अविरलता बिन गंगा निर्मल नहीं 

कौशल किशोर | Follow @HolyGanga

नर्मदा, गंगा और यमुना जैसी पुरानी नदियां भारतीय उपमहाद्वीप की जीवनरेखा है। बहुसंख्य समाज इन्हें पवित्र मानकर पूजती है। साथ ही यह भी सच है कि इनकी शुद्धता पर ही सवाल है। चिपको आंदोलन के प्रवर्तक और गांधीवादी पर्यावरणविद सुन्दर लाल बहुगुणा ने वर्षों पहले यह मामला उठाया था। आज यह सवाल रह रह कर बराबर उठ रहा है। गंगा एक्सन प्लान की शुरुआत से पहले ही उच्चतम न्यायालय में इसकी शुद्धता का मामला पहुंच चुका था। ढ़ाईतीन सालों तक यह उत्तराखंड उच्च न्यायालय के न्यायमूर्तियों की परेशानी का सबब बना रहा। फिर जस्टिस राजीव शर्मा और आलोक सिंह की अदालत ने बीते 20 मार्च को मोहम्मद सलीम की याचिका पर सुनावाई करते हुए गंगा रिवर सिस्टम को कानूनी रुप से जीवंत मानने का आदेश जारी किया। पिछले हफ्ते सर्वाेच्च न्यायालय ने इस मामले में स्थगनादेश जारी किया है। इस तरह 108 दिनों तक गंगा और यमुना के संदर्भ में दृष्टिकोण बदलने की कानूनी बाध्यता रही।

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प्रधानमंत्री ने बनारस से लोकसभा चुनाव लड़ते हुए गंगा के प्रति अपना भाव जाहिर किया था। फिर उन्होंने नमामि गंगे कार्यक्रम का सूत्रपात किया। अपने ही अंदाज में अमरकंटक की यात्रा कर उन्होंने नमामि देवि नर्मदे अभियान को भी गति प्रदान किया है। इस बीच बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार गंगा के मामले में खासे चिंतित दिखते हैं। उन्होंने कहा है कि अविरलता के बिना गंगा की निर्मलता संभव नहीं है। इससे स्पष्ट होता है कि नदियों के संदर्भ में वस्तुतः अवरिलता और निर्मलता समानार्थी शब्द हैं निश्चय ही उन्होंने एक बड़ी रेखा खींचा है। भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में यह एक साहसिक पहल माना जाएगा। पिछले सत्तर सालों में किसी सरकार ने अविरलता की बात कहने का साहस नहीं किया। इसलिए यह एक दिलचस्प ऐतिहासिक मोड़ है।

पटना में बिहार सरकार ने फरवरी के आखिरी हफ्ते में बातचीत का सिलसिला शुरु किया था। गंगा के सवाल पर यह एक इंटरनेशनल कांफ्रेंस थी। कुछ समय पहले चीनी विद्वान हू शीसेंग ने पड़ोस में ऐसी ही एक पंचायत हिमालय के सवाल पर आयोजित किया था। फिर नीतीश कुमार अपनी बात को विस्तार देने दलबल के साथ दिल्ली पहुंचते हैं। इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में दो दिनों तक चर्चा चलती रही। पर्यावरण वैज्ञानिक से संन्यासी हुए स्वामी सानंद (जीडी अग्रवाल) उनके साथ खड़े थे। गाद की समस्या पर बात करने वाले विद्वानों की बात समाप्त होने पर जल संसाधन विभाग के प्रमुख सचिव ने दस सूत्रीय दिल्ली घोषणापत्र भी जारी किया। इस पंचायत में उन्होंने गंगा की धाराओं पर खड़े अभियांत्रिकी के हैरतअंगेज कारनामों के कारण बिहार में पनपी गाद और भूक्षरण की समस्या से निजात पाने का सपना देखा है। इस क्रम में बताते हैं कि सूबे की सरकार ने इसी मद में पिछले पांच सालों में एक हजार करोड़ से ज्यादा धनराशि खर्च किया है। साथ ही माधव चितले समिति की रिपोर्ट का जिक्र करते हैं। वास्तव में फरक्का बराज से नदी बेढ़ब हो जाती है। इससे बिहार में भारी अपव्यय होता है। आज अविरलता का मामला उठाने का मूल आधार यही है। इस अवसर पर राज्य के जल संसाधन मंत्री ने केन्द्र से संवाद में होने वाली चूक का जिक्र किया था। केन्द्र और राज्य की सरकारों के बीच संवादहीनता दूर होनी चाहिए। इस तरह की त्रुटियों और गतिरोधों से उपजी चुनौतियों का जिक्र न्यायालय के आदेशों में भी है।

आज नमामि गंगे में हो रही तरक्की का विरोध बनारस के घाटों पर मल्लाह कर रहे हैं। स्थानीय नाविकों और गंगाभक्तों ने पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए प्रस्तावित तैरने वाली जेटी का जोरदार विरोध किया है। यह उनकी जीविका ही नहीं बल्कि अविरलता से जुड़ा मामला है। गंगा की अविरलता पर चल रही चर्चा का इतिहास 170 साल पुराना है। महामना मदन मोहन मालवीय इस आंदोलन के महानायक माने जाते हैं। उन्नीसवीं सदी के मध्य हिन्दू समाज में गंगा की अविरलता का सवाल जोर-शोर से उठने लगा था। उस युग में भारतीय समाज नदियों पर बनने वाले पुल का भी विरोध करता था। इस लिहाज से बनारसी मल्लाहों की पारंपरिक समझ अब तक भी नष्ट नहीं हुई। इन्हीं रहस्यों को समझने चारपांच सालों बाद मैंने फिर काशी का रुख किया था।

पहले विश्व युद्ध के कालखंड में महामना ने इसे एक जनांदोलन का रुप दिया। उनके साथ देश की जनता और रियासती सरकारें अंग्रेजों के विरुद्ध एकजुट खड़ी थीं। आज अपना मतलब खो चुका भागीरथबिन्दू नाम से 1916 में छोड़ा गया अविरल प्रवाह उनके सफलता की कहानी कहती है। उन्होंने अंतिम क्षणों में गंगा को बांधने के विषय में चेताया भी था। फिरंगी सरकार सिंचाई के नाम पर नदियों का दोहन करती रही और बाद की सरकारों ने शोषण करने में भी कसर बाकी नहीं रखा। अस्सी के दशक से ही सरकार और न्यायालय लगातार इसमें सक्रियता दिखा रही है। इन प्रयासों को देखकर एक देशी कहावत समझ में आती है, लेने गई पूत और खो आई खसम। यह कैसा दुर्भाग्य है कि आजाद भारत में लोग गंगाराइट्स से वंचित हो गए।

लाखों साल पुरानी गंगा का जल हमेशा इस कदर दूषित नहीं रहा। साठ के दशक तक यह जल पीने के लिए प्रयोग किया जाता था। समाज ने शुद्धता सहेजने के लिए तमाम तरह की परंपराएं रचीं। त्याग और बलिदान की उसी परिपाटी ने इनकी पवित्रता को बरकरार रखा। स्वामी सानंद एक दशक से गंगा के अविरलता की मांग कर रहे हैं। करीब तीन साल पहले बनारस में शहीद हुए बाबा नागनाथ छः सालों तक इसी बात पर अनशनरत रहे। 2011 की जून का दूसरा सोमवार गंगापुत्र निगमानंद की शहादत के नाम है। इस बलिदान से देश द्रवित हो उठा था। आज बिहार में अविरलता की बात उठी है। इस बीच आधा युग बीत गया। क्या नीतीशजी सचमुच गंगा मुक्ति की मांग करने वाले आंदोलनकारियों की जमात में शामिल हो रहे हैं? उनके साथ खड़े सत्याग्रहियों को देख कर वाकई यह वहम हो सकता है।

बिहार सरकार की दो बातों पर गौर करने से स्थिति साफ होती है। घोषणापत्र में इस कवायद का मकसद केन्द्र सरकार की गंगा से जुड़ी परियोजनाओं को गति देना बताया गया है। मुख्यमंत्री ने नपेतुले शब्दों में साफ कहा कि फरक्का बराज तोड़ने की पैरवी करने नहीं, बल्कि गंगा की अविरलता सुनिश्चित करने आए हैं। यहां विरोधाभाषी बातों के बीच एक ऐसी कल्पना है, जिसमें अविरलता कृत्रिम निर्माणों को तोड़े बगैर ही संभव हो। एक दृष्टांत युरोप पेश करता है। करीब चार दशक पहले पर्यावरण से जुड़ी ऐसी समस्या सामने आई। ग्रेट ब्रिटेन में कोयला संचालित विद्युत उत्पादन केन्द्रों से होने वाले प्रदूषण के कारण नाॅर्वे और पश्चिमी जर्मनी के जंगल और झील तबाह हो रहे थे। इसके लिए हर्जाने की मांग उठी। ब्रिटीश सरकार लंबे समय तक पल्ला झाड़ती रही। पर्यावरण विशेषज्ञों के बीच उनकी खूब किरकिरी होती रही। अंत में उन्हें कई बीलियन पाउंड खर्च कर नुकसान की भरपाई करना पड़ा। बिहार सरकार का पहला काम अपव्यय के लिए जिम्मेदार दोषियों को चिन्हित कर उन्हें भरपाई के लिए बाध्य करना चाहिए। साथ ही उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि बिहार में सत्तर के दशक में गंगा की लहरों पर आग की लपट देखा गया था। उस वक्त जय प्रकाश नारायण के कुछ शिष्यों ने इसे उठाया था। आज अविरलता के लिए अनिल प्रकाश जैसे गांधीजन वहीं जनांदोलन में लगे हैं।

वास्तव में गंगा की अविरलता सुनिश्चित करने के लिए कृत्रिम निर्माणों को ध्वस्त करना ही पर्याप्त नहीं है। इस विषय में वयोवृद्ध बहुगुणा साफसाफ कहते हैं कि इसके लिए हिमालय का भू उपयोग परिवर्तित करना होगा। इस दीर्घकालिक योजना पर सरकारों ने विचार ही नहीं किया। कभी हिमालय चैड़ी पत्तियों वाले वृक्षों से भरा सघन और सदाबहार वन था। अंग्रेजों ने व्यापारिक हितों को साधने हेतु हिमालय की नैसर्गिक वनस्पतियों को नष्ट करने की योजना बनाई। आज इसका परिणाम प्रत्यक्ष है। चैड़ी पत्तियों वाले ओक (बांझ) के बदले नुकीली पत्तियों वाले पाइन (चीर) के पेड़ यत्रतत्र खड़े हैं। स्थानीय लोग इसी वजह से बारबार भूक्षरण की समस्या का सामना करते हैं। इसके बावजूद भी हिमालय की पथरीली भूमि के अनुकुल कोई प्रभावी योजना अब तक नहीं बन सकी है।  

गंगा की अविरलता का मामला समूचे उपमहाद्वीप को प्रभावित करता है। यह बड़ा काम बड़े मन से ही संभव है। इस लक्ष्य को साधने के लिए नीतीश कुमार को दलीय राजनीति के दलदल से ऊपर उठ कर महामना होने की जरुरत है। उन्हें पहले अपने सर्मथकों को इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए तैयार करना होगा। किसी भी सूरत में ऐसा सभी के सहयोग से ही संभव है। यह केन्द्र और दूसरे राज्यों से जुड़ा मामला है। हिमालयन माॅनसून को प्रभावित करने वाले दक्षिण एशिया के दूसरे देशों और विश्व बैंक जैसे महाजनों से भी बारीकी से जुड़ा है। सभी को परस्पर सहयोग के लिए राजी करने की मुश्किल चुनौती सामने है। आज यदि गंगा की अविरलता का सपना देखते हैं तो इसे पूरा होने में भी कई दशक लगेंगे। यद्यपि इस विषय में सक्रिय विशेषज्ञों का नेतृत्व राजेन्द्र सिंह कर रहे हैं, तथापि अनुपम मिश्र और अरुण कुमारपानीबाबा जैसे गांधीवादी पर्यावरणविदों की बातें परिचर्चा से बाहर है। तैरने में कभी सक्षम रहे समाज को आज डूबने से बचने के लिए उनकी तरकीबों को सीखने और समझने की जरुरत है। ऐसी दशा में यह असाधरण भूल मानी जा सकती है। साथ ही इन समस्याओं का वास्तविक समाधान बीसवीं सदी के आॅस्ट्रियन वैज्ञानिक विक्टर शाॅबर्गर की चेतना से युक्त होकर ही संभव है।

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ईवीएम पर छिड़ी रार

कौशल किशोर | Follow @HolyGanga
 
चुनाव आयोग ने दिल्ली के मुख्यमंत्री को वोटिंग मशीन हैक करने की चुनौती दी है। चुनौती और ललकार लगाने में अव्वल नेता को उन्हीं के अंदाज में यह चुनौती पहली बार मिली है। पर चुनाव आयोग की ईवीएम पर चुनौती नई कतई नहीं है। नगर निगम चुनाव में इसी मशीन के नाम पर खलबली मची है। दिल्ली के मुख्यमंत्री की बात नहीं मान कर चुनाव आयोग ने बैलट पेपर पर चुनाव कराने से इंकार कर दिया। उन्होंने तैयारियां पूरी होने तक के लिए इस चुनाव पर रोक लगाने को कहा था। हालांकि आईआईटी खड़गपुर से अभियांत्रिकी की पढ़ाई करने वाले अरविन्द केजरीवाल ने चुनौती स्वीकार नहीं किया। संभव है, उन्हें पता हो कि आयोग की यह चुनौती उनकी पहली ताजपोशी के बाद जारी उसी बयान के समान है, जिसमें उन्होंने बिना किसी तैयारी के दिल्ली की जनता का बिजली बिल माफ कर दिया था। उन्होंने ईवीएम की ईमानदारी पर सवाल उठाया है। मध्य प्रदेश के अटेर विधानसभा में हाल में हुए परीक्षण के दौरान ईवीएम ने भाजपा प्रत्याशी के पक्ष में गलत नतीजा देकर इस चर्चा को गरमाने की सामग्री उपलब्ध कराया है। केजरीवाल की ईमानदारी इस बात से भी जाहिर होती है कि चुनौती के जवाब में उन्होंने वीवीपीएटी युक्त ईवीएम से चुनाव कराने के विषय में आयोग को लिखा है। 
 
पिछले कई हफ्तों से इलेक्ट्राॅनिक वोटिंग मशीन सुर्खियों में है। 11 मार्च 2017 को आए विधानसभा चुनावों के नतीजों ने इन मशीनों को अचानक बहस का विषय बना दिया। चुनावों में हार का ठीकरा राजनेताओं ने इन्हीं मशीनों पर फोड़ना मुनासिब समझा था। बसपा सुप्रिमो मायावती, कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी, समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव और आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविन्द केजरीवाल ने एक साथ ईवीएम में गड़बड़ी की ओर इंगित किया। इन आरोपों से कुल इतनी ही बात साफ होती कि ईवीएम में हेराफेरी की संभावना है। इस संभावना के बूते चुनाव परिणामों को बदलने की आशा करने वाले नेता भविष्य में भी हार का सामना करेंगे। क्या यह विवाद अपनी कमियों को छिपाने की असफल कोशिश नहीं है? ईवीएम को दोषी ठहराने वाले इस सत्य को नकार रहे हैं कि इन दिनों भाजपा बेहतर रणनीति के साथ मैदान में उतर रही है। 
 
विधानसभा चुनावों में नोटबंदी से नाराज व्यापारी वर्ग भाजपा के खिलाफ मतदान करती है। परंतु मोदी, जेटली और शाह की टीम इसी नोटबंदी को गरीब जनता के हित में कालेधन के मालिकों को परेशान करने का मंत्र साबित करने में सफल होती है। गरीबों का विशाल जनसमूह भाजपा के पक्ष में मतदान करती है। तीन तलाक के मामले पर उन्होंने मुस्लिम महिलाओं की नजर में दूसरी पार्टियों के मुकाबले बेहतर मुकाम बनाया है। इस सोसल इंजीनियरिंग का मुकाबला किए बगैर बैलट पेपर की पैरोकारी करने से ईवीएम का दोष नहीं सिद्ध होता है। पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कहा, ‘अगर इवीएम में गड़बड़ी हुई होती तो मैं मुख्यमंत्री नहीं होता।’ इस बीच कांग्रेस नेता वीरप्पा मोइली ने पुराने दिनों की ओर नहीं लौटने की पैरवी करते हुए बैलेट पेपर पर चुनाव नहीं कराने की पैरोकारी किया है। इन तथ्यों ने साफ कर दिया कि कांग्रेस के नेताओं में इस मामले में कोई आम सहमति नहीं कायम हो सकी है।
 
इन मशीनों की दक्षता के साथ ही खूबियों को बखान करने वाला एक वर्ग वर्षों से सक्रिय है। ‘ईवीएम डेमोक्रेसी’ के पैरोकार इन्हीं के बूते लोकतांत्रिक देशों की सरकार चलाने की मंशा रखते हैं। करीब एक दशक से इस मामले पर कार्यरत गोविन्द यादव जैसे सामाजिक कार्यकर्ता और विधि विशेषज्ञ ‘ईवीएम डेमोक्रेसी’ को परिभाषित कर इसके विरोध में ‘वोट बचाओ-देश बचाओ’ अभियान शुरु करते हैं। मध्य प्रदेश के कई हिस्सों में इस मामले में गतिविधियां चलती रही है। वर्षों से उनकी शिकायत अनसुनी होती रही। बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने हितों को साधने के लिए ‘ईवीएम डेमोक्रेसी’ को प्रभावी तरीके से लागू करने में लगी है। इस अभियान के पैरोकार जापान और जर्मनी जैसे तकनीकी संपन्न लोकतांत्रिक देशों में स्वीकृत मतपत्र व्यवस्था की वकालत भी करते हैं। भाजपा के एक विद्वान प्रवक्ता ने साल 2010 में ‘डेमोक्रेसी एट रिस्क’ नामक एक किताब लिखी थी, जिसकी विषयवस्तु यही थी। लालकृष्ण आडवाणी ने इस पुस्तक की पैरवी किया और भाजपा के कई दिग्गज नेताओं ने इसमें वर्णित बातों का जिक्र कर ओजपूर्ण भाषण दिए। इस सैद्धान्तिक विमर्श के पक्ष-विपक्ष में कई राजनैतिक दलों से जुड़े लोग शामिल रहे हैं। इन सब के बावजूद पहले यह मामला कभी मुख्यधारा के बहस का हिस्सा नहीं हो सका था। अचानक एक दिन यह भारतीय राजनीति का सबसे मुखर सवाल बन जाता है। इस मामले की पृष्ठभूमि और वर्तमान परिदृष्य को समझना जरुरी है। 
 
बाहुबलियों के बूते मतपेटियों के लूट की कहानी को ईवीएम के इस्तेमाल ने रोक दिया। ऐसी युक्तियों को अपनाकर विधानभवन पहुंचने वाले माननीयों से लोकतंत्र को बचाना जरुरी है। और इसी धांधली को रोकने के लिए ईवीएम का उपयोग शुरु करने की बात कही गई। इस मामले में वी.पी. सिंह की सरकार ने जनवरी 1990 में तत्कालीन विधि मंत्री दिनेश गोस्वामी के नेतृत्व में 11 सदस्यीय चुनाव सुधार समिति बनाई थी। इस समिति की रिपोर्ट मई 1990 में संसद के पटल पर रखा गया, जिसमें ईवीएम के इस्तेमाल की बात कही गई है। परंतु ईवीएम का इस्तेमाल इस सिफारिश का नतीजा नहीं है। 1988 में राजीव गांधी की सरकार ने लोक प्रतिनिधित्व कानून 1951 की धारा 61 में संशोधन कर मतपत्रों के स्थान पर ईवीएम का उपयोग करने का कानून बनाया था। गोस्वामी समिति ने इस कानून की भूमिका बाद में लिखी। इस बीच एक अति आवश्यक प्रक्रिया छूट जाती है। ईवीएम के प्रामाणिकता की जांच नहीं की जाती है। आज केजरीवाल के सामने पेश की गई चुनौती में भी इस कमी को दूर करने का प्रयास नहीं किया गया है। ऐसा लगता है जैसे को तैसा नीति अपना कर चुनाव आयोग ने एक चाल चली, जिससे उनकी उस मांग को बल मिलता है, जिसके लिए लंबे समय से कोशिश जारी है।
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1990 के दशक में तकनीकी का इस्तेमाल कर मतदान प्रक्रिया की धांधली को रोकने की कोशिश हुई। इसके साथ छेड़छाड़ की चुनौती भी तभी से है। चुनाव आयोग और राजनीतिक दलों के अतिरिक्त सर्वोच्च न्यायालय एक अर्से से ईवीएम मामले की सुनवाई में लगी है। इसी केस में ईवीएम को वीवीपीएटी नामक एक अन्य उपकरण से जोड़ने की बात आती है। इससे यह सुनिश्चित होगा कि मतदाता ने किस बटन को दबा कर मतदान किया। इसे वोटर वेरिफिएबल पेपर आॅडिट ट्रायल (वीवीपीएटी) कहा जाता है। गोवा में हुए हालिया विधानसभा चुनाव में पहली बार सभी सीटों पर यह सिस्टम इस्तेमाल में लाया गया है। इससे पहले 16वीं लोकसभा चुनाव में 8 प्रदेशों के 8 संसदीय क्षेत्रों में इन उपकरणों का इस्तेमाल किया गया था। चुनाव आयोग को सभी ईवीएम में यह सुविधा जोड़ने के लिए करीब 3600 करोड़ रुपये की जरुरत है। इसके अर्थशास्त्र को समझना बहुत मुश्किल नहीं है। मुख्य चुनाव आयुक्त ने इस विषय में कई बार केन्द्र सरकार को पत्र लिखा है। हाल ही में उन्होंने प्रधानमंत्री से सीधी गुहार कर धन उपलब्ध कराने का निवेदन किया है। आम आदमी पार्टी के नेता ने इस चुनाव में बैलट पेपर की मांग के बदले वीवीपीएटी युक्त मशीनों से चुनाव कराने के लिए लिखकर क्या संकेत दिया है? संभव है कि चुनाव आयोग दिल्ली नगर निगम चुनाव में पेपर आडिट ट्रायल सिस्टम युक्त मशीनों का इस्तेमाल कर एक तीर से कई निशाना साधने का काम करे। 
 
आज ‘वोट बचाओ-देश बचाओ अभियान’ एक जनान्दोलन में तब्दील होने में लगी है। चंडीगढ़ में हाल में हुए निकाय चुनाव में ईवीएम के छेड़छाड़ की घटना सामने आई, जिसमें स्ट्रांग रुम में घुसकर उम्मीदवारों के शुभचिंतकों ने चुनाव आयोग को निःशब्द चुनौती दी। इस विषय में प्रिंट और इलेक्ट्राॅनिक मीडिया में कई उम्मीदवारों की शिकायतें सुनाई देती है। फिर हजारों लोगों का हुजूम वोट बचाओ-देश बचाओ नारे के साथ सड़क पर उतरने को मजबूर हो जाता है। मध्य प्रदेश की आहट पंजाब में चिंगारी का रुप ले चुकी है। पंजाब के मुख्यमंत्री भले ही ईवीएम की पैरवी कर रहे हों, पर उनके समर्थन में माहौल बनाने वाले हजारों कार्यकर्ताओं ने ईवीएम से हुए छेड़छाड़ के सवाल को गंभीरता से लिया है। इन आंदोलनकारियों का मानना है कि भारत जैसी तीसरी दुनिया के देशों में माइक्रो-प्रोसेसर जैसे उपकरण विदेशों से आयात किये जाते हैं। यहां ईवीएम फिक्स कर सरकार बनाना असंभव नहीं है। क्या ऐसी दशा में देश की जनता यह मान लेगी कि एक ऐसा उपकरण जो मतदान की प्रिंट उपलब्ध कराती है वह बैलेट पेपर के बराबर होगी? कांग्रेस और आम आदमी पार्टी का रुख सामने है। क्या आज बैलट पेपर की मांग करने वाली सभी पार्टी वीवीपीएटी की आपूर्ति से संतोष कर लेगी? क्या इस बहस का अंत इसी प्रिंटेड स्लिप के नाम पर होना है? 
 
निश्चय ही ईवीएम के टेम्पर प्रूफ होने के दावे हैं। प्रमाण नहीं। सैद्धांतिक रुप से मतपत्रों पर अंकित निशान का मुकाबला कोई इलेक्ट्राॅनिक उपकरण नहीं कर सकता है। पर इस व्यवस्था से चुनाव आयोग को मतदान से लेकर मतगणना तक आसानी होती है। इस मामले में राजनीतिक दलों को आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठकर लोकतंत्र के हित में विचार करना चाहिए। यह देशहित और आम जनता की निष्ठा से जुड़ा मामला है। इस गंभीर समस्या की आड़ में हार के दंश से उबरने की कोशिश वैमनस्य की राजनीति ही मानी जाएगी।

Dialogue Series in Panchayat Parishad

Dialogue Series in Panchayat Parishad

Kaushal Kishore | Follow @HolyGanga

All India Panchayat Parishad (AIPP) was founded in 1958 with an objective to strengthen Panchayati Raj institutions. The establishment of pan India network of Panchayati Raj institutions was one of the most sought after dreams of its founding fathers in that decade. Training and research on socio-political issues is one of the key functions of this autonomous society that reflects from its publications since later phase of 1950s. Lok Nayak Jayprakash Narayan and certain other likeminded leaders played crucial role to found Balwantray Mehta Panchayati Raj Foundation and Memorial Fund, hereinafter referred as BMPRF. In fact, this is a trust that came into existence as a consequence of the AIPP resolution after a serious consultation that prolonged for a couple of days during 18th and 19th May 1966. The main objective of this foundation is to perpetuate the memory of the founding father of the three-tier panchayati raj in Independent India by propagating and strengthening the cause for which he stood, namely, development and fulfilment of the ideas and objectives of democratic decentralisation or Swaraj.aipp108.jpg

These two institutions are working for upliftment of rural and urban societies for many decades along with the state units of the Parishad. Bihar Rajya Panchayat Parishad (BRPP) is the mother institution of this group of institutions that was founded by Pt. Binodanand Jha in 1950. BRPP General Secretary Dr. Lal Singh Tyagi has started publication of Panchayat Sandesh (Hindi), a monthly journal focused on decentralisation of democracy in 1955. After a couple of years this periodical got registered in Press Information Bureau vide registration number 3599/1957. All India Panchayat Parishad started its monthly publication from New Delhi in English and Hindi separately in 1960 itself. One can obtain RNI records (32376/77 & 32377/77) on the name of our current editor Shri Sahdev Chaudhary, in addition to them, Shri Prakash Herur has started Karnataka Panchayat Sandesh from Dharwad in Kannada only a few years ago. As such the subject of democratic decentralisation is covered in three different languages every month. These days I am serving publication division of AIPP and BMPRF, as the managing editor of above said journals on decentralisation of democracy.DSC_0002

Before proceeding further I think it pertinent to mention a couple of records from the previous issues of Panchayat Sandesh. Kindly refer to the AIPP annual report by Shriram Tiwari as published in August 1988 on page 14-16. He gives a clear picture of training program that describes the national award ceremony that was initiated in 1985-86 with the sponsorship of Gujarat govt. The April 1992 issue of Panchayat Sandesh was specially focused on training of youth associated with Panchayati Raj institutions. The report on 10 days training program at Kishore Sadan, Haidargarh, Barabanki, UP was published on page 3-10 in that issue. A copy of these reports is attached herewith for ready reference.img_20160522_161336

My senior colleague Shri Shitala Shankar Vijai Mishra is the Trustee Secretary of BMPRF and Secretary General of AIPP for certain years. He has been seriously working to build a network of qualified workers comprising teachers, writers, researchers and field organisers according to the spirit of clauses mentioned in functions of the trust. Last year he has delightfully persuaded me to start a voluntary program to train and educate people in society or public life. I’ve heard the similar voices from various other corners, meanwhile, one of his subordinates wrote a letter so as to formerly engage myself for this noble cause. As such I’ve been assigned the convener to start dialogue series and training program pertaining to decentralisation of democracy in modern times. The year round auspicious occasions of anniversaries of our founding fathers and crusaders for great causes turns out to be more valuable with brainstorming sessions focused on relevance of their life and works in present scenario. The staff members from Panchayat Sandesh office and volunteers from various walks of life helped me to organise a series of sessions on different subjects between 19th Feb. 2016 and 19th Feb. 2017. The frequency of such events is not less than 50 times an year that may extend to 100 sessions or more in a particular year.dsc_0254

As you know the birth anniversary of Balwantray Mehta is celebrated as Panchayat Divas (the day dedicated to the memory of Mehta ji and his works on Panchayati Raj system or decentralisation of democracy). Some of my colleagues and journalists wrote specific reports on a few of the dialogue sessions organised in the past. A brief summary is being presented here with the details of subjects and experts. I hope it will be helpful to ascertain the impact of such educational programs on the immediate and larger audiences. Although this series of events take place with a limited number of participants, it gets published in print and new media to reach a wider network of audience.  Panchayat Me Paricharcha, Saturday Forum and anniversary celebrations are the platforms of learning and sharing, where everyone gets an opportunity to express his or her views on a horizontal platform. As its convener, I’ve started this series with certain experts like Dr. Vijay Kumar (former head of deptt. Gandhian Thoughts in TMU Bhagalpur, Bihar) and Dr. Onkar Mittal (President, Society in Action for Community Health, New Delhi) on 19th February 2016 at Panchayat Dham. This series ended with Shri Sanjeeb Patjoshi, the joint secretary of Panchayti Raj ministry in central govt. on 19th February 2017. Meanwhile we have started a weekly three hours educational program, also known as the Saturday Forum, on 19th March 2016 with former IAS officer Shri K.B. Saxena. It was focused on the subject of Budget and Village. Next week, the RBI consultant and economist Dr. T.N. Jha came to enlighten us further on the same subject. Around 20 serious people from various different walks of life participated in these programs. We have first time published the list of experts on page 27 in December 2016 issue of Panchayat Sandesh. The subjects in focus were political economy: budget, panchayati raj, constitution, law, etc.DSC15.JPG

Shri Chandra Shekhar Pran, the author of Teesari Sarkar, is the source behind a regular column on the same name in Panchayat Sandesh. He has focused on the concept of Swaraj as stated by Mahatma Gandhi in Hind Swaraj and the local self-rule initiated by Harold Laski, the author of A Grammar of Politics, 1925. The detailed synopsis on this issue is published on page 20-26 in December 2016 issue of Panchayat Sandesh in his own words. Shelley Kasli, the editor of Great Game India largely remained concentrated on geopolitics and political economy that makes changes on the grassroots in rural and urban India. This is the other regular column in Panchayat Sandesh.  The focus on challenges to sustainable development reflects from the dialogue session with Smt. Bidyut Mohanthi and Dr. Onkar Mittal. Dr. Hishmi Husain, Gandhian poet Shri Ramesh Chandra Sharma and Shri Bireshwar Bhadauria are noticeable experts on environment and pollution. Padmashri Ram Bahadur Rai, Shri Lalit K. Joshi, Shri Govind Yadav, Shri Ram Nagina Singh, Dr. Ravindra Kumar, etc. are other experts in this series of events that took place in Panchayat Dham within last year. The other topics of discussion were technology, resource management and lifestyle in rural and urban societies on various occasions. Panchayat Sandesh is going to publish certain more reports on these issues in its upcoming editions.

The council reviewed the pros and cons of this endeavour in the 91 meeting of AIPC at Kullu, H.P. on 18th September 2016. Kindly refer to a couple of reports covering this initiative. I wrote a report i.e. Mahapanchayat ki Baithak. It was published on page 39 on 2nd issue of Hindi fortnightly Yathavat in October 2016. The Executive Editor of Panchayat Sandesh Shri Satya Prakash Thakur wrote i.e. Kullu me Mahapanchayat, as published on page 32-33 of December 2016 issue. The need of training and mass awareness initiative was one of the principle issues in AIPC91. Consequently certain other states joined this initiative. This was in focus from Punjab to Uttar Pradesh. The representatives from different corners of Punjab gathered at Dera Bassi on birth anniversary of Mahatma Gandhi to learn from his life and works. Similarly at least a thousand village heads from different corners of Uttar Pradesh gathered on 21st December 2016 at Aligarh on this issue alone.aipc91

The outcome of these programs is not merely confined to talks and discussions alone. The organisations addressing issues of public interest joined us in certain initiatives. Surat based Om Yoga Peeth has started healthy village mission (Swasth Panchayat Mission) with All India Panchayat Parishad. The training programme is a part of this initiative. As a consequence of that a group of 51 women student joined regular training course on the Republic Day. The AIPP treasurer Shri Jayanti Bhai Patel and the expert Shri Manu Bhai Patel are committed to this mission. Shri Shitala Shankar Vijai Mishra took personal interest in this creative effort and visited the training centre in last December. Next month I was there with Shri Lalit Joshi, Trustee India International Centre to help them further. As thus this initiative of AIPP and BMPRF is going to be fruitful for the betterment of rural and urban societies.wp-image-41989055jpg.jpeg

The 73rd and 74th amendments of the Constitution of India deal with the decentralisation of democracy. These issues are in debate since the lawmakers amended the Constitution in 1992. Still the local bodies are yet to receive the powers mentioned in the aforesaid amendments. The status of National Capital Region is obscure; as such it was one of the issues in AIPC91. Here, the state govt. of Delhi is talking about Mohalla Sabha instead of Gram Sabha. We have organised certain dialogue sessions in Panchayat Dham and other parts of the city only to realise the necessity to start a series of interactive programs to train the people living in the urban areas. The state govt. is talking about local self-rule for many years. AIPP and BMPRF need to consult Delhi govt. on this issue in order to further this cause.dsc_0036

The said training programs could have been more effective and lucrative for the rural and urban societies, if we were not suffering from crisis of resources. We need to provide sufficient Human Resource and Material Resource to achieve the aims and objects of the society and trust. Mahatma Gandhi and Jayprakash Narayan are a couple of well-known original thinkers on decentralisation of democracy in modern India. We have been celebrating the birth anniversaries of these leaders in the month of October every year. Last year, we have discussed in the office of Panchayat Sandesh on the 10 days long training program and gathering of people from different corners of India. We have discussed on suggestions on it timing as well. The series of celebrations in the first half of October is covering anniversaries of a few gems like Mahatma Gandhi, Lok Nayak Jayprakash Narayan and Lal Bahadur Shastri. The committee proposed to utilise the first fortnight of October to train Panchayati representatives and common people on the subject of decentralisation of democracy.DSC_0242.JPG

All India Panchayat Parishad and Balwantray Mehta Panchayati Raj Foundation have conducted the aforesaid training program on the scheme of volunteering for an year. This training program needs to have certain fixed staffs for its management and appropriate reporting. In some of the events reporters from Trudy and Solange Media Pvt. Ltd. have covered the program on their own. They have updated the details through the broadcasting channels of its network in print and other media production units. Most of the experts offered their help voluntarily, but still we need to bear the cost of certain expenses such as transportation. The seriousness and necessity of these training programs might be ascertained from the fact that the participants have arranged all the cost engaged in this initiative. AIPP and BMPRF have graciously offered their place with tea and snacks.20170126_101101

The members and councillors associated with All India Panchayat Parishad and Balwantray Mehta Panchayati Raj Foundation are diligently doing the above said works as a duty since the inception of these couple of institutions. This is also mentioned in the Constitution of India in article 51. These institutions were used to get unsolicited grants from the govt. agencies in the gone by decades. Most of them used to contribute a moderate sum, however, collectively it was sufficient to bear the expenses i.e. to pay the salary of the staff members and other expenditures of these institutions, including cost of training programs and anniversary celebrations. In addition to such grants, donations from civil society and subscriptions from the readers were other source of fund to run these initiatives in the past. Today the society and trust need to approach the govt. agencies to get aid in order to run the training program regularly and effectively. The elected governments in the centre, sates and local bodies need to look into the spirit of the aforesaid article of the Constitution while going through the contents of this report. The representatives from AIPP and BMPRF will delightfully co-operate the agencies from govt. and non-govt. sectors while addressing these issues. I’d like to conclude this report with an ancient adage that is all the more relevant in 21st century that I’ve quoted on a couple of occasions. It says, either we shall hang together or we will be hanged separately.

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(This report is prepared by Kaushal Kishore, Managing Editor, Panchayat Sandesh after the completion of an yearlong series of events focused on training and education on decentralisation of democracy initiated by All India Panchayat Parishad and Balwantray Mehta Panchayati Raj Foundation at their headquarter at Panchayat Dham, Mayur Vihar Phase 1, Delhi 110091)

 

Open Letter to Shri Nitish Kumar, Bihar CM

Open Letter to Shri Nitish Kumar, Bihar CM

Dear Shri Nitish ji,

I wrote my first open letter a couple of years ago. This is the second, and I’d like you to remember the occasion of 35th Bhim Sen Sachar Memorial Lecture in India International Centre, New Delhi on December 2, 2014. Indeed it was an excellent 67 minutes address. Last year I have heard Justice T.S. Thakur in the 37th memorial lecture. The same lecture series and same Kamla Devi Multi Purpose Hall. It was a fascinating experience to be among the audience, when veteran journalist Kuldip Nayar was in chair. Still I cannot say the two an equal. Sorry to express it. In fact, I was a guest, not a host this time. Justice Thakur has delivered an almost extempore memorial address. I’d like to praise him for certain things, especially that explicitly expressed reasons behind the fumbling words and thoughts in the beginning. The courageous man accepted how plagiarized text supplied by a subordinate judicial officer failed him to be up to the mark. I fell in love to hear the narratives of Bhim Sen Sachar’s emergency days in your words. I hope this is a fact that Mahatma Tyagi is nothing less than an emblem on decentralisation of democracy in the deepest furrow of your fertile brain, no? 

I’ve something to be glad to share with your good self. Justice Sachar delightfully agreed to permit me to publish the text of his presidential address delivered on 6th May 2015 during the 150th anniversary of Lala Lajpat Rai at CSOI, Vinay Marg, New Delhi in my coming book. That day I was delighted to host the chief guest Dr. Hamid Ansari, the Vice President of India. The prestigious English daily Business Standard published his address on the guest column on 30th May that year. The text is attached herewith for your ready reference. A news clip as published in the largest Hindi daily Jagran covering this event is also enclosed here to have a better picture of that evening. I’m sorry. I’m not inviting you to its releasing ceremony. In fact, I write all this verbatim details to invite your good self to talk about Dr. Lal Singh Tyagi, the former Panchayati Raj Minister of Bihar govt. and the longest remaining President of All India Panchayat Parishad (AIPP) and Bihar Rajya Panchayat Parishad (BRPP). We call him Mahatma Tyagi of Panchayati Raj.

This is the year of decentralisation of power, so that the Prime Minister is celebrating 70th year of independence with great pomp and show. The heads of certain provinces are also taking part in them. This is a special series of occasion to remember the founding fathers of the Indian nation. The issue of Panchayati Raj or decentralisation of democracy is a core content of Hind Swaraj written by Mahatma Gandhi in 1909. Lok Nayak Jayprakash Narayan is an authority on this subject, and it reflects in the Constitution of India in the directive principles. State govt. of Bihar did an exemplary act in this regard. They have enacted Bihar Panchayat Raj Act 1947 during Dr. Sri Krishna Singh govt. I conclude on reports that Pt. Binodanand Jha and Lal Singh Tyagi were the leading figures behind this development. This is one of the initial laws on Panchayati Raj in modern Indian history, and a decade after this enactment Panchayati leader of Bihar conducted a nationwide tour on a special train designated for this purpose alone. Consequently All India Panchayat Parishad came into existence. Now seven decades have passed. I don’t know how your govt. is going to celebrate this 70th year of Panchayati Raj in Bihar. This is an occasion of celebrations for those who love the likes of Lok Nayak Jayprakash Narayan, Pt. Binodanand Jha and Dr. Lal Singh Tyagi. State govt. used to celebrate the birth anniversary of Dr. Tyagi with Bihar Rajya Panchayat Parishad on 21st January every year. This year that day was marked for the huge human chain on the alcohol ban.

I remember you have leisurely expressed the 50 minutes typed text in 67 minutes. It was indeed a brainstorming session. Your close association with Lok Nayak and Dr. Lal Singh Tyagi is in public domain. Here at the office of Panchayat Sandesh we have expressed our dream that deals with the resurrection of Dr. Lal Singh Tyagi Trust initiated in 1980s. Recently the president of Bihar Rajya Panchayat Parishad told me that his adopted son Dr.  Prakash Sinha is also dreaming the same. I want to place my request to think on this issue and do the needful. 

On the 108th Birth Anniversary of Dr. Lal Singh Tyagi Panchayat Sandesh once again started the dialogue series i.e. Panchayat me Paricharcha at AIPP headquarter in the national capital. We want a series of dialogue dedicated to Dr. Lal Singh Tyagi and Reforms in last 7 Decades since Bihar Panchayat Raj Act. In my opinion you are one of the best experts to address this issue in the proposed dialogue series. We would like to organise such an event in the same hall of India International Centre on a suitable day. If you principally agree to spare some time to share your precious views on this issue, we would like to visit your place with a delegation from Panchayat Sandesh. I hope you would look into the contents of this open letter with all seriousness and spare some time for this noble cause. 

With warm regards,

Yours sincerely,

Kaushal Kishore
Author of The Holy Ganga (Rupa 2008)
Managing Editor PANCHAYAT SANDESH
Published by All India Panchayat Parishad & Balvantray Mehta Panchayati Raj Foundation from Balvantray Mehta Panchayat Bhawan (Panchayat Dham) 368, Mayur Vihar Phase 1, Delhi 110091 (INDIA)
Phone: +91-1122-752-573 & 74

https://kaushalk.wordpress.com/2015/01/24/an-open-letter-to-vice-president-md-hamid-ansari-for-lalajis-150th-birth-anniversary/

http://www.business-standard.com/article/opinion/the-question-of-social-harmony-115053001473_1.html

अनर्थशास्त्र का अर्थ 

कौशल किशोर |Follow @HolyGanga

आपको पता है। यह कहावत किसकी है? ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा।’ क्या आपको यह भी पता है कि अमेरिका की कांग्रेस में किस व्यक्ति ने कहा था, ‘हमें राष्ट्र के पैसे पर कंट्रोल करने दो, और फिर परवाह नहीं, इसके कानून कौन बनाता है।’ क्या आज इस सवाल से रु-ब-रु होने की जरुरत नहीं है? खैर, अब भारत में लोग जियो की इंटरनेट सुविधा से वंचित नहीं रह गए। और ‘गुगल देव’ ने ऐसे सवालों का जवाब देने से मना भी नहीं किया है। सोसल मीडिया पर ‘बागों में बहार है’ के बाद शहर की गलियों में कतार पर कतार है। क्योंकि उस रात टी.वी. पर ‘साहब’ का हुक्म सुनकर पैसा, पैसा ना रहा। क्या गज़ब का करिश्मा हुआ? करेंशी महज कागज का टुकड़ा हो गया! 

अब आप समझ सकते हैं कि यहां नेताजी और ‘करेंशी-किंग’ की कहावतों से बात शुरु करने की क्या जरुरत थी। यह केन्द्र सरकार का एक अहम फैसला है। क्या यह भारतीय गणराज्य में अलोकतांत्रिक तरीके से लिए गए आदेशों की श्रेणी में गिना जाएगा? इसका असर निश्चय ही बहुत व्यापक और मुश्किलों से भरा है। यह एक ऐसा मामला है, जो देश में ‘सिविल-वार’ की हालत पैदा करने में सक्षम है। सरकार को यह बात समझना चाहिए। इसके कारण कई जगहों पर भाजपा कार्यकर्ताओं की पिटाई तक हो चुकी है। महाराष्ट्र के पनवेल में नवंबर के तीसरे हफ्ते में हुई कृषि उत्पाद बाजार समिति के चुनाव में न सिर्फ भापजा को सभी 17 सीटों पर हार का सामना करना पड़ा, बल्कि पार्टी कार्यकर्ताओं को लोगों ने मारने-पीटने में भी कसर बाकी नहीं रखा है। 

यह घोषणा भारत के प्रधानमंत्री ने की है। इस घोषणा के बाद क्या भारतीय रिजर्व बैंक का वह वचन खारिज हो जाता है, जिसमें धारक को नोट पर अंकित मूल्य को चुकाने की बात कही गई है। परिचालन में हजार और पांच सौ के अधिकांश नोट जाली हैं, जिनकी सरलता से पहचान करना कठिन है। इस आशय की बात 8 नवंबर 2016 को जारी राजपत्र संख्या 2652 में कहा गया है। क्या यह फैसला भारत की लोकतांत्रिक सरकार का माना जाएगा? इस सवाल से हैरत हो सकती है। पर बचा नहीं जा सकता है। व्यक्ति व समाज ही नहीं संसद और सर्वोच्च न्यायालय भी इस मामले पर विचार कर रहा है। इस कदम से जाली नोट, काला धन और आतंकवाद की फंडिंग बंद करने का दावा केन्द्र सरकार ने किया है। तीनों ही समस्याएं बेहद जटिल हैं। यदि ये दूर हो जाऐं तो सचमुच देश का भला हो। इसे स्वागत के योग्य कदम माना जाएगा। पर क्या सचमुच सरकार के दावे पूरे होंगे? क्या यह इस कदर जरुरी था, अच्छे दिनों के लिए? फिर तो संभावना यह भी है कि भारत के प्रधानमंत्री अमेरिकी राष्ट्रपतियों की तरह गरीब जनता में अब खैरात बांटें। इसी बीच ब्रिटीश प्रधानमंत्री ने ‘साहब’ की नपे-तुले शब्दों में तारीफ की है। इसे कहते हैं सोने पर सुहागा। “क्वीन के सिर पर ताज रहे, और मोदी जी का राज रहे।” अब ऐसा नारा सहज सुलभ हो गया है।

आज इन मामलों में कम लोग दुरुस्त जानकारी रखते हैं। वास्तव में इस विमुद्रीकरण को जाली नोट के कारोबर का क्षणिक समाधान माना जाता है। इससे कर की चोरी पर तुरंत असर पड़ता है। साथ ही केन्द्रीय बैंक को लाखों करोड़ का फायदा होता है। अर्थशास्त्रियों के अनुसार यह आंकड़ा करीब साढ़े तीन लाख करोड़ का होगा। केन्द्रीय बैंक के पूर्व गवर्नर डी.सुब्बाराव जैसे विशेषज्ञों ने इस मुनाफे की प्रकृति पर सवाल किया है। साथ ही प्रशासन इस आदेश की तामील करते हुए अधूरी और मुक्कमल तैयारी के बीच झूल रही है, जिसका नतीजा सामने है। इसकी वजह क्या है? यह तो ‘साहब’ ही कह सकते हैं। पर क्या हो सकता है, इसकी चर्चा नहीं करें। यह भी यहां मुमकिन नहीं है। सबसे जरुरी बातों का संज्ञान लेकर ही आगे की ओर बढ़ें।

इस सदमे से चालीस साल की एक महिला बेमौत मारी गई। यह गौतम बुद्ध के निर्वाणस्थल के समीप पूर्वी उत्तर प्रदेश का मामला है। वह कपड़े धोकर जीवन-यापन करती थी। इसी क्षेत्र में आठ साल का एक बच्चा भी करेंशी-नोट और दवाई के खेल में शहीद हो गया। फिर मुंबई में बैंक की कतार में खड़े तिहत्तर साल के वृद्ध विश्वनाथ वर्तक के मौत की खबर आई। इस बीच कम से कम सैंतीस ऐसी ही और घटनाएं प्रकाशित हुई हैं। आज इन सभी निर्दोष हमवतन लोगों की मौत पर एकसाथ मातम मनाने का दिन है। आप जानते हैं ऐसा किन हालातों में हुआ। और मैं यह जानना चाहता हूं कि क्यों हुआ? क्या पता आज आपके मन में भी यह सवाल उठे। सरकार इन चालीस मौतों को भी महज संयोग मान सकती है। क्योंकि उस रात टी.वी. पर इस लोकतांत्रिक देश में एक बार फिर साकार हुआ कि सरकार आखिरकार ‘सरकार’ ही है। 

इसे महज संयोग मानने से पहले मेरे सामने पैसा, कानून और कंट्रोल का तिलिस्मी खेल आ जाता है। जिसकी परतों में उलझने पर आपका आमना-सामना भी इन पंक्तियों में वर्णित तथ्यों से होगा। इसलिए अपनी बात शुरु करते हुए दो बातों को याद करने की जरुरत महसूस हुई। अब एक सरसरी निगाह देश, दुनिया और समाज के विस्तृत परिदृष्य पर डालते हैं। ऐसा करते हुए आपसे मेरा निवेदन है कि महज संयोग की स्थितियों पर गौर फरमाएं। 

नवंबर के दूसरे हफ्ते की शुरुआत निश्चय ही चैंकाने वाली घटनाओं से हुई है। आठ नवंबर की रात आठ बजे भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पांच सौ और हजार रुपये के करेंसी नोट की कानूनी वैधता खत्म कर दी। दिन में ही महात्मा गांधी सीरिज के इन नोटों को बंद करने के लिए एक अधिसूचना जारी किया गया था। फिर दुनिया भर में सबसे बड़ी खबर थी कि डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका के नए राष्ट्रपति चुने गए। उम्मीद के विपरीत डेमोक्रेटिक पार्टी की महिला प्रत्याशी हिलेरी क्लिंटन से ज्यादा मतदान उनके पक्ष में हुआ। दोनों छोर पर एक साथ अचरज में डालने वाली खबरें हैं। इनके अलावा एक तीसरी बात भी है, जिसे नजरअंदाज करना आसान नहीं है। ब्रेक्सिट के बाद ब्रिटेन की प्रधानमंत्री बनीं श्रीमती थेरेसा मे ने इन धमाकेदार खबरों का लुत्फ इंग्लैंड में उठाने की बजाय इंडिया में उठाया है। ये क्या गज़ब हुआ? ये क्या जुल्म हुआ?… अब थोड़ा रुकना होगा। डर है। आप पूछ न बैठें, गीत क्यों गाने लगे हो? 

ये तीनों ही घटनाक्रम महज संयोग हो सकते हैं। पर क्या इस बात से इंकार किया जा सकता है कि दुनिया में कुछ ऐसे भी लोग हैं, जिन्हें इन बातों का पुर्वानुमान था, या फिर इसकी दुरुस्त जानकारी थी। राजनैतिक-अर्थशास्त्र का औसत दर्जे का विद्यार्थी भी यह न्यूनतम जानकारी रखता है कि कुछ लोगों ने इन तीनों ही घटनाओं को कार्यरुप देने के लिए विधिवत तैयारी किया था। क्या उनके बीच कोई सीधा संबंध है? क्या कोई समीकरण इन्हें आपस में जोड़ता है? देश में चहुंओर अफरा-तफरी मची है। ऐसे में इनकी गहराई नापने की फुर्सत कम ही लोगों को है। परंतु मैं दावे से कह सकता हूं कि इस घड़ी में इन्हीं बातों का रहस्य जानने-समझने वाले लोग राहत की सांस ले रहे हैं । 

सटीक और सधे हुए क्रम में घटित होने के कारण तीनों बातें एक साथ सामने आती हैं। यहां मैं इन्हें मजह संयोग ही कहता हूं। इसके बावजूद भी विचार करने योग्य बातें यहां मौजूद हैं। मुकेश अंबानी समूह में रिलायंस इंडस्ट्रीज के पूर्व प्रेसिडेंट उर्जित पटेल केन्द्रीय बैंक के गर्वनर बनाए गए। सरकार पर सवाल उठे थे। दो हजार और पांच सौ के नए नोट इन्हीं महोदय के हस्ताक्षर से जारी हुए हैं। एक रुपये का नोट भारत सरकार जारी करती है। यह पांच सौ, हजार और दो हजार रुपये की करेंशी का मामला है। इस विषय में केन्द्रीय बैंक को घोषणा करना चाहिए था। प्रधानमंत्री की घोषणा के पीछे क्या रहस्य है? इतनी बात साफ है कि 1934 के रिजर्व बैंक आॅफ इंडिया एक्ट के तहत जारी अधिसूचना में नोटबदली का जिक्र है। परंतु प्रधानमंत्री की बुलंद आवाज के बूते इसे नोटबंदी के प्रपंच में तब्दील कर दिया गया है। दो बार विस्तार देने से यह स्पष्ट है कि सरकार भी मानती है कि ऐसा कर पाना मुमकिन नहीं है। लोगों को राहत मिलेगी यदि सरकार 31 मार्च 2017 तक नोटबदली की पाबंदी पर कायम रहते हुए नोटबंदी की सीमा भी इसी तिथि तक बढ़ा दे। साथ ही फंड-फ्लो पर लगे रोक को हटाकर कारोबार की मंदी भी काफी हद तक कम किया जा सकता है। ऐसा करने से संभव है कि गतिरोध खत्म हो, परंतु सहमति की इस संभावना के जनहित में होने के बावजूद भी कोई राजनेता इसकी सचमुच पैरवी नहीं कर रहा है। 

विमुद्रीकरण के विषय में दैनिक जागरण ने 27 अक्टूबर को बृजेश दूबे की कानपुर से रिपोर्ट छापी है। बाद में 17 नवंबर को इसे लागू करने की योजना भी खबरों में रही है। इस बीच तमाम मीडिया प्रतिष्ठानों के पास प्रशांत भूषण द्वारा भेजे गए कुछ कागजात पहुंचे हैं। इनमें गुजरात के मुख्यमंत्री रहते नरेंद्र मोदी द्वारा करोड़ों का कालाधन कारोबारियों से लेने का खुलासा किया गया है। आज जायसवाल की हवाला डायरी के पन्ने हवा में तैर रहे हैं। इन सभी तथ्यों का संज्ञान लेने से प्रतीत होता है कि चालीस साल पहले इंदिरा गांधी की हालत और आज के नरेंद्र मोदी एक जैसी दशा में मजबूर हैं। 

इसी मजबूरी का नतीजा है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में आम लोगों का जीवन कई महीनों तक अस्त-व्यस्त रहेगा। इसका व्यौरा आस-पास हो रही घटनाओं पर नजर डालने पर होता है। रही-सही कोर-कसर इलेक्ट्रानिक मीडिया से लेकर सोसल मीडिया तक पूरी कर रही है। अफवाहों का बाजार गरम है। एक दिन नमक की कीमत आसमान छूने लगी। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में लोगों की भीड़ ने एक बैंक लूट लिया। तो पोस्ट-आफिस पर हाथ साफ करने की दूसरी घटना भी सामने आई है। पूर्वी उत्तर प्रदेश में कई एटीएम मशीनों में सप्लाई किया जाने वाला सौ करोड़ से ज्यादा का रकम गायब हो चुका है। 20 नवंबर के इंडियन एक्सप्रेस में मिथुन एमके की रिपोर्ट पर गौर करें। हैदराबाद से 168 किलोमीटर दूर कर्नाटक बार्डर के पास खारमुंगी में तीन रुपये सैकड़ा मासिक पर किसानों से सूद वसूलने वाले दो लोग सौ रुपये के कमीशन पर हजार और पांच सौ के नोट बदल रहे हैं। यह एक लंबी सूची से ली गई चुनिंदा सूचनाएं हैं। जस्टिन रौलेट की बीबीसी रिपोर्ट में इसे मोदी सरकार का आर्थिक ‘शाॅक एंड औ’ पालिसी कहा गया है। साथ ही ऐसे सभी रिपोर्ट में उपरोक्त घटनाओं की जानकारी का सर्वथा लोप है। जाहिर है कि आज ऐसे भी लोग हैं, जो सच का संज्ञान तक नहीं लेना चाहते हैं। साथ ही ललित मोदी और विजय माल्या ही नहीं, बल्कि पनामा पेपर में वर्णित अमिताभ बच्चन, ऐश्वर्या राय बच्चन और अजय देवगन जैसे चर्चित लोग इस नीति का समर्थन कर रहे हैं। 

इन सबके बीच बाजार की सारी बातें काले और सफेद नामक दो ध्रुवों पर सिमट गया है। इसमें बस दो ही रंगों के लिए जगह है। बाकी रंगों के प्रति चेतना नगन्य है। यह शोक संदेश इन दो ध्रुवों पर प्रवास करने वाले लोगों के लिए निश्चय ही नहीं है। वास्तव में यह इंद्रधनुषी रंगों को समझने वाले लोगों के लिए है, जिनको पीले, हरे, नीले जैसे और रंगों की भी बराबर समझ हो। यों तो अपने गांव में सफेद और काला भी कई जातियों, प्रजातियों और उपजातियों में विभाजित है। सुबह गोपाल के दुधिया सफेदी से होती, तो दिन ढ़लने से पहले मोतिया सफेदी की चमक भी नजरों के सामने जगमगा उठती है। वस्तुस्थिति देखकर मुझे दूसरे विश्व युद्ध के एक अमेरिकी महावीर जार्ज स्मिथ पैटन की बात याद आती है। उन्होंने कहा था, ‘जब सभी लोग एक जैसा सोच रहे हैं, तो कुछ लोग नहीं सोच रहे हैं।’ यह नहीं सोचने वाले लोगों से एक अपील भी है। क्योंकि ऐसे लोगों के जीवन में इसी वजह से दुश्वारियां पैदा हुईं। 

आज सचमुच उन्हें ही गंभीर विचार-विमर्श करने की जरुरत है। इस क्रम में यह भी ध्यान रखना होगा कि प्रधानमंत्री ने नोटबदली के लिए नोटबंदी की घोषणा क्यों किया? और इसके बाद जापान की यात्रा पर क्यों चले गए? इस रहस्य की ओर आउटलुक में बीते 17 नवंबर को प्रकाशित मन मोहन की रिपोर्ट में इशारा किया गया है। नरसिंह राव सरकार के दौरान देश की करेंशी जैसी सिक्युरिटी प्रिंटिंग से जुड़े कारोबार में जापान की कंपनी को शामिल किया गया। इस पर युरोपियन कंपनी डेलारु जियोरी ने भारत सरकार को जाली-नोट को लेकर चेतावनी दिया था। आखिर इसी वजह से नोटबदली का मसौदा तैयार किया गया है। 

कालाधन और सफेदधन का मामला पेंचीदा है। जिस पैसे का लेन-देन बैंक के माध्यम से नहीं हुआ वह कालेधन की जद में है। प्रधानमंत्री की नोटबंदी संबंधी घोषणा के बाद यह धन एक बार फिर परिभाषित हो रहा है। बाजार में मची अफरा-तफरी में एक सवाल है कि क्या जिस धन का आदान-प्रदान बैंकों के माध्यम से नहीं हुआ है, वह सचमुच काला धन है? इसी धन के कारण बैंक और डाकघर में ठसाठस भीड़ है। कतार पर कतार है। इस भीड़ में होने वाले उत्पात का कोई ठिकाना नहीं है। कम ही बातें मीडिया रिपार्ट का हिस्सा बन सकी है। कलह और उत्पात की ऐसी स्थिति बनी हुई है कि लोग काले और सफेद धन के सही मायने भी भूल गए हैं। राजनीति और अर्थशास्त्र से जुड़ा यह प्रपंच दिन-ब-दिन विशाल हो रहा है। चिंगारी सुलग उठी है। यह दहकते अंगारे में बदल कर कभी भी गृह-युद्ध में तब्दील हो सकता है। अच्छा होगा, यदि इसे रोकने की कोशिश में लगी जमात के लोग अचूक हों। 

विमुद्रीकरण के विरोध में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की आवाज उभरती है। इस बीच उन्होंने एटीएम की नई परिभाषा गढ़ा है, आएगा तो मिलेगा। राजनैतिक दलों ने मिलकर संसद में इसका विरोध शुरु किया है। सहमति की आषा चिह्न दिख नहीं रही है। राहुल गांधी ने लोगों के साथ कतार में खड़े होकर इसका विरोध किया, और फिर इस मामले में घोटाले की संभावना भी व्यक्त किया है। अरविन्द केजरीवाल ने चिंगारी सुलगाने का काम किया है। इसी बीच सोसल मीडिया में मुलायम सिंह यादव के ‘बगावत’ का शोर भी उभरा। कहा गया कि ऊत्तर प्रदेश में रुपया बन्दी का आदेश लागू नहीं होने दिया जाएगा। हकीकत यह रही कि सूबे के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने 24 नवंबर 2016 तक जमीन खरीदने में हजार और पांच सौ रुपये के नोट का इस्तेमाल करने की छूट देने का जिक्र किया है। आम लोगों की मौत, अफवाह, अफरा-तफरी और लूट-खसोट का सिलसिला चल पड़ा है। यह सब एक अलोकतांत्रिक निर्णय का नतीजा है। इसे रोकने के लिए नोटबदली को नोटबंदी बनने से रोकना था। यह वही कर्म है, जिसकी वजह से केन्द्रीय बैंक मुनाफाखोर साबित हो गया है। 

आज विमुद्रीकरण के परिणाम सामने हैं। भारत में ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। इमरजेंसी के बाद मोरारजी देसाई की सरकार बनी। उस दौर में 1000, 5000 और 10000 के नोटों को बंद करने का फैसला लिया गया। पर वह एक लंबी लोकतांत्रिक प्रक्रिया थी। 16 जनवरी 1978 को बड़े मूल्य के नोटों का चलन बंद हो गया। बाद में इसी मामले में संसद ने 30 मार्च 1978 को डिमोनेटाइजेशन एक्ट भी पारित किया। इस विषय में कहा गया कि पिछली सरकार से जुड़े अभिजात्य वर्ग के लोगों ने अकूत धन जमा कर रखा है। इसे आम जनता के हित में उपयोग करने का सुझाव राजनेताओं के दिमाग की उपज थी। दरअसल पहली बार 1938 में ऐसे बड़े नोट छापे गए। आजादी से पहले 1946 में बनी अंतरिम सरकार ने इसे बंद कर दिया था। फिर 1954 में जवाहरलाल नेहरु के कार्यकाल में इन्हें पुनः प्रयोग में लाया गया। अंत में इन्हें 1978 में बंद कर दिया गया था। आज भी युरोप के क्लबों में इन नोटों की खुलेआम निलामी होती है। इनके लिए लगने वाली बोली की रकम पर आप सहसा यकीन भी नहीं कर सकेंगे। 

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के जस्टिस जगमोहन की गौरव गाथा आप अभी तक भूल नहीं सके होंगे। सत्तर के दशक में उन्होंने भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को कटघरे में खड़ा किया था। और जिसकी वजह से इमरजेंसी की कील जबरदस्ती ठोेंक दी गई थी। इन पंक्तियों को पढ़कर शायद आप मान बैठें कि मेरी दिलचस्पी भी इस मामले में रही है। दरअ़सल मेरे दोस्तों में ऐसे नाम भी हैं, जो इस मामले में बेहद अहम रही नीली डायरी और लाल डायरी को सामने लाने वालों में से रहे। मेरी साधारण समझ से इस विषय में ठीक-ठीक जानकारी रखने में शायद सबसे सक्षम व्यक्ति। इस मामले को भी समझना जरुरी है।

रायबरेली लोकसभा सीट से इंदिरा गांधी और राज नारायण चुनाव मैदान में आमने-सामने थे। उनके बीच कांटे की टक्कर थी। ईमानदारी और बेइमानी की जंग तो चल रही थी पर आज की तरह सोसल मीडिया और इलेक्ट्राॅनिक मीडिया का प्रभाव नहीं था। इंदिरा गांधी के समर्थन में प्रचार करने वाले लोगों ने अपने पक्ष में मतदान करने के लिए 1000, 5000 और 10000 रुपये के नोट गरीब लोगों के बीच खुलेआम बांटे। जिन लोगों ने ऐसे नोट कभी नहीं देखे थे, उन्होंने इसे रद्दी समझ कर फेंक दिया। राज नारायण के प्रचार दल में शामिल एक चैदह साल के बीर बालक ने ऐसे 49 करेंशी नोट बीन लिए। बालक ने लोगों से इस विषय में जानकारी की। फिर सारी बातें राज नारायण को बताया। परंतु उन्हें भी ऐसे नोट के विषय में जानकारी नहीं थी। इसलिए यकीन ही नहीं हुआ। बीर बालक ने स्टेट बैंक की शाखा में जाकर इसकी सच्चाई जानने का निश्चय किया। कई हफ्तों की जद्दोजहद के बाद पता चला कि सभी नोट असली थे। 

वोट खरीदने की इसी कोशिश का नतीजा था कि इंदिरा गांधी के खिलाफ जगमोहन की अदालत में केस चला। और नौबत इमरजेंसी तक पहुंच गई। मोरारजी देसाई सरकार ने राज नारायण के सुझाव पर अमल किया। उन दिनों ऐसे बड़े नोट धनकुबेरों के पास ही कालेधन के रुप में संचित था। इस फैसले का नतीजा हुआ कि दानपेटियों में इन नोटों के अंबार लग गए और धर्मस्थानों के नाम पर बड़ी-बड़ी अट्टालिकाएं भी खड़ी हो गई। यद्यपि ऐसा कहना मुमकिन नहीं है कि काला धन समाप्त हो गया। हां, आम लोगों को कोई तकलीफ या नुकसान नहीं झेलना पड़ा था। सरकार को देश की जनता का सहयोग मिला। परंतु आज ऐसा नहीं है। आम जनता का सहयोग लेना मुनासिब नहीं समझा गया। इसकी एक वजह यह भी हो सकती है कि बाजार में जितना पैसा होने का दावा केन्द्रीय बैंक ने किया है, उससे ज्यादा रकम मौजूद हो। किसी दूसरी वजह से भला बैंक अफरा-तफरी मचाने के लिए क्यों राजी होने लगा!

आज की परिस्थिति ठीक विपरीत है। काले धन को सोने-चांदी और दूसरे रुपों में तब्दील करने की प्रक्रिया जोर-शोर से चल रही है। इसका व्यौरा भी आने वाले वक्त में आसानी से उपलब्ध हो जाएगा। प्लास्टिक मनी के इस युग में सीसीटीवी और आधार कार्ड का उपयोग हो रहा है। लोगों की जेब से निकलने वाले धन का आंकड़ा उपलब्ध हो रहा है। बैंकों ने लोगों को कतार में खड़ा कर पांच लाख करोड़ रुपये दस दिनों में ही जमा कर लिए हैं। मैं इसे जन-धन योजना की प्यास बुझाने का जरिया नहीं मानता हूं। यहां दो बातों का ध्यान रखना जरुरी है। आजादी के 69 सालों बाद भी देश में होने वाले कुल व्यापार का तीन चैथाई हिस्सा बुक्स में नहीं है। दूसरी बात काले धन के प्रबंधन की कारगर योजनाओं को सरकार ने बखूबी प्रचारित किया है। इसके प्रबंधन की बेहतर युक्ति आयकर अधिनियम की धाराओं से निकल कर फाॅरेन डायरेक्ट इंवेस्टमेंट की व्यवस्था में समा चुकी है। एफडीआई के प्रावधानों ने इसके लिए सबसे कारगर युक्ति को संभव किया है। एक ऐसा कारगर तरीका इजाद हुआ है, जिसके माध्यम से विदेशों में जमा काला धन सफेद होकर स्वदेश में लौट सकता है। इसमें स्वदेश में जमा काले धन को विदेश भेजने की सुविधा भी उपलब्ध है। प्रधानमंत्री ने स्टार्टअप इंडिया अभियान की शुरुआत भी कालेधन की समस्या को हल करने के लिए ही किया। इसलिए इसमें टैक्स की छूट का प्रावधान किया गया। वित्त मंत्रालय द्वारा 30 सितंबर 2016 तक कालाधन जमा करने की समय सीमा तय कर खूब प्रचारित किया गया था। इसके कारण बैंकों में जुलाई से सितंबर की तिमाही में औसत से ज्यादा धन जमा हुआ।

इस कड़ी में ऐसी कोशिश हो रही है, जिसकी दुरुस्त जानकारी आम लोगों को आसानी से नहीं होगी। दिल्ली के चांदनी चैक जैसे पुराने बाजार में होने वाले कारोबार का 80 प्रतिशत हिस्सा बिना बिल के ही होता रहा। प्रधानमंत्री की घोषणा के तत्काल बाद ऐसे सभी बाजारों में दर्ज होने वाली बिक्री में अप्रत्याशित रुप से वृद्धि देखा गया। गौर करने की बात है कि यहां वास्तविक सेल और बुक्स में हुए सेल के बीच कई गुणा का फासला रहा। इस कार्य को अंजाम देने वाले व्यापारियों ने कम से कम 10 फीसदी आयकर बचाने के लिए यह हेराफेरी किया। इस आदेश के बाद हवाला करोबार में लगे लोगों की चिंता बढ़ी। इन करोबारियों की प्राथमिकता गुप्त-गोदामों में पड़े धन को अतिशीघ्र ठिकाने लगाने की है। इस प्रक्रिया को समझना आसान है। पर ऐसे काले धन को निकालना बेहद मुश्किल। भारत की करेंशी का इस्तेमाल श्रीलंका, नेपाल, भूटान और बांग्लादेश जैसे देशों में बखूबी होता है। थाईलेंड में फुर्राट मार्केट और सिंगापुर में मुस्तफा मार्केट जैसे जगह भी हैं। इनके अतिरिक्ति पनामा पेपर में कर चोरों के जन्नत का विस्तृत वर्णन है। ये सभी वे रुट हैं, जिनके माध्यम से हवाला करोबारियों का धन सफेद होता है। यह प्रक्रिया चल रही है। और तब तक बंद नहीं होगी, जब तक चुनिंदा करोबारियों का धन सफेद होकर पुनः एफडीआई के माध्यम से स्वदेश न लौट आए। इन सब के बाद भी जिनके हाथों में पांच सौ और हजार के नोट दिख रहे हैं, क्या वो सचमुच काले धन के स्वामी हैं? ऐसे मेहनतकश लोग उत्पीड़न अथवा हास्य के पात्र बने हुए हैं। पता नहीं ये लोग कब तक ऐसी विकट स्थिति में बने रहेंगे।  

सरकार की तमाम सुविधाओं का लाभ लेने से वंचित रह गए लोग आज दानपेटियों की ओर रुख करने को भी स्वतंत्र नहीं रह गए हैं। नोटबंदी ने आदान-प्रदान बंद कर दिया है। इस कड़ी में ऐसी खबरें हैं कि कहीं सरकारी दुकानें पुराने नोट नहीं लेकर परेशानी खड़ी कर रही है, तो कहीं छोट-छोटे व्यापारी भी लोगों की तकलीफ कम करने की नीयत से प्रधानमंत्री का फरमान भूल रहे हैं। भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गर्वनर रघुराम राजन ने विमुद्रीकरण और कालाधन पर टिप्पणी की थी। वस्तुतः कालेधन के मालिक इसका प्रबंधन करना भी जानते हैं। 

नोटबंदी और नोटबदली की इस घटना को दूसरा सर्जिकल स्ट्राइक कहा जा रहा है। केन्द्र की सत्ता में काबिज दलों से जुड़े नेताओं ने इसी तरह इसे प्रचारित करना शुरु किया है। क्या सचमुच मोदीजी ने दूसरा सर्जिकल स्ट्राइक किया है? इसके भुक्तभोगी आज बैंक और डाकघर के अलावा तमाम तरह के व्यायवसायिक प्रतिष्ठानों में दिख रहे हैं। देश का कोई कोना और समाज का कोई वर्ग शायद ही अछूता रह गया हो। इसकी चपेट में आए लोगों की संख्या और प्रभाव क्षेत्र का दायरा बहुत विशाल है। वास्तव में रणनीति की भाषा में सर्जिकल स्ट्राइक एकदम सटीक प्रहार को कहा जाता है। इसमें लक्ष्य भेदने के अलावा किसी अन्य स्थान पर कोई नुकसान नहीं हो, यह सुनिश्चित करना सर्वोपरि होता है। इसके ठीक विपरीत रणनीति को कारपेट स्ट्राइक कहा जाता है, जिसका प्रभाव क्षेत्र बहुत व्यापक होता है। मरने वाले कौन होंगे, इसकी पुख्ता जानकारी पहले से नहीं होती है। दोनों ही रणनीति में एक समानता हो सकती है, जिसे गोपनीयता कहते हैं। इस प्रहार का दंश झेलने वाले कौन हैं, कहां हैं और कितने हैं? इन प्रश्नों का उत्तर पब्लिक डोमेन में है। एकदम साफ और बिल्कुल स्पष्ट। इस पर गौर करने के बाद कोई इसे सर्जिकल स्ट्राइक शायद ही कहे। दूसरी बात इस स्ट्राइक का स्पष्ट मतलब निकलता है कि केन्द्र सरकार ने विश्वनाथ वर्तक जैसे निर्दोष और असहाय लोगों को बेमौत मारने की योजना बनाई है।

यहां तीन और बातों पर गौर करने की कोशिश करें। ये नफा-नुकसान की अहम बातें हैं। आर्थिक मामलों के सचिव शशिकांत दास द्वारा नोट चेंज करने पर निशान लगाने की घोषणा की गई। आपको याद है मतदान के बाद स्याही लगाया जाता है। अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर को इस स्याही की आपूर्ति एक मात्र कंपनी मैसूर पेंट्स एंड वार्निश लिमिटेड से होती है। नए नोटों के साईज में फर्क है। अब देश भर में दो लाख एटीएम ठीक काम नहीं करेंगे। इनमें फेर-बदल का नया काम निकला है। इस बाजार पर काबिज कंपनियों को फायदा पहुंचेगा। नए नोट करोड़ों की संख्या में और अरबों-खरबों के मूल्य में छापा गया है। इसमें बारह हजार करोड़ रुपये खर्च हुए हैं। आपको करेंशी छपाई के काम का ब्रेक-अप पता है। मुझे नहीं पता था तो दोस्तों से पूछा। पता चला कि पूरी पांच आयतों वाला काम है। कागज सप्लाई करने वाली कंपनी, फिर नोट छापने वाली दूसरी कंपनी, इस बीच थागा जैसे उपस्करों की आपूर्ति करने वाली तीसरी कंपनी और स्याही की आपूर्ति के लिए चैथी कंपनी। इन सभी सुविधाओं को एक साथ मुहैया कराने वाली एक और कंपनी मिलकर इसे पूरा करती है। नए करेंशी नोट छापने वाली इन सभी कंपनी का व्यौरा दी हिन्दू में प्रकाशित विजेता सिंह की रिपोर्ट में मैंने पढ़ा है। इन्हीं में एक एक युरोपियन कंपनी है, डेलारु जियोरी। यह लंबे समय से दुनिया के 90 फीसदी करेंशी बिजनस पर काबिज है। पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी को जाली नोट सप्लाई करने के कारण पिछली सरकार ने इसे ब्लैकलिस्ट भी कर दिया था। इसके वापसी की कहानी आश्चर्यजनक है।

कालाधन के मामले में अर्थशास्त्रियों की बातों और भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों पर गौर करना चाहिए। वर्ष 2015-16 में सकल घरेलु उत्पाद लगभग 150 लाख करोड़ रुपये का रहा, जिसका न्यूनतम 20 फीसदी हिस्सा कालाधन माना गया है। इसी वित्त वर्ष में 30 लाख करोड़ रुपये मूल्य का कालाधन पैदा हुआ। पंद्रह वर्ष पूर्व यही आंकड़ा 40 फीसदी का आंका गया था। हिसाब-किताब की सामान्य समझ के अनुसार पिछले पंद्रह वर्षों में न्यूनतम 400 लाख करोड़ रुपये का कालाधन पैदा हुआ। भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार बीते मार्च तक बाजार में उपलब्ध पांच सौ और हजार के नोटों का कुल मूल्य बारह लाख करोड़ है। यह कुल नोटों का 86 फीसदी है। बाजार में मौजूद यह धन आने वाले दिनों में बैंकों अथवा डाकघरों में जमा हो जाएगा। शेष 388 लाख करोड़ मूल्य का कालाधन कहां गया? यह आपके लिए खोज का विषय हो सकता है। जाली नोट के विषय में एफआईसीएन और भारतीय सांख्यिकी संस्थान की रिपोर्ट को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। इनके अवलोकन से स्पष्ट होता है कि एक समय में देश में 400 करोड़ रुपये मूल्य से ज्यादा नकली नोट नहीं हो सकती है। ऐसी दशा में केन्द्रीय बैंक के इस निर्णय के क्या मायने हैं? कुछ और स्पष्ट होता है। 

अंग्रेजी राज में क्राउन एजेंट करेंशी का व्यापार संभालते थे। पैसे छापकर विलायत से भारत भेजा जाता था। अंग्रेजों ने 1928 में नासिक में पहला छापाखाना लगाया। फिर देश में पैसे की छपाई शुरु हुई। परंतु आज भी इस व्यापार में 70 फीसदी भागीदारी विदेशी ही है। ब्रिटेन की प्रधानमंत्री के तीन दिनों के भारत प्रवास प्रसंग को ठीक से समझने की जरुरत है। उनकी इस यात्रा से पूर्व 10 डाउनिंग स्ट्रीट की विज्ञप्ति में दुविधा की स्थिति दिखती है। पहले उनके साथ आने वाले मेहमानों की संख्या 100 बताया गया। बाद में यह सिमट कर 40 हो गई। कभी लंदन के एक गली में 40 व्यापारियों ने मिलकर ईस्ट इंडिया कंपनी शुरु किया था, जिसमें बैंक आॅफ इंग्लैंड के नीति-नियंता शामिल थे। आप जानते हैं कि किन परिस्थितियों में कंजरवेटिव पार्टी का नेतृत्व थेरेसा मे को सौंपा गया था। उनके पति फिलीप जाॅन मे का इंवेस्टमेंट बैंकिंग सेक्टर और कंजरवेटिव पार्टी में नाम है। सन 1979 में फिलीप आक्सफोर्ड युनियन सोसाइटी के प्रेसिडेंट हुआ करते थे। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि इन्हें बेनजीर भुट्टो, जो बाद में पाकिस्तान की प्रधानमंत्री बनीं, ने कंजरवेटिव पार्टी स्टूडेंट डिस्को में मिलवाया था। थेरेसा ने आक्सफोर्ड युनिवर्सिटी से भूगोल में स्नातक करने के बाद बैंक आॅफ इंग्लैंड से कैरियर की शुरुआत किया। इस बैंक के लिए डेलारु जियोरी ही करेंशी छापती है। विदा होने से पूर्व उन्होंने इस विषय पर भी प्रकाश डाला कि नरेन्द्र मोदी की स्वतंत्र भारत के प्रधानमंत्रियों के बीच क्या स्थिति है। इससे साफ है कि ब्रिटेन के प्रधानमंत्री के पास कामनवेल्थ देशों के राष्ट्राध्यक्षों की ग्रेडिंग करने की भी शक्ति है। 

इस विषय में कोई राय कायम करने से पहले दो और तथ्यों का संज्ञान रखना आवष्यक है। संभव है कि इन दोनों बातों पर सहसा आपको यकीन नहीं हो। इसलिए इन्हें लिखने से पहले अंग्रेजी के दी हिन्दू, इंडियन एक्सप्रेस, गार्जियन और टेलीग्राफ जैसे प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में प्रकाशित खबरों के आधार पर मिली जानकारियों को जहां तक संभव हो सका है, विश्वस्त श्रोतों से सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया है। मैंने प्रिंट मीडिया में योगदान देते हुए डेढ़ साल व्यतीत किया था। यह घटना राजग सरकार के पिछले कार्यकाल के दौरान घटित हुई थी। इंडियन एयरलाइंस की काठमांडू से दिल्ली आ रहे विमान आईसी-814 का अपहरण हो गया। क्रिसमस से एक दिन पहले ऐसा हुआ था। और नए सहस्त्राब्दि की शुरुआत से पहले छः दिनों तक हाईप्रोफाइल ड्रामा चलता रहा। आतंकवादियों ने कई मुल्क के राजनेताओं की नींद उड़ा दिया था। 

उन दिनों जसवंत सिंह विदेश मंत्री थे। इसमें मसूद अजहर समेत तीन आतंकवादियों को तालीबान को सौंपा गया था। आतंकवादियों ने एक नवयुवक को मार दिया था और शेष 155 लोगों की जान बचाने में मिली सफलता को प्रचारित किया गया। भारत के इस मामले में स्वीट्जरलेंड की सरकार ने विशेष रुचि लिया था। इस कांड में मौत का शिकार हुए नवयुवक रुपीन कात्यान के अलावा एक ऐसा नाम भी उभरा था, जिसे पब्लीसिटी बिल्कुल ही नहीं पसंद है। दरअ़सल उस दिन करेंशी किंग राॅबर्टो जियोरी और उनकी महिला साथी क्रिश्चियाना कालेब्रेसी इसी विमान में मौजूद थे। 150 देशों की करेंशी के बेताज बादशाह जियोरी इटली में जन्मे और स्वीट्जरलेंड के रईस हैं। इसलिए स्वीस डिमांड के तहत यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना सर्वोपरि हो गया था। आप इस महानुभाव की एक तस्वीर तक ‘गुगल देव’ से नहीं प्राप्त कर सकते हैं। जियोरी जानते हैं कि उस यात्रा से दुरुस्त लौट कर आने की क्या कीमत थी। याद रहे कि इसके पूर्व ही उन्होंने राव सरकार को चेताया था। 

दूसरा वाकया समझना थोड़ा जटिल है। ब्रिटीश दैनिक गार्जियन में 12 अगस्त 2010 को डेलारु के विषय में प्रकाशित जो वूड और ग्रीमी वेर्डन की रिपोर्ट पर गौर करें। इसमें कंपनी के शेयर में गिरावट और चेयरमैन जेम्स हसी के त्यागपत्र का जिक्र है। चूंकि इस मामले को भारतीय लोगों से छिपाने की कोशिश की गई है, इसलिए इसकी जानकारी सत्ता को करीब से परखने वाले चुनिंदा लोगों को ही है। साल 2009-2010 के दौरान सीबीआई ने जाली नोट के सिलसिले में भारत नेपाल बाॅर्डर के पास 70 बैंक शाखाओं में छापेमारी की, जहां उन्हें नकली नोट बरामद हुए। प्रबंधकों ने बताया कि पैसे उन्हें भारतीय रिजर्व बैंक से प्राप्त हुए। फिर सीबीआई ने आरबीआई के तहखानों में छापेमारी की, जहां उन्हें बड़ी मात्रा में हजार और पांच सौ के जाली नोट प्राप्त हुए। नतीजा गार्जियन की रिपोर्ट में वर्णित है। विदित हो कि जेम्स हसी ब्रिटिश क्वीन एलिजाबेथ द्वितीय के धर्मपुत्र हैं। त्यागपत्र से पिछले वित्त-वर्ष में उन्होंने वेतन भत्ते के रुप में छत्तीस करोड़ रुपये प्राप्त किया था। डेलारु छोड़कर इसी धंधे की दूसरी युरोपियन कंपनी में चेयरमैन के विशेष सलाहकार की हैसियत से ज्वाइन किया।

उन्हीं दिनों की बात है तत्कालीन वित्त मंत्री ने नोटबदली लागू करने की योजना बनाई थी। परंतु अमली-जामा पहनाने में असफल रहे। आज केन्द्रीय बैंक जाली-नोट के धंधे से अपना दामन साफ करने में लगी है। आम लोग मारे जा रहे हैं। विपक्षी दल के नेताओं को कालेधन की चिंता सता रही है। कोई यह कहने को तैयार नहीं जब केन्द्रीय बैंक ही काला धन बैंको में भेज रहा था, तो काले और सफेद के बीच भेद ही खत्म हो गया। भूमंडलीकरण की शुरुआत के बाद यह तीसरा मौका है, जब भारत में लोग करेंशी-किंग की शक्तियों को अनजाने ही सही, पर झेल जरुर रहे हैं। कालेधन को खत्म करने वाले व्यक्ति अथवा समूह वर्षों से छोटे मूल्य के नोटों की पैरवी कर रहे हैं। यह कार्य उनकी अवधारणाओं के भी ठीक उलट ही है। इसके विश्लेषण से केन्द्रीय बैंक की मंशा स्पष्ट होती है। साथ ही यह भी स्पष्ट होता है कि ऐसा करने का लाभ किसे मिलेगा। 

भारतीय पारंपरिक अर्थशास्त्र की अवधारणा को कौटिल्य ने लिपिबद्ध किया था। वस्तुतः अर्थ का यह शास्त्र चाणक्य से भी पुराना है। वस्तु विनिमय के क्रम में एक वस्तु के सापेक्ष दूसरी वस्तु किस परिमाण (मात्रा, वजन व मूल्य) में होगा। इन्हीं बातों का विश्लेषण करने वाला विषय अर्थशास्त्र कहलाता है। गांवों की पुरानी व्यवस्था वस्तु विनिमय की प्रक्रिया को स्पष्ट रेखांकित करती है। कई लोगों को आज भी ध्यान होगा कि गांवों के दुकानदारों ने क्या व्यवस्था अपना रखी थी? खेतों में उपजने वाले अनाज अथवा दूसरी वस्तुओं के बदले इन दुकानों में ग्रामीणों को वांछित वस्तु की प्राप्ति हो जाती रही। इस अर्थशास्त्र में वह दोष नहीं था, जिसका सामना आज आम लोग यत्र, तत्र, सर्वत्र कर रहे हैं। अफरा-तफरी और गृह-युद्ध की स्थिति के कारक शास्त्र को अनर्थशास्त्र  ही कहा जाता है। फुर्सत नहीं निकाल पाने के कारण नोबल पुरस्कार नहीं लेने वाले अर्थशास्त्री ने इसका अर्थ बताते हुए कहा कि सरकार ने 125 करोड़ लोगों के साथ जुआ खेला है। जियां द्रेज साहब इसे शायद अर्थशास्त्र का अनर्थ कहें। मेरे गांव में तो लोग इसे ही अनर्थशास्त्र का अर्थ मानते हैं। क्या यह एडम स्मिथ का अर्थशास्त्र है? या फिर केन्द्रीय बैंकों का अर्थशास्त्र? सचमुच यह गंभीर समस्याओं का कारक साबित हुआ है। यह तो मौलिक अर्थशास्त्र भी नहीं है। खून से रंगी मुनाफाखोरी को हम अर्थशास्त्र कैसे कह सकते हैं। 

आधुनिक अर्थशास्त्र आधारहीन मुद्रा विनिमय की व्यवस्था पर आधारित है। सोने के बराबर मूल्य का टोकन मनी छापने की व्यवस्था खत्म हो चुकी है। उन्नीसवीं सदी में गढ़वाल के पहाड़ों में एक बिना ताज का बादशाह अपना सिक्का चलाया करता था। फ्रेडरिक विल्सन को स्थानीय लोग हुल सिंह कहते थे। आज भी भारत में अपनी करेंशी चलाने वाले लोग हैं। पिछले दिसंबर में भारतीय न्याय मंच ने अर्थशास्त्री रोशनलाल अग्रवाल के सम्मान में दो दिनों की परिचर्चा रखा था। इस दौरान भरत गांधी का व्याख्यान सुनने को मिला। उन्होंने बीते सालों में करोड़ों रुपये मूल्य की अपनी करेंशी जारी करने के विषय में जानकारी देकर मुझे चैंका दिया था। परंतु यह सब करेंशी-किंग जियोरी के साम्राज्य के सामने नगण्य ही है। 

इस प्रसंग में अमेरिका के नए राष्ट्रपति के विषय में जिक्र किया गया है। इस संयोग की पड़ताल में इंडिया फस्ट या अमेरिका फस्ट जैसा मिलता-जुलता जुमला याद कर सकते हैं। पर यह महज संयोग है, कोई समीकरण नहीं। करेंशी बदलने के सवाल से इसका कोई संबंध स्थापित करना मुश्किल है। हालांकि वहां साठ के दशक के अंत में तत्कालीन राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने डिमोनेटाइजेशन का फार्मूला लागू कर सौ डॉलर से ज्यादा मूल्य की करेंशी को चलन से बाहर कर दिया था। अब तक के अमेरिकी इतिहास में वही एक राजनेता हैं, जिसे महाभियोग से बचने के लिए त्यागपत्र देना पड़ा हो। डोनाल्ड ट्रंप के इस जीत की भविष्यवाणी करने वाले विशेषज्ञ एलन लिचमैन ने उन पर महाभियोग चलने के विषय में भी दावे से कहा है। पर यहां मुझे अमेरिका के तीसरे राष्ट्रपति थोमस जेफरसन की बात याद आती है। अट्ठारहवीं सदी में ही उन्होंने कहा था, ‘मैं समझता हूं कि बैंकिंग संस्थान हमारी स्वतंत्रता के लिए सेवारत सैनिकों से भी ज्यादा खतरनाक हैं’। जेफरसन अमेरिका के राष्ट्र निर्माताओं में से एक थे। डिक्लेरेसन आॅफ इंडिपेंडेंस का मूल ड्राफ्ट उन्होंने ही लिखा था। कर्ज और करेंशी के बूते राज करने वाले युरोपियन क्राउन एजेंट्स का मुकाबला करने में एंड्रयु जैक्सन और अब्राहम लिंकन जैसे अमेरिकी राष्ट्रपति के नाम गौरव से लिए जाते हैं। इन महान राजनेताओं ने पूंजी के साम्राज्य को चैलेंज किया था। अमेरिकी स्वतंत्रता के पुरोधाओं को इसकी समुचित जानकारी थी। 

आज वहां भी कम ही लोग इस विषय में दुरुस्त जानकारी रखते हैं। पूंजी से जीतना आसान नहीं है। बैंकनोट प्रिंटिंग के रहस्यों को उजागर करने के लिए 1983 में अमेरिकी लेखक टेरी ब्लूम ने एक किताब, ‘दी ब्रदरहुड आॅफ मनीः दी सीक्रेट वर्ल्ड आॅफ बैंकनोट प्रिंटर्स’ लिखी थी। करेंशी व्यापार को नियंत्रित करने वाले प्रतिष्ठान से जुड़े दो प्रतिनिधियों ने प्रिंटिंग प्रेस से सारी की सारी किताबें उठा लिया था। आज तक यह किताब बाजार का मुंह नहीं देख सका है। इसके पूर्व कूगन द्वारा 1935 में लिखी ‘मनी क्रियेटर्स’ जैसी थोड़ी सी किताबें ही उपलब्ध रही हैं। हालांकि सूचना-क्रांति के काल में इस विषय में ज्ञान को लेकर अकाल कायम नहीं रहा। कई विद्वानों ने जान की परवाह न कर ज्ञान को आम लोगों तक पहुंचाने का काम किया है। इस विषय में क्लाउज बेंडर की ‘मनी-मेकर्सः दी सीक्रेट वर्ल्ड आॅफ बैंकनोट प्रिटिंग’ ज्ञान का भंडार है। पिछले साल दिसंबर में प्रकाशित इतिहासकार पाॅल कहन की किताब ‘दी बैंक वार’ की विषयवस्तु भी यही है। यह अमेरिकी बैंक को बराबर मूल्य के सोना और चांदी की डिपोजिट के लिए बाध्य करने वाले राष्ट्रपति एंड्रयु जैक्सन और सेंट्रल बैंक की योजना को मूर्तरुप देने में लगे बैंकर निकोलस बीडल के बीच की जंग का व्यौरा प्रस्तुत करता है। यह वही योजना थी, जिसने एक सदी बाद संयुक्त राज्य अमेरिका के आम लोगों का सारा सोना (गोल्ड) हड़प लिया था।

अमेरिकी कांग्रेस में एक सुनवाई के दौरान सन 1911 में टी.कशिंग डेनियल ने कहा था कि हमें राष्ट्र के पैसे पर कंट्रोल करने दो, और फिर परवाह नहीं, कानून कौन बनाता है। दरअ़सल बैंकर और फाइनेंसर धन आपूर्ति को नियंत्रित कर व्यापार रोकने में लगे थे। इस विषय में संसदीय कार्यवाही चल रही थी। डेनियल ने ऐसा पूंजी के साम्राज्य पर काबिज बैंक आफ इंग्लैंड के नियंताओं के बीच लंबे समय से प्रचलित कहावत को याद करते हुए कहा था। अट्ठारहवीं सदी के युरोपिन बैंकर मेयेर एंसेल रेडशिल्ड को उद्धृत कर यहां तक कहा जाता है, ‘मुझे राष्ट्र का धन निर्गत और नियंत्रित करने दो, और मुझे कोई परवाह नहीं, कानून कौन बनाता है’। यहां ‘हम’ से ‘मैं’ के बीच का जटिल फासला है। मुनाफाखोरी की मंशा इन्हीं शब्दों में निहित है। आधुनिक लोकतंत्र के सामने मुंह बाए सवालों की जड़ में यही संकट है। 

वास्तव में पूंजी के नियंताओं ने कवियों की उक्तियों में अपनी युक्ति फिट कर नया मंत्र पेश किया था। मेरे ताऊजी कवियों की बातों का अक्सर जिक्र करते हैं। सोलहवीं शताब्दि के कवि सर फिलीप सिडनी के बारे में प्रसिद्ध है कि क्वीन एलिजाबेथ के कोर्ट में उनका जादूई प्रभाव था। उन्होंने कहा, ‘मुझे राष्ट्र के गीत गढ़ने दो, और फिर परवाह नहीं, कानून कौन बनाता है’। सत्तरहवीं शताब्दि में स्काॅटलेंड के प्रसिद्ध लेखक और राजनेता एंड्रयु फ्लेचर ने भी उनकी बातों को दुहराया है। शहर के सफेदपोशों के बीच एक ऐसी ही पुरानी कहावत है, ‘हमें शहर का कोतवाल नियुक्त करने दो, और हमें परवाह नहीं, कानून कौन बनाता है’। ये बातें शक्ति के केन्द्र की ओर इंगित करता है। इन तीनों बातों के इर्द-गिर्द पसरे तथ्यों को ध्यान में रखकर आज की परिस्थिति पर गौर करना चाहिए। फिर स्पष्ट होगा कि करेंशी-किंग सचमुच बेताज-बादशाह हैं। इस बादशाह को चैलेंज करना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन हो गया है।

भारत के प्रधानमंत्री ने एक गोपनीय निर्णय को टी.वी. पर घोषित किया है। यह अपराध से अर्जित कालेधन को खत्म करने की कथित मुहिम है। ऐसा करने वाले ‘साहब’ शायद यही समझते हैं कि इन लोगों को जमीन, मकान, पेंटिंग्स और दूसरे ऐसे निवेशों के विषय में कोई जानकारी ही नहीं है। ऐसा करने से पहले ‘साहब’ को अपने ही दल के चुनावों में कालेधन का प्रयोग सख्ती से बंद कर साहबी दिखानी थी। आखिरकार सवाल वहीं है कि यह आदेश सचमुच किसने जारी किया? क्या नेताजी सुभाष चंद्र बोस के मुल्क को यह जानने का अधिकार भी नहीं रह गया है? इसी देश की आजादी के लिए उन्होंने खून मांगा था।

अफ्रीकी विद्वान इब्न बतूता ने भारत के एक विद्वान मुस्लिम बादशाह का जिक्र किया है। इस बादशाह ने अपनी राजधानी दिल्ली से देवगिरि (दौलताबाद) निर्धारित किया। एक व्यक्ति चलने में असमर्थ था। अपाहिज की फरियाद बादशाह तक पहुंचने पर फरमान जारी हुआ कि इसे हाथी के पांव में बांध कर वहां भेजा जाय। बादशाह ने फिर राजधानी दिल्ली शिफ्ट करने का भी आदेश दिया था। नोटबंदी के आदेश के बाद ‘साहब’ की तुलना उसी बादशाह से हो रही है। परंतु ‘साहब’ के पास इससे बचने का एक मौका अभी भी शेष है। भाजपा के पूर्व महासचिव गोविंदाचार्य ने इस विषय में कहा है, ‘खोदा पहाड़ निकली चुहिया’। उन्होेंने रेल हादसा में मारे गए लोगों की तरह इस आदेश के कारण मौत का शिकार हुए चालीस लोगों को मुआवजा देने की मांग किया है। भाजपा भी लोगों को राहत देने के लिए नई युक्तियों को अपनाने में लगी है। यह अजीबोगरीब स्थिति है। जिसमें बातें राहत देने की होती है, और कोशिशें जान लेने की।

कुछ महीनों बाद यह अफरा-तफरी खत्म हो चुकी होगी। फिर देश में आम लोगों का क्या हाल होगा, इसका अंजादा भी कतार में खड़े लोगों को शायद नहीं है। इस आंधी के थमने पर घोर सन्नाटा पसरने वाला है। स्वदेशी व्यापार की रीढ़ टूट जाएगी। बाजार में महामंदी पैर पसार चुकी होगी। और मंहगाई का आलम पिछला सभी रिकार्ड तोड़ चुका होगा। पर एक दिन उत्पात थम जाएगा और शांति भी अवश्य होगी। यह आज तभी संभव है, जब सभी सहमति का मार्ग खोजने की ओर चलें। राजनीतिक लाभ के हथकंडे अपनाने में लोग पीड़ित जनता की तकलीफ कम करने को तैयार नहीं प्रतीत होते हैं। स्वाधीनता का स्वांग सजाने से ऐसे अत्यंत दुखद अन्याय भी लाजिमी हो जाते हैं । 

इस मामले में भारतीय न्याय मंच की अनुशंसा निश्चय ही गौर करने योग्य है। इसमें सहमति का ऐसा मार्ग प्रस्तुत किया गया है, जिसमें सांप भी मर जाए और लाठी भी नहीं टूटे। इसके लिए सरकार को नोटबदली अमल में लाना होगा, नोटबंदी नहीं। आखिर टैक्स डिपार्टमेंट की अक्षमता का खामियाजा कब तक आम लोगों को चुकाना होगा? यदि जनहित में सरकार 31 मार्च 2017 के समय सीमा तक लोगों को पुरानी करेंशी में फंड-फ्लो के लिए अधिकृत करे तो निश्चय ही अफरा-तफरी से निजात मिल सकती है। ऐसा करने से वास्तव में ‘साहब’ की साहबी पर कोई आंच नहीं आएगी और गृह-युद्ध के बादल भी छंट जाऐंगे। 

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(यह आलेख नोटबंदी के फरमान से व्यथित पंचायती लोगों के आग्रह पर कौशल किशोर द्वारा आॅल इंडिया पंचायत परिषद के मुखपत्र ‘पंचायत संदेश’ के लिए लिखा गया है। जनहित में इसे साझा करने पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है। बल्कि हमें अच्छा लगेगा। सूचित भी करें तो बहुत अच्छा।)

गौवंश रक्षा मुहिम 

कौशल किशोर | Follow @HolyGanga

सात नवंबर का दिन गौवंश रक्षा आंदोलन के इतिहास में अहम है। ठीक पचास साल पहले इसी दिन गौवंश रक्षा हेतु साधु-संतों ने बलिदान दिया था। 7 नवंबर 1966 के आंदोलन में प्रभुदत्त ब्रह्मचारी, करपात्री महाराज, विनोबा भावे और तत्कालीन संघ प्रमुख गोलवरकर प्रमुख नेता थे। समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया इस मुहिम को समर्थन देने वालों में प्रमुख थे। देश के विभिन्न भागों से दिल्ली पहुंचने वाले आम लोगों की संख्या लाखों में थी। सभी ने मिलकर संसद भवन घेरकर तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार के हाथ-पांव फूला दिए थे। आखिर उस दिन हुतात्मा चौक पर ऐसा क्या हुआ कि सरकार ने प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलवाई और कुर्बानियों का सिलसिला शुरू हुआ। गौवंश रक्षा की इस मुहिम के शहीदों की संख्या खुला-रहस्य है।

आज इस आंदोलन की पृष्ठभूमि, वर्तमान स्थिति और भविष्य की रूपरेखा के विषय में गौर करने का दिन है। हजारों लोग इसी उद्देश्य से दिल्ली पहुंचे हैं। 1857 की क्रांति के पीछे एक प्रमुख वजह गौवंश रही है। महर्षि दयानन्द सरस्वती का आर्य समाज 1875 से इसकी पैरवी कर रहा है। आजादी की लड़ाई के अंतिम कालखंड में महात्मा गांधी ने गौवंश रक्षा की बात को अंग्रेजी राज का खात्मा करने से भी यादा जरूरी करार दिया था। इसी मुद्दे पर स्वतंत्र भारत का सबसे विशाल जन आंदोलन दर्ज है। आज गो भक्त उस आंदोलन के हुतात्माओं की याद में गोल्डन जुबली मना रहे हैं। 

इस बीच फर्जी गौरक्षकों का मामला भी उछला है। गुजरात के ऊना में गौरक्षा के नाम पर सक्रिय बदमाशों ने दलितों की बेतहाशा पिटाई कर बवाल मचाया था। इस घटना से प्रधानमंत्री का दुखी होना लाजिमी है। उन्होंने 80 फीसदी गौरक्षकों को फर्जी बताकर राय सरकारों को डोजियर तैयार करने का निर्देश दिया था। इस बीच, गौरक्षा आंदोलन के गोल्डन जुबली का दायरा फिजां में पनपने लगा। पचास साल पहले चंद फर्जी गौरक्षकों ने उत्पात मचाया था। क्या सचमुच अब गौरक्षकों के बीच फर्जी लोगों की भागीदारी 80 फीसदी तक पहुंच गई है? या फिर टाउनहाल में प्रधानमंत्री की जुबान फिसल गई थी? प्रधानमंत्री ने अपने उसी संबोधन में पॉलिथिन खाकर मरने वाली गायों की ओर गो रक्षकों का ध्यान आकृष्ट किया था। इन पचास सालों में पैदा हुई यह नई समस्या है। इसे नजरअंदाज कर सचमुच गो रक्षा की बात नहीं हो सकेगी। यह गायों का दुर्भाग्य है कि वास्तव में इस विषय में मजबूरी और पाखंड गड्डमड्ड हो गया है। संत गोपाल दास और भाजपा के पूर्व महासचिव गोविंदाचार्य जैसे लोग सचमुच इस आंदोलन को गति देने में लगे हैं। लेकिन दुर्भाग्यवश इस पर राजनीति ही होती रही है।

पंचायती राज के बिना ग्रामोदय से भारतोदय का सपना अधूरा

कौशल किशोर | Follow @HolyGanga 

​आज महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज के सपने को साकार करने की कोशिशों को सौ साल से ज्यादा वक्त बीत चुका है। इस क्रम में हुए कार्यों पर गौर करने पर लोकनायक जयप्रकाश नारायण, बलवंतराय मेहता और पंडित बिनोदानंद झा का नाम सबसे ऊपर मिलता है। इन विभूतियों का अविस्ममरणीय योगदान है कि देशभर की पंचायतों को एकसूत्र में बांधने के लिये पंचायतों की परिषद बनाई गई। दरअ़सल 1958 में ही अखिल भारतीय पंचायत परिषद की स्थापना हुई थी। तब से अब तक परिषद की महासमिति ने कुल 91 बैठकें की हैं। इन बैठकों को महापंचायत कहा जाता है। इन्हीं महापंचायतों का नतीजा है कि पंचायती राज को तीसरी सरकार के रुप में संवैधानिक दर्जा प्राप्त हुआ। हाल में हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में हुई पिछली महापंचायत में साफ हो गया था कि यह उपलब्धि इस संकल्प का आखिरी विराम कतई नहीं है।

ग्राम स्वराज ही गांधी के हिन्द स्वराज का मूलमंत्र है। इस सपने को साकार करने के लिए पंचायत परिषद के नेताओं का बलिदान सर्वोच्च कोटि का माना जाता है। आज अखिल भारतीय पंचायत परिषद ग्राम स्वराज के सपने को जमीन पर उतारने के लिए पूरी निष्ठा के साथ प्रतिबद्ध है। हाल में इन्हीं विषयों में गंभीर विचार-विमर्श पर बल दिया गया है। पिछली महासमिति में संविधान के 73वें संशोधन और 14वें वित्त आयोग की सिफारिशों पर जोरदार बहस हुआ और कई अतिमहत्वपूर्ण निर्णय लिए गए। इन्हें जमीन पर उतारने के लिए आज देशभर में जन जागरण अभियान चलाया जा रहा है।

नब्बे के दशक में नरसिंह राव सरकार के दौरान 73वां संविधान संशोधन किया गया था। तभी से इसे लागू करने की बातें चल रही हैं। पंचायतों की सूची में शामिल 29 विभागों की स्थिति पर केन्द्र सरकार का रुख सामने है। बीते पंचायती राज दिवस पर वैंकैया नायडू ने भी एक बार फिर इसे दुहराया था। परिषद का मानना है कि संविधान के इस संशोधन को सही मायनों में जमीन पर उतारे बगैर ग्राम स्वराज का स्वप्न साकार नही हो सकेगा। महापंचयत में परिषद ने सभी राज्यों में इस व्यवस्था को लागू कराने का निर्णय लिया है। इसके लिए अब एक मात्र संघर्ष का रास्ता ही शेष बचा है। उत्तर प्रदेश में पंचायत के सभी स्तरों पर योग्य लोगों को जिम्मेदारियां सौंपी जा रही है, तो पंजाब और दिल्ली ने इस कवायद को दुहराने की जरुरत पर बल देना शुरु किया है। इस सूची में देश के सभी राज्य और केन्द्रशासित प्रदेश शामिल हैं। आज व्यापक जन संपर्क की जरुरत है। पंचायती राज संस्थानों की मजबूती और ग्राम-स्वराज के लिये एक प्रभावी आंदोलन की आवश्यकता है।

ऐसा प्रतीत होता है कि पिछले साल डा. वाई.वी. रेड्डी ने 14वें वित्त आयोग की सिफारिशों में पंचायतों के लिए 10 फिसदी बजट बढ़ा कर उन्हें मजबूत करने का प्रयास किया है। निश्चय केन्द्र ने पंचायतों को दो लाख दो सौ बिरानवे करोड़ की बड़ी रकम उपलब्ध कराने का प्रावधान किया है। क्या इसमें पांच सालों के लिए निर्धारित रकम को एक मुस्त दर्शाने से वाहवाही की मंशा जाहिर होती है? महापंचायत में पहुंचे पंचायतों की राजनीति में सक्रिय प्रतिनिधियों की दिन भर चली चर्चा में प्रायः सभी विद्वानों का मतेक्य इस बात में था कि वित्त आयोग ने जिला परिषद को किनारे करने का काम कर पंचायती राज संस्थानों को कमजोर किया है। इसी वजह से आज परिषद के लोग भाजपा से जुड़े स्वदेशी जागरण मंच और मजदूर तथा किसानों के हितों की पैरोकार उनके अनुसांगिक संगठनों की तरह ही जनविरोधी नीतियों के प्रति खुलकर नाराजगी जाहिर कर रहे हैं। सरकार की लोकप्रियता को प्रभावित करने वाले मसलों में निश्चय ही इसकी अपनी अहमियत है। किसी भी सूरत में इसे नकारना अनुचित ही होगा।

इक्कीसवीं सदी में कुपोषण की समस्या विकाराल हो रही है। इसे दूर करने के लिए आंगनवाडी नामक कार्यक्रम शुरु किया गया। वर्ल्ड बैंक पोषित इस स्कीम का बजट 2000 से 2013 के बीच बीस हजार करोड़ तक पहुंच गया था। सोलहवीं लोक सभा चुनाव के बाद सत्ता में आई सरकार ने इसे आधा से भी कम कर दिया। यह एक ऐसी समस्या है, जिसका विरोध मेनका गांधी जैसे सरकार के अपने सहयोगियों ने भी किया है। झारखंड जैसे सूबे में आज भी तीस फिसदी बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। आंकड़े बताते हैं कि विकास के दौर में पिछड़े राज्यों की हालत ज्यादा खराब है। कुपोषण के शिकार भूखे बच्चों की समस्या का संज्ञान लेकर परिषद ने सभी स्तरों पर इसे उठाने का निर्णय लिया है।

देश में भूखमरी की स्थिति दिन-ब-दिन भयावह होती जा रही है। रिपोर्ट में दर्ज है कि आज हिन्दुस्तान में भूखे सोने को विवश कितने लोग हैं। करीब सत्तर लाख भारतीय पीने के लिए स्वच्छ जल से भी वंचित हैं। एक व्यक्ति भोजन व्यर्थ करते हुए सोचता नहीं है कि दूसरा व्यक्ति ऐसा भी है, जिसके पास दो जून की सूखी रोटी भी नहीं है। यह किसी भी सभ्य समाज की गरिमा के अनुकूल नहीं माना जा सकता है। पिछले साल न्यूयार्क में हुए संयुक्त राष्ट्र के सत्तरवें शिखर सम्मेलन के दौरान अगले 15 सालों में भूख को एकदम निर्मूल करने का संकल्प लिया गया था। यह संकल्प सरहानीय है, परंतु केन्द्र और राज्य की सरकारों के बूते इस जंग को जीतना संभव नहीं है। पंचायत परिषद इस विषय में की जा रही कोशिशों को प्रभावी और व्यापक बनाने की दिशा में सतत प्रयत्नशील है। तीनों स्तरों पर कार्यरत पंचायत प्रतिनिधियों की प्राथमिकताओं में यह अग्रणी है। इस विषय में सफलता अर्जित करने के लिए अभिजात्य वर्ग की उदासीनता दूर होनी चाहिए। परिषद ने भोजन और काम के अधिकारों को मौलिक आवश्यकता के रुप में चिन्हित किया है। वंचित ग्रामीण समाज इस समस्या के कारण पलायन को विवश है। यह महानगरों पर बढ़ते बोझ की एक बड़ी वजह साबित होती है। सरकारों को इस विषय में गंभीरता दिखानी होगी। ‘राइट टू फूड’ और ‘राइट टू वर्क’ को देश-विदेश में सराहा गया। इसे मजबूत और प्रभावी बनाने की जरुरत है।

दिल्ली में तीन सौ से ज्यादा पंचायतें हैं। ग्रामीण और शहरी का भेद दिल्ली के इन गांवों में साफ दृष्टिगोचर होता है। अस्सी के दशक में इन पंचायतों में आखिरी बार चुनाव हुए थे। 1983 से अब तक इन गांवों में पंचायत चुनाव नहीं हुए हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ग्राम सभा के सापेक्ष मोहल्ला सभा की पैरवी कर रहे हैं। यह इस क्षेत्र में एक गंभीर मामला है। गांवों को पंचायत के अधीन ही होना चाहिए। राज्य पंचायत परिषद से जुड़े नेताओं मानना है कि दिल्ली की पंचायतें लोकनायक, बलवंतराय मेहता और महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज के सपनों को साकार करने के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। इस लड़ाई को लड़ने की योजना पर दिल्ली राज्य पंचायत परिषद काम कर रही है। अखिल भारतीय पंचायत परिषद ने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के सभी सहमना संस्थानों को एकजुट होकर इस मुद्दे पर सक्रिय होने की अपील किया है।

हाल में केन्द्र और राज्य की सरकार में शामिल जनप्रतिनिधियों की वित्तीय क्षमता में अभिवृद्धि हुई है। विधायकों और सांसदों को प्राप्त होने वाले भत्तों में हुई अप्रत्याशित वृद्धि सुर्खियों में रही है। पंचायतों के लिए चुने गए जनप्रतिनिधि गांव, ब्लॉक और जिला स्तर पर सतत कार्यरत हैं। उन्हें विधायकों और सांसदों की तरह वित्तीय सुविधाएं नहीं प्राप्त हैं। अर्थाभाव के कारण विभिन्न सामाजिक-राजनैतिक कार्याें पर इसका सीधा असर पड़ता है। अखिल भारतीय पंचायत परिषद देशभर के पंचायत प्रतिनिधियों को बेहतर वेतन-भत्ता दिए जाने की पूरजोर पैरवी करती है। राज्य और केन्द्र की सरकारों को इस विषय में सहानुभूतिपूर्वक विचार करना चाहिए। ग्रामोदय से भारतोदय का सपना ऐसा किए बगैर सपना ही रह जाएगा। इसे साकार करने और परिषद के अन्य कार्यों को सुचारु रुप से जारी रखने के लिए नए पदाधिकारियों को नियुक्त किया गया है।

अखिल भारतीय पंचायत परिषद के अध्यक्ष सुबोधकांत सहाय वर्षों से कांग्रेस पार्टी से जुड़े हैं। यहां 2003 से लगातार तीन बार चुनाव जीतने का रिकार्ड उनके नाम है। हालांकि इस बीच हुए कई कार्यों पर सवाल भी खड़े होते हैं, जिन्हें दूर करने के लिए सार्थक पहल भी नहीं हुए। इसका मतलब यह भी नहीं है कि एक गैर-राजनीतिक संस्थान को किसी पार्टी से जोड़ने से समस्याएं हल होने वाली हैं। परिषद यह बात बार-बार दुहराती रही है कि यह न कांग्रेस पार्टी की है और न ही किसी दूसरी पार्टी की है। इसमें हर पार्टी के लोग हो सकते हैं। दलीय राजनीति के दलदल से दूर मूलतः पंचायतों के लिए समर्पित यह एक स्वायत्तशासी संस्थान है, जो केरल और पश्चिम बंगाल की पंचायतों में बढ़े राजनैतिक दलों के हस्तक्षेप का भी समर्थन नहीं करती है। इसकी स्थापना तीनों स्तरों पर कार्यरत पंचायती राज संस्थानों को मजबूती प्रदान करने के लिए हुई। इस कार्य के लिए देशभर की पंचायतों से प्रतिनिधियों को चुनने का काम राज्य की स्थानीय परिषदों को दिया गया है। मेहता के संविधान में तीन प्रतिशत ब्लॉक के प्रतिनिधित्व का प्रावधान किया गया था। संसद और विधान भवनों में मौजूद दलों को अभी तक इस परिषद की व्यवस्था में पैठ बनाने में सफलता नहीं मिली है। परंतु क्या राजनैतिक दलों ने पंचायत परिषद में पैठ बनाने का निर्णय लिया है? आज पंचायत परिषद इस सवाल से जूझते हुए ग्राम स्वराज के सपने को साकार करने में लगी है।

Published in Hindi Monthly PAHAL 

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