इतना ही खराब था तो फर्जी मुकद्दमा दायर करने वाले तथाकथित दलित को मुकम्मल सजा देना क्यों नहीं मुनासिब समझा गया। ऐसा करने से सटीक संदेश जाता। पिछले साल जुलाई में भी इसी अदालत ने दहेज पीड़ित महिलाओं के मामले में ऐसा ही एक निर्णय सुनाया था। बाद में उस आदेश को मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली 3 सदस्यीय पीठ ने खारिज कर दिया था। बहुत संभव है कि इस मामले में भी वैसी ही कोई प्रक्रिया दोहराई जाए। भविष्य में इस मामले में क्या और कैसे होता है, यह जानना सचमुच बेहद दिलचस्प होगा।

(कौशल किशोर “दी होली गंगा” पुस्तक के लेखक हैं) https://t.co/z9ScyYCT0O?amp=1

https://punjabkesari.in/post/5728986/dalit-problems-and-discrimination-politics-777647 http://epaper.navodayatimes.in/c/27500151

​Assassination of Activist Journalist Gauri Lankesh

Featured​Assassination of Activist Journalist Gauri Lankesh

Kaushal Kishore

The activist journalist Gauri Lankesh was shot dead in Bengaluru last night at around 8 o’clock. She was fired seven times at a close range outside her home. It is believed that as soon as she stepped out of the car and opened the gates the attackers fired at her. Three bullets hit her, in the forehead, neck and chest. The neighbours found the 55-year-old editor lying on her porch. This assassination appears to be an organised crime. The police suspects the role of hired killers.

State administration has deputed three teams to investigate into this cold blooded murder. Siddaramaiah, the chief minister of Karnataka, reacts on this issue: (I’m) absolutely shocked to learn about the murder of renowned journalist Gauri Lankesh. I have no words to condemn this heinous crime. In fact, this is an assassination on democracy. In her passing, Karnataka has lost a strong progressive voice, and I have lost a friend. Karnataka Law Minister TB Jayachandra finds similarities with the murder of the Sahitya Academy Award recipient scholar M.M. Kalburgi. In September 2015, he was shot dead by a couple of bikers at his doorstep in Dharwad, 400 km away from the state capital. The men knocked on his door and when the 77-year-old scholar opened it, shot him at point blank range. The mystery of that murder is yet to be solved. The similarity of these heinous crimes also refer to its fate.

Gauri Lankesh was the daughter of P. Lankesh, who brought in a new brand of Kannada journalism with his tabloid i.e. Lankesh Patrike. She has followed his footsteps, and started Gauri Lankesh Patrike (GLP) 2005. The GLP stood for its straightforward attitude and questioning the system that compromises, while constantly exposing the stories of politicians’ scandals. She was well known for speaking her mind, and involved with a group that worked for communal harmony. In fact her views were considered Leftist and anti-Hindutva ideology. At the same time she has also raised the cases of corruption of leaders of other parties, including the Congress.

Gauri Lankesh has woken up a lot more minds in her death than she did during her lifetime, however, doing excellent as an activist and a journalist. In a decade her publication grown to employ 50 people with a substantial subscription devoid of advertisement from government or corporate. The tabloid is financially supported by her other publication, in fact Lankesh Prakashana is known for publishing literature and self help study material for competitive examinations. She is the first journalist whose martyrdom is celebrated with the state honour.

Recently one of her stories not only earned notoriety, but also a jail term, in which she was enlarged on bail. In 2008 her tabloid published certain story mentioning names of three right wing workers claimed to have duped a jeweller a hundred thousand bucks, however, this act was published in many local dailies without mentioning the names. At least three defamation cases are being reported to be pending against her. Meanwhile Gauri had sensed the days that we live in are not conducive enough to voice dissent, as she had stated that the “Right regime would want me silenced” a statement that seems to suggest her expected end.

The law and order is an issue of the state. As such this is the failure of Karnataka govt. headed by Congress Party. Journalists and social activists gathered today at the headquarter of  Press Club of India in a protest against such a heinous act. Several protests are being reported from different corners of the nation. I am sure all participants of these events are not from left wing. The excitement of right wing leaders and workers is on its peak, some of them celebrate her death. It seems that left and right wings are fighting with each other as if they surely know who were the killers. The condition of ruling parties in the state and the centre are also similar. And social media is flooded with muddy remarks. All those vomiting venom are trying to get attention from his or her own community. At least they are focused on political mileage, and hatred seems to br in its centre. Unfortunately this is the actual condition of Indian democracy of the day. The fate of these hue and cry after most of such deaths are confined merely to take benefits in elections. A collective effort towards how to improve the sate of administration is nowhere in the picture. So that such cases will continue in future. Sadly, none among the leaders are focused on it.

This is the latest death being counted in a string of murders of rationalist writers or journalists or activists. Siwan (Bihar) bureau chief of Hindi daily Hindustan, Ranjan Rajdeo was shot from a close range by assailants on a motorcycle in May 2015. Before death, he had written extensively on the cases involving murder of Shrikant Bharti in 2014. Bharti was an aide of BJP MP Om Prakash Yadav. The burning of Jagendra Singh, a freelance journalist, in June 2015 at Shahjahanpur (Uttar Pradesh) is still fresh in my memory. Deshbandhu reporter Sai Reddy was killed in Bijapur district of Chhattisgarh in December 2013. He died while being transported to the hospital and police suspected Maoists’ hand behind his killing. Govind Pansare, prominent activist and rationalist, was shot dead in February 2014 by unidentified persons, when he was returning home after morning walk in Kolhapur. On August 20, 2013, Narendra Dabholkar, a prominent anti-superstition crusader, was allegedly gunned down by a couple of bikers during his morning walk in Pune. A couple of days after Gauri’s murder another journalist, Pankaj Mishra received fatal bullet injuries in Bihar. These are a few cases of recent years that suggest how freedom of expression is being infringed in India.

In addition to these intellectuals there are numerous cases of murder of political workers from different parties in recent times. The story of Gangaputra Nigamananda, who has fasted till death for the Ganga, is also available in public domain. There were people who were not agree with these crusaders. But everyone knows they were the fighters, who gave up their life for a noble cause. I do in fact salute such brave hearts, even if I don’t agree with them.

Right to dissent is the beauty of democracy. We need to preserve it in 21st century India as well. This assassination raised several questions, including whether the gun is mightier or the pen? I saw certain teachers afraid of guns, but still they were preaching the power of pen is more than that of a bullet. This is the time to save democracy that can sustain only when right to dissent is ensured with dignity.

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ईवीएम पर छिड़ी रार

कौशल किशोर | Follow @HolyGanga
 
चुनाव आयोग ने दिल्ली के मुख्यमंत्री को वोटिंग मशीन हैक करने की चुनौती दी है। चुनौती और ललकार लगाने में अव्वल नेता को उन्हीं के अंदाज में यह चुनौती पहली बार मिली है। पर चुनाव आयोग की ईवीएम पर चुनौती नई कतई नहीं है। नगर निगम चुनाव में इसी मशीन के नाम पर खलबली मची है। दिल्ली के मुख्यमंत्री की बात नहीं मान कर चुनाव आयोग ने बैलट पेपर पर चुनाव कराने से इंकार कर दिया। उन्होंने तैयारियां पूरी होने तक के लिए इस चुनाव पर रोक लगाने को कहा था। हालांकि आईआईटी खड़गपुर से अभियांत्रिकी की पढ़ाई करने वाले अरविन्द केजरीवाल ने चुनौती स्वीकार नहीं किया। संभव है, उन्हें पता हो कि आयोग की यह चुनौती उनकी पहली ताजपोशी के बाद जारी उसी बयान के समान है, जिसमें उन्होंने बिना किसी तैयारी के दिल्ली की जनता का बिजली बिल माफ कर दिया था। उन्होंने ईवीएम की ईमानदारी पर सवाल उठाया है। मध्य प्रदेश के अटेर विधानसभा में हाल में हुए परीक्षण के दौरान ईवीएम ने भाजपा प्रत्याशी के पक्ष में गलत नतीजा देकर इस चर्चा को गरमाने की सामग्री उपलब्ध कराया है। केजरीवाल की ईमानदारी इस बात से भी जाहिर होती है कि चुनौती के जवाब में उन्होंने वीवीपीएटी युक्त ईवीएम से चुनाव कराने के विषय में आयोग को लिखा है। 
 
पिछले कई हफ्तों से इलेक्ट्राॅनिक वोटिंग मशीन सुर्खियों में है। 11 मार्च 2017 को आए विधानसभा चुनावों के नतीजों ने इन मशीनों को अचानक बहस का विषय बना दिया। चुनावों में हार का ठीकरा राजनेताओं ने इन्हीं मशीनों पर फोड़ना मुनासिब समझा था। बसपा सुप्रिमो मायावती, कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी, समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव और आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविन्द केजरीवाल ने एक साथ ईवीएम में गड़बड़ी की ओर इंगित किया। इन आरोपों से कुल इतनी ही बात साफ होती कि ईवीएम में हेराफेरी की संभावना है। इस संभावना के बूते चुनाव परिणामों को बदलने की आशा करने वाले नेता भविष्य में भी हार का सामना करेंगे। क्या यह विवाद अपनी कमियों को छिपाने की असफल कोशिश नहीं है? ईवीएम को दोषी ठहराने वाले इस सत्य को नकार रहे हैं कि इन दिनों भाजपा बेहतर रणनीति के साथ मैदान में उतर रही है। 
 
विधानसभा चुनावों में नोटबंदी से नाराज व्यापारी वर्ग भाजपा के खिलाफ मतदान करती है। परंतु मोदी, जेटली और शाह की टीम इसी नोटबंदी को गरीब जनता के हित में कालेधन के मालिकों को परेशान करने का मंत्र साबित करने में सफल होती है। गरीबों का विशाल जनसमूह भाजपा के पक्ष में मतदान करती है। तीन तलाक के मामले पर उन्होंने मुस्लिम महिलाओं की नजर में दूसरी पार्टियों के मुकाबले बेहतर मुकाम बनाया है। इस सोसल इंजीनियरिंग का मुकाबला किए बगैर बैलट पेपर की पैरोकारी करने से ईवीएम का दोष नहीं सिद्ध होता है। पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कहा, ‘अगर इवीएम में गड़बड़ी हुई होती तो मैं मुख्यमंत्री नहीं होता।’ इस बीच कांग्रेस नेता वीरप्पा मोइली ने पुराने दिनों की ओर नहीं लौटने की पैरवी करते हुए बैलेट पेपर पर चुनाव नहीं कराने की पैरोकारी किया है। इन तथ्यों ने साफ कर दिया कि कांग्रेस के नेताओं में इस मामले में कोई आम सहमति नहीं कायम हो सकी है।
 
इन मशीनों की दक्षता के साथ ही खूबियों को बखान करने वाला एक वर्ग वर्षों से सक्रिय है। ‘ईवीएम डेमोक्रेसी’ के पैरोकार इन्हीं के बूते लोकतांत्रिक देशों की सरकार चलाने की मंशा रखते हैं। करीब एक दशक से इस मामले पर कार्यरत गोविन्द यादव जैसे सामाजिक कार्यकर्ता और विधि विशेषज्ञ ‘ईवीएम डेमोक्रेसी’ को परिभाषित कर इसके विरोध में ‘वोट बचाओ-देश बचाओ’ अभियान शुरु करते हैं। मध्य प्रदेश के कई हिस्सों में इस मामले में गतिविधियां चलती रही है। वर्षों से उनकी शिकायत अनसुनी होती रही। बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने हितों को साधने के लिए ‘ईवीएम डेमोक्रेसी’ को प्रभावी तरीके से लागू करने में लगी है। इस अभियान के पैरोकार जापान और जर्मनी जैसे तकनीकी संपन्न लोकतांत्रिक देशों में स्वीकृत मतपत्र व्यवस्था की वकालत भी करते हैं। भाजपा के एक विद्वान प्रवक्ता ने साल 2010 में ‘डेमोक्रेसी एट रिस्क’ नामक एक किताब लिखी थी, जिसकी विषयवस्तु यही थी। लालकृष्ण आडवाणी ने इस पुस्तक की पैरवी किया और भाजपा के कई दिग्गज नेताओं ने इसमें वर्णित बातों का जिक्र कर ओजपूर्ण भाषण दिए। इस सैद्धान्तिक विमर्श के पक्ष-विपक्ष में कई राजनैतिक दलों से जुड़े लोग शामिल रहे हैं। इन सब के बावजूद पहले यह मामला कभी मुख्यधारा के बहस का हिस्सा नहीं हो सका था। अचानक एक दिन यह भारतीय राजनीति का सबसे मुखर सवाल बन जाता है। इस मामले की पृष्ठभूमि और वर्तमान परिदृष्य को समझना जरुरी है। 
 
बाहुबलियों के बूते मतपेटियों के लूट की कहानी को ईवीएम के इस्तेमाल ने रोक दिया। ऐसी युक्तियों को अपनाकर विधानभवन पहुंचने वाले माननीयों से लोकतंत्र को बचाना जरुरी है। और इसी धांधली को रोकने के लिए ईवीएम का उपयोग शुरु करने की बात कही गई। इस मामले में वी.पी. सिंह की सरकार ने जनवरी 1990 में तत्कालीन विधि मंत्री दिनेश गोस्वामी के नेतृत्व में 11 सदस्यीय चुनाव सुधार समिति बनाई थी। इस समिति की रिपोर्ट मई 1990 में संसद के पटल पर रखा गया, जिसमें ईवीएम के इस्तेमाल की बात कही गई है। परंतु ईवीएम का इस्तेमाल इस सिफारिश का नतीजा नहीं है। 1988 में राजीव गांधी की सरकार ने लोक प्रतिनिधित्व कानून 1951 की धारा 61 में संशोधन कर मतपत्रों के स्थान पर ईवीएम का उपयोग करने का कानून बनाया था। गोस्वामी समिति ने इस कानून की भूमिका बाद में लिखी। इस बीच एक अति आवश्यक प्रक्रिया छूट जाती है। ईवीएम के प्रामाणिकता की जांच नहीं की जाती है। आज केजरीवाल के सामने पेश की गई चुनौती में भी इस कमी को दूर करने का प्रयास नहीं किया गया है। ऐसा लगता है जैसे को तैसा नीति अपना कर चुनाव आयोग ने एक चाल चली, जिससे उनकी उस मांग को बल मिलता है, जिसके लिए लंबे समय से कोशिश जारी है।
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1990 के दशक में तकनीकी का इस्तेमाल कर मतदान प्रक्रिया की धांधली को रोकने की कोशिश हुई। इसके साथ छेड़छाड़ की चुनौती भी तभी से है। चुनाव आयोग और राजनीतिक दलों के अतिरिक्त सर्वोच्च न्यायालय एक अर्से से ईवीएम मामले की सुनवाई में लगी है। इसी केस में ईवीएम को वीवीपीएटी नामक एक अन्य उपकरण से जोड़ने की बात आती है। इससे यह सुनिश्चित होगा कि मतदाता ने किस बटन को दबा कर मतदान किया। इसे वोटर वेरिफिएबल पेपर आॅडिट ट्रायल (वीवीपीएटी) कहा जाता है। गोवा में हुए हालिया विधानसभा चुनाव में पहली बार सभी सीटों पर यह सिस्टम इस्तेमाल में लाया गया है। इससे पहले 16वीं लोकसभा चुनाव में 8 प्रदेशों के 8 संसदीय क्षेत्रों में इन उपकरणों का इस्तेमाल किया गया था। चुनाव आयोग को सभी ईवीएम में यह सुविधा जोड़ने के लिए करीब 3600 करोड़ रुपये की जरुरत है। इसके अर्थशास्त्र को समझना बहुत मुश्किल नहीं है। मुख्य चुनाव आयुक्त ने इस विषय में कई बार केन्द्र सरकार को पत्र लिखा है। हाल ही में उन्होंने प्रधानमंत्री से सीधी गुहार कर धन उपलब्ध कराने का निवेदन किया है। आम आदमी पार्टी के नेता ने इस चुनाव में बैलट पेपर की मांग के बदले वीवीपीएटी युक्त मशीनों से चुनाव कराने के लिए लिखकर क्या संकेत दिया है? संभव है कि चुनाव आयोग दिल्ली नगर निगम चुनाव में पेपर आडिट ट्रायल सिस्टम युक्त मशीनों का इस्तेमाल कर एक तीर से कई निशाना साधने का काम करे। 
 
आज ‘वोट बचाओ-देश बचाओ अभियान’ एक जनान्दोलन में तब्दील होने में लगी है। चंडीगढ़ में हाल में हुए निकाय चुनाव में ईवीएम के छेड़छाड़ की घटना सामने आई, जिसमें स्ट्रांग रुम में घुसकर उम्मीदवारों के शुभचिंतकों ने चुनाव आयोग को निःशब्द चुनौती दी। इस विषय में प्रिंट और इलेक्ट्राॅनिक मीडिया में कई उम्मीदवारों की शिकायतें सुनाई देती है। फिर हजारों लोगों का हुजूम वोट बचाओ-देश बचाओ नारे के साथ सड़क पर उतरने को मजबूर हो जाता है। मध्य प्रदेश की आहट पंजाब में चिंगारी का रुप ले चुकी है। पंजाब के मुख्यमंत्री भले ही ईवीएम की पैरवी कर रहे हों, पर उनके समर्थन में माहौल बनाने वाले हजारों कार्यकर्ताओं ने ईवीएम से हुए छेड़छाड़ के सवाल को गंभीरता से लिया है। इन आंदोलनकारियों का मानना है कि भारत जैसी तीसरी दुनिया के देशों में माइक्रो-प्रोसेसर जैसे उपकरण विदेशों से आयात किये जाते हैं। यहां ईवीएम फिक्स कर सरकार बनाना असंभव नहीं है। क्या ऐसी दशा में देश की जनता यह मान लेगी कि एक ऐसा उपकरण जो मतदान की प्रिंट उपलब्ध कराती है वह बैलेट पेपर के बराबर होगी? कांग्रेस और आम आदमी पार्टी का रुख सामने है। क्या आज बैलट पेपर की मांग करने वाली सभी पार्टी वीवीपीएटी की आपूर्ति से संतोष कर लेगी? क्या इस बहस का अंत इसी प्रिंटेड स्लिप के नाम पर होना है? 
 
निश्चय ही ईवीएम के टेम्पर प्रूफ होने के दावे हैं। प्रमाण नहीं। सैद्धांतिक रुप से मतपत्रों पर अंकित निशान का मुकाबला कोई इलेक्ट्राॅनिक उपकरण नहीं कर सकता है। पर इस व्यवस्था से चुनाव आयोग को मतदान से लेकर मतगणना तक आसानी होती है। इस मामले में राजनीतिक दलों को आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठकर लोकतंत्र के हित में विचार करना चाहिए। यह देशहित और आम जनता की निष्ठा से जुड़ा मामला है। इस गंभीर समस्या की आड़ में हार के दंश से उबरने की कोशिश वैमनस्य की राजनीति ही मानी जाएगी।

हिमालय में महापंचायत की बैठक

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अलसुबह उड़ी में सेना के कैंप पर हमला हुआ। और उस दिन एक महापंचायत भी हिमालय में हुई। वास्तव में यह हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में पहले से तयशुदा एजेंडे पर विभिन्न प्रांतों की पंचायत से जुड़े सामाजिक-राजनैतिक लोगों की लंबी बैठक थी। देश में पंचायती राज संस्थानों की पैरोकार आल इंडिया पंचायत परिषद 1958 से इस तरह का अयोजन करती आ रही है। इसे महासमिति की बैठक या महापंचायत कहते हैं। यहां 73वें संविधान संशोधन और 14वें वित्त आयोग की सिफारिशों के अलावा कई अन्य महत्वपूर्ण मामला भी छाया रहा। एक ओर दहशतगर्दी की आग में जल रहे जम्मू-कश्मीर से पहुंचे पंचायत प्रतिनिधि की दबी आवाज सुनाई दी। तो उत्तर प्रदेश में पंचायत के स्तर पर योग्य लोगों को परिषद से जोड़ने की कवायद को देशभर में दुहराने की जरुरत पर चर्चा होती है। साथ ही यह महासमिति पंचायती राज संस्थानों को मजबूत बनाने के लिए एक व्यापक जन आंदोलन को खड़ा करने की कोशिश करती प्रतीत होती है।

दरअ़सल महापंचायत की इन बैठकों का असर आजादी के बाद के इतिहास में पंचायती राज संस्थानों के क्रियाकलापों के रुप में साफ दिखता है। स्वतंत्र भारत में स्वराज, पंचायती राज अथवा तीसरी सरकार (डेमोक्रेटिक डिसेंट्रलाइजेशन) के नाम पर जो कुछ भी हुआ, उसके पीछे जो शक्तियां रही, वही महापंचायत के कर्त्ता-धर्त्ता, पुरोधा और फाउडिंग फादर्स माने जाते हैं। इसमें सबसे भारी योगदान देने वालों ने तो अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया। स्वराज के इसी सपने को साकार करने के लिए आजादी से पहले लाला लाजपत राय, भगत सिंह और आजाद जैसे शहीद हुए तो स्वतंत्र भारत में मेहता, शास्त्री और जयप्रकाश जैसे विभूतियों का जीवनदान देखने को मिलता है। महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज के सपनों को पंख लगाने के लिए लोक नायक जयप्रकाश नारायण, गुजरात के दूसरे मुख्यमंत्री बलवंतराय मेहता और बिहार के तीसरे मुख्यमंत्री पंडित बिनोदानंद झा का योगदान अनुकरण के योग्य माना जाता है। उन्होंने ही पंचायतों की परिषद बनाई, जिसकी इससे पहले ऐसे 90 और बैठकों के रिकार्ड मिलते हैं। आज भी इनके प्रभावों को नकारना संभव नहीं है। 1957 की बलवंतराय मेहता कमिटी और फिर बीस साल बाद अशोक मेहता कमिटी की सिफारिशों के अभाव में क्या नब्बे के दशक में हुए 73वें संविधान संशोधन की चर्चा भी संभव थी? भारतीय राजनीति में हुए रिफार्म की इन ईबारतों को गढ़ने में महती भूमिका अदा करने वाली महासमिति भविष्य में क्या करने जा रही है? इसे समझना सरकार और नागरिक समाज के लिए आज बेहद जरुरी है। 

अभी बहुत वक्त नहीं बीता है। प्रधानमंत्री झारखंड में पंचायती राज दिवस मना रहे थे। उन दिनों ग्रामसभा और लोकसभा की तुलना होने लगी, तो ग्रामोदय से भारतोदय तक का सपना भी आकार-प्रकार लेने लगा। पिछले साल चौदहवें वित्त आयोग की सिफारिशों में डा. वाई.वी. रेड्डी ने पंचायतों को आवंटित किए जाने वाले बजट में अप्रत्याशित रुप से वृद्धि किया था। आज मोदी सरकार दो लाख दो सौ बिरानवे करोड़ की मोटी रकम पंचायतों के विकास के लिए सीधा मुहैया कराने को प्रतिबद्ध है। इन सब के बावजूद पंचायत परिषद से जुड़े लोग भाजपा से जुड़े स्वदेशी जागरण मंच और भारतीय किसान संघ जैसे अनुसांगिक संगठनों की तरह नाराजगी जाहिर कर रहे हैं। सरकार की लोकप्रियता को प्रभावित करने वाले मसलों में निश्चय ही यह भी अपनी अहमियत रखता है। यहां पहुंचे पंचायतों की राजनीति में सक्रिय प्रतिनिधियों की दिन भर चली चर्चा में मैंने चालीस के करीब विद्वानों की बातों पर गौर किया। उनका मतेक्य इस बात में था कि वित्त आयोग ने जिला परिषद को किनारे करने का काम कर पंचायती राज संस्थानों को कमजोर किया है। 

हिमाचल प्रदेश राज्य पंचायत परिषद की प्रमुख प्रेमलता ठाकुर वित्त आयोग के प्रभावी पंचवर्षी प्रावधानों की ओर इंगित कर बड़े तीखे सवाल उठाती हैं। उनकी नाराजगी ब्लॉक और जिला स्तर पर पंचायत प्रतिनिधियों को पूर्व में प्राप्त वित्तीय शक्तियों को कम करने के कारण है। सूचनाओं को आनलाइन करने के क्रम में होने वाली त्रुटियों से उपजने वाली समस्याओं से वंचित लोगों को कष्ट पहुंचता है। यह दूसरी जटिल समस्या है। इसके निराकरण के लिए कोई सार्थक प्रयास नहीं किया गया। यहां आनलाइन डाटा और आधार कार्ड के इस्तेमाल से लोगों को रिलीफ पहुंचाने के क्रम में होने वाली समस्याओं पर गंभीर मंथन चला। राजस्थान की चुनिंदा घटनाओं का हवाला भी दिया गया। विख्यात सामाजसेवी अरुणा राय और वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार ने बेवश और लाचार लोगों को आधार डाटा मिसमैच से होने वाली असुविधाओं पर विचार करने को प्रेरित किया है। यह एक ऐसी समस्या है, जिसे देखकर पंचायतों से जुड़े लोगों का छुब्ध होना लाजिमी है। इन्हीं तथ्यों का संज्ञान लेकर ग्रामसभा से जुड़े कुछ लोग अब तकनीकी और समस्या के बीच का समीकरण समझने में लगे हैं। उन्हें पता है कि कंप्युटर टेक्नोलोजी का इस्तेमाल कई जगह अच्छा है। पर इसके नुकसान भी हैं। यहां एक सवाल उठता है कि क्या सरकार तकनीकी का व्यापार करने का साधन मात्र बन कर रह गई है? या फिर सचमुुच अंतिम जन की सेवा के प्रयासों में होने वाले त्रुटियों से लोग रु-ब-रु हो रहे हैं। यदि तकनीकी लोगों के पास पहुंच कर उनकी सेवा करने में सक्षम बनाती है, तो निश्चय ही उसका इस्तेमाल होना चाहिए। पर यदि वही वंचित तबके की सेवा में बाधा बन रही हो, तो निश्चित तौर पर उस तकनीकी का विरोध होना चाहिए। इस विषय में सरकार को भारतीय परंपरा का अनुकरण करना चाहिए, जो सबसे पहले वंचितों और दिव्यांगों की सेवा सुनिश्चित करने की पैरवी करता है। अतिथि देवो भव और वसुधैव कुटुम्बकम की पैरवी करने वाले समाज में यह वंचितों को जीवन की आधारभूत जरुरतों से मरहूम होते हुए दिन-ब-दिन देखने का मामला है। 

नब्बे के दशक में राव सरकार के दौरान 73वां संविधान संशोधन किया गया था। तभी से इसे लागू करने की बातें चल रही हैं। पंचायतों की सूची में शामिल 29 विभागों की स्थिति पर केन्द्र सरकार का रुख सामने है। बीते पंचायती राज दिवस पर वैंकैया नायडू ने राज्यों से पैरवी की जरुरत को रेखांकित कर इसे एक बार फिर दुहराया था। सही मायनों में इन शक्तियों के अभाव में ग्राम स्वराज के स्वप्न का साकार होना आसान नहीं होगा। इस महापंचयत में परिषद ने सभी राज्यों में इस व्यवस्था को लागू कराने के लिए संघर्ष का रास्ता चुना है। आशा  के अनुरुप ही मैंने उनकी प्रतिति को यथार्थ में परिवर्तित करने से जुडे़ महत्वपूर्ण पहलुओं पर प्रकाश डाला था। इस क्रम में पिछले पांच सालों में हुए कुछ छोटे, मंझोले और बड़े कद-काठी के आंदोलनों का जिक्र जरुरी था। ऐसा करते हुए मैंने यह बताने का जतन किया कि किस तरह से इन आंदोलनों में सक्रिय लोगों का समर्थन और सहयोग हासिल किया जाय। और इससे ग्राम स्वराज का लक्ष्य अर्जित करने के प्रयासों को बल मिले। 

महासमिति गैरबराबरी को ग्रामीण और शहरी नामक दो किश्मों में विभाजित करती है। इस क्रम में कुपोषण और भूख से तड़पती जनता के दर्द का विश्लेषण होता है। साथ ही भोजन का अधिकार से लेकर काम के अधिकार तक की तमाम बातों पर चर्चा छिड़ती है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के तीन सौ से ज्यादा ग्राम पंचायतों के लिए नई मुहिम शुरु करने की बात भी उठती है। दिल्ली के ग्रामीण क्षेत्र का दुर्भाग्य है कि यहां 1983 से ही पंचायतों के चुनाव नहीं होते। परंतु पंचायतों को मिलने वाले बजट को खर्च करने के लिए विभाग बदस्तूर कायम है। अरविन्द केजरीवाल के मोहल्ला सभा के सामने पंचायत परिषद की मुहिम वास्तव में कैसी होगी? यह अभी नहीं कहा जा सकता है। पर इस मामले पर अब चर्चाएं लगातार होने लगी हैं। 

केन्द्र और राज्य की सरकारों को पंचायती राज प्रतिष्ठानों की समस्या दूर करने में सहयोग का रुख अख्तियार करने की जरुरत है। इस क्रम में उन्हें पंचायत प्रतिनिधियों के असंतोष को भी समझना होगा। आज वस्तुस्थिति ऐसी है कि जमीन पर पंचायती राज संस्थान और इनके प्रतिनिधि राज्य और केन्द्र की योजनाओं को लागू करने की एजेंसी के रुप में सिमटने को विवष हैं। इस महासभा के बाद हुए प्रेस वार्ता की आखिरी घोषणा मुझे साफ-साफ याद है। सभापति ने कहा था कि पंचायत परिषद कोई कांग्रेस पार्टी या किसी दूसरे पार्टी का नहीं है, इसमें हर पार्टी के लोग हैं। यही बात मेरे केविएट का सार था। और ऐसा कायम नहीं रहने की ददशा में गांधी, मेहता, शास्त्री, बिनोदानंद झा और लोक नायक के सपनों की एक साथ हत्या होगी। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51 में वर्णित दायित्वों का निर्वहण करने के लिए इस थाती को सहेजना बेहद आवश्यक है। यह कार्य सरकार, समाज और व्यक्ति विषेष के स्तर पर बेहतर तारतम्य स्थापित कर ही सुनिश्चित हो सकती है।

तीसरी सरकार बनाम पहली सरकार

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balvantray_mehtaआज भारत-पाक युद्ध के दौरान शहीद हुए बलवन्त राय मेहता का 116वां जन्मदिन है। पाकिस्तानी सेना ने कश्मीर में घुसपैठ और कब्जे की नीयत से अप्रैल 1965 में ‘आॅपरेशन जिब्राल्टर’ शुरु किया था। बाद में यह भारत-पाकिस्तान युद्ध के रुप में परिणत हुआ। नतीजतन भारत को एशिया में शाक्तिशाली राष्ट्र होने का गौरव मिला। इसी महाभारत के दौरान एक पाकिस्तानी फाइटर जेट ने 19 सितम्बर को सिविलियन बीचक्राफ्ट को हवा में अवरुद्ध कर उड़ा दिया। इसमें मेहता दम्पति समेत कुल आठ लोगों की मौत हुई। इस घटना को पचास साल बीत चुके हैं। उनकी शहादत के चैथे दिन अमेरिका, तत्कालीन सोवियत संघ और संयुक्त राष्ट्र के दखल से सीजफायर की घोषणा हुई। एक बार फिर पाकिस्तान के साथ तनाव बढ़ रहा है। पठानकोट में हुए आतंकवादी हमला और डेविड कोलमेन हेडली (दाउद गिलानी) की गवाही से भारत को अस्थिर करने में पाकिस्तान की भूमिका का पर्दाफास होता है। सवालों की फेहरिस्त दिन-ब-दिन लंबी हो रही है। इसी बीच उपद्रवी तत्वों ने भारत की बरबादी और पाकिस्तान जिन्दाबाद के नारे भी लगाए हैं। शान्ति स्थापित करने की तमाम कोशिशों के बीच तनाव बढ़ाने वाली घटनाएं अनवरत हो रही हैं। ये सभी घटनाक्रम अच्छे दिनों का प्रतीक नहीं है। 
 
बलवन्त राय मेहता स्वतंत्र भारत में पंचायती राज के जनक माने जाते हैं। शहादत से ठीक दो साल पूर्व उन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री का पद संभाला था। इसके अतिरिक्त लोक सेवक मंडल और अखिल भारतीय पंचायत परिषद जैसी महत्वपूर्ण संस्थाओं के अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी बखूबी निभाते रहे। उनकी शहादत से सामाजिक समरसता कायम रखने में अहम भूमिका निभाने वाली इन संस्थाओं को बड़ा झटका लगा। उनके बाद लाल बहादूर शास्त्री ने लोक सेवक मंडल के अध्यक्ष का पद संभाला। ताशकंद समझौते के अगले ही दिन उनका असामयिक निधन तथाकथित हृदयाघात से हुआ। तो दूसरी ओर पंचायती राज और स्वराज का स्वदेशी सपना भी बिखरने लगा। बिहार राज्य की सुव्यवस्थित पंचायत परिषद को देखकर मेहताजी ने पंचायतों के राष्ट्रव्यापी संगठन की स्थापना का बीड़ा उठाया था। जिसे बाद में जय प्रकाश नारायण ने आगे अवश्य बढ़ाया। परंतु उनके बाद बिहार में ही दो दशकों से भी ज्यादा समय तक पंचायतों के चुनाव नहीं हुए। दूसरे प्रदेशों में भी पंचायतों की दशा ढुलमुल नीतियों का शिकार होती रही। जो अबतक बरकरार है।
 
गांधीवादी समाजसेवियों ने मेहताजी के जन्मदिन पर पंचायत दिवस मनाने की परंपरा शुरु किया। कई दशकों से यह आज भी बदस्तूर जारी है। परंतु मनमोहन सिंह सरकार ने इसके बदले 24 अप्रैल को राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस मनाना प्रारंभ किया। इस परिवर्तन से जुड़ी कड़ियां परत-दर-परत विकसित हुईं। इन्हीं परतों में पंचायतों का राष्ट्रीय संगठन अखिल भारतीय पंचायत परिषद दम तोड़ता प्रतीत होता है। इस क्रम में नेशनल हेराल्ड मामले जैसा हजारों करोड़ की पंचायती सम्पत्ति के हेड़ाफेरी का प्रयास भी सामने आता है। आज फिर इस विषय में मोदी सरकार का रुख आशा जगाती है। पूर्व भाजपा अध्यक्ष और केन्द्र सरकार में प्रभावशाली मंत्री नितिन गडकरी और राजनाथ सिंह ने तीसरी सरकार को मजबूत बनाने और पंचायत परिषद को पुनः जीवित करने का प्रयास आरंभ किया है। 
 
महात्मा गांधी हिन्द स्वराज की बात करते हैं। दीनदयाल उपाध्याय ने सत्ता के विकेन्द्रीकरण की पैरोकारी किया। वास्तव में दोनों विभूतियों ने आम जनता को शक्ति संपन्न बनाने की पूरजोर कोशिश किया था। परंतु राज्यों और केन्द्र की सरकारों का रुख हैरान करता है। इमरजेंसी के बाद से सरकारें इस मामले में प्रायः उदासीन बनी रही। संविधान के 73वें और 74वें संशोधन के माध्यम से इस कमी को पूरा करने का खोखला प्रयास अवश्य किया गया। केन्द्र, राज्य और समवर्ती सूची की तरह पंचायत सूची के अभाव में यह खोखलापन दूर हो, इसकी कोई संभावना दूर-दूर तक नहीं है। अन्ना आन्दोलन के छुपे रुस्तम सुरेश शर्मा और पंचायत परिषद के अध्यक्ष वाल्मीकि सिंह तीसरी सरकार को पहली सरकार मानते हैं। ग्राम पंचायत और नगर पंचायत से जुड़े मुद्दों पर सक्रिय जय हिन्द मंच ने पिछले महीने हरियाणा में हुए पंचायत चुनावों में 300 सीटों पर उम्मीदवार खड़े कर 241 सीटों पर जीत हासिल किया है। इन प्रयासों से उम्मीद जग सकती है। पर क्या व्यवस्था की कमियां सचमुच दूर होंगी? और क्या स्वराज का सपना साकार होगा? ऐसे कई बेहद जटिल प्रश्न हैं।  
 
आशा की किरणें कभी अस्त नहीं होती। पाकिस्तानी एयर फोर्स के पायलट कैज हुसैन ने बीचक्राफ्ट का मार्ग अवरुद्ध कर हत्याकांड को अंजाम दिया था। उस समय वह आदेश का पालन कर रहे थे। रिटायरमेंट के बाद करीब पांच साल पहले हुसैन ने बीचक्राफ्ट के शहीद पायलट जहांगीर इंजीनियर की बेटी फरीदा सिंह को ई-मेल भेजकर शोक प्रकट किया। इससे नागरिक और सरकार के बीच का फासला उजागर होता है। यह लोकतंत्र की कामयाबी का सूचक नहीं है। पिछली बार राजग सरकार ने नई दिल्ली और लाहौर के बीच यात्रा सेवा शुरु किया और कारगिल की लड़ाई भी लड़ी। आज फिर विरोधाभाषों के बीच संकट गहरा रहा है। निश्चय ही यह भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं है। आशा की किरणों को तलाशना होगा।
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लाला लाजपत राय के 151वें जन्मदिन पर

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Lala Lajpatrai
Lalaji
आज भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के अमर शहीद लाला लाजपत राय के जन्म को 151 साल पूरे हो रहे हैं। अंग्रेजी तारीख के अनुसार इसी दिन उनका जन्म ढुडीके नामक गांव में हुआ था। बीते कई दशकों से पंजाब के इस छोटे से गांव का मौसम इस अवसर पर एकदम बदल जाता है। यहां इन दिनों अच्छी चहल-पहल रहती है। आठ-दस दिनों तक मेला लगा रहता, जिसमें सभी भेद-भाव भूल कर लाखों लोग शामिल होते हैं। यहां बड़ी संख्या में लोगों के भाग लेने का सिलसिला पिछले पचास सालों में उत्तरोत्तर बढ़ा है। कभी इसे मजबूती प्रदान करने का निर्णय तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादूर शास्त्री ने लिया था। लालाजी को प्यार करने वाले पंजाबी समाज में ही सीमित नहीं हैं। देश के दूसरे हिस्सों में आज भी ऐसे अनेक संगठन सक्रिय हैं, जिन्हें आजादी के आन्दोलन में उनके बलिदान का महत्व बखूबी पता है। लालाजी की कर्मभूमि लाहौर थी, जो विभाजन के कारण पाकिस्तान का हिस्सा है। वहां भी लालाजी को याद करने वाले कम नहीं हैं। 
 
लालाजी स्वतंत्र भारत के निर्माताओं में सबसे अगली पंक्ति के महानायक हैं। गांधीजी ने उन्हें एक संस्थान माना है। अगर आप उन्हे संस्थानों का समूह कहते हैं तो भी कोई अतिशयोक्ति नहीं। आर्य समाज का संविधान गढ़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले रायबहादूर मूलराज का मानना था कि उस दौर में लालाजी की अपील के बगैर पंजाब नेशनल बैंक की स्थापना संभव ही नहीं था। उन्होंने लालाजी को इसके लिए राजी करने में तीन साल इंतजार किया। पता नहीं एलआईसी के लिए काम करने वाले कितने लोग इस तथ्य से वाकिफ हैं कि लालाजी द्वारा स्थापित लक्ष्मी इंश्योरेंश कंपनी उनकी मातृ संस्थानों में से एक है। उन्होंने आॅल इंडिया ट्रेड युनियन कांग्रेस की स्थापना किया और वर्ल्ड ट्रेड युनियन की सभा में भारत का प्रतिनिधित्व भी किया। लाहौर में आर्य-समाज ने महर्षि के प्रति जीवंत स्मारक बनाने का प्रस्ताव रखा था। यह सपना ‘दयानंद एंग्लो वैदिक’ शिक्षण संस्थान के रुप में प्रस्फुटित हुआ। लालाजी इसके संस्थापकों में बेहद मजबूत कड़ी साबित हुए। असहयोग आन्दोलन में विद्यार्थियों की भूमिका के मुद्दे पर लाला हंसराज और लालाजी के बीच मतभेद पनपा। नतीजतन लालाजी डीएवी स्कूल छोड़ कर चले गए। इसके बाद उन्होंने तिलक स्कूल को बढ़ावा देने में दिलचस्पी लेना शुरु किया, जो बाद में लोक सेवकों की नवीन परंपरा के रुप में विकसित हुआ। यहीं उन्होंने आजादी और उसके बाद के भारत का नवनिर्माण करने के लिए राजनेताओं और लोकसेवकों की नई पीढ़ी तैयार किया। इस क्रम में राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन, बलवंतराय मेहता और लाल बहादूर शास्त्री जैसे राजनेताओं ने उनके सपनों का भारत बनाने के लिए सहर्ष अपना जीवन अर्पित किया। देश की सेवा के लिए समर्पित इन महापुरुषों के अतिरिक्त भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु जैसे नाम भी लालजी से जुड़े हैं। कभी-कभी सत्य के लिए मरना आसान होता है और सत्य के साथ सतत जीना बेहद मुश्किल। लोकसेवा के क्षेत्र में लोकमान्य विकसित करने वाली संस्थान की जरुरत आज पहले से कहीं अधिक है। परंतु उनके द्वारा शुरु किए गए राजनीति के तिलक स्कूल का इक्कसवीं सदी में कोई नामलेवा तक नहीं है। 
 
लालाजी द्वारा स्थापित संस्थानों की लंबी फेहरिस्त है। प्रायः इन सभी स्थानों पर उत्साह के साथ उनका जन्म-दिवस मनाया जाता है। इसमें वैश्य समूहों के अतिरिक्त दूसरे समाजसेवी संगठनों की भी सक्रियता दिखती है। हालांकि इनमें से कई लोग ऐसे अवसरों को रिवाज मात्र मानकर निभाते हैं। फिर भी यह सच है कि आज लाखों लोग उनको बड़े प्रेम से याद करते हैं। पिछले साल लालाजी के 150वें साल के महोत्सव से जुड़कर मैंने इसके विभिन्न पहलुओं को करीब से समझने का प्रयास किया। उनके सपनों को साकार करने का बीड़ा उन लोगों व समूहों ने उठाया है, जिनका उनके परिवार अथवा संस्थानों से कोई नाता-रिश्ता नहीं है। ऐसे तीन प्रयास अतुलनीय हैं। लालाजी ने स्कूल आॅफ स्टेट्समैनशिप की जरुरत को महसूस किया था। मानव अभ्युदय संस्थान में इसकी परिकल्पना के साथ ‘अपने देश की बात’ शुरु हुई। जय हिन्द मंच के अध्यक्ष सुरेश शर्मा ने लालाजी से प्रेरणा लेकर चार सौ से ज्यादा शहीदों का सम्मान किया है। लालाजी को प्रवासी मानने वाले महेश कांत पाठक और अविनाश कुमार सिंह जैसे सामाजिक कार्यकर्ताओं ने दिल्ली और पंजाब के विभिन्न हिस्सों में रहने वाले प्रवासियों के बीच स्वदेशी, स्वराज और स्वाबलंबन के सूत्र को परिभाषित करने का बीड़ा उठाया है। 
 
वास्तव में लालाजी के व्यक्तित्व का जादू दो ध्रुवों के बीच का समीकरण साधने में दृष्टिगोचर होता है। कांग्रेस और आर्य समाज को आजादी का आन्दोलन बनाने में उनकी महती भूमिका है। आज उनकी शहादत के बाद आठ दशक से ज्यादा वक्त गुजर चुका है। लाल-बाल-पाल के युग को एक सदी होने को आया। ऐसी दशा में नई पीढ़ी के लोग पूछ सकते हैं कि आज लालाजी क्यों प्रासंगिक हैं? वर्तमान परिप्रेक्ष्य में भारतीय गणतंत्र के समक्ष कई बड़ी चुनौतियां मुंह बाए खड़ी हैं। सामाजिक-आर्थिक पैमाने पर विषमता में अनवरत अभिवृद्धि हो रही है। वैमनस्य की राजनीति नए दौर का पागलपन साबित हो रहा है। और असहिष्णुता का विस्तार देश के हर कोने तक फैल गया है। इस विषय में आगे बढ़ने से पहले स्वतंत्र भारत के निर्माताओं के सपनों पर भी एक बार गौर करना चाहिए। लाल-बाल-पाल की त्रिमूर्ति को स्वदेशी और स्वराज के मुद्दे पर राष्ट्रव्यापी बहिष्कार का सूत्रपात करने के कारण जाना गया। निश्चय  ही बाल गंगाधर तिलक, श्री अरविन्द और विपिन चंद्र पाल लालाजी के अभिन्न मित्र थे। इनके अलावा उनके बेहद करीबी मित्रों में महामना मदनमोहन मालवीय प्रमुख हैं। हिन्दू महासभा और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की पैरवी के क्रम में उन्होंने धर्म को राजनीति से दूर रखने की वकालत किया था। ऐसे सभी तथ्यों को ध्यान में रखकर महामना और लालाजी को प्रो. विपिन चंद्रा जैसे सेक्युलर इतिहासकारों ने भी उदार सांप्रदायिक कहा है। 
 
आज देश के एक बड़े हिस्से में शीतलहर बनाम असहिष्णुता की लहर साफ दिखती है। उत्तर भारत में इखलाक मियां की हत्या और दक्षिण भारत में शोध छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या जैसे मामले वैमनस्य और असहिष्णुता के नए प्रतीक बनकर उभरे हैं। इन हादसों से जुड़े घटनाक्रम और हालात सब कुछ साफ-साफ बयां करता है। ऐसे घटनाक्रम भारतीय लोकतंत्र पर कलंक का धब्बा है। हाशिये पर खड़े लोगों को असहाय और मजबूर साबित करना जनतंत्र की मजबूती नहीं, बल्कि लोकतंत्र के लिए संकट काल का सूचक होता है। ऐसी दशा में लालाजी कितने प्रासंगिक हैं? इसका उत्तर उपराष्ट्रपति डाॅ हामिद अंसारी देते हैं। समाज में व्याप्त असहिष्णुता के सम्बन्ध में चर्चा करते हुए उन्होंने 1923 के सांप्रदायिक सौहार्द के लिए जारी किए गए सौ विशिष्ट लोगों की अपील का जिक्र किया। गौर करने की बात है कि इस सूची में लालाजी पहले स्थान पर सटीक और कारगर योजना के साथ हैं। उन्होंने सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने वाले समुदाय के नेताओं का ही शांति और सौहार्द कायम करने के लिए आह्वान किया था। यह उदारता सचमुच बेमिशाल है।
 
सांप्रदायिक शक्तियों के ध्रुवीकरण का दुष्परिणाम देश को ही भुगतना होता है। सरकार रोहित को याकूब मेमन की फांसी के विरुद्ध हुए प्रदर्शन से जोड़कर राष्ट्रद्रोही करार देती है। तो विपक्ष को दलित विमर्ष का नया प्रसंग शुरु करने के लिए एक नौजवान के बलिदान की जरुरत थी। क्या याकूब मेमन और नाथूराम गोडसे जैसे लोगों के मुद्दे पर चर्चा करना कोई राष्ट्रद्रोह का कर्म है? ऐसा कहना निहायत ही अवैज्ञानिक है। यह कुतर्कों पर आधारित मनगढ़ंत बात है। ऐसी विचारधारा भविष्य में विज्ञान और तत्वज्ञान के क्षेत्र में मौलिकता का शत्रु ही साबित होगा। सात महीने से छात्रवृत्ति बन्द करने के प्रश्न पर सरकार क्यों मौन है? क्या भविष्य के कार्ल सेगान की हत्या के लिए ऐसा करना जरुरी था? क्या यह मानवीय सृजनशीलता और कल्पनाशक्ति के उड़ान को रोकने का प्रयास नहीं है? यहां देश के भविष्य और उच्च शिक्षा से जुड़ी चुनौतियां दलित विरोधी मुहिम में उलझकर रह गई हैं। यह प्रयास किसी सकारात्मक राजनीति का हिस्सा नहीं हो सकता है। और न ही इससे समाज का कोई हित होने वाला है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रवर्तकों को भी इस तरह के घृणित कृत्यों का कोई विशेष लाभ नहीं मिलने वाला है। फिर भी इस विषय में कोई सकारात्मक पहल नहीं हो रही है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है।
 
मोदीजी के ख्यालों में बराबर देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादूर शास्त्री होते हैं। 1964 में शास्त्रीजी कैरो से लौटते वक्त अचानक कराची में उतरते हैं। उस दिन पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति अय्यूब खान तमाम प्रोटोकाॅल भूल कर उनकी आगवानी करने पहुंचे थे। हाल ही में मोदीजी ने अचानक लाहौर में उतरने का फैसला किया। उन्होंने अपने पाकिस्तानी समकक्ष को जन्मदिन की मुबारकबाद देने का बहाना अच्छा ढ़ूंढ़ लिया था। लालाजी को आदर्श मानने वाले शास्त्रीजी ने देश के लिए जीवनदान दिया था। सरकार को वैमनस्य और असहिष्णुता के मुद्दे पर लालाजी और शास्त्रीजी का अनुकरण करना चाहिए। वैमनस्य और असहिष्णुता का समूल नाश करने के इस प्रयास में निश्चय ही देशवासियों का सहयोग और समर्थन मिलेगा। 
 
आज देश की आजादी के लिए बलिदान देने वाले देशप्रेमियों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित करने का दिन है। ऐसा करने के लिए स्वदेश और स्वराज से स्वभाविक प्रेम बेहद जरुरी है। इसके साथ ही वैमनस्य और असहिष्णुता दूर करने का सार्थक संकल्प भी लेना होगा। ऐसा सुनिश्चित कर ही समाज के अंतिम और मध्यम क्रम के लोगों को मजबूत किया जा सकता है। खैर! आज आम जनता और सरकार बखूूबी समझती है कि चुनी हुई सरकारें लालाजी जैसे अमर शहीदों का कर्मफल भोग रही हैं।
(स्वराज और स्वदेशी का मंत्र साधकर बहिष्कार को अमोघ अस्त्र बनाने  और सफलता अर्जित करने वाले लाल-बाल-पाल के लाल  को  जन्मदिन पर स्मरण कर रहे कौशल किशोर)
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