गंगा की मुक्ति के लिए सत्याग्रह

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कौशल किशोर | Follow @HolyGanga

पेयजल और स्वच्छता मंत्री उमा भारती ने रविवार, 1 जुलाई को एक खत लिखा है। यह खत देश के पर्यावरण वैज्ञानिकों में अगुवा और केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पहले सदस्य सचिव से कालांतर में संन्यासी हुए गंगापुत्र स्वामी सानंद को संबोधित है। गंगा अवतरण के अवसर पर 22 जून को उन्होंने एक बार फिर आमरण अनशन शुरू किया। उमा जी ने उन्हें ही अपने गंगा अभियान का मार्गदर्शक एवं प्रेरणा बिन्दु बताते हुए अनशन खत्म करने का आठ साल पुराना आग्रह ही इसमें भी दुहराया है। गांधीवादी सत्याग्रही से इसी आशय का भावपूर्ण निवेदन इस मामले के मंत्री नितिन गडकरी भी कर चुके हैं। गंगा की मुक्ति के इस पैरोकार की वजह से आज केन्द्र और राज्य की सरकारें मुश्किलों का सामना करने को विवश है।

इस बार तपस्थली के तौर पर उन्होंने गंगापुत्र निगमानंद की हरिद्वार स्थित समाधि को चुना है। इसी जगह सात साल पहले दुनिया भर की मीडिया हिन्दूओं के आस्था की प्रतीक मां गंगा के लिए शहादत देने वाले महावीर को श्रद्घा सुमन अर्पित करने पहुंची थी। बीते दो दशकों में मातृ सदन नामक यह आश्रम गंगा आन्दोलन का एक असाधारण केंद्र साबित हुआ है। दलीय राजनीति के दलदल से दूर यह एक ऐसा स्थान है, जहां उनको समर्थन देने सभी विचारधाराओं के लोग खुले मन से पहुंच रहे हैं। रूड़की स्थित दक्षिण एशिया के सबसे पुराने इंजीनियरिंग संस्थान के इस शीर्ष विद्यार्थी को यहां स्वामी शिवानंद जैसा निहायत भरोसेमंद साथी मिलता है। पश्चिम बंगाल के प्रतिष्ठित जाधवपुर विश्वविद्यालय के इस रसायन शास्त्री को गोविंदाचार्य जैसे विलक्षण विभूति ने वेदों के सर्वोच्च विद्वानों में से एक माना है। सही मायनों में इस आन्दोलन को समर्थन देने वालों की कोई कमी नहीं है। तमाम मीडिया में खबरें भी दिख रही है। तथापि यह सत्याग्रह हाल के समय के बहुचर्चित जनान्दोलनों की तरह सूर्खियों से एक तरह की दूरी भी कायम रखे है। इसका यह मतलब नहीं है कि यह कोई प्रभावी आन्दोलन नहीं है। गांधीजी महात्मा कहलाने से पहले जनात्मा से एक व्यवहारिक संबंध स्थापित कर चुके थे। इन महात्माओं की तपस्या ही जनात्मा को जागृत करने का काम करेगी। ईक्कीसवीं सदी में शेष बचा उपाय भी यही है।

उसी दिन स्वामी सानंद ने जवाब भी लिखा है। पुराने आग्रह के प्रत्युत्तर में पिछली ही बात दुहराते हुए लिखते हैं, “मैं अपना भार छोटी बहन के कंधों पर पर डालने को कभी तैयार नहीं हो सकता।” यहां गंगा दशहरा के अवसर पर प्राणांत तक के लिए उपवास करने के संकल्प का भी जिक्र है। साथ ही उन दोनों पत्रों का उल्लेख है जो उन्होंने मां गंगा की पुकार सुनकर काशी पहुंचने वाले छोटे गंगापुत्र को इसी विषय में लिखा था। चार सूत्रीय मांग के साथ शुरु हुए इस सत्याग्रह का वास्तविक लक्ष्य गंगा नदी की अविरलता सुनिश्चित करना है। यहां संन्यास से पूर्व 2009 में किए सत्याग्रह का भी व्यौरा है। उमा जी ने इसे उनका सफलतम कार्य बता कर क्या यह नहीं स्पष्ट कर दिया है कि जिस सफलता की आशा इस तपस्या में परिणत हुई है, उसका क्या हश्र होने जा रहा है? अब की बार प्रशासन के सामने सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किया हुआ लक्षमण रेखा भी मौजूद है। अंग्रेजों के जमाने से अनशनकारियों के खिलाफ खूब कारगर साबित हुई आईपीसी की धारा 309 के तहत उन्हें गिरफ्तार करने की प्रक्रिया को 2013 में ही उच्चतम न्यायालय अनुचित मान चुकी है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या मां गंगा के सुपुत्र माने जाने वाले स्वामी सानंद दूसरे विनोबा भावे साबित होंगे? आज वह निगमानंद और नागनाथ की तरह हर पल आत्म बलिदान की ओर बढ़ रहे हैं। क्या यह सब देखने सुनने वाले मेरे जैसे आम लोगों को इतिहास गंगा कुपुत्र ही नहीं मानेगा?

पिछले एक दशक में उन्होंने कई बार गंगा की अविरलता के लिए तपस्या किया है। इसी सूत्र की कड़ियां पिरोते हुए उन्हें लोगों ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ पीछे दिल्ली में देखा था। दोनों एक सुर में कहते हैं। अविरलता के बिना गंगा निर्मल नहीं होगी। एक दशक पहले उन्होंने गंगा पर लिखी मेरी किताब के लोकार्पण में शामिल होकर मुझे अनुग्रहीत किया था। उनकी बातें मेरे कानों में अब भी गूंज रही है। किसी हिन्दू के लिए गंगा जल कोई साधारण पानी नहीं है, बल्कि यह जीने और मरने का सवाल है। आज फिर वही बातें चहुँओर गुंजायमान है। इसकी सार्थक परिणति अविरलता के सवाल से मुंह मोड़ कर तो संभव ही नहीं है। इस सवाल पर दो गंगापुत्रों के बीच की संवादहीनता एक ऐसी चक्की न बन कर रह जाय, जिसमें गंगा की मुक्ति का मामला न जाने कब तक पिसता रहे।

सिंचाई, बिजली उत्पादन, पेयजल और बाढ़ नियंत्रण के नाम पर आज उत्तराखंड में पंचेश्वर परियोजना पर जोड़ दिया जा रहा है। पंपिंग सिस्टम और भूजल संरक्षण की तकनीकी नहरों से होने वाली सिंचाई की व्यवस्था को आज बौना साबित कर चुकी है। हम उन्नीसवीं सदी के प्रोबे काॅटले युग के बाद एक लंबा सफर तय कर चुके हैं। देश में ऊर्जा और पानी का रिश्ता ऐसा हो गया है कि पानी बचाने के लिए बिजली बिल में राहत दी जाने लगी है। वैकल्पिक ऊर्जा श्रोतों के बराबर दोहन से पनबिजली परियोजनाओं की जरूरत पूरी हो सकती है। दिल्ली जैसे महानगरों को पेयजल की आपूर्ति के लिए यमुना समेत उन सभी पुराने श्रोतों को जीवित करने की जरूरत है, जिनके खात्मे का नजारा लोगों ने पिछले पचास सालों में नंगी आंखों से देखा है। जहां तक बाढ़ नियंत्रण का प्रश्न है, आंकड़े साफ बताते हैं कि बांधों ने बड़ी विभीषिकाओं से रु-ब-रु कराया या नदियों ने। इन चारों ही समस्याओं पर विचार किए बगैर कोई ऋषि या वैज्ञानिक धरना देने की बात सोच भी नहीं सकता है।

एक दशक होने को है जब दुनिया भर के हिन्दूओं और प्रकृति प्रेमियों ने उनकी मांग का समर्थन किया था। फिर सरकार ने गंगा के अपस्ट्रीम में बन रही लोहारी नाग पाला और दूसरी पनबिजली परियोजनाओं को तत्काल प्रभाव से बंद कर दिया था। इसके पांच साल बाद 2013 में किये अनशन के दौरान सरकार ने मांगों को अनसूना किया। फलतः राष्ट्रीय गंगा नदी घाटी प्राधिकरण के राजेन्द्र सिंह, रवि चोपड़ा और राशिद सिद्धकी जैसे सम्मानित सदस्यों ने इस्तीफा दे दिया था। इससे सरकार की खूब किरकिरी हुई। स्वामी सानंद जैसे तपस्वी संत उस लाॅबी के निशाने पर रहे हैं, जो हिमालय में बांधों की पैरोकार है। इससे जुड़े लोगों ने स्वार्थवश उन्हें अमेरिकी एजेंट तक बताया था। यहां एक बात और नहीं भूलना चाहिए। इसी बीच उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत की एक ऐसी प्रतिक्रिया सामने आती है, जिसका इस मामले से कोई सीधा संबंध नहीं है। उन्होंने संकटग्रस्त वृद्ध एकल शिक्षिका उत्तरा बहुगुणा की शिकायत सुनने के बदले अपना रूतबा प्रदर्शित कर अच्छा नहीं किया है। क्या राजनैतिक गरिमा के इस तरह से होने वाले हनन का शिकार कल स्वामी सानंद नहीं होंगे? यह सवाल असहज करने के लिए आज पर्याप्त है।

इन पत्रों को पढ़ कर कुछ बातें शीशे की तरह साफ है। इस अनशन की एकादशी पर गांधीवादी सत्याग्रही से बातचीत शुरू हुई है। भले ही इस औपचारिक संवाद का अंदाज अनौपचारिक है। नितिन गडकरी और उमा भारती जैसे अनन्य गंगा भक्त इस अनशन की समाप्ति चाहते हैं। प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री से बात कर इस मामले की वाजिब परिणति की रूप-रेखा तैयार करने की आवश्यकता है। फिर छियासी वर्षीय वयोवृद्ध संत की जान बचाने का लाभ सत्तारूढ़ गठबंधन को मिल सकता है। ऐसा नहीं होने से भारतमाता का आंचल तीसरे गंगापुत्र के रक्त से सन कर और दागदार ही होगा।

(कौशल किशोर “दी होली गंगा” पुस्तक के लेखक और “पंचायत संदेश” के प्रबन्धन संपादक हैं)

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नजरिया विदेशी और महिलाएं भारतीय

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थाॅमसन रायटर्स फाउंडेशन महिलाओं से जुड़ी बेहद सनसनीखेज रिपोर्ट मंगलवार, 26 जून को जारी करती है। इसमें भारत को महिलाओं के लिए दुनिया भर में सबसे असुरक्षित देश कहा गया है। महिला और बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने इसे सिरे से खारिज कर दिया है। इस फाउंडेशन की मुखिया मोनिक विला ने तथ्यों को सर्वेक्षण का आधार बनाने के बदले एक ऐसे जनमत संग्रह का सहारा लिया, जिसमें शामिल तथाकथित विशेषज्ञों का वाजिब व्यौरा तक उपलब्ध नहीं है। इस पर पक्ष-विपक्ष में टिका-टिप्पणी खूब हो रही है। कुछ तो इसे अंतिम सच मान कर प्रचार में लग गए हैं। यह तथाकथित ग्लोबल सर्वे एक तात्कालिक गूंज पैदा करती है। आखिर इस रिपोर्ट की वास्तविकता क्या है? इसे खूब अहम साबित करने में लगे लोग सचमुच क्या कर रहे हैं? इस हायतौबा से ग्लोबल फाउंडेशन को क्या हासिल होता है? इन सब बातों का सही आंकलन कम ही लोगों को है। इस मामले में आज-कल सोसल मीडिया में चर्चा गरम है। इस रिपोर्ट को पढ़ कर ऐसा लगता है जैसे इकलौते सवाल का मनचाहा जवाब पाने के लिए सर्वेक्षकों ने बंद गली के आखिरी मकान में 548 लोगों को बंद करना मुनासिब मान लिया हो।

दुनिया भर में महिलाओं ने भेद-भाव और दूसरी समस्याओं को समय-समय पर उठाया है। भारत इसका अपवाद कतई नहीं है। ऐसा भी नहीं है कि यहां आज कोई समस्या नहीं है। पर क्या इस मामले में भारत सचमुच में अफगानिस्तान, कांगो, सीरिया और सोमालिया समेत दुनिया के बाकी देशों से खराब है। भले ही यह चुनिंदा लोगों का मत हो। पर धर्म और संस्कृति का जिक्र कर इस रिपोर्ट में हमारे देश के बारे मे यही कहा गया है।

यहां मेहनत करने वाली भारत की आम महिलाओं को सरेआम अपमानित करने के लिए आंकड़ों का बेहतरीन इस्तेमाल किया गया है। सरकारी दस्तावेजों से कई हैरत में डालने वाली बातें पेश किया गया है। जिसमें कहा गया है कि 2007 से 2016 के बीच महिलाओं के साथ होने वाली अप्रिय घटनाओं में 80 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। यहां हर घंटे ऐसे 40 अपराध औसतन दर्ज होते हैं। दिल्ली में हुए 2012 के आंदोलन का जिक्र करते हुए मोनिक विला के सभी साथी यह क्यों भूल जाते हैं कि उसी साल सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर जेंडर जस्टिस के पैरोकारों ने कैसी हायतौबा मचाई थी। उच्चतम न्यायालय ने दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले को खारिज करते हुए कुल इतना ही तो कहा था कि कानून में बदलाव करना संसद के काम में हस्तक्षेप करना है। उस दिन जश्न मनाने जमा हुए इसी जमात के लोग सारी शालीनता ताक पर रखकर न्यायालय के खिलाफ सड़कों पर थे। यह बौखलाहट काफी कुछ जाहिर करने के काबिल है।

यह कोई पहला सर्वेक्षण नहीं है। कुछ समय पूर्व इसी जमात ने एक और रिपोर्ट प्रकाशित किया था। जिसमें कहा गया कि भारत में हर दो में से एक महिला घर-परिवार में ही यौन शोषण का शिकार होती है। यह सब एक शाजिस ही है। इस षड्यंत्र का इतिहास मौजूद है। पहले विश्व युद्ध के पहले ही अमेरिका में एक ऐसी लाॅबी सक्रिय पाई गई थी। वह प्रचार करने में लगी थी कि ईस्ट इंडिया कंपनी भारत की जनता का सिर्फ भला ही कर रही है। युद्ध के दौरान देश से निर्वासित लाला लाजपत राय अमेरिका प्रवास के दौरान इन बातों से रु-ब-रु होते हैं। सही स्थिति अमेरिकी जनता के सामने रखने के लिए उन्होंने 1915 में यंग इंडिया नामक एक किताब लिखी। भारत और ब्रिटेन में कई सालों तक इस किताब का प्रकाशन प्रतिबंधित रहा था। भविष्य में विला की यह कोशिश इंडोफाइल कैथरिन मायो का सभी रिकॉर्ड ध्वस्त कर दे तो कोई हैरत की बात नहीं होगी। वह सचमुच मायो को मात देने जा रही हैं। कम ही लोगों को पता है कि हमेशा सुर्खियों में रहने वाली उस अमेरिकी इतिहासकार ने ईस्ट इंडिया कंपनी के हितों को साधने के लिए 1927 में मदर इंडिया लिखा था। मायो का भारत में जोरदार स्वागत हुआ था। इस किताब की तुलना महात्मा गांधी ने उस बदबू से किया था, जो गंदी नाली के निरीक्षकों की मजबूरी हो सकती है। इसमें लिखी बातों का सटीक उत्तर देते हुए असली खंडन का काम तो लाला लाजपत राय ने किया था। मदर इंडिया के जवाब में लिखी लालाजी की किताब अनहैप्पी इंडिया सफलता के सारे रिकॉर्ड ध्वस्त कर देती है।

बहुराष्ट्रीय कंपनियां 2011 में इस फाउंडेशन को महिलाओं की सुरक्षा के नाम पर एक खास अभियान के लिए खूब धन देती है। यह एक ऐसी योजना की फंडिंग का मामला है, जिसका इतिहास नया नहीं है। फिर महिलाओं पर रहम का प्रदर्शन करते हुए इसके मुख्य कार्यकारी अधिकारी की योजना के अनुरूप 15 जून 2011 को एक विज्ञप्ति जारी की जाती है। देखते ही देखते महिलाओं के लिए अफगानिस्तान, कांगो, पाकिस्तान, भारत और सोमालिया दुनिया का सबसे खतरनाक पांच देश घोषित हो जाता है। फिर एक पांच सूत्रीय अभियान का सूत्रपात होता है। इसमें खूब चर्चा में रही #MeToo जैसा कैंपेन भी शामिल है। इस वर्ष तो भारत से अमेरिका तक दस देशों की सूची जारी किया गया है। इसका राजनैतिक अर्थशास्त्र बहुत गंभीर अध्ययन का विषय है। इस तरह के प्रयासों से कुछ बड़े लोगों को लाभ होता है।

भारतीय जन पार्षद मंच के संयोजक और सच के अध्यक्ष डॉ ओंकार मित्तल कई सालों से इस विषय के गंभीर अध्येता हैं। उन्होंने इस सर्वेक्षण की कार्य-प्रणाली (मेथोडोलोजी) पर सवाल उठाया है। इसकी विश्वसनीयता कायम रखने के लिए किसी विदेशी कॉर्पोरेट को भारतीय परिदृष्यों की ठीक समझ रखने वाले संस्थानों के साथ मिलकर अध्ययन करने की जरूरत को चिन्हित किया है। इस तरह के अभियानों के पोषकों ने भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के विरुद्ध आंदोलन प्रायोजित कर रखा है। वह इसका जिक्र करते हुए दो टूक बातें करते हैं। पिछले एक दशक में इसके लिए लगभग 10 हज़ार करोड़ की मोटी रकम केवल भारत में ही खर्च किया गया है। सालों से तमाम नैतिक-अनैतिक हथकंडों का इस्तेमाल करने में लगे इनके लोग सर्वोच्च न्यायालय की अवमानना करने से भी नहीं चूकते हैं। यहां डा. मित्तल एक सवाल उठाते हैं कि क्या भारत एक बार फिर उसी दौर की ओर लौट रहा है, जिसके विषय में कहा जाता है: राज बादशाह का और हुक्म कम्पनी बहादुर का।

संकटग्रस्त महिलाओं के विषय में पिछले एक दशक से सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है। वृंदावन की 25000 एकल वृद्धाओं के नाम पर शुरू हुए इस मुकदमे का दायरा सोसल जस्टिस बेंच के गठन के बाद राष्ट्रव्यापी होकर करीब पांच करोड़ तक पहुंच गया है। केन्द्र और राज्य की सरकारें मिलकर सभी संकटग्रस्त महिलाओं के लिए बेहतर जीवन सुनिश्चित करने के लिए विशेष कार्यक्रम शुरू करने की योजना पर काम कर रही है। मुझे यह जानकर आश्चर्य हुआ कि महिलाओं की समस्याओं को दूर करने का दावा करने वाले प्रतिष्ठानों ने इस मामले में उदासीन रहना ही उचित समझा है।

फ्रांसीसी मूल की मोनिक विला मूलतः एक पत्रकार हैं। नब्बे के दशक में उन्होंने एएफपी के साथ काम करना शुरू किया था। उनकी असली पहचान है, समाज का हित साधने के लिए फंड जुटाने का कौशल। मैं उनसे वृंदावन की संकटग्रस्त महिलाओं की मदद करने की अपील करता हूं। साथ ही भविष्य में भारतीय महिलाओं से जुड़े ऐसे सर्वेक्षणों के विषय में एक महत्वपूर्ण सुझाव भी देना चाहता हूं। इस मामले में सही दिशा में आगे बढ़ने के लिए जरूरी है कि इसमें ऐसे सहयोगियों को शामिल करें जिन्हें जय शंकर प्रसाद की कामायनी की इन पंक्तियों की भी बराबर समझ हो: नारी तुम केवल श्रद्धा हो, विश्वास रजत नग पग तल में / पीयूष स्रोत सी बहा करो, जीवन के सुन्दर समतल में।

Temple Treasure Trove and Tirumala Tirupati Devasthanam

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Kaushal Kishore | Follow @HolyGanga

Sotheby’s, one of the oldest auction houses, may find the buyer this year in November at the Geneva auction for the much highlighted 37.3-carat Raj Pink Diamond. The price of the so-called African stone in this auction may reach certain hundred of crores. The controversy around this precious gem is actually pertaining to its owner. Tirumala Tirupati Devasthanam has sacked its Chief Priest Dr. Raman Dikshitulu on 18th May, who has alleged that the said pink diamond is the missing gem from the property of Lord Venkateswara, the god worshipped in the holy shrine at Chittoor district of Andhra Pradesh. This was the gift given by Maharaja of Mysore in 1940s itself, and the prists aware of such facts are agitated since they came to know that the disappeared gem suddenly appeared in the Sotheby’s catalogue and acution last year. The status of prevailing corruption in the management of TTD is in focus these days. Dikshitulu has recently shared its details with the BJP President. As such this is not surprising if it becomes the epicenter of all politics in Andhra Pradesh in the future. Dr. Subramanyam Swamy, the senior advocate and member of parliament in the Rajya Sabha from BJP is challenging the removal of the chief priest in the Supreme Court.

Tirumala Tirupati Devasthanam

This series of revelations is less discussed in the North India. Meanwhile there was a news from Jagannath Puri Temple in the East. Sadly the keys of its jwelery store disappeared on 4th April, and perhaps when it was needed most. Again the key was found dramatically in an envelope from the record room of the District Magistrate on 13th June. The mysterious missing from the treasury department of the district administration is in question. How did it go to the record room and why? The 16-member team appointed by the High Court for inspection of the treasury of the Puri Temple after 34 years returned back without performing its duty on account of the said manipulation. I am surprised to know that on the insistence of Shankaracharya of Govardhan Peeth Swami Nischalanand Saraswati this news reached the media outlets. The governing provisions of these temples were evolved in different times in history. The state heads its governing body since the days of East India Company. As such the tension between the state governments and the opposition parties is brewing as if they were waiting for this occasion due to the general elections.

Jagannath Puri Temple

The history of donations made to monasteries and temples are available in records. The kingdoms of the Chola, Pallava, Pandya and especially the Vijayanagara empire in the far south had offered invaluable wealth at the lotus feet of Lord Tirupati. The condition of the Puri Temple in Kalinga finds a fair resemblance to it. According to a mining engineer, who has studied the temple at Srisailam, there are 2500 tonnes of pure gold buried within its premises. Several other important things are here to look at. The western ghats stretches from Odisha in the east to Tamil Nadu in the south. It includes Golkunda the world famous diamond region. The 23 diamond mines out of the total 38 of the nation are present in this region itself. The hills of Niyamgiri and Nallamala are known for its own significance. The forest of Nallamala is scattered in Kurnool, Nellore, Guntur, Prakasam, Kadappa and Chittoor districts of Andhra Pradesh, and Mehbobnagar and Nalgonda districts of Telangana. Tirumala Deva Rai, the chief of Vijayanagar army had ran away from the battle of Talikota in the 16th century with the treasure of the empire, which was loaded on 7000 elephants and 30000 horses. He has buried that treasure in these forests, and its security remained in the hands of Chenchus, the tribals of this region. Today they are being forced to leave these forests on the one hand, and on the other, one of the multinational corporations has been engaged in excavation activities for last five years. They have acquired fifty acres of forest land in order to leagalise this plunder. Before an initiative of this nature, they have sent more than a hundred full time search parties in the quest of these hidden treasures of the Vijayanagar empire since 1980. The information available in public domain suggests that the number of people died in last 38 years during such an adventure are not less than a hundred.

Archaeologist Dr Dharm Veer Sharma is anguished on it. He knows what actually happens when cases of such theft and grand larceny from temple and monastery find a mention in the records of the state or media. He had lodged FIRs in such cases while serving the Archaeological Survey of India (ASI) in the capacity of its director. He was shocked to know that Christie’s, the auction house known for selling the most precious work of art, i.e. Salvator Mundi, and Sotheby’s, the fourth oldest in the history of modrn auction, are a couple of reputed multinational corporations involved in this business. Once he has discovered the involvement of the daughter of the then Union Minister in this nexus. The role of the District Magistrate was in question in yet another case. Dr. Sharma has faced difficulties due to his firm stand against the guilty parties in such cases. In his opinion these cases never get fair treatment, and most of them are not even investigated properly. The response of the journalist, Shelley Kasli, who is focused on this issue for quite sometimes is even more acrimonious. The fair deal of details on auctions from the palaces of Sotheby’s and Christie’s are available in the reports of his quarterly journal Great Game India. He describes about the hundreds of stolen items from Indian monasteries and temples that was sold in their auctions. His questions and criticisms are not less serious for the prestigious agencies of the state. Kasli presents the broad picture before demanding the transparent and high level inquiry into this plunder of the most precious resources. The message of the Shankaracharya is a further indication in this issue. The common perception among the devotees of the god worshipped at the self reflected shrine of Tirumala is a serious concern in todays politics.

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In fact it was Christie’s that first covered the feature of Nirav Modi, the fugitive diamond merchant notorious for the PNB Fraud in the 2010 catalogue. Modi has cracked the deal, the Golconda Diamond Necklace worth more than Rs 16 crores. Sotheby’s had auctioned the Riviera Diamond Necklace in October 2012 for more than Rs 33 crores. It is necessary to mention this Hong Kong auction due to Nirav Modi. Next year he was found in the list of rich and wealthy in the prestigious magazine Forbes. There are many things here to be astonished about. No agencies bear the precise information about those buying these stones. Sadly the source of procurement of artifacts and gems are hidden among these houses. These two multinational corporations have been auctioning the properties of Indian monasteries, temples and kingdoms for a long time. The ASI is confined to fill the blanks in the record books even after receiving complaints. The opinions of the experts on the estimate of such wealth is far beyond my imagination. At the same time this plundering of resources is continued as ever before.

This business of manipulation is more quantitative in size and volume than any other business of the recent times including that of the demonetisation and remonetisation. There is a long list of precious gems obtained from the mines of Golkonda and Western Ghats starting from the well-known Kohinoor. Only a handful of experts are capable to accurately ascertain the volume of this grand larceny prevailing since the advent of this temple treasure trove. The dialogues of leaders from most of the political parties are far apart from the bone of contention, however, they are all centred around allegations and counter allegations so far. In this noise one thing is forgotten that the actual ownership of this huge wealth belongs to the Indian people. The attitude of the state administration is in question. The governments bound to face the upcoming elections are compelled to address this crisis, as they have to suffer in case they failed to furnish with concrete and accurate solution to this series of problems that started with Tirumala Tirupati Devasthanam and extended with the Jagannath Puri.

(Kaushal Kishore is the author of The Holy Ganga)

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दलित समस्या और भेदभाव की राजनीति

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कौशल किशोर | Follow @HolyGanga

आज दलितों के सवाल पर पूरा देश आंदोलित है। यह सिलसिला मंगलवार, 20 मार्च को शुरू हुआ। उस दिन उच्चतम न्यायालय ने डा. सुभाष काशीनाथ महाजन की अपील का निर्णय सुनाया था। एक बार फिर जस्टिस आदर्श कुमार गोयल और जस्टिस उदय उमेश ललित की अदालत ने चौंकाने वाला फैसला सुनाया है। दहेज उत्पीडऩ मामले में हुई फजीहत के बाद अब इस अदालत ने अनुसूचित जाति व जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम में नया दिशा-निर्देश जारी किया है। उन्होंने दलित उत्पीडऩ के मामले में बिना जांच-पड़ताल के होने वाली तुरंत गिरफ्तारी पर रोक लगा दी है। अब सरकारी मुलाजिमों से जुड़े मामलों में पहले नियोक्ता की संस्तुति आवश्यक है। अन्य मामलों में वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक की स्वीकृति लेनी होगी। इस आदेश के प्रभावी रहने की दशा में डी.एस.पी. स्तर के अधिकारी द्वारा जांच के बाद ही एफ.आई.आर. दर्ज की जा सकेगी। साथ ही अभियुक्तों की अग्रिम जमानत भी अब सहज संभव है। 

न्यायालय का सम्मान करने वाली दलित जनता सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले के विरुद्ध खड़ी है। कांग्रेस अध्यक्ष ने सत्ताधारी भाजपा पर दलित विरोधी होने का आरोप लगाया है। भीम सेना जैसे राजनीतिक संगठन सड़क पर उतर आए हैं। बिहार समेत देश के कई हिस्सों में न्यायालय और सरकार के खिलाफ  प्रदर्शन शुरू हुए। सभी जगह हलचल हो रही है। सरकार के मंत्रियों की प्रतिक्रियाएं सामने आती रही हैं। मोदी सरकार के कई मंत्री और सांसद इस निर्णय से क्षुब्ध हैं। इसकी गंभीरता को समझ कर सरकार भी इसमें पुनॢवचार याचिका दाखिल करने का विचार करती है। 

दुनिया भर में चर्चा होती है कि भारत में प्रतिदिन कितने दलित व आदिवासी ज्यादती का शिकार होते हैं। दलित हितैषी संगठनों में बराबर इन आंकड़ों पर चर्चा होती है। यहां रोजाना 3 दलित महिलाओं के साथ बलात्कार और 11 दलितों की पिटाई होती है। हर हफ्ते दलितों की हत्याएं, उनके घरों को आग के हवाले करने और उनके अपहरण की खबरें आती हैं। हर साल हजारों मुकद्दमे दर्ज होते हैं। इनमें पैरवी करने वाले न के बराबर हैं। बड़ी मुश्किल से सजा हो पाती है। क्या इनका मतलब यह है कि इस कानून का दुरुपयोग नहीं हो रहा है? 

वस्तुस्थिति क्या है, इस पर संसद तक में चर्चा हो चुकी है। कोर्ट के सामने अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट के साथ विशेषज्ञों की राय भी मौजूद है। सत्य और न्याय की रक्षा करना ही न्यायपालिका का धर्म है। क्या सचमुच अदालत ने यही काम नहीं किया है? यहां झूठा मुकद्दमा दर्ज कराने के दोषी को मुकम्मल सजा देकर दूरगामी संदेश दिया जा सकता था किंतु नया विधान रचने के क्रम में हुई भूल यहां साफ दिख रही है। यह दलीलों और आंकड़ों के जाल में उलझ कर भावना में बहने का नतीजा हो सकता है। इस निर्णय को त्रुटिहीन कराने की नीयत से रामदास अठावले और रामविलास पासवान के दलों ने पुनॢवचार याचिका दाखिल करने का फैसला किया है। मोदी सरकार के रविशंकर प्रसाद और थावरचंद गहलोत जैसे जिम्मेदार मंत्रीगण इस कार्य में लगे हैं। उन्हें पता है कि 16वें लोकसभा चुनाव में दलितों के बड़े वर्ग के समर्थन से ही भाजपा गठबंधन सत्तारूढ़ हो सका है।

वस्तुत: यह कानून का दुरुपयोग कर प्रशासन को सुचारू रूप से चलाने के लिए जिम्मेदार लोगों को परेशान करने का मामला है। यह महाराष्ट्र के सतारा जिले के कराड तालुका का एक दशक पुराना मामला है। राज्य सरकार द्वारा संचालित फार्मेसी कालेज में कार्यरत अनुसूचित जाति के एक स्टोरकीपर के ईमान और चरित्र का जिक्र विभागीय अधिकारी द्वारा गोपनीय वार्षिक रिपोर्ट में किया गया। इसका पता लगने पर तथाकथित दलित कर्मचारी ने थाने में उत्पीडऩ की शिकायत दर्ज करा दी। फिर सी.आर.पी.सी. की धारा 197 की प्रक्रिया कई सालों बाद पूरी हुई। आखिरकार 28 मार्च, 2016 को इस मामले में एफ.आई.आर. दर्ज की गई। न्यायालय के समक्ष मौजूद तथ्यों से साफ  है कि इस केस में प्रथम दृष्टया बदनीयती साबित नहीं होती है। क्या महज इस कानून के प्रयोग की संभावना को आधार मानकर किसी सरकारी अधिकारी के खिलाफ  कार्रवाई की जा सकती है? महाराष्ट्र के तकनीकी शिक्षा विभाग के कई निर्दोष अधिकारी एक दशक से इस मुकद्दमे में उलझे हैं। इन निर्दोष प्रशासनिक अधिकारियों की रक्षा कौन करेगा? इस फैसले में साफ  कहा गया है कि किस तरह इस कानून के दुरुपयोग से अदालतों का समय खराब होता रहा है। वस्तुत: यह दलित उत्पीडऩ रोकने के लिए बनाए गए कानून के दुरुपयोग का संवेदनशील मामला है परंतु कोई यह नहीं बता रहा कि ऐसे मामलों से निपटने के लिए पीड़ितों को क्या करना चाहिए? इन प्रश्नों को निरुत्तरित छोडऩे से दलितों को भी नुक्सान ही होगा। 

आज सुप्रीम कोर्ट के फैसले की आलोचना करने में लगी जमात के लोग अप्रत्यक्ष रूप से भेदभाव की राजनीति को बढ़ावा दे रहे हैं। क्या सचमुच दलितों के बीच निराशा का माहौल नहीं है? इस एक्ट के नियमों में ढील होने पर दलितों के खिलाफ अत्याचार के मामले बढऩे की आशंका निर्मूल नहीं है। पहले गिरफ्तारी के भय से लोग कमजोर दलित लोगों पर अत्याचार करने से दूर रहते थे मगर गिरफ्तारी में मुश्किल और जमानत के नए प्रावधान के बाद लोगों का यह डर खत्म हो गया है। नख और दंतविहीन होने के बाद इस कानून की प्रासंगिकता पर प्रश्न चिन्ह लग गया है। फलत: भविष्य में ऐसे मामलों में होने वाली वृद्धि को रोकना सहज नहीं होगा।

मेरी समझ से जस्टिस गोयल और जस्टिस ललित को भीम की तरह गदा भांजने की अपेक्षा अर्जुन की तरह पैने तीर से निशाना साधना चाहिए। यदि यह मामला इतना ही खराब था तो फर्जी मुकद्दमा दायर करने वाले तथाकथित दलित को मुकम्मल सजा देना क्यों नहीं मुनासिब समझा गया। ऐसा करने से सटीक संदेश जाता। पिछले साल जुलाई में भी इसी अदालत ने दहेज पीड़ित महिलाओं के मामले में ऐसा ही एक निर्णय सुनाया था। बाद में उस आदेश को मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली 3 सदस्यीय पीठ ने खारिज कर दिया था। बहुत संभव है कि इस मामले में भी वैसी ही कोई प्रक्रिया दोहराई जाए। भविष्य में इस मामले में क्या और कैसे होता है, यह जानना सचमुच बेहद दिलचस्प होगा।

(कौशल किशोर “दी होली गंगा” पुस्तक के लेखक हैं) https://t.co/z9ScyYCT0O?amp=1

https://punjabkesari.in/post/5728986/dalit-problems-and-discrimination-politics-777647 http://epaper.navodayatimes.in/c/27500151

​Assassination of Activist Journalist Gauri Lankesh

Featured​Assassination of Activist Journalist Gauri Lankesh

Kaushal Kishore

The activist journalist Gauri Lankesh was shot dead in Bengaluru last night at around 8 o’clock. She was fired seven times at a close range outside her home. It is believed that as soon as she stepped out of the car and opened the gates the attackers fired at her. Three bullets hit her, in the forehead, neck and chest. The neighbours found the 55-year-old editor lying on her porch. This assassination appears to be an organised crime. The police suspects the role of hired killers.

State administration has deputed three teams to investigate into this cold blooded murder. Siddaramaiah, the chief minister of Karnataka, reacts on this issue: (I’m) absolutely shocked to learn about the murder of renowned journalist Gauri Lankesh. I have no words to condemn this heinous crime. In fact, this is an assassination on democracy. In her passing, Karnataka has lost a strong progressive voice, and I have lost a friend. Karnataka Law Minister TB Jayachandra finds similarities with the murder of the Sahitya Academy Award recipient scholar M.M. Kalburgi. In September 2015, he was shot dead by a couple of bikers at his doorstep in Dharwad, 400 km away from the state capital. The men knocked on his door and when the 77-year-old scholar opened it, shot him at point blank range. The mystery of that murder is yet to be solved. The similarity of these heinous crimes also refer to its fate.

Gauri Lankesh was the daughter of P. Lankesh, who brought in a new brand of Kannada journalism with his tabloid i.e. Lankesh Patrike. She has followed his footsteps, and started Gauri Lankesh Patrike (GLP) 2005. The GLP stood for its straightforward attitude and questioning the system that compromises, while constantly exposing the stories of politicians’ scandals. She was well known for speaking her mind, and involved with a group that worked for communal harmony. In fact her views were considered Leftist and anti-Hindutva ideology. At the same time she has also raised the cases of corruption of leaders of other parties, including the Congress.

Gauri Lankesh has woken up a lot more minds in her death than she did during her lifetime, however, doing excellent as an activist and a journalist. In a decade her publication grown to employ 50 people with a substantial subscription devoid of advertisement from government or corporate. The tabloid is financially supported by her other publication, in fact Lankesh Prakashana is known for publishing literature and self help study material for competitive examinations. She is the first journalist whose martyrdom is celebrated with the state honour.

Recently one of her stories not only earned notoriety, but also a jail term, in which she was enlarged on bail. In 2008 her tabloid published certain story mentioning names of three right wing workers claimed to have duped a jeweller a hundred thousand bucks, however, this act was published in many local dailies without mentioning the names. At least three defamation cases are being reported to be pending against her. Meanwhile Gauri had sensed the days that we live in are not conducive enough to voice dissent, as she had stated that the “Right regime would want me silenced” a statement that seems to suggest her expected end.

The law and order is an issue of the state. As such this is the failure of Karnataka govt. headed by Congress Party. Journalists and social activists gathered today at the headquarter of  Press Club of India in a protest against such a heinous act. Several protests are being reported from different corners of the nation. I am sure all participants of these events are not from left wing. The excitement of right wing leaders and workers is on its peak, some of them celebrate her death. It seems that left and right wings are fighting with each other as if they surely know who were the killers. The condition of ruling parties in the state and the centre are also similar. And social media is flooded with muddy remarks. All those vomiting venom are trying to get attention from his or her own community. At least they are focused on political mileage, and hatred seems to br in its centre. Unfortunately this is the actual condition of Indian democracy of the day. The fate of these hue and cry after most of such deaths are confined merely to take benefits in elections. A collective effort towards how to improve the sate of administration is nowhere in the picture. So that such cases will continue in future. Sadly, none among the leaders are focused on it.

This is the latest death being counted in a string of murders of rationalist writers or journalists or activists. Siwan (Bihar) bureau chief of Hindi daily Hindustan, Ranjan Rajdeo was shot from a close range by assailants on a motorcycle in May 2015. Before death, he had written extensively on the cases involving murder of Shrikant Bharti in 2014. Bharti was an aide of BJP MP Om Prakash Yadav. The burning of Jagendra Singh, a freelance journalist, in June 2015 at Shahjahanpur (Uttar Pradesh) is still fresh in my memory. Deshbandhu reporter Sai Reddy was killed in Bijapur district of Chhattisgarh in December 2013. He died while being transported to the hospital and police suspected Maoists’ hand behind his killing. Govind Pansare, prominent activist and rationalist, was shot dead in February 2014 by unidentified persons, when he was returning home after morning walk in Kolhapur. On August 20, 2013, Narendra Dabholkar, a prominent anti-superstition crusader, was allegedly gunned down by a couple of bikers during his morning walk in Pune. A couple of days after Gauri’s murder another journalist, Pankaj Mishra received fatal bullet injuries in Bihar. These are a few cases of recent years that suggest how freedom of expression is being infringed in India.

In addition to these intellectuals there are numerous cases of murder of political workers from different parties in recent times. The story of Gangaputra Nigamananda, who has fasted till death for the Ganga, is also available in public domain. There were people who were not agree with these crusaders. But everyone knows they were the fighters, who gave up their life for a noble cause. I do in fact salute such brave hearts, even if I don’t agree with them.

Right to dissent is the beauty of democracy. We need to preserve it in 21st century India as well. This assassination raised several questions, including whether the gun is mightier or the pen? I saw certain teachers afraid of guns, but still they were preaching the power of pen is more than that of a bullet. This is the time to save democracy that can sustain only when right to dissent is ensured with dignity.

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नवभारत का शंखनाद 

कौशल किशोर 

15 अगस्त 2017

आज चैथी बार लालकिला के प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दुनिया को संबोधित किया है। चक्रधारी और चरखाधारी मोहन की चर्चा के अपने ही निहितार्थ हैं। आरंभ से ही कृष्ण का जीवन मुश्किलों से भरा था। सगे मामा कंस ने बालगोपाल की हत्या कराने के तमाम षड्यंत्रों को अमलीजामा पहनाने में कोई कसर बाकी नहीं रखा। वही कृष्ण महाभारत युद्ध के महानायक साबित हुए। साल के आरंभ में खादी ग्रामोद्योग ने चरखा के सम्मुख बैठे मोहन दास को पीछे धकेल दिया था। आज मोदीजी ने उन्हें चरखाधारी बना दिया। इन बिंबों से आगे बढ़ कर उन्होंने राजग सरकार की जीएसटी और नोटबदली जैसी आर्थिक सुधारों समेत तमाम उपब्धियों से जनता को रु-ब-रु करा कर स्पष्ट किया कि स्वतंत्रता दिवस का अवसर प्रधानमंत्री का दिन होता है। इस अवसर पर नवभारत का शंखनाद बार-बार प्रतिध्वनित होता रहा। पहली बार लालकिला से जनता को संबोधित करते हुए उन्होंने नीति आयोग और मेक इन इंडिया का खुलासा कर सभी को स्तब्ध कर दिया था। हाल ही में भारत छोड़ो आंदोलन की 75वीं वर्षगांठ पर संसद में दिया वक्तव्य अविस्मरणीय है। ‘करो या मरो’ के बदले उनका नया नारा है, ‘करेंगे और करके रहेंगे’। नवभारत का यह सपना बिना किसी खास अवरोध के साकार होने की दिशा में अग्रसर है।

राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पदों के लिए हुए चुनावों में भाजपा उम्मीदवारों ने आसानी से ऐतिहासिक जीत दर्ज की है। वरिष्ठ भाजपा नेता एम. वेंकैया नायडू के उपराष्ट्रपति चुने जाने से सभी शीर्ष संसदीय पदों से कांग्रेस प्रतिनिधियों की विदाई हो चुकी है। हालांकि उन्हें राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के मुकाबले कम वोट मिले हैं। इस चुनाव में विपक्ष के उम्मीदवार गोपाल कृष्ण गांधी को कांग्रेस की राष्ट्रपति पद की प्रत्याशी मीरा कुमार से 19 वोट ज्यादा मिले। भाजपा गठबंधन में शामिल होने के बावजूद नीतीश कुमार के जनता दल ने उनके पक्ष में मतदान किया। इस बीच गुजरात समेत तीन प्रदेशों में राज्यसभा के दस सीटों के लिए हुए चुनावों के परिणाम सामने आ चुके हैं। अंकों में सिमटी राजनीति का गणित राजग की संसद में मजबूत स्थिति साफ बयां करती है। यद्यपि राज्यसभा में राजग को 123 अंकों के जादुई आंकड़े तक पहुंचने में वक्त लगेगा, परंतु संसद के दोनों सदन में भाजपा आज सबसे बड़ा दल है। जीत की इस श्रृंखला के महानायक नरेन्द्र मोदी हैं। उनका सामना करने की स्थिति में कोई दूर-दूर तक दिखाई नहीं देता है। इस अक्षमता को ढकने में लगे राजनीतिज्ञों ने हार का ठीकरा कभी मीडिया पर तो कभी ईवीएम पर फोड़ कर अपनी ही दुर्बलताओं को उजागर किया है। 

राष्ट्रपति चुनाव में मोदी ने तमाम अटकलों को ताक पर रख कर दलित समुदाय से आने वाले बिहार के राज्यपाल को चुना। यही वह  प्रदेश है, जहां के क्षत्रपों ने मोदी की जीत को रोकने के लिए महागठबंधन की राजनीति का सहारा लिया था। भ्रष्टाचार में लिप्त नेताओं के साथ गठबंधन की राजनीति का हश्र सामने है। सांप्रदायिकता के नाम पर मोदी से किनारा करने वाले नीतीश कुमार ने सुशासन के लिए भाजपा के सहयोग को वरीयता दी है। गठबंधन और भ्रष्टाचार का समीकरण नया कतई नहीं है। नब्बे के दशक में केन्द्र की राजनीति इस समस्या से जुझती रही। रामनाथ कोविंद के महामहिम बनने के बाद के घटनाक्रम से स्पष्ट है कि संसद का उच्च सदन और बिहार की जमीन केन्द्र की योजनाओं के अनुकूल होती जा रही है। हालांकि शरद यादव और गोविन्द यादव जैसे शूरमा जंग-ए-मैदान में मौजूद हैं। वेंकैया नायडू के उपराष्ट्रपति बनने से दक्षिण भारत में भाजपा का जनाधार मजबूत होता है। शीर्ष संसदीय पदों पर विद्यमान महानुभावों के चरित्रचित्रण से साफ होता है कि नवभारत का स्वप्न साकार करने में इनकी भूमिका कितनी अहम होगी।

चुनावों के नतीजों का विश्लेषण स्पष्ट करता है कि बीते तीन सालों में भाजपा का जनाधार तेजी से बढ़ा है। इस बीच लोकसभा और राज्यसभा से लेकर प्रदेशों की विधानसभाओं तक पार्टी की स्थिति दिनानुदिन मजबूत हुई है। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के कार्यकाल में पार्टी ने सुदूर प्रदेशों में जीत दर्ज किया है। जिन सूबों में कभी भाजपा का एक विधायक नहीं होता था, आज वहां भी पार्टी सरकार चला रही है। विजय के इस क्रम को यदि मोदी का अश्वमेघ यज्ञ कहा जाय तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। पुराने समय में अश्वमेघ विजेता सम्राट कहलाते थे। वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था विजेता को कौन सी संज्ञा देगी? यह भविष्य की बात है। पर इस बीच यह स्पष्ट हो गया कि कांग्रेस ने लोगों को इस कदर निराश किया कि अब अप्रासंगिक होने की दिशा में बढ़ चली है। अस्तित्व के संकट से जूझ रही कांग्रेस की दशा और दिशा पर वरिष्ठ कांग्रेसी नेता जयराम रमेश द्वारा कोच्चि में कही गई बातें बेहद महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि मोदी और शाह अलग तरीके से सोचते हैं और उनकी कार्यशैली भी भिन्न है। साथ ही सल्तनत खत्म होने के बाद सुल्तानी कायम रहने की बात पार्टी फोरम पर कहने के बजाय मीडिया में कहा है। इससे कांग्रेस की आंतरिक स्थिति का अनुमान लगाना सहज हो जाता है। 

सोलहवीं लोकसभा चुनाव के समय से भाजपा का कांग्रेस मुक्त भारत का नारा सतत बुलंदी की ओर अग्रसर है। वास्तव में इसका दायरा जीत के गणित तक सीमित नहीं है। सही मायनों में यह सुधार (रिफार्म) की उन योजनाओं को इंगित करता है, जिनकी बातें पहले भी होती रही हैं। सटीक और दूरगामी प्रभाव वाले इन कार्यक्रमों की प्रत्यक्ष व परोक्ष अभिव्यक्तियों को ध्यान में रखना आवश्यक है। आज प्रधानमंत्री ने नवभारत का सपना कुछ विस्तृत ढ़ंग से देश के सामने रखा है। इसके अतिरिक्त भाजपा समान नागकि संहिता, गौवंश रक्षा और राम मंदिर के निर्माण की योजनाओं को वर्षों से संजोए हुए है। इन मामलों में हुई हलचल साफ दिखती है। साथ ही बीते चार सालों में संविधान की समीक्षा और संशोधन का जिक्र बार-बार हुआ है। एक साथ राज्य और केन्द्र की सरकारों का चुनाव कराने का दुरुह मामला अधर में है। मोदी और शाह की जोड़ी इस व्यवस्था को लागू कर चुनावों में होने वाले खर्चाें को कम करने की दिशा में प्रयत्नशील है। चुनाव आयोग इस दिशा में अगले साल सफलता की ईबारत लिखने हेतु सतत सक्रिय है। गुजरात में हुए राज्यसभा चुनाव ने मुख्य चुनाव आयुक्त को एक मजबूत संस्थान के रुप में स्थापित किया है। जिसका लाभ आयोग को मिलेगा। 

ब्रिटीश तर्ज पर कार्यरत भारतीय संसद को अमेरिकी तर्ज पर स्थापित करने की मुहिम का नतीजा राष्ट्रपति को प्रधानमंत्री से कद्दावर बना सकता है। भविष्य में यह व्यवस्था नवभारत के सबसे अहम प्रतीक के रुप में सामने आएगा। देश के सर्वोच्च नागरिक का सम्मान पाने वाले रामनाथ कोविंद यदि पुराने भारत के आखिरी राष्ट्रपति साबित होते हैं तो कोई अचरज की बात नहीं होगी। यह अमेरिकी माॅडल आज दुनिया के कई देशों में सफलतापूर्वक संचालित हो रहा है। कांग्रेस के कार्यकाल में संविधान निर्माताओं ने ब्रिटीश संसदीय व्यवस्था को श्रेष्ठ माना था। इसका गहरा असर भारतीय संविधान पर पड़ा। मैं ब्रिटीश और अमेरिकी संसदीय प्रणाली में मौलिक भेद साफ-साफ महसूस करता हूं। अंग्रेजी संसदीय व्यवस्था का जोड़ इस बात पर रहा कि सभी तरह के विचारों का समावेश किया जाय और बेहतरीन बात पर अमल हो। इसमें नायक के बदलने पर निर्णय बदलने के आसार कम होते हैं। यही वजह है कि विपक्षी दल समय-समय पर सरकार की योजनाओं को अपना बताती है। इससे पृथक अमेरिकी प्रणाली का आधार अपनी बात लागू करने के लिए जोरदार जन समर्थन हासिल करने पर है। भारतीय परिपेक्ष्य में राम मंदिर और तीन तलाक जैसे सवाल इसी श्रेणी में आते हैं। इस व्यवस्था में सरकार की योजनाओं और क्रियाकलापों पर नायक के बदलने का असर सर्वाधिक होता है। मोदी के सपनों का नवभारत इन सूत्रों को अमलीजामा पहनाए बगैर अस्तित्वविहीन ही रहेगा।

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह गुजरात से राज्यसभा सदस्य चुने गए हैं। उनके सामने उच्च सदन में राजग की स्थिति को मजबूत करने का लक्ष्य है। यह सुधारों को तेजी से लागू करने के लिए बेहद जरुरी है। बजट सत्र में मोदी सरकार ने आधार एक्ट लागू किया था। यह बिना चर्चा के लागू होने वाले मनी बिल के तौर पर पेश किया गया था। इस तरह की युक्तियों को अपनाना लोकतांत्रिक नहीं माना जाता है। क्या कांग्रेस मुक्त न्यू इंडिया एक मजबूत सरकार का द्योतक नहीं है, जो लोकतांत्रिक तरीके से एजेंडा लागू करने हेतु प्रतिबद्ध हो।

आजादी के सत्तर साल बीत चुके हैं। इस बार लालकिला से नरेन्द्र मोदी पहले से कहीं ज्यादा मजबूत होकर देश को सम्बोधित कर रहे थे। निश्चय ही यह नवभारत के स्वप्न को बेहतर अभिव्यक्त करने का अवसर साबित हुआ है। कांग्रेस मुक्त भारत का स्पष्ट स्वरुप ही नवभारत के रुप में प्रकट होता है। संभव है कि जयराम रमेश जैसे विद्वानों की सलाहों में छिपी संजीवनी का सेवन करने से भविष्य में कांग्रेस को पुर्नजीवन मिल जाय। सत्तर और नब्बे के दशक में ऐसा होने का इतिहास मौजूद है। परंतु ऐसा कुछ भी होने से पहले मोदी और शाह की टीम तमाम अवरोधों को पार कर नवभारत का सपना साकार कर चुकी होगी। गोपाल कृष्ण गांधी के विषय में डा. वेद प्रताप वैदिक के सलाह का मैं साग्रह अनुमोदन करता हूं। स्वच्छ चरित्र के विद्वान राजनेता यदि महात्मा गांधी के वंशज हों, तो देश और दुनिया का नजरिया जिम्मेदारी और सत्याग्रह का भाव लिए प्रकट होता है। 

Sorry for the delay in this post. It’s my views as expressed on Independence Day (15 August 2017)

अविरलता बिन गंगा निर्मल नहीं 

कौशल किशोर | Follow @HolyGanga

नर्मदा, गंगा और यमुना जैसी पुरानी नदियां भारतीय उपमहाद्वीप की जीवनरेखा है। बहुसंख्य समाज इन्हें पवित्र मानकर पूजती है। साथ ही यह भी सच है कि इनकी शुद्धता पर ही सवाल है। चिपको आंदोलन के प्रवर्तक और गांधीवादी पर्यावरणविद सुन्दर लाल बहुगुणा ने वर्षों पहले यह मामला उठाया था। आज यह सवाल रह रह कर बराबर उठ रहा है। गंगा एक्सन प्लान की शुरुआत से पहले ही उच्चतम न्यायालय में इसकी शुद्धता का मामला पहुंच चुका था। ढ़ाईतीन सालों तक यह उत्तराखंड उच्च न्यायालय के न्यायमूर्तियों की परेशानी का सबब बना रहा। फिर जस्टिस राजीव शर्मा और आलोक सिंह की अदालत ने बीते 20 मार्च को मोहम्मद सलीम की याचिका पर सुनावाई करते हुए गंगा रिवर सिस्टम को कानूनी रुप से जीवंत मानने का आदेश जारी किया। पिछले हफ्ते सर्वाेच्च न्यायालय ने इस मामले में स्थगनादेश जारी किया है। इस तरह 108 दिनों तक गंगा और यमुना के संदर्भ में दृष्टिकोण बदलने की कानूनी बाध्यता रही।

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प्रधानमंत्री ने बनारस से लोकसभा चुनाव लड़ते हुए गंगा के प्रति अपना भाव जाहिर किया था। फिर उन्होंने नमामि गंगे कार्यक्रम का सूत्रपात किया। अपने ही अंदाज में अमरकंटक की यात्रा कर उन्होंने नमामि देवि नर्मदे अभियान को भी गति प्रदान किया है। इस बीच बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार गंगा के मामले में खासे चिंतित दिखते हैं। उन्होंने कहा है कि अविरलता के बिना गंगा की निर्मलता संभव नहीं है। इससे स्पष्ट होता है कि नदियों के संदर्भ में वस्तुतः अवरिलता और निर्मलता समानार्थी शब्द हैं निश्चय ही उन्होंने एक बड़ी रेखा खींचा है। भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में यह एक साहसिक पहल माना जाएगा। पिछले सत्तर सालों में किसी सरकार ने अविरलता की बात कहने का साहस नहीं किया। इसलिए यह एक दिलचस्प ऐतिहासिक मोड़ है।

पटना में बिहार सरकार ने फरवरी के आखिरी हफ्ते में बातचीत का सिलसिला शुरु किया था। गंगा के सवाल पर यह एक इंटरनेशनल कांफ्रेंस थी। कुछ समय पहले चीनी विद्वान हू शीसेंग ने पड़ोस में ऐसी ही एक पंचायत हिमालय के सवाल पर आयोजित किया था। फिर नीतीश कुमार अपनी बात को विस्तार देने दलबल के साथ दिल्ली पहुंचते हैं। इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में दो दिनों तक चर्चा चलती रही। पर्यावरण वैज्ञानिक से संन्यासी हुए स्वामी सानंद (जीडी अग्रवाल) उनके साथ खड़े थे। गाद की समस्या पर बात करने वाले विद्वानों की बात समाप्त होने पर जल संसाधन विभाग के प्रमुख सचिव ने दस सूत्रीय दिल्ली घोषणापत्र भी जारी किया। इस पंचायत में उन्होंने गंगा की धाराओं पर खड़े अभियांत्रिकी के हैरतअंगेज कारनामों के कारण बिहार में पनपी गाद और भूक्षरण की समस्या से निजात पाने का सपना देखा है। इस क्रम में बताते हैं कि सूबे की सरकार ने इसी मद में पिछले पांच सालों में एक हजार करोड़ से ज्यादा धनराशि खर्च किया है। साथ ही माधव चितले समिति की रिपोर्ट का जिक्र करते हैं। वास्तव में फरक्का बराज से नदी बेढ़ब हो जाती है। इससे बिहार में भारी अपव्यय होता है। आज अविरलता का मामला उठाने का मूल आधार यही है। इस अवसर पर राज्य के जल संसाधन मंत्री ने केन्द्र से संवाद में होने वाली चूक का जिक्र किया था। केन्द्र और राज्य की सरकारों के बीच संवादहीनता दूर होनी चाहिए। इस तरह की त्रुटियों और गतिरोधों से उपजी चुनौतियों का जिक्र न्यायालय के आदेशों में भी है।

आज नमामि गंगे में हो रही तरक्की का विरोध बनारस के घाटों पर मल्लाह कर रहे हैं। स्थानीय नाविकों और गंगाभक्तों ने पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए प्रस्तावित तैरने वाली जेटी का जोरदार विरोध किया है। यह उनकी जीविका ही नहीं बल्कि अविरलता से जुड़ा मामला है। गंगा की अविरलता पर चल रही चर्चा का इतिहास 170 साल पुराना है। महामना मदन मोहन मालवीय इस आंदोलन के महानायक माने जाते हैं। उन्नीसवीं सदी के मध्य हिन्दू समाज में गंगा की अविरलता का सवाल जोर-शोर से उठने लगा था। उस युग में भारतीय समाज नदियों पर बनने वाले पुल का भी विरोध करता था। इस लिहाज से बनारसी मल्लाहों की पारंपरिक समझ अब तक भी नष्ट नहीं हुई। इन्हीं रहस्यों को समझने चारपांच सालों बाद मैंने फिर काशी का रुख किया था।

पहले विश्व युद्ध के कालखंड में महामना ने इसे एक जनांदोलन का रुप दिया। उनके साथ देश की जनता और रियासती सरकारें अंग्रेजों के विरुद्ध एकजुट खड़ी थीं। आज अपना मतलब खो चुका भागीरथबिन्दू नाम से 1916 में छोड़ा गया अविरल प्रवाह उनके सफलता की कहानी कहती है। उन्होंने अंतिम क्षणों में गंगा को बांधने के विषय में चेताया भी था। फिरंगी सरकार सिंचाई के नाम पर नदियों का दोहन करती रही और बाद की सरकारों ने शोषण करने में भी कसर बाकी नहीं रखा। अस्सी के दशक से ही सरकार और न्यायालय लगातार इसमें सक्रियता दिखा रही है। इन प्रयासों को देखकर एक देशी कहावत समझ में आती है, लेने गई पूत और खो आई खसम। यह कैसा दुर्भाग्य है कि आजाद भारत में लोग गंगाराइट्स से वंचित हो गए।

लाखों साल पुरानी गंगा का जल हमेशा इस कदर दूषित नहीं रहा। साठ के दशक तक यह जल पीने के लिए प्रयोग किया जाता था। समाज ने शुद्धता सहेजने के लिए तमाम तरह की परंपराएं रचीं। त्याग और बलिदान की उसी परिपाटी ने इनकी पवित्रता को बरकरार रखा। स्वामी सानंद एक दशक से गंगा के अविरलता की मांग कर रहे हैं। करीब तीन साल पहले बनारस में शहीद हुए बाबा नागनाथ छः सालों तक इसी बात पर अनशनरत रहे। 2011 की जून का दूसरा सोमवार गंगापुत्र निगमानंद की शहादत के नाम है। इस बलिदान से देश द्रवित हो उठा था। आज बिहार में अविरलता की बात उठी है। इस बीच आधा युग बीत गया। क्या नीतीशजी सचमुच गंगा मुक्ति की मांग करने वाले आंदोलनकारियों की जमात में शामिल हो रहे हैं? उनके साथ खड़े सत्याग्रहियों को देख कर वाकई यह वहम हो सकता है।

बिहार सरकार की दो बातों पर गौर करने से स्थिति साफ होती है। घोषणापत्र में इस कवायद का मकसद केन्द्र सरकार की गंगा से जुड़ी परियोजनाओं को गति देना बताया गया है। मुख्यमंत्री ने नपेतुले शब्दों में साफ कहा कि फरक्का बराज तोड़ने की पैरवी करने नहीं, बल्कि गंगा की अविरलता सुनिश्चित करने आए हैं। यहां विरोधाभाषी बातों के बीच एक ऐसी कल्पना है, जिसमें अविरलता कृत्रिम निर्माणों को तोड़े बगैर ही संभव हो। एक दृष्टांत युरोप पेश करता है। करीब चार दशक पहले पर्यावरण से जुड़ी ऐसी समस्या सामने आई। ग्रेट ब्रिटेन में कोयला संचालित विद्युत उत्पादन केन्द्रों से होने वाले प्रदूषण के कारण नाॅर्वे और पश्चिमी जर्मनी के जंगल और झील तबाह हो रहे थे। इसके लिए हर्जाने की मांग उठी। ब्रिटीश सरकार लंबे समय तक पल्ला झाड़ती रही। पर्यावरण विशेषज्ञों के बीच उनकी खूब किरकिरी होती रही। अंत में उन्हें कई बीलियन पाउंड खर्च कर नुकसान की भरपाई करना पड़ा। बिहार सरकार का पहला काम अपव्यय के लिए जिम्मेदार दोषियों को चिन्हित कर उन्हें भरपाई के लिए बाध्य करना चाहिए। साथ ही उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि बिहार में सत्तर के दशक में गंगा की लहरों पर आग की लपट देखा गया था। उस वक्त जय प्रकाश नारायण के कुछ शिष्यों ने इसे उठाया था। आज अविरलता के लिए अनिल प्रकाश जैसे गांधीजन वहीं जनांदोलन में लगे हैं।

वास्तव में गंगा की अविरलता सुनिश्चित करने के लिए कृत्रिम निर्माणों को ध्वस्त करना ही पर्याप्त नहीं है। इस विषय में वयोवृद्ध बहुगुणा साफसाफ कहते हैं कि इसके लिए हिमालय का भू उपयोग परिवर्तित करना होगा। इस दीर्घकालिक योजना पर सरकारों ने विचार ही नहीं किया। कभी हिमालय चैड़ी पत्तियों वाले वृक्षों से भरा सघन और सदाबहार वन था। अंग्रेजों ने व्यापारिक हितों को साधने हेतु हिमालय की नैसर्गिक वनस्पतियों को नष्ट करने की योजना बनाई। आज इसका परिणाम प्रत्यक्ष है। चैड़ी पत्तियों वाले ओक (बांझ) के बदले नुकीली पत्तियों वाले पाइन (चीर) के पेड़ यत्रतत्र खड़े हैं। स्थानीय लोग इसी वजह से बारबार भूक्षरण की समस्या का सामना करते हैं। इसके बावजूद भी हिमालय की पथरीली भूमि के अनुकुल कोई प्रभावी योजना अब तक नहीं बन सकी है।  

गंगा की अविरलता का मामला समूचे उपमहाद्वीप को प्रभावित करता है। यह बड़ा काम बड़े मन से ही संभव है। इस लक्ष्य को साधने के लिए नीतीश कुमार को दलीय राजनीति के दलदल से ऊपर उठ कर महामना होने की जरुरत है। उन्हें पहले अपने सर्मथकों को इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए तैयार करना होगा। किसी भी सूरत में ऐसा सभी के सहयोग से ही संभव है। यह केन्द्र और दूसरे राज्यों से जुड़ा मामला है। हिमालयन माॅनसून को प्रभावित करने वाले दक्षिण एशिया के दूसरे देशों और विश्व बैंक जैसे महाजनों से भी बारीकी से जुड़ा है। सभी को परस्पर सहयोग के लिए राजी करने की मुश्किल चुनौती सामने है। आज यदि गंगा की अविरलता का सपना देखते हैं तो इसे पूरा होने में भी कई दशक लगेंगे। यद्यपि इस विषय में सक्रिय विशेषज्ञों का नेतृत्व राजेन्द्र सिंह कर रहे हैं, तथापि अनुपम मिश्र और अरुण कुमारपानीबाबा जैसे गांधीवादी पर्यावरणविदों की बातें परिचर्चा से बाहर है। तैरने में कभी सक्षम रहे समाज को आज डूबने से बचने के लिए उनकी तरकीबों को सीखने और समझने की जरुरत है। ऐसी दशा में यह असाधरण भूल मानी जा सकती है। साथ ही इन समस्याओं का वास्तविक समाधान बीसवीं सदी के आॅस्ट्रियन वैज्ञानिक विक्टर शाॅबर्गर की चेतना से युक्त होकर ही संभव है।

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