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ईवीएम पर छिड़ी रार

कौशल किशोर | Follow @HolyGanga
 
चुनाव आयोग ने दिल्ली के मुख्यमंत्री को वोटिंग मशीन हैक करने की चुनौती दी है। चुनौती और ललकार लगाने में अव्वल नेता को उन्हीं के अंदाज में यह चुनौती पहली बार मिली है। पर चुनाव आयोग की ईवीएम पर चुनौती नई कतई नहीं है। नगर निगम चुनाव में इसी मशीन के नाम पर खलबली मची है। दिल्ली के मुख्यमंत्री की बात नहीं मान कर चुनाव आयोग ने बैलट पेपर पर चुनाव कराने से इंकार कर दिया। उन्होंने तैयारियां पूरी होने तक के लिए इस चुनाव पर रोक लगाने को कहा था। हालांकि आईआईटी खड़गपुर से अभियांत्रिकी की पढ़ाई करने वाले अरविन्द केजरीवाल ने चुनौती स्वीकार नहीं किया। संभव है, उन्हें पता हो कि आयोग की यह चुनौती उनकी पहली ताजपोशी के बाद जारी उसी बयान के समान है, जिसमें उन्होंने बिना किसी तैयारी के दिल्ली की जनता का बिजली बिल माफ कर दिया था। उन्होंने ईवीएम की ईमानदारी पर सवाल उठाया है। मध्य प्रदेश के अटेर विधानसभा में हाल में हुए परीक्षण के दौरान ईवीएम ने भाजपा प्रत्याशी के पक्ष में गलत नतीजा देकर इस चर्चा को गरमाने की सामग्री उपलब्ध कराया है। केजरीवाल की ईमानदारी इस बात से भी जाहिर होती है कि चुनौती के जवाब में उन्होंने वीवीपीएटी युक्त ईवीएम से चुनाव कराने के विषय में आयोग को लिखा है। 
 
पिछले कई हफ्तों से इलेक्ट्राॅनिक वोटिंग मशीन सुर्खियों में है। 11 मार्च 2017 को आए विधानसभा चुनावों के नतीजों ने इन मशीनों को अचानक बहस का विषय बना दिया। चुनावों में हार का ठीकरा राजनेताओं ने इन्हीं मशीनों पर फोड़ना मुनासिब समझा था। बसपा सुप्रिमो मायावती, कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी, समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव और आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविन्द केजरीवाल ने एक साथ ईवीएम में गड़बड़ी की ओर इंगित किया। इन आरोपों से कुल इतनी ही बात साफ होती कि ईवीएम में हेराफेरी की संभावना है। इस संभावना के बूते चुनाव परिणामों को बदलने की आशा करने वाले नेता भविष्य में भी हार का सामना करेंगे। क्या यह विवाद अपनी कमियों को छिपाने की असफल कोशिश नहीं है? ईवीएम को दोषी ठहराने वाले इस सत्य को नकार रहे हैं कि इन दिनों भाजपा बेहतर रणनीति के साथ मैदान में उतर रही है। 
 
विधानसभा चुनावों में नोटबंदी से नाराज व्यापारी वर्ग भाजपा के खिलाफ मतदान करती है। परंतु मोदी, जेटली और शाह की टीम इसी नोटबंदी को गरीब जनता के हित में कालेधन के मालिकों को परेशान करने का मंत्र साबित करने में सफल होती है। गरीबों का विशाल जनसमूह भाजपा के पक्ष में मतदान करती है। तीन तलाक के मामले पर उन्होंने मुस्लिम महिलाओं की नजर में दूसरी पार्टियों के मुकाबले बेहतर मुकाम बनाया है। इस सोसल इंजीनियरिंग का मुकाबला किए बगैर बैलट पेपर की पैरोकारी करने से ईवीएम का दोष नहीं सिद्ध होता है। पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कहा, ‘अगर इवीएम में गड़बड़ी हुई होती तो मैं मुख्यमंत्री नहीं होता।’ इस बीच कांग्रेस नेता वीरप्पा मोइली ने पुराने दिनों की ओर नहीं लौटने की पैरवी करते हुए बैलेट पेपर पर चुनाव नहीं कराने की पैरोकारी किया है। इन तथ्यों ने साफ कर दिया कि कांग्रेस के नेताओं में इस मामले में कोई आम सहमति नहीं कायम हो सकी है।
 
इन मशीनों की दक्षता के साथ ही खूबियों को बखान करने वाला एक वर्ग वर्षों से सक्रिय है। ‘ईवीएम डेमोक्रेसी’ के पैरोकार इन्हीं के बूते लोकतांत्रिक देशों की सरकार चलाने की मंशा रखते हैं। करीब एक दशक से इस मामले पर कार्यरत गोविन्द यादव जैसे सामाजिक कार्यकर्ता और विधि विशेषज्ञ ‘ईवीएम डेमोक्रेसी’ को परिभाषित कर इसके विरोध में ‘वोट बचाओ-देश बचाओ’ अभियान शुरु करते हैं। मध्य प्रदेश के कई हिस्सों में इस मामले में गतिविधियां चलती रही है। वर्षों से उनकी शिकायत अनसुनी होती रही। बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने हितों को साधने के लिए ‘ईवीएम डेमोक्रेसी’ को प्रभावी तरीके से लागू करने में लगी है। इस अभियान के पैरोकार जापान और जर्मनी जैसे तकनीकी संपन्न लोकतांत्रिक देशों में स्वीकृत मतपत्र व्यवस्था की वकालत भी करते हैं। भाजपा के एक विद्वान प्रवक्ता ने साल 2010 में ‘डेमोक्रेसी एट रिस्क’ नामक एक किताब लिखी थी, जिसकी विषयवस्तु यही थी। लालकृष्ण आडवाणी ने इस पुस्तक की पैरवी किया और भाजपा के कई दिग्गज नेताओं ने इसमें वर्णित बातों का जिक्र कर ओजपूर्ण भाषण दिए। इस सैद्धान्तिक विमर्श के पक्ष-विपक्ष में कई राजनैतिक दलों से जुड़े लोग शामिल रहे हैं। इन सब के बावजूद पहले यह मामला कभी मुख्यधारा के बहस का हिस्सा नहीं हो सका था। अचानक एक दिन यह भारतीय राजनीति का सबसे मुखर सवाल बन जाता है। इस मामले की पृष्ठभूमि और वर्तमान परिदृष्य को समझना जरुरी है। 
 
बाहुबलियों के बूते मतपेटियों के लूट की कहानी को ईवीएम के इस्तेमाल ने रोक दिया। ऐसी युक्तियों को अपनाकर विधानभवन पहुंचने वाले माननीयों से लोकतंत्र को बचाना जरुरी है। और इसी धांधली को रोकने के लिए ईवीएम का उपयोग शुरु करने की बात कही गई। इस मामले में वी.पी. सिंह की सरकार ने जनवरी 1990 में तत्कालीन विधि मंत्री दिनेश गोस्वामी के नेतृत्व में 11 सदस्यीय चुनाव सुधार समिति बनाई थी। इस समिति की रिपोर्ट मई 1990 में संसद के पटल पर रखा गया, जिसमें ईवीएम के इस्तेमाल की बात कही गई है। परंतु ईवीएम का इस्तेमाल इस सिफारिश का नतीजा नहीं है। 1988 में राजीव गांधी की सरकार ने लोक प्रतिनिधित्व कानून 1951 की धारा 61 में संशोधन कर मतपत्रों के स्थान पर ईवीएम का उपयोग करने का कानून बनाया था। गोस्वामी समिति ने इस कानून की भूमिका बाद में लिखी। इस बीच एक अति आवश्यक प्रक्रिया छूट जाती है। ईवीएम के प्रामाणिकता की जांच नहीं की जाती है। आज केजरीवाल के सामने पेश की गई चुनौती में भी इस कमी को दूर करने का प्रयास नहीं किया गया है। ऐसा लगता है जैसे को तैसा नीति अपना कर चुनाव आयोग ने एक चाल चली, जिससे उनकी उस मांग को बल मिलता है, जिसके लिए लंबे समय से कोशिश जारी है।
EVM-VVPAT
1990 के दशक में तकनीकी का इस्तेमाल कर मतदान प्रक्रिया की धांधली को रोकने की कोशिश हुई। इसके साथ छेड़छाड़ की चुनौती भी तभी से है। चुनाव आयोग और राजनीतिक दलों के अतिरिक्त सर्वोच्च न्यायालय एक अर्से से ईवीएम मामले की सुनवाई में लगी है। इसी केस में ईवीएम को वीवीपीएटी नामक एक अन्य उपकरण से जोड़ने की बात आती है। इससे यह सुनिश्चित होगा कि मतदाता ने किस बटन को दबा कर मतदान किया। इसे वोटर वेरिफिएबल पेपर आॅडिट ट्रायल (वीवीपीएटी) कहा जाता है। गोवा में हुए हालिया विधानसभा चुनाव में पहली बार सभी सीटों पर यह सिस्टम इस्तेमाल में लाया गया है। इससे पहले 16वीं लोकसभा चुनाव में 8 प्रदेशों के 8 संसदीय क्षेत्रों में इन उपकरणों का इस्तेमाल किया गया था। चुनाव आयोग को सभी ईवीएम में यह सुविधा जोड़ने के लिए करीब 3600 करोड़ रुपये की जरुरत है। इसके अर्थशास्त्र को समझना बहुत मुश्किल नहीं है। मुख्य चुनाव आयुक्त ने इस विषय में कई बार केन्द्र सरकार को पत्र लिखा है। हाल ही में उन्होंने प्रधानमंत्री से सीधी गुहार कर धन उपलब्ध कराने का निवेदन किया है। आम आदमी पार्टी के नेता ने इस चुनाव में बैलट पेपर की मांग के बदले वीवीपीएटी युक्त मशीनों से चुनाव कराने के लिए लिखकर क्या संकेत दिया है? संभव है कि चुनाव आयोग दिल्ली नगर निगम चुनाव में पेपर आडिट ट्रायल सिस्टम युक्त मशीनों का इस्तेमाल कर एक तीर से कई निशाना साधने का काम करे। 
 
आज ‘वोट बचाओ-देश बचाओ अभियान’ एक जनान्दोलन में तब्दील होने में लगी है। चंडीगढ़ में हाल में हुए निकाय चुनाव में ईवीएम के छेड़छाड़ की घटना सामने आई, जिसमें स्ट्रांग रुम में घुसकर उम्मीदवारों के शुभचिंतकों ने चुनाव आयोग को निःशब्द चुनौती दी। इस विषय में प्रिंट और इलेक्ट्राॅनिक मीडिया में कई उम्मीदवारों की शिकायतें सुनाई देती है। फिर हजारों लोगों का हुजूम वोट बचाओ-देश बचाओ नारे के साथ सड़क पर उतरने को मजबूर हो जाता है। मध्य प्रदेश की आहट पंजाब में चिंगारी का रुप ले चुकी है। पंजाब के मुख्यमंत्री भले ही ईवीएम की पैरवी कर रहे हों, पर उनके समर्थन में माहौल बनाने वाले हजारों कार्यकर्ताओं ने ईवीएम से हुए छेड़छाड़ के सवाल को गंभीरता से लिया है। इन आंदोलनकारियों का मानना है कि भारत जैसी तीसरी दुनिया के देशों में माइक्रो-प्रोसेसर जैसे उपकरण विदेशों से आयात किये जाते हैं। यहां ईवीएम फिक्स कर सरकार बनाना असंभव नहीं है। क्या ऐसी दशा में देश की जनता यह मान लेगी कि एक ऐसा उपकरण जो मतदान की प्रिंट उपलब्ध कराती है वह बैलेट पेपर के बराबर होगी? कांग्रेस और आम आदमी पार्टी का रुख सामने है। क्या आज बैलट पेपर की मांग करने वाली सभी पार्टी वीवीपीएटी की आपूर्ति से संतोष कर लेगी? क्या इस बहस का अंत इसी प्रिंटेड स्लिप के नाम पर होना है? 
 
निश्चय ही ईवीएम के टेम्पर प्रूफ होने के दावे हैं। प्रमाण नहीं। सैद्धांतिक रुप से मतपत्रों पर अंकित निशान का मुकाबला कोई इलेक्ट्राॅनिक उपकरण नहीं कर सकता है। पर इस व्यवस्था से चुनाव आयोग को मतदान से लेकर मतगणना तक आसानी होती है। इस मामले में राजनीतिक दलों को आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठकर लोकतंत्र के हित में विचार करना चाहिए। यह देशहित और आम जनता की निष्ठा से जुड़ा मामला है। इस गंभीर समस्या की आड़ में हार के दंश से उबरने की कोशिश वैमनस्य की राजनीति ही मानी जाएगी।

हिमालय में महापंचायत की बैठक

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अलसुबह उड़ी में सेना के कैंप पर हमला हुआ। और उस दिन एक महापंचायत भी हिमालय में हुई। वास्तव में यह हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में पहले से तयशुदा एजेंडे पर विभिन्न प्रांतों की पंचायत से जुड़े सामाजिक-राजनैतिक लोगों की लंबी बैठक थी। देश में पंचायती राज संस्थानों की पैरोकार आल इंडिया पंचायत परिषद 1958 से इस तरह का अयोजन करती आ रही है। इसे महासमिति की बैठक या महापंचायत कहते हैं। यहां 73वें संविधान संशोधन और 14वें वित्त आयोग की सिफारिशों के अलावा कई अन्य महत्वपूर्ण मामला भी छाया रहा। एक ओर दहशतगर्दी की आग में जल रहे जम्मू-कश्मीर से पहुंचे पंचायत प्रतिनिधि की दबी आवाज सुनाई दी। तो उत्तर प्रदेश में पंचायत के स्तर पर योग्य लोगों को परिषद से जोड़ने की कवायद को देशभर में दुहराने की जरुरत पर चर्चा होती है। साथ ही यह महासमिति पंचायती राज संस्थानों को मजबूत बनाने के लिए एक व्यापक जन आंदोलन को खड़ा करने की कोशिश करती प्रतीत होती है।

दरअ़सल महापंचायत की इन बैठकों का असर आजादी के बाद के इतिहास में पंचायती राज संस्थानों के क्रियाकलापों के रुप में साफ दिखता है। स्वतंत्र भारत में स्वराज, पंचायती राज अथवा तीसरी सरकार (डेमोक्रेटिक डिसेंट्रलाइजेशन) के नाम पर जो कुछ भी हुआ, उसके पीछे जो शक्तियां रही, वही महापंचायत के कर्त्ता-धर्त्ता, पुरोधा और फाउडिंग फादर्स माने जाते हैं। इसमें सबसे भारी योगदान देने वालों ने तो अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया। स्वराज के इसी सपने को साकार करने के लिए आजादी से पहले लाला लाजपत राय, भगत सिंह और आजाद जैसे शहीद हुए तो स्वतंत्र भारत में मेहता, शास्त्री और जयप्रकाश जैसे विभूतियों का जीवनदान देखने को मिलता है। महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज के सपनों को पंख लगाने के लिए लोक नायक जयप्रकाश नारायण, गुजरात के दूसरे मुख्यमंत्री बलवंतराय मेहता और बिहार के तीसरे मुख्यमंत्री पंडित बिनोदानंद झा का योगदान अनुकरण के योग्य माना जाता है। उन्होंने ही पंचायतों की परिषद बनाई, जिसकी इससे पहले ऐसे 90 और बैठकों के रिकार्ड मिलते हैं। आज भी इनके प्रभावों को नकारना संभव नहीं है। 1957 की बलवंतराय मेहता कमिटी और फिर बीस साल बाद अशोक मेहता कमिटी की सिफारिशों के अभाव में क्या नब्बे के दशक में हुए 73वें संविधान संशोधन की चर्चा भी संभव थी? भारतीय राजनीति में हुए रिफार्म की इन ईबारतों को गढ़ने में महती भूमिका अदा करने वाली महासमिति भविष्य में क्या करने जा रही है? इसे समझना सरकार और नागरिक समाज के लिए आज बेहद जरुरी है। 

अभी बहुत वक्त नहीं बीता है। प्रधानमंत्री झारखंड में पंचायती राज दिवस मना रहे थे। उन दिनों ग्रामसभा और लोकसभा की तुलना होने लगी, तो ग्रामोदय से भारतोदय तक का सपना भी आकार-प्रकार लेने लगा। पिछले साल चौदहवें वित्त आयोग की सिफारिशों में डा. वाई.वी. रेड्डी ने पंचायतों को आवंटित किए जाने वाले बजट में अप्रत्याशित रुप से वृद्धि किया था। आज मोदी सरकार दो लाख दो सौ बिरानवे करोड़ की मोटी रकम पंचायतों के विकास के लिए सीधा मुहैया कराने को प्रतिबद्ध है। इन सब के बावजूद पंचायत परिषद से जुड़े लोग भाजपा से जुड़े स्वदेशी जागरण मंच और भारतीय किसान संघ जैसे अनुसांगिक संगठनों की तरह नाराजगी जाहिर कर रहे हैं। सरकार की लोकप्रियता को प्रभावित करने वाले मसलों में निश्चय ही यह भी अपनी अहमियत रखता है। यहां पहुंचे पंचायतों की राजनीति में सक्रिय प्रतिनिधियों की दिन भर चली चर्चा में मैंने चालीस के करीब विद्वानों की बातों पर गौर किया। उनका मतेक्य इस बात में था कि वित्त आयोग ने जिला परिषद को किनारे करने का काम कर पंचायती राज संस्थानों को कमजोर किया है। 

हिमाचल प्रदेश राज्य पंचायत परिषद की प्रमुख प्रेमलता ठाकुर वित्त आयोग के प्रभावी पंचवर्षी प्रावधानों की ओर इंगित कर बड़े तीखे सवाल उठाती हैं। उनकी नाराजगी ब्लॉक और जिला स्तर पर पंचायत प्रतिनिधियों को पूर्व में प्राप्त वित्तीय शक्तियों को कम करने के कारण है। सूचनाओं को आनलाइन करने के क्रम में होने वाली त्रुटियों से उपजने वाली समस्याओं से वंचित लोगों को कष्ट पहुंचता है। यह दूसरी जटिल समस्या है। इसके निराकरण के लिए कोई सार्थक प्रयास नहीं किया गया। यहां आनलाइन डाटा और आधार कार्ड के इस्तेमाल से लोगों को रिलीफ पहुंचाने के क्रम में होने वाली समस्याओं पर गंभीर मंथन चला। राजस्थान की चुनिंदा घटनाओं का हवाला भी दिया गया। विख्यात सामाजसेवी अरुणा राय और वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार ने बेवश और लाचार लोगों को आधार डाटा मिसमैच से होने वाली असुविधाओं पर विचार करने को प्रेरित किया है। यह एक ऐसी समस्या है, जिसे देखकर पंचायतों से जुड़े लोगों का छुब्ध होना लाजिमी है। इन्हीं तथ्यों का संज्ञान लेकर ग्रामसभा से जुड़े कुछ लोग अब तकनीकी और समस्या के बीच का समीकरण समझने में लगे हैं। उन्हें पता है कि कंप्युटर टेक्नोलोजी का इस्तेमाल कई जगह अच्छा है। पर इसके नुकसान भी हैं। यहां एक सवाल उठता है कि क्या सरकार तकनीकी का व्यापार करने का साधन मात्र बन कर रह गई है? या फिर सचमुुच अंतिम जन की सेवा के प्रयासों में होने वाले त्रुटियों से लोग रु-ब-रु हो रहे हैं। यदि तकनीकी लोगों के पास पहुंच कर उनकी सेवा करने में सक्षम बनाती है, तो निश्चय ही उसका इस्तेमाल होना चाहिए। पर यदि वही वंचित तबके की सेवा में बाधा बन रही हो, तो निश्चित तौर पर उस तकनीकी का विरोध होना चाहिए। इस विषय में सरकार को भारतीय परंपरा का अनुकरण करना चाहिए, जो सबसे पहले वंचितों और दिव्यांगों की सेवा सुनिश्चित करने की पैरवी करता है। अतिथि देवो भव और वसुधैव कुटुम्बकम की पैरवी करने वाले समाज में यह वंचितों को जीवन की आधारभूत जरुरतों से मरहूम होते हुए दिन-ब-दिन देखने का मामला है। 

नब्बे के दशक में राव सरकार के दौरान 73वां संविधान संशोधन किया गया था। तभी से इसे लागू करने की बातें चल रही हैं। पंचायतों की सूची में शामिल 29 विभागों की स्थिति पर केन्द्र सरकार का रुख सामने है। बीते पंचायती राज दिवस पर वैंकैया नायडू ने राज्यों से पैरवी की जरुरत को रेखांकित कर इसे एक बार फिर दुहराया था। सही मायनों में इन शक्तियों के अभाव में ग्राम स्वराज के स्वप्न का साकार होना आसान नहीं होगा। इस महापंचयत में परिषद ने सभी राज्यों में इस व्यवस्था को लागू कराने के लिए संघर्ष का रास्ता चुना है। आशा  के अनुरुप ही मैंने उनकी प्रतिति को यथार्थ में परिवर्तित करने से जुडे़ महत्वपूर्ण पहलुओं पर प्रकाश डाला था। इस क्रम में पिछले पांच सालों में हुए कुछ छोटे, मंझोले और बड़े कद-काठी के आंदोलनों का जिक्र जरुरी था। ऐसा करते हुए मैंने यह बताने का जतन किया कि किस तरह से इन आंदोलनों में सक्रिय लोगों का समर्थन और सहयोग हासिल किया जाय। और इससे ग्राम स्वराज का लक्ष्य अर्जित करने के प्रयासों को बल मिले। 

महासमिति गैरबराबरी को ग्रामीण और शहरी नामक दो किश्मों में विभाजित करती है। इस क्रम में कुपोषण और भूख से तड़पती जनता के दर्द का विश्लेषण होता है। साथ ही भोजन का अधिकार से लेकर काम के अधिकार तक की तमाम बातों पर चर्चा छिड़ती है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के तीन सौ से ज्यादा ग्राम पंचायतों के लिए नई मुहिम शुरु करने की बात भी उठती है। दिल्ली के ग्रामीण क्षेत्र का दुर्भाग्य है कि यहां 1983 से ही पंचायतों के चुनाव नहीं होते। परंतु पंचायतों को मिलने वाले बजट को खर्च करने के लिए विभाग बदस्तूर कायम है। अरविन्द केजरीवाल के मोहल्ला सभा के सामने पंचायत परिषद की मुहिम वास्तव में कैसी होगी? यह अभी नहीं कहा जा सकता है। पर इस मामले पर अब चर्चाएं लगातार होने लगी हैं। 

केन्द्र और राज्य की सरकारों को पंचायती राज प्रतिष्ठानों की समस्या दूर करने में सहयोग का रुख अख्तियार करने की जरुरत है। इस क्रम में उन्हें पंचायत प्रतिनिधियों के असंतोष को भी समझना होगा। आज वस्तुस्थिति ऐसी है कि जमीन पर पंचायती राज संस्थान और इनके प्रतिनिधि राज्य और केन्द्र की योजनाओं को लागू करने की एजेंसी के रुप में सिमटने को विवष हैं। इस महासभा के बाद हुए प्रेस वार्ता की आखिरी घोषणा मुझे साफ-साफ याद है। सभापति ने कहा था कि पंचायत परिषद कोई कांग्रेस पार्टी या किसी दूसरे पार्टी का नहीं है, इसमें हर पार्टी के लोग हैं। यही बात मेरे केविएट का सार था। और ऐसा कायम नहीं रहने की ददशा में गांधी, मेहता, शास्त्री, बिनोदानंद झा और लोक नायक के सपनों की एक साथ हत्या होगी। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51 में वर्णित दायित्वों का निर्वहण करने के लिए इस थाती को सहेजना बेहद आवश्यक है। यह कार्य सरकार, समाज और व्यक्ति विषेष के स्तर पर बेहतर तारतम्य स्थापित कर ही सुनिश्चित हो सकती है।

तीसरी सरकार बनाम पहली सरकार

कौशल किशोर | Follow @HolyGanga

balvantray_mehtaआज भारत-पाक युद्ध के दौरान शहीद हुए बलवन्त राय मेहता का 116वां जन्मदिन है। पाकिस्तानी सेना ने कश्मीर में घुसपैठ और कब्जे की नीयत से अप्रैल 1965 में ‘आॅपरेशन जिब्राल्टर’ शुरु किया था। बाद में यह भारत-पाकिस्तान युद्ध के रुप में परिणत हुआ। नतीजतन भारत को एशिया में शाक्तिशाली राष्ट्र होने का गौरव मिला। इसी महाभारत के दौरान एक पाकिस्तानी फाइटर जेट ने 19 सितम्बर को सिविलियन बीचक्राफ्ट को हवा में अवरुद्ध कर उड़ा दिया। इसमें मेहता दम्पति समेत कुल आठ लोगों की मौत हुई। इस घटना को पचास साल बीत चुके हैं। उनकी शहादत के चैथे दिन अमेरिका, तत्कालीन सोवियत संघ और संयुक्त राष्ट्र के दखल से सीजफायर की घोषणा हुई। एक बार फिर पाकिस्तान के साथ तनाव बढ़ रहा है। पठानकोट में हुए आतंकवादी हमला और डेविड कोलमेन हेडली (दाउद गिलानी) की गवाही से भारत को अस्थिर करने में पाकिस्तान की भूमिका का पर्दाफास होता है। सवालों की फेहरिस्त दिन-ब-दिन लंबी हो रही है। इसी बीच उपद्रवी तत्वों ने भारत की बरबादी और पाकिस्तान जिन्दाबाद के नारे भी लगाए हैं। शान्ति स्थापित करने की तमाम कोशिशों के बीच तनाव बढ़ाने वाली घटनाएं अनवरत हो रही हैं। ये सभी घटनाक्रम अच्छे दिनों का प्रतीक नहीं है। 
 
बलवन्त राय मेहता स्वतंत्र भारत में पंचायती राज के जनक माने जाते हैं। शहादत से ठीक दो साल पूर्व उन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री का पद संभाला था। इसके अतिरिक्त लोक सेवक मंडल और अखिल भारतीय पंचायत परिषद जैसी महत्वपूर्ण संस्थाओं के अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी बखूबी निभाते रहे। उनकी शहादत से सामाजिक समरसता कायम रखने में अहम भूमिका निभाने वाली इन संस्थाओं को बड़ा झटका लगा। उनके बाद लाल बहादूर शास्त्री ने लोक सेवक मंडल के अध्यक्ष का पद संभाला। ताशकंद समझौते के अगले ही दिन उनका असामयिक निधन तथाकथित हृदयाघात से हुआ। तो दूसरी ओर पंचायती राज और स्वराज का स्वदेशी सपना भी बिखरने लगा। बिहार राज्य की सुव्यवस्थित पंचायत परिषद को देखकर मेहताजी ने पंचायतों के राष्ट्रव्यापी संगठन की स्थापना का बीड़ा उठाया था। जिसे बाद में जय प्रकाश नारायण ने आगे अवश्य बढ़ाया। परंतु उनके बाद बिहार में ही दो दशकों से भी ज्यादा समय तक पंचायतों के चुनाव नहीं हुए। दूसरे प्रदेशों में भी पंचायतों की दशा ढुलमुल नीतियों का शिकार होती रही। जो अबतक बरकरार है।
 
गांधीवादी समाजसेवियों ने मेहताजी के जन्मदिन पर पंचायत दिवस मनाने की परंपरा शुरु किया। कई दशकों से यह आज भी बदस्तूर जारी है। परंतु मनमोहन सिंह सरकार ने इसके बदले 24 अप्रैल को राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस मनाना प्रारंभ किया। इस परिवर्तन से जुड़ी कड़ियां परत-दर-परत विकसित हुईं। इन्हीं परतों में पंचायतों का राष्ट्रीय संगठन अखिल भारतीय पंचायत परिषद दम तोड़ता प्रतीत होता है। इस क्रम में नेशनल हेराल्ड मामले जैसा हजारों करोड़ की पंचायती सम्पत्ति के हेड़ाफेरी का प्रयास भी सामने आता है। आज फिर इस विषय में मोदी सरकार का रुख आशा जगाती है। पूर्व भाजपा अध्यक्ष और केन्द्र सरकार में प्रभावशाली मंत्री नितिन गडकरी और राजनाथ सिंह ने तीसरी सरकार को मजबूत बनाने और पंचायत परिषद को पुनः जीवित करने का प्रयास आरंभ किया है। 
 
महात्मा गांधी हिन्द स्वराज की बात करते हैं। दीनदयाल उपाध्याय ने सत्ता के विकेन्द्रीकरण की पैरोकारी किया। वास्तव में दोनों विभूतियों ने आम जनता को शक्ति संपन्न बनाने की पूरजोर कोशिश किया था। परंतु राज्यों और केन्द्र की सरकारों का रुख हैरान करता है। इमरजेंसी के बाद से सरकारें इस मामले में प्रायः उदासीन बनी रही। संविधान के 73वें और 74वें संशोधन के माध्यम से इस कमी को पूरा करने का खोखला प्रयास अवश्य किया गया। केन्द्र, राज्य और समवर्ती सूची की तरह पंचायत सूची के अभाव में यह खोखलापन दूर हो, इसकी कोई संभावना दूर-दूर तक नहीं है। अन्ना आन्दोलन के छुपे रुस्तम सुरेश शर्मा और पंचायत परिषद के अध्यक्ष वाल्मीकि सिंह तीसरी सरकार को पहली सरकार मानते हैं। ग्राम पंचायत और नगर पंचायत से जुड़े मुद्दों पर सक्रिय जय हिन्द मंच ने पिछले महीने हरियाणा में हुए पंचायत चुनावों में 300 सीटों पर उम्मीदवार खड़े कर 241 सीटों पर जीत हासिल किया है। इन प्रयासों से उम्मीद जग सकती है। पर क्या व्यवस्था की कमियां सचमुच दूर होंगी? और क्या स्वराज का सपना साकार होगा? ऐसे कई बेहद जटिल प्रश्न हैं।  
 
आशा की किरणें कभी अस्त नहीं होती। पाकिस्तानी एयर फोर्स के पायलट कैज हुसैन ने बीचक्राफ्ट का मार्ग अवरुद्ध कर हत्याकांड को अंजाम दिया था। उस समय वह आदेश का पालन कर रहे थे। रिटायरमेंट के बाद करीब पांच साल पहले हुसैन ने बीचक्राफ्ट के शहीद पायलट जहांगीर इंजीनियर की बेटी फरीदा सिंह को ई-मेल भेजकर शोक प्रकट किया। इससे नागरिक और सरकार के बीच का फासला उजागर होता है। यह लोकतंत्र की कामयाबी का सूचक नहीं है। पिछली बार राजग सरकार ने नई दिल्ली और लाहौर के बीच यात्रा सेवा शुरु किया और कारगिल की लड़ाई भी लड़ी। आज फिर विरोधाभाषों के बीच संकट गहरा रहा है। निश्चय ही यह भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं है। आशा की किरणों को तलाशना होगा।
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लाला लाजपत राय के 151वें जन्मदिन पर

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Lala Lajpatrai
Lalaji
आज भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के अमर शहीद लाला लाजपत राय के जन्म को 151 साल पूरे हो रहे हैं। अंग्रेजी तारीख के अनुसार इसी दिन उनका जन्म ढुडीके नामक गांव में हुआ था। बीते कई दशकों से पंजाब के इस छोटे से गांव का मौसम इस अवसर पर एकदम बदल जाता है। यहां इन दिनों अच्छी चहल-पहल रहती है। आठ-दस दिनों तक मेला लगा रहता, जिसमें सभी भेद-भाव भूल कर लाखों लोग शामिल होते हैं। यहां बड़ी संख्या में लोगों के भाग लेने का सिलसिला पिछले पचास सालों में उत्तरोत्तर बढ़ा है। कभी इसे मजबूती प्रदान करने का निर्णय तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादूर शास्त्री ने लिया था। लालाजी को प्यार करने वाले पंजाबी समाज में ही सीमित नहीं हैं। देश के दूसरे हिस्सों में आज भी ऐसे अनेक संगठन सक्रिय हैं, जिन्हें आजादी के आन्दोलन में उनके बलिदान का महत्व बखूबी पता है। लालाजी की कर्मभूमि लाहौर थी, जो विभाजन के कारण पाकिस्तान का हिस्सा है। वहां भी लालाजी को याद करने वाले कम नहीं हैं। 
 
लालाजी स्वतंत्र भारत के निर्माताओं में सबसे अगली पंक्ति के महानायक हैं। गांधीजी ने उन्हें एक संस्थान माना है। अगर आप उन्हे संस्थानों का समूह कहते हैं तो भी कोई अतिशयोक्ति नहीं। आर्य समाज का संविधान गढ़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले रायबहादूर मूलराज का मानना था कि उस दौर में लालाजी की अपील के बगैर पंजाब नेशनल बैंक की स्थापना संभव ही नहीं था। उन्होंने लालाजी को इसके लिए राजी करने में तीन साल इंतजार किया। पता नहीं एलआईसी के लिए काम करने वाले कितने लोग इस तथ्य से वाकिफ हैं कि लालाजी द्वारा स्थापित लक्ष्मी इंश्योरेंश कंपनी उनकी मातृ संस्थानों में से एक है। उन्होंने आॅल इंडिया ट्रेड युनियन कांग्रेस की स्थापना किया और वर्ल्ड ट्रेड युनियन की सभा में भारत का प्रतिनिधित्व भी किया। लाहौर में आर्य-समाज ने महर्षि के प्रति जीवंत स्मारक बनाने का प्रस्ताव रखा था। यह सपना ‘दयानंद एंग्लो वैदिक’ शिक्षण संस्थान के रुप में प्रस्फुटित हुआ। लालाजी इसके संस्थापकों में बेहद मजबूत कड़ी साबित हुए। असहयोग आन्दोलन में विद्यार्थियों की भूमिका के मुद्दे पर लाला हंसराज और लालाजी के बीच मतभेद पनपा। नतीजतन लालाजी डीएवी स्कूल छोड़ कर चले गए। इसके बाद उन्होंने तिलक स्कूल को बढ़ावा देने में दिलचस्पी लेना शुरु किया, जो बाद में लोक सेवकों की नवीन परंपरा के रुप में विकसित हुआ। यहीं उन्होंने आजादी और उसके बाद के भारत का नवनिर्माण करने के लिए राजनेताओं और लोकसेवकों की नई पीढ़ी तैयार किया। इस क्रम में राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन, बलवंतराय मेहता और लाल बहादूर शास्त्री जैसे राजनेताओं ने उनके सपनों का भारत बनाने के लिए सहर्ष अपना जीवन अर्पित किया। देश की सेवा के लिए समर्पित इन महापुरुषों के अतिरिक्त भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु जैसे नाम भी लालजी से जुड़े हैं। कभी-कभी सत्य के लिए मरना आसान होता है और सत्य के साथ सतत जीना बेहद मुश्किल। लोकसेवा के क्षेत्र में लोकमान्य विकसित करने वाली संस्थान की जरुरत आज पहले से कहीं अधिक है। परंतु उनके द्वारा शुरु किए गए राजनीति के तिलक स्कूल का इक्कसवीं सदी में कोई नामलेवा तक नहीं है। 
 
लालाजी द्वारा स्थापित संस्थानों की लंबी फेहरिस्त है। प्रायः इन सभी स्थानों पर उत्साह के साथ उनका जन्म-दिवस मनाया जाता है। इसमें वैश्य समूहों के अतिरिक्त दूसरे समाजसेवी संगठनों की भी सक्रियता दिखती है। हालांकि इनमें से कई लोग ऐसे अवसरों को रिवाज मात्र मानकर निभाते हैं। फिर भी यह सच है कि आज लाखों लोग उनको बड़े प्रेम से याद करते हैं। पिछले साल लालाजी के 150वें साल के महोत्सव से जुड़कर मैंने इसके विभिन्न पहलुओं को करीब से समझने का प्रयास किया। उनके सपनों को साकार करने का बीड़ा उन लोगों व समूहों ने उठाया है, जिनका उनके परिवार अथवा संस्थानों से कोई नाता-रिश्ता नहीं है। ऐसे तीन प्रयास अतुलनीय हैं। लालाजी ने स्कूल आॅफ स्टेट्समैनशिप की जरुरत को महसूस किया था। मानव अभ्युदय संस्थान में इसकी परिकल्पना के साथ ‘अपने देश की बात’ शुरु हुई। जय हिन्द मंच के अध्यक्ष सुरेश शर्मा ने लालाजी से प्रेरणा लेकर चार सौ से ज्यादा शहीदों का सम्मान किया है। लालाजी को प्रवासी मानने वाले महेश कांत पाठक और अविनाश कुमार सिंह जैसे सामाजिक कार्यकर्ताओं ने दिल्ली और पंजाब के विभिन्न हिस्सों में रहने वाले प्रवासियों के बीच स्वदेशी, स्वराज और स्वाबलंबन के सूत्र को परिभाषित करने का बीड़ा उठाया है। 
 
वास्तव में लालाजी के व्यक्तित्व का जादू दो ध्रुवों के बीच का समीकरण साधने में दृष्टिगोचर होता है। कांग्रेस और आर्य समाज को आजादी का आन्दोलन बनाने में उनकी महती भूमिका है। आज उनकी शहादत के बाद आठ दशक से ज्यादा वक्त गुजर चुका है। लाल-बाल-पाल के युग को एक सदी होने को आया। ऐसी दशा में नई पीढ़ी के लोग पूछ सकते हैं कि आज लालाजी क्यों प्रासंगिक हैं? वर्तमान परिप्रेक्ष्य में भारतीय गणतंत्र के समक्ष कई बड़ी चुनौतियां मुंह बाए खड़ी हैं। सामाजिक-आर्थिक पैमाने पर विषमता में अनवरत अभिवृद्धि हो रही है। वैमनस्य की राजनीति नए दौर का पागलपन साबित हो रहा है। और असहिष्णुता का विस्तार देश के हर कोने तक फैल गया है। इस विषय में आगे बढ़ने से पहले स्वतंत्र भारत के निर्माताओं के सपनों पर भी एक बार गौर करना चाहिए। लाल-बाल-पाल की त्रिमूर्ति को स्वदेशी और स्वराज के मुद्दे पर राष्ट्रव्यापी बहिष्कार का सूत्रपात करने के कारण जाना गया। निश्चय  ही बाल गंगाधर तिलक, श्री अरविन्द और विपिन चंद्र पाल लालाजी के अभिन्न मित्र थे। इनके अलावा उनके बेहद करीबी मित्रों में महामना मदनमोहन मालवीय प्रमुख हैं। हिन्दू महासभा और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की पैरवी के क्रम में उन्होंने धर्म को राजनीति से दूर रखने की वकालत किया था। ऐसे सभी तथ्यों को ध्यान में रखकर महामना और लालाजी को प्रो. विपिन चंद्रा जैसे सेक्युलर इतिहासकारों ने भी उदार सांप्रदायिक कहा है। 
 
आज देश के एक बड़े हिस्से में शीतलहर बनाम असहिष्णुता की लहर साफ दिखती है। उत्तर भारत में इखलाक मियां की हत्या और दक्षिण भारत में शोध छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या जैसे मामले वैमनस्य और असहिष्णुता के नए प्रतीक बनकर उभरे हैं। इन हादसों से जुड़े घटनाक्रम और हालात सब कुछ साफ-साफ बयां करता है। ऐसे घटनाक्रम भारतीय लोकतंत्र पर कलंक का धब्बा है। हाशिये पर खड़े लोगों को असहाय और मजबूर साबित करना जनतंत्र की मजबूती नहीं, बल्कि लोकतंत्र के लिए संकट काल का सूचक होता है। ऐसी दशा में लालाजी कितने प्रासंगिक हैं? इसका उत्तर उपराष्ट्रपति डाॅ हामिद अंसारी देते हैं। समाज में व्याप्त असहिष्णुता के सम्बन्ध में चर्चा करते हुए उन्होंने 1923 के सांप्रदायिक सौहार्द के लिए जारी किए गए सौ विशिष्ट लोगों की अपील का जिक्र किया। गौर करने की बात है कि इस सूची में लालाजी पहले स्थान पर सटीक और कारगर योजना के साथ हैं। उन्होंने सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने वाले समुदाय के नेताओं का ही शांति और सौहार्द कायम करने के लिए आह्वान किया था। यह उदारता सचमुच बेमिशाल है।
 
सांप्रदायिक शक्तियों के ध्रुवीकरण का दुष्परिणाम देश को ही भुगतना होता है। सरकार रोहित को याकूब मेमन की फांसी के विरुद्ध हुए प्रदर्शन से जोड़कर राष्ट्रद्रोही करार देती है। तो विपक्ष को दलित विमर्ष का नया प्रसंग शुरु करने के लिए एक नौजवान के बलिदान की जरुरत थी। क्या याकूब मेमन और नाथूराम गोडसे जैसे लोगों के मुद्दे पर चर्चा करना कोई राष्ट्रद्रोह का कर्म है? ऐसा कहना निहायत ही अवैज्ञानिक है। यह कुतर्कों पर आधारित मनगढ़ंत बात है। ऐसी विचारधारा भविष्य में विज्ञान और तत्वज्ञान के क्षेत्र में मौलिकता का शत्रु ही साबित होगा। सात महीने से छात्रवृत्ति बन्द करने के प्रश्न पर सरकार क्यों मौन है? क्या भविष्य के कार्ल सेगान की हत्या के लिए ऐसा करना जरुरी था? क्या यह मानवीय सृजनशीलता और कल्पनाशक्ति के उड़ान को रोकने का प्रयास नहीं है? यहां देश के भविष्य और उच्च शिक्षा से जुड़ी चुनौतियां दलित विरोधी मुहिम में उलझकर रह गई हैं। यह प्रयास किसी सकारात्मक राजनीति का हिस्सा नहीं हो सकता है। और न ही इससे समाज का कोई हित होने वाला है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रवर्तकों को भी इस तरह के घृणित कृत्यों का कोई विशेष लाभ नहीं मिलने वाला है। फिर भी इस विषय में कोई सकारात्मक पहल नहीं हो रही है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है।
 
मोदीजी के ख्यालों में बराबर देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादूर शास्त्री होते हैं। 1964 में शास्त्रीजी कैरो से लौटते वक्त अचानक कराची में उतरते हैं। उस दिन पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति अय्यूब खान तमाम प्रोटोकाॅल भूल कर उनकी आगवानी करने पहुंचे थे। हाल ही में मोदीजी ने अचानक लाहौर में उतरने का फैसला किया। उन्होंने अपने पाकिस्तानी समकक्ष को जन्मदिन की मुबारकबाद देने का बहाना अच्छा ढ़ूंढ़ लिया था। लालाजी को आदर्श मानने वाले शास्त्रीजी ने देश के लिए जीवनदान दिया था। सरकार को वैमनस्य और असहिष्णुता के मुद्दे पर लालाजी और शास्त्रीजी का अनुकरण करना चाहिए। वैमनस्य और असहिष्णुता का समूल नाश करने के इस प्रयास में निश्चय ही देशवासियों का सहयोग और समर्थन मिलेगा। 
 
आज देश की आजादी के लिए बलिदान देने वाले देशप्रेमियों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित करने का दिन है। ऐसा करने के लिए स्वदेश और स्वराज से स्वभाविक प्रेम बेहद जरुरी है। इसके साथ ही वैमनस्य और असहिष्णुता दूर करने का सार्थक संकल्प भी लेना होगा। ऐसा सुनिश्चित कर ही समाज के अंतिम और मध्यम क्रम के लोगों को मजबूत किया जा सकता है। खैर! आज आम जनता और सरकार बखूूबी समझती है कि चुनी हुई सरकारें लालाजी जैसे अमर शहीदों का कर्मफल भोग रही हैं।
(स्वराज और स्वदेशी का मंत्र साधकर बहिष्कार को अमोघ अस्त्र बनाने  और सफलता अर्जित करने वाले लाल-बाल-पाल के लाल  को  जन्मदिन पर स्मरण कर रहे कौशल किशोर)
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Pahal a Milestone

 

Jallikattu: Sport of Bull-Taming or Question of Cruelty to Bulls

Kaushal Kishore (Follow @HolyGanga)

Issue: Thousands of people sustained injuries and tens of incidents of death are in the reports in last five years, but still there is a special significance of events like Jallikattu

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Jallikattu: Pic. Credit: The Hindu

The Supreme Court of India has passed an interim order to ban the event of Jallikattu in Tamil Nadu. The game of bull taming will be impossible in case this interim order remains in effect. Sharp criticism and a series of protest began to emerge immediately after the order was passed. Certain regional political parties of Tamil Nadu such as DMK, MDMK and PMK began to put pressure on the government of state and centre respectively. P. Radhakrishnan, the Loksabha M.P. elected from Kanyakumari constituency and MoS for Shipping in Modi Govt. stand in support of the protesting groups. Jayalalithaa, the Chief Minister of the state, wrote a letter to the central government in a hurry. She has firmly repeated the request to issue an ordinance to that effect in this matter immediately. After all these set of events this case turns into a very hot political issue. Consequently a fresh war between the government and the judiciary is facing each other. All the powerful forces of Tamil Nadu appear to be united on this issue. As thus this is an important case in the beginning of this year, and time will tell the fate of it.

The common citizen of India obviously respects the decisions of the judiciary, but the response of public in this case is outrageous. Today, the members of local societies and those who are active in politics are visible on the roads during the protest. The trend of strike, blockade and protest intensified in certain districts like Madurai, Alangnallur, Palamedu, Avnipurm, etc. After all, what is the reason that people took to the streets immediately after that interim order? Isn’t it necessary to look into the issues that the south Indian people oppose today? Whether the govt. of India is going to respect views of Tamilian leaders in order to issue the new ordinance? The organisers of Jallikattu have made elaborate arrangements everywhere—in villages, towns and cities, for this traditional sporting event. The Supreme Court has decided to cancel the game on the name of preventing violence and cruelty to animals. After this interim order the next hearing of the case has been fixed for March 15. It is also clear here that the approach of the court and intent of the central and state governments are not consistent with each other. Ministry of Environment and Forest of the Govt. of India issued a notification on last seventh January. This notification amended the previous regulation imposed in July 2011, and lifted the ban on the display of trained bulls in certain traditional sports such as bullock cart race and Jallikattu. The Animal Welfare Board of India, PETA and certain other organizations joined together to challenge the government in the court. There is a noticeable fact that the case listed for the division bench headed by the Chief Justice T.S. Thakur has been actually heard in the court headed by Justice Dipak Misra and N.V. Ramana, because Justice R. Bhanumati, who is a member of that bench, refused to hear the same. The reports in the media on this topic have not discussed its reasons. There must be some plausible reason behind doing so for Justice Bhanumati, who has started her career from the Higher Judicial Service of the Tamil Nadu cadre. God knows, when this mystery will be solved, but it is evidently clear that the issue at stake alarms the reputation of the judiciary.

There is a special importance to certain games associated with the conservation of gauvansh (cattle of the cow family) in the Tamilian society that is largely dependent on agriculture and animal husbandry. The new harvest festival is celebrated in almost every part of India since prehistoric times in the beginning of the year. In different regions, it has various names such as Makar Sankranti, Lohri, Pongal, etc. The regional characteristics are also evidently clear along with these festivals. The festival of Pongal is celebrated in the Tamil Nadu, as a four-day long series of festivities. There is a special feature for each day of celebration that reflects from their names as well i.e. Bhogi Pongal, Thai Pongal, Mattu Pongal and Kannum Pongal. The third day is dedicated to Pashupati Nath that is another name of Lord Shiva. According to the Tamil belief Mattu is the bull of Lord Shiva. This day of celebration is dedicated to animals due to their usefulness in the field of agriculture. The sporting event like Jallikattu is one of its significant parts. The bulls for this purpose are given special trainings. Such trained bulls are known as Jallikat or Jallikattu.

In fact, the festival associated with the performance of strongest progeny of the cow family is a result of long and time consuming preparations. This is a centre of extremely important cultural activities, and also a cause of gatherings that is organized in different villages of Tamil Nadu rest of the year. Almost every village temple has its own Jallikattu; the feelings of most of the villagers are associated with such cattle. The game—to subdue the healthy and strong bull—is certainly difficult and dangerous. The reports of injuries to more than a thousand people and death of 18 people in the last five years are before our eyes. But still there is an extraordinary importance of events like Jallikattu in the protection of animals of native breed, especially the native cow progeny that can produce A2 milk. This fact cannot be denied in any case. The use of machines increased in modern farming. The result of that is in front of us. The utility of bullock is an affair of the gone by days. The farmers, the natural herd of cattle in India, are competing today to sell oxen and bulls to the butcher. The sport like Jallikattu is one of the very limited remaining resources in order to protect the native breed of cows. One more question arises during this process. Whether this effort to prevent the cruelty towards the bulls won’t prove to be an attempt that can wipe out this creature from its roots? In fact, this is the question that provoked the Tamil people to such an extent that they accepted to commit contempt of the court. The people familiar with the Tamil society knows about it.

The observation of facts mentioned in the interim order revealed the unequaled sensitivity of the Supreme Court towards the silent animals. If the sensitivity of the court on the issue of cruelty and violence towards the animals and birds moves a few steps further in the right direction that might lead the dead-body-eaters to resort to a kind of natural reaction. By the way, it is clear in the light of the urgency of Jallikattu and hubble-bubble of the traditional festival that the compliance of this order will be extremely difficult for the administrative authorities. However, a large segment of the society still believes that the govt. will surely bring some sort of solution, because Jallikattu is an ancient traditional practice, which has been continued for centuries.

(Kaushal Kishore is the author of The Holy Ganga)

Jallikattu-Jagran

जल्लीकट्टू और पशुओं के प्रति क्रूरता का प्रश्न 

कौशल किशोर (Follow @HolyGanga)
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Jallikattu (Pic. Credit: The Hindu)
मुद्दाः पिछले पांच सालों में इसमें हजारों लोगों के घायल होने और दर्जन मौत की खबरें सामने हैं, परंतु जल्लीकट्टू जैसे आयोजनों का एक विशेष महत्व है
सर्वोच्च न्यायालय ने तमिलनाडु में होने वाले जल्लीकट्टू के आयोजन पर रोक लगा दी है। इस अंतरिम आदेश के प्रभावी रहने की दशा में इस साल बैलों के खेल का आयोजन नहीं हो सकेगा। इस आदेश के तत्काल बाद ही विरोध का तीव्र स्वर भी उभरने लगा है। द्रमुक, एमडीएमके और पीएमके जैसी तमिलनाडु की क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टियों ने राज्य और केन्द्र की सरकार पर दबाव बनाना शुरु कर दिया है। कन्याकुमारी लोकसभा सीट से चुने गए भाजपा सांसद और मोदी सरकार में जहाजरानी राज्यमंत्री पी. राधाकृष्णन प्रदर्शनकारियों के समर्थन में खड़े हैं। प्रदेश की मुख्यमंत्री जयललिता ने भी आनन-फानन में केन्द्र सरकार को पत्र लिखकर इस मामले में तत्काल अध्यादेश जारी करने के अनुरोध को मजबूती से दोहराया है। इससे यह बेहद गरम राजनैतिक मुद्दे में तब्दील हो चुका है। इसके बाद एक बार फिर सरकार और न्यायपालिका के बीच की जंग आमने-सामने है। तमिलनाडु की तमाम बड़ी शक्तियां इस मामले में एकजुट होती दिखाई दे रही हैं। इस साल के आरंभ में यह एक अहम मसला है, जिसका हश्र समय ही बताएगा।
भारत की आम जनता स्वाभाविक तौर पर न्यायपालिका के निर्णय का सम्मान करती है, पर इस मामले में जनता की प्रतिक्रिया चौंकाने वाली है। आज स्थानीय समाज और राजनीति में सक्रिय लोगों का विरोध सड़क पर दिख रहा है। मदुरै, आलंगनाल्लूर, पालामेडु, अवनीपुरम, आदि जिलों में हड़ताल, चक्का जाम और प्रदर्शन का सिलसिला तेज हो गया है। आखिर क्या वजह है कि इस आदेश के तत्काल बाद लोग सड़कों पर उतर आए? क्या आज दक्षिण भारत में विरोध करने वाले लोगों की बातों पर ध्यान देने की जरुरत नहीं है? क्या सचमुच केन्द्र सरकार तमिल नेताओं की बात मानकर नया अध्यादेश जारी करेगी? जल्लीकट्टू के आयोजकों ने गांवों, कस्बों और नगरों में जगह-जगह इस खेल के आयोजन की विस्तृत व्यवस्था कर रखी है। ऐसी दशा में पशुओं के प्रति क्रूरता और हिंसा को रोकने के नाम पर उच्चतम न्यायालय ने इस खेल को रद करने का निर्णय लिया है। इस अंतरिम आदेश के बाद अगली सुनवाई के लिए 15 मार्च का दिन निर्धारित किया गया है। यहां इतना तो साफ है कि न्यायालय का रुख केन्द्र और राज्य सरकार की मंशा के अनुरुप बिल्कुल नहीं है। भारत सरकार के पर्यावरण और वन मंत्रालय द्वारा बीते सात जनवरी को एक अधिसूचना जारी की गई थी। इसमें जुलाई 2011 के नियमों में संशोधन कर जल्लीकट्टू और बैलगाड़ी दौड़ जैसे पारंपरिक खेलों में प्रशिक्षित सांड़ के प्रदर्शन पर लगा प्रतिबन्ध हटा लिया गया। इस पर भारतीय पशु कल्याण बोर्ड, पेटा और दूसरे संगठनों ने मिलकर सुप्रीम कोर्ट में सरकार को चुनौती दी। गौर करने की बात है कि मुख्य न्यायाधीश टी.एस. ठाकुर की अध्यक्षता वाली अदालत में सूचीबद्ध इस केस की सुनवाई न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा और एन.वी. रमना की पीठ में हुई, क्योंकि उस पीठ से जुड़ी जस्टिस आर. भानुमति ने इस मामले से स्वयं को अलग कर लिया था। इस विषय में आई मीडिया रिपोर्ट में इसके कारणों पर कोई चर्चा नहीं हुई है। निश्चय ही तमिलनाडु उच्च न्यायिक सेवा से करियर की शुरुआत करने वाली जस्टिस भानुमति के लिए ऐसा करने के पीछे कोई युक्तिसंगत कारण रहा होगा। पता नहीं इस रहस्य से पर्दा कब उठता है, पर यह तो स्पष्ट हो गया है कि इस मामले में न्यायपालिका की प्रतिष्ठा दांव पर लगी हुई है।
कृषि और पशुपालन पर आश्रित तमिल समाज में गौवंश की रक्षा से जुड़े खेलों का विशेष महत्व है। भारत के प्रायः सभी हिस्सों में साल की शुरुआत में नवान्न का त्योहार प्रागैतिहासिक काल से मनाया जाता रहा है। मकर संक्रान्ति, लोहरी, पोंगल जैसे विभिन्न क्षेत्रों में इसके भिन्न-भिन्न नाम हैं। साथ ही इन पर्व-त्योहारों पर क्षेत्र विशेष की छाप भी साफ दिखाई देती है। तमिलनाडु में पोंगल चार दिनों के विशेष महोत्सव के रुप में मनाया जाता है। प्रत्येक दिन के आयोजन की खास विशेषताएं हैं, जो भोगी पोंगल, थाई पोंगल, मट्टू पोंगल और कन्नम पोंगल जैसे इसके विभिन्न नामों से भी परिलक्षित होता है। तीसरे दिन का आयोजन पशुपति नाथ अर्थात् भगवान शिव को समर्पित है। तमिल मान्याताओं के अनुसार मट्टू भगवान शंकर का बैल है। इस दिन का उत्सव कृषि कार्यों में काम आने के कारण पशुओं को समर्पित है। इसका एक अहम हिस्सा जल्लीकट्टू जैसे खेल का आयोजन है। इस खेल के लिए बैल को विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है। ऐसे प्रशिक्षित सांड़ को जल्लीकट या जल्लीकट्टू कहते हैं।
वास्तव में गोवंश के सबसे मजबूत प्राणी के प्रदर्शन से जुड़ा यह पर्व लंबी तैयारियों का नतीजा है। यह बेहद महत्वपूर्ण सांस्कृतिक गतिविधियों का केन्द्र है। इस कारण तमिलनाडु के अलग-अलग गांवों में साल भर मेले लगते हैं। प्रायः हर गांव के देवालय की अपनी जल्लीकट्टू होती है, जिसके साथ सभी की संवेदना जुड़ी होती है। तंदुरुस्त और मजबूत सांड़ को वश में करने का यह खेल निश्चय ही मुश्किल और खतरनाक है। पिछले पांच सालों में इसमें हजार से ज्यादा लोगों के घायल होने और करीब डेढ़ दर्जन लोगों की मौत की खबरें हमारे सामने हैं, परंतु देशी नस्ल के पशुओं, विशेषकर गोवंश के संरक्षण में जल्लीकट्टू जैसे आयोजनों का विशेष महत्व है। इसे किसी भी सूरत में नकारा नहीं जा सकता है। आधुनिक कृषि में मशीनों का प्रयोग बढ़ा है। इसका नतीजा सामने है। बैलों की उपयोगिता खत्म हो चुकी है। पशुपालक किसान आज बैलों को कसाईयों के हाथ बेचने की होड़ में लगे हैं। ऐसी दशा में जल्लीकट्टू जैसे खेल गौवंश रक्षा के अत्यंत सीमित बचे साधनों में अतिमहत्वपूर्ण है। इस क्रम में एक प्रश्न यह भी खड़ा होता है कि क्या गौवंश के प्रति क्रूरता रोकने का यह मामला भविष्य में उनके समूल नाश का कारण नहीं साबित होगा। असल में यही वह प्रश्न है, जिसे विचार कर तमिल जनता न्यायालय की अवमानना करने पर आमादा है। तमिल समाज को जानने वाले लोग इस बात को समझते हैं।
इस अंतरिम आदेश में वर्णित तथ्यों के अवलोकन से मूक पशुओं के प्रति उच्चतम न्यायालय की अप्रतिम संवेदनशीलता उजागर होती है। जीव-जन्तुओं के प्रति क्रूरता और हिंसा रोकने के मामले में न्यायालय की यह संवेदनाशीलता अगर सही दिशा में कुछ कदम और आगे की ओर अग्रसर हो तो मृतप्राणी भक्षकों का असहज होना कोई अस्वभाविक प्रतिक्रिया नहीं होगी। बहरहाल जल्लीकट्टू की तात्कालिकता और पारंपरिक त्योहारों की गहमा-गहमी को ध्यान में रखने से यह तो स्पष्ट ही है कि प्रशासनिक अधिकारियों के लिए इस आदेश का अनुपालन सुनिश्चित करना बेहद मुश्किल चुनौतियों का सामना कर ही संभव हो सकेगा। हालांकि समाज के एक बड़े वर्ग का विश्वास अभी भी इस बात पर है कि सरकार की तरफ से उन्हें कुछ न कुछ राहत अवश्य मिलेगी, क्योंकि यह एक प्राचीन परंपरा है जो सदियों से चली आ रही है।
-लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं-
Jallikattu-Jagran
Jallikattu in Jagran

jalli
Editorial in Swaraj Khabar

Challenges to Sustainable Development

Kaushal Kishore SDG(Follow @HolyGanga)

Sustainable Development Goals have been implemented in India and other 192 countries of the United Nations on January 1, 2016 in order to remove poverty and hunger. This is a resolution to end poverty in all its forms everywhere, which will eliminate poverty and hunger together, and it will further overcome certain serious problems like social and economic inequality. The accomplishment of these goals is bursting with a number of challenges. Today the deep chasm of social and economic inequality has been clearly visible in the modern era of growth-centered development vision, where a handful of wealthy people in every nook and corner of the globe live a luxurious life taking advantage of the latest facilities, on the other hand nearly 800 million people around the world are marginalized, who are undernourished. The member states of the United Nations have shown commitment to curb this menace of inequality. It aims to meet the goals by the end of 2030. It may prove to be an effective initiative in the context of social justice. This is an important and ambitious campaign for certain developing countries like India, where millions of people are deprived of two meals a day almost after seven decades of independence. It has been posing extremely complex challenges before the government and society for a long time.

Last year, upon completion of seventy years United Nations organized the summit in New York during September 25 to 27. Prime Minister Narendra Modi also addressed this summit. The global community unanimously agreed on 17 goals and 169 targets at the very same summit. This was the result of over two years of intensive public consultation and engagement with civil society and other stakeholders around the world that paid particular attention to the voices of the poorest and most vulnerable. These goals and targets are envisaging a world free of poverty, hunger, disease and want. This is the mantra that might assimilate the possibility of prosperity—where all life can thrive. The Sustainable Development Goals (SDG) are focused on five fundamental things: people, planet, prosperity, peace and partnership. All major issues pertaining to education, gender equality and climate change are included in them. In addition to that this declaration claims to envisage a world free of fear and violence, but in the next 15 years whether this dream will come true? This is an extremely complex question. The main points of Sustainable Development Goals are as follows:

  • End poverty in all its forms everywhere by the end of 2030. These days 1 in every 5 people in developing countries are living on the daily earning of less than 1.25 dollars a day.
  • End hunger, achieve food security, improved nutrition and promote sustainable agriculture.
  • Eliminate all forms of malnutrition, while increasing the income of food producers two times.
  • Ensure healthy lives and promote well being for all at all ages. Save the lives of newborn and other children under 5 years whose death can be possibly prevented.
  • To eradicate AIDS, tuberculosis, malaria, etc. and to control hepatitis and other infectious diseases.
  • To minimize the accidental deaths that occurs globally on roads to its half. Reducing the illnesses and number of deaths caused by hazardous chemicals, and pollution of air, soil, water, etc.
  • Achieve gender equality and empower all women and girls. To stop completely child marriage, forced marriage, female feticide. Ensure the end of all forms of child labor.
  • Ensure availability and sustainable management of water and sanitation for all (Restriction on the propensity of defecation in open).
  • Take urgent action to combat climate change and its impacts.

 The history of fight against poverty in India is time-consuming and complicated. The status of poverty in most of the other republics in the Third World is not exactly unusual. The member countries of the United Nations have worked hard on ‘Millennium Development Goals’ for last 15 years. In the year 2000, they have agreed upon eight goals and issued the declaration to overcome extreme poverty and hunger. But they failed to accomplish that on the ground exactly. Therefore these goals have been included in the SDGs. Today, nearly two hundred million people in India alone are malnourished. The problems of malnutrition among children and non-availability of adequate foodstuff are continued for many years here. Madhya Pradesh and Bihar have done significant progress in this direction in the last decade. The issue of malnutrition among children was assigned to the Anganbadi. This programme has been running for a long time on the aid of the World Bank. The budget allocation for this programme, from 2000 to 2013, has risen drastically—1000 crores to 20,000 crores. Later the World Bank observed it as a failure, and its outcome is here, in the 2015-16 budget, it has been reduced by more than half. The information on the involvement of global institutions in Indian administrative system and governance is fewer in the public domain. This is unfortunate in the modern age of right to information. The possibility of solving the problem of poverty and hunger while this serious issue remains continued is rare. To increase the public awareness on all topics related to governance and public administration is a must in this regard. It is all the more needed now, because of the new problem of pollution that is so serious. The global temperature is rising unprecedentedly at every level due to increasing pollution, and the problems emerging on account of that is making it more difficult to achieve the goals and targets of the sustainable development.

People in need are also deprived of a dignified life. The saint like Nanak spend the money, received from his father for business, to feed the monks considering it as a duty. Today, the followers of the tradition of Guru Nanak are still serving millions of people while feeding them free of cost. There are many such traditional institutions in the country. There is a Dharma in India to give food and water to the hungry and thirsty respectively (Bhukhe ko bhojan aur pyase ko pani). But still the facts and figures present the report of hunger and misery. According to the UNDP report, nearly 190 million Indians are compelled to sleep hungry. This failure is a result of lack of political and administrative will; in addition to that the indifferent attitude of the elite is also clearly visible. Last month, the French economist Thomas Piketty advised Indian elites to learn from the history, while visiting India to take part in the literary festival. This suggestion clearly indicates the indifference of the elites in order to remove the prevailing disparity. He has candidly advocated for tax increase on this class. Widespread public participation is required to achieve such an ambitious goal associated with social problem. The probability of failure in the future will continue on account of its absence. Let no one sleep hungry. A number of organisations are working on this mission over the years in the country. Many such volunteering groups have done remarkable works in the past that cannot be ignored.

Recently, under the aegis of the Human Advancement Institute, several social activists and a bunch of organizations came together to overcome discrimination and economic inequality and formed Bharatiya Nyay Manch (Indian Forum for Social Justice). From the rostrum of this Manch, the pundit of economics Roshanlal Agarwal has raised burning issues. He is leaving the issue of poverty line behind in order to draw a new line to fix the limit of wealth, and by doing so he seems to expand the ideas of Thomas Piketty. The issue of determining the limit of wealth instead of drawing poverty line has been already raised in the gone by decades. Our policy makers need to realize that the way of social justice might be paved only after removing inequality and hunger. The fight against poverty can be handled victoriously only if the close coordination between government and civil society is ensured. Everyone needs to show enthusiasm to achieve the aims and objects of sustainable development goals.