दलित समस्या और भेदभाव की राजनीति

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कौशल किशोर | Follow @HolyGanga

आज दलितों के सवाल पर पूरा देश आंदोलित है। यह सिलसिला मंगलवार, 20 मार्च को शुरू हुआ। उस दिन उच्चतम न्यायालय ने डा. सुभाष काशीनाथ महाजन की अपील का निर्णय सुनाया था। एक बार फिर जस्टिस आदर्श कुमार गोयल और जस्टिस उदय उमेश ललित की अदालत ने चौंकाने वाला फैसला सुनाया है। दहेज उत्पीडऩ मामले में हुई फजीहत के बाद अब इस अदालत ने अनुसूचित जाति व जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम में नया दिशा-निर्देश जारी किया है। उन्होंने दलित उत्पीडऩ के मामले में बिना जांच-पड़ताल के होने वाली तुरंत गिरफ्तारी पर रोक लगा दी है। अब सरकारी मुलाजिमों से जुड़े मामलों में पहले नियोक्ता की संस्तुति आवश्यक है। अन्य मामलों में वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक की स्वीकृति लेनी होगी। इस आदेश के प्रभावी रहने की दशा में डी.एस.पी. स्तर के अधिकारी द्वारा जांच के बाद ही एफ.आई.आर. दर्ज की जा सकेगी। साथ ही अभियुक्तों की अग्रिम जमानत भी अब सहज संभव है। 

न्यायालय का सम्मान करने वाली दलित जनता सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले के विरुद्ध खड़ी है। कांग्रेस अध्यक्ष ने सत्ताधारी भाजपा पर दलित विरोधी होने का आरोप लगाया है। भीम सेना जैसे राजनीतिक संगठन सड़क पर उतर आए हैं। बिहार समेत देश के कई हिस्सों में न्यायालय और सरकार के खिलाफ  प्रदर्शन शुरू हुए। सभी जगह हलचल हो रही है। सरकार के मंत्रियों की प्रतिक्रियाएं सामने आती रही हैं। मोदी सरकार के कई मंत्री और सांसद इस निर्णय से क्षुब्ध हैं। इसकी गंभीरता को समझ कर सरकार भी इसमें पुनॢवचार याचिका दाखिल करने का विचार करती है। 

दुनिया भर में चर्चा होती है कि भारत में प्रतिदिन कितने दलित व आदिवासी ज्यादती का शिकार होते हैं। दलित हितैषी संगठनों में बराबर इन आंकड़ों पर चर्चा होती है। यहां रोजाना 3 दलित महिलाओं के साथ बलात्कार और 11 दलितों की पिटाई होती है। हर हफ्ते दलितों की हत्याएं, उनके घरों को आग के हवाले करने और उनके अपहरण की खबरें आती हैं। हर साल हजारों मुकद्दमे दर्ज होते हैं। इनमें पैरवी करने वाले न के बराबर हैं। बड़ी मुश्किल से सजा हो पाती है। क्या इनका मतलब यह है कि इस कानून का दुरुपयोग नहीं हो रहा है? 

वस्तुस्थिति क्या है, इस पर संसद तक में चर्चा हो चुकी है। कोर्ट के सामने अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट के साथ विशेषज्ञों की राय भी मौजूद है। सत्य और न्याय की रक्षा करना ही न्यायपालिका का धर्म है। क्या सचमुच अदालत ने यही काम नहीं किया है? यहां झूठा मुकद्दमा दर्ज कराने के दोषी को मुकम्मल सजा देकर दूरगामी संदेश दिया जा सकता था किंतु नया विधान रचने के क्रम में हुई भूल यहां साफ दिख रही है। यह दलीलों और आंकड़ों के जाल में उलझ कर भावना में बहने का नतीजा हो सकता है। इस निर्णय को त्रुटिहीन कराने की नीयत से रामदास अठावले और रामविलास पासवान के दलों ने पुनॢवचार याचिका दाखिल करने का फैसला किया है। मोदी सरकार के रविशंकर प्रसाद और थावरचंद गहलोत जैसे जिम्मेदार मंत्रीगण इस कार्य में लगे हैं। उन्हें पता है कि 16वें लोकसभा चुनाव में दलितों के बड़े वर्ग के समर्थन से ही भाजपा गठबंधन सत्तारूढ़ हो सका है।

वस्तुत: यह कानून का दुरुपयोग कर प्रशासन को सुचारू रूप से चलाने के लिए जिम्मेदार लोगों को परेशान करने का मामला है। यह महाराष्ट्र के सतारा जिले के कराड तालुका का एक दशक पुराना मामला है। राज्य सरकार द्वारा संचालित फार्मेसी कालेज में कार्यरत अनुसूचित जाति के एक स्टोरकीपर के ईमान और चरित्र का जिक्र विभागीय अधिकारी द्वारा गोपनीय वार्षिक रिपोर्ट में किया गया। इसका पता लगने पर तथाकथित दलित कर्मचारी ने थाने में उत्पीडऩ की शिकायत दर्ज करा दी। फिर सी.आर.पी.सी. की धारा 197 की प्रक्रिया कई सालों बाद पूरी हुई। आखिरकार 28 मार्च, 2016 को इस मामले में एफ.आई.आर. दर्ज की गई। न्यायालय के समक्ष मौजूद तथ्यों से साफ  है कि इस केस में प्रथम दृष्टया बदनीयती साबित नहीं होती है। क्या महज इस कानून के प्रयोग की संभावना को आधार मानकर किसी सरकारी अधिकारी के खिलाफ  कार्रवाई की जा सकती है? महाराष्ट्र के तकनीकी शिक्षा विभाग के कई निर्दोष अधिकारी एक दशक से इस मुकद्दमे में उलझे हैं। इन निर्दोष प्रशासनिक अधिकारियों की रक्षा कौन करेगा? इस फैसले में साफ  कहा गया है कि किस तरह इस कानून के दुरुपयोग से अदालतों का समय खराब होता रहा है। वस्तुत: यह दलित उत्पीडऩ रोकने के लिए बनाए गए कानून के दुरुपयोग का संवेदनशील मामला है परंतु कोई यह नहीं बता रहा कि ऐसे मामलों से निपटने के लिए पीड़ितों को क्या करना चाहिए? इन प्रश्नों को निरुत्तरित छोडऩे से दलितों को भी नुक्सान ही होगा। 

आज सुप्रीम कोर्ट के फैसले की आलोचना करने में लगी जमात के लोग अप्रत्यक्ष रूप से भेदभाव की राजनीति को बढ़ावा दे रहे हैं। क्या सचमुच दलितों के बीच निराशा का माहौल नहीं है? इस एक्ट के नियमों में ढील होने पर दलितों के खिलाफ अत्याचार के मामले बढऩे की आशंका निर्मूल नहीं है। पहले गिरफ्तारी के भय से लोग कमजोर दलित लोगों पर अत्याचार करने से दूर रहते थे मगर गिरफ्तारी में मुश्किल और जमानत के नए प्रावधान के बाद लोगों का यह डर खत्म हो गया है। नख और दंतविहीन होने के बाद इस कानून की प्रासंगिकता पर प्रश्न चिन्ह लग गया है। फलत: भविष्य में ऐसे मामलों में होने वाली वृद्धि को रोकना सहज नहीं होगा।

मेरी समझ से जस्टिस गोयल और जस्टिस ललित को भीम की तरह गदा भांजने की अपेक्षा अर्जुन की तरह पैने तीर से निशाना साधना चाहिए। यदि यह मामला इतना ही खराब था तो फर्जी मुकद्दमा दायर करने वाले तथाकथित दलित को मुकम्मल सजा देना क्यों नहीं मुनासिब समझा गया। ऐसा करने से सटीक संदेश जाता। पिछले साल जुलाई में भी इसी अदालत ने दहेज पीड़ित महिलाओं के मामले में ऐसा ही एक निर्णय सुनाया था। बाद में उस आदेश को मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली 3 सदस्यीय पीठ ने खारिज कर दिया था। बहुत संभव है कि इस मामले में भी वैसी ही कोई प्रक्रिया दोहराई जाए। भविष्य में इस मामले में क्या और कैसे होता है, यह जानना सचमुच बेहद दिलचस्प होगा।

(कौशल किशोर “दी होली गंगा” पुस्तक के लेखक हैं) https://t.co/z9ScyYCT0O?amp=1

https://punjabkesari.in/post/5728986/dalit-problems-and-discrimination-politics-777647 http://epaper.navodayatimes.in/c/27500151

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An Evening on Applied Spirituality

Applied Spirituality
Kaushal Kishore [follow @HolyGanga ]

There are many programmes in the halls of India International Centre every day. Many of these events are focused on promotion of certain ideas, groups and even products. In many cases, you may predict almost everything if you know about the event and its organiser. Still a few of them are interesting and others are entertaining. But these days the brainstorming—interesting and stimulating—sessions are rare. Last Monday (21 September 2015) I witnessed one of such events there.

I never had an idea on how interesting and stimulating the dais comprising Madhu Kishwar, Arun Sorie, Reverend Valson Thampu and Swami Agnivesh can really be. That evening, it was the occasion of a talk on the newest publication of Harper Collins i.e. Applied Spirituality by Swami Agnivesh. The representative of its publisher Kartika, in brief, introduced the issue and digniteries on the dais, and handed over the cord to Madhu Kishwar to moderate the session further.

I thought that this is going to be a rather hot evening when I heard the preamble and questions that Madhu Kishwar raised. She puts her crisp views in straightforward and simple words, and asks certain burning questions. She begins with Maharshi Dayananda and his mission the Arya Samaj that emerged to counter rise of Christianity in Brithish India. And further raise questions on the articulation of attack on the prevailing impediments of religions, as stipulated in the book. The call for collective efforts and the hardness in the tone of attacks are the backbone of her introductory talk. At last she expects a modeate tone so that every one can join the platform.

Arun Sorie says that reaction to reform is always bitter. He has further defined three different states—spiritual, mystic and do-gooder—in order to establish relationship among them. He clearly states that Swami Agnivesh is doing all that was initiated by Swami Dayananda Saraswati. He depicts examples from the life and works of Mahatma Gandhi and Raman Maharshi. However Gandhiji never went to Maharshi, still at times he referred many people to him. The audience before Maharshi praises the excellent works of Gandhiji, and questions so as to persuade him to do such works. In order to answer such questions Maharshi simply asks, ‘Who is doing these good works?’ The sublime and spiritual connection among these three different types of works is mentioned in the talks of Arun Sourie.

Debate on Freedom: Pristly class emerged in every religion, and only the priest is authorised to interpret the scriptures. In contrast there is the freedom that is being expressed in the behaviour of our children. Reverend Thampu says that every religion is against human freedom. Moreover religion is against spirituality. I was astonished to hear when a person like Valson Thampu says that he finally left the Inter Religious Movement after being a part of it for 25 years because the learders are not free to open their hearts.

Swamiji shares verbatium accounts of his formatin sice its inception in the Telagu speaking region of South India. His father died at the tender age of 4 and thereafter the maternal grand-father nourished him. There is many important things in his talk. I saw Swami Agnivesh first time in the chair. Although the audience felt the presidential address a bit lengthy, but still it was flawless and entertaining. The open session could have been more interesting, for there were many experts from various walks of life among the audience. Unfortunately it was not possible due to the time constraint.

वैमनस्य की राजनीति: चुनावी समर में नफरत का पैगाम

Jagran10April2014

Politics of Hatred

Kaushal Kishore

(Follow @HolyGanga)

Election campaign began with great zeal as soon as the clarion rang for 16th Lok Sabha polls. The candidates started to appeal to their voters with provocative statements, full of hatred. Leaders of all political parties are burning fumes against their opponents. This propensity is destroying Indian culture and basic pillars of the Indian Constitution. BJP’s prime ministerial candidate Narendra Modi was verbally threatened to cut into pieces, and someone retaliated it by ripping off clothes before deporting Sonia and Rahul Gandhi to Italy, regularly hate speech burns in the atmosphere after a little pause. This tendency is destructive for the society that advocates the concept of Vasudhaiva Kutumbakam; a single planetary home. In fact, this is the gift of democracy that can destroy the Indian culture. Last month, Supreme Court attempted on an unsuccessful effort to curb the menace of inflammatory speeches in public. The court of a three judge panel, comprising Justice B.S. Chauhan, M.Y. Eqbal and A.K. Sikri, after long hearing decided the public interest litigation filed by Pravasi Bhalai Sangathan in order to influence the election season, but the appeasement policy adopted by political parties to satisfy the vote bank makes a mockery of the verdict in true sense during this general elections. Hate Speech is still continued. Azam Khan, minister in Uttar Pradesh Govt. to Union Govt. minister Beniprasad Verma, there are many other names.

At least, it is proved by the statements of politicians that Hate Speech is a highly effective weapon to remain in lime-light. Recently, Congress leader from Saharanpur, Imran Masood went to jail for a short while due to his comments on prime ministerial candidate of BJP. This cycle does not end here. Politicians are sowing seeds of hatred only to win votes. This is what? Valueless politics or culmination of a deeply nourished conspiracy, all parts of this political plot can be deciphered in investigations or research, but politics based on unpleasantness and disharmony among common citizen can never be in favour of the national interests.

The rise of certain regional parties was an outcome of politics based on hatred. Public that votes on the basis of religion and caste are deeply affected by these things. Caste based equations are prevailing features of politics in certain states like Uttar Pradesh and Bihar. There was a time when migrants of Uttar Pradesh and Bihar were threatened to cut their hands on the western coast by Raj Thakre, and in South communal peace was agitated by Akabar-uddin Owaisi. Before all these Hindi Virodhi Andolan (Movement against Hindi) was on peak in the south itself. Meanwhile, Arvind Kejriwal started his politics in the national capital. He has offended certain leaders of the migrants’ welfare organization, thus supporters of the group launched movement against him before the Delhi assembly polls. The leader of the Sangathan launched protests aiming at the Aam Adami Party leader.

Politics of hatred, throughout the country, reaches its climax due to elections and burning unpleasantness. Last year, some migrants lost their hands in Maharashtra. Such actions are hammers that hurt the democratic spirit of Indian constitution. Spreading hatred by experienced leaders is not the result of an impulsive kind of reactions. In the last three decades hatred and violence sustained perpetual growth in Indian politics. The extent to which lawmakers abstained from giving priority to brotherhood and love might be ascertained from the fact that chili powder spray was used during a session in the 15th Lok Sabha. Honourable parliamentarians crossed all limits of decency in order to defeat the democratic values. The helplessness of Supreme Court of India came to light during the hearing of a case that was filed to obtain prohibition on hate speech by public figures. During the long debate in this case, the court summoned representatives of central and state governments. It was surprising to know that there is no provision in the thick books of law to curb the menace of hate speech. The arguments of Meenakshi Arora, counsel for the Election Commission, and judgment of the apex court reveal this fact. Finally, the court made ​​it clear that the parliament can only conquer this problem. In this situation, there is a serious question before the public, who is going to elect their representatives in the poll.

The problems caused by diversity of race, religion, colour, shape and breed are not new. It is not that simple now to fill the cavity between the natives and immigrants.  Vasudhaiva Kutumbakam is one of the key expressions of Indian culture, but today inflammatory speeches, under the guise of political ambitions, hurt the harmony among common citizen. Can this easy option really win the heart of Indian voters? The migrants issue can pose a major problem before the popularity of Maharashtra Navnirman Sena (MNS) and Aam Adami Party (AAP). The opposition of Arvind Kejriwal by the leaders of migrants’ organisation influenced the voters in Delhi assembly polls last year. AAP candidates lost many seats with thin margins.

Leaders and activists of the migrant community are contributing significantly to resolve this crisis. The ongoing awareness campaign in different parts of the country is a reflection of the lights in the Supreme Court judgment. This campaign for fraternity and peace can be a promise for the better future. The age-old Indian culture is needed to be preserved. It can be a worthwhile effort, if the voters think on such issues before deciding their representatives in this election season. In its absence this challenge can wipe out the bounty and generosity of Indian tradition.

[Kaushal Kishore is the author of The Holy Ganga]

http://www.jagran.com/editorial/apnibaat-politics-of-unpleasantness-11223366.html?src=HP-EDI-ART 

कौशल किशोर (Follow @HolyGanga)

16वीं लोकसभा के लिए बिगुल बजते ही चुनाव प्रचार जोर-शोर से शुरू हो गया। मतदाताओं को लुभाने के लिए उम्मीदवारों ने नफरत भड़काने वाली बयानबाजी शुरू कर दी। तमाम राजनीतिक दलों के नेता विरोधियों के खिलाफ आग उगल रहे हैं। यह प्रवृत्तिभारतीय संस्कृति और लोकतंत्र के मूल स्तंभों को ही ध्वस्त कर रही है। भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की बोटी-बोटी करने वाला बयान हो या सोनिया और राहुल गांधी के कपड़े उतार कर इटली भेज देने का, आम चुनाव में नफरत का स्वर रह-रह कर उठ रहा है। वसुधैव कुटुंबकम की पैरवी करने वाले समाज के लिए यह प्रवृत्तिबेहद घातक है। वास्तव में, यह लोकतंत्र की ही देन है जो हिंदुस्तानी संस्कृति को नष्ट कर सकती है। पिछले महीने सर्वोच्च न्यायालय ने नफरत फैलाने वाली बयानबाजी पर अंकुश लगाने का असफल प्रयास किया था। जस्टिस बीएस चौहान, एमवाई इकबाल और एके सिकरी की अदालत ने लंबी सुनवाई के बाद प्रवासी भलाई संगठन की जनहित याचिका पर विचार करते हुए चुनाव के मौसम में ऐसे भाषणों पर अंकुश लगाने की कोशिश की, परंतु सही मायने में न्यायालय के आदेश के बावजूद वोट बैंक के तुष्टीकरण के प्रयास में भड़काऊ भाषणों का सिलसिला जारी है। उत्तार प्रदेश सरकार में मंत्री आजम खान से लेकर केंद्र सरकार के मंत्री बेनीप्रसाद वर्मा तक ऐसे कई और नाम हैं। राजनेताओं के वक्तव्यों से इतना तो साफ है कि चर्चा में बने रहने के लिए भड़काऊ भाषण बेहद कारगर उपाय है। सहारनपुर के कांग्रेस नेता इमरान मसूद भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के संबंध में की गई टिप्पणी के कारण जेल की हवा खा चुके हैं। यह सिलसिला यहीं खत्म नहीं हो जाता। वोट बटोरने के लिए राजनेता घृणा और नफरत के बीज बो रहे हैं। यह विचारहीनता की परिणति है या राजनीतिक पैंतरा, यह अन्वेषण का विषय हो सकता है, पर वैमनस्यता के बूते पनपने वाली राजनीति राष्ट्रहित में कतई नहीं हो सकती।

कई क्षेत्रीय दलों का अभ्युदय घृणा के बूते पनपने वाली राजनीति के कारण हुआ। धर्म और जाति के आधार पर मतदान करने वाली जनता इन बातों से प्रभावित होती रही है। उत्तार प्रदेश और बिहार की राजनीति जातिगत समीकरणों के इर्द-गिर्द घूमती है। एक दौर ऐसा भी था कि पश्चिमी छोर पर राज ठाकरे द्वारा बिहार और उत्तार प्रदेश के प्रवासियों के हाथ काटने की कवायद हो रही थी तो दक्षिण में अकबरुद्दीन ओवैसी ने सांप्रदायिक भावनाएं भड़काने का काम किया था। इससे पहले दक्षिण में ही हिंदी विरोधी आंदोलन छेड़ा गया था। इसी बीच राष्ट्रीय राजधानी में अरविंद केजरीवाल ने राजनीति शुरू की। उनके कुछ बयानों से आहत प्रवासी भलाई संगठन के समर्थकों ने दिल्ली विधानसभा चुनाव से पूर्व आम आदमी पार्टी के नेता पर निशाना साधा था।

चुनाव के कारण देश भर में घृणा और वैमनस्य की राजनीति चरमोत्कर्ष पर पहुंच जाती है। गत वर्ष महाराष्ट्र में कुछ प्रवासियों के हाथ काट दिए थे। इस तरह की हरकतें भारतीय संविधान की लोकतांत्रिक भावना पर कुठाराघात हैं। अनुभवी नेताओं द्वारा नफरत फैलाने का काम क्षणिक आवेश में जन्मी प्रतिक्त्रिया कतई नहीं है। पिछले तीन दशकों में भारतीय राजनीति में घृणा और हिंसा की प्रवृत्तिका अनवरत विकास हुआ है। कानून निर्माता भाईचारा और प्रेम को प्राथमिकता देने से किस कदर कतराते रहे हैं, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 15वीं लोकसभा में मिर्च-पाउडर का स्प्रे तक हुआ। माननीय सांसदों ने शालीनता की सारी हदें लांघकर लोकतांत्रिक मूल्यों पर कुठाराघात किया। नफरत फैलाने वाले बयानों पर रोक लगाने के उद्देश्य से दायर किए गए एक मुकदमे की सुनवाई के दौरान उच्चतम न्यायालय की लाचारी साफ नजर आई। इस मामले में हुई लंबी बहस के दौरान केंद्र और राज्य के प्रतिनिधियों से न्यायालय ने जवाब-तलब किया था। आश्चर्य की बात है कि कानून की मोटी किताबों में नफरत फैलाने वाली आवाजों पर अंकुश लगाने का कोई प्रावधान नहीं है। चुनाव आयोग की तरफ से वकील मीनाक्षी अरोड़ा की दलीलों और न्यायालय के आदेश से यह बात स्पष्ट हुई। आखिरकार न्यायालय ने साफ कर दिया है कि संसद ही इस समस्या का निदान कर सकती है। इस स्थिति में जनप्रतिनिधियों का चुनाव करने वाली जनता के सामने यह एक गंभीर प्रश्न है।

जाति, धर्म, रंग-रूप और नस्ल की विविधता से उपजी समस्या नई नहीं है। अब मूल निवासियों और प्रवासियों के बीच की गहरी खाई को पाटना आसान नहीं रहा। वसुधैव कुटुंबकम का भाव भारतीय संस्कृति का मूल मंत्र रहा है, परंतु आज राजनीतिक महत्वाकांक्षा की आड़ में भड़काऊ भाषणों के कारण आपसी भाईचारा और सौहा‌र्द्र को ठेस पहुंच रही है। यह सुगम साधन क्या सचमुच मतदाताओं का दिल जीत सकता है? महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना और आम आदमी पार्टी की लोकप्रियता के सामने प्रवासियों का मसला एक बड़ी समस्या है। केजरीवाल के खिलाफ प्रवासी भलाई संगठन की मोर्चाबंदी के कारण दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को मिलने वाले वोटों पर असर पड़ा था। कई सीटों पर आप प्रत्याशियों को काफी कम वोटों से हार का सामना करना पड़ा था।

प्रवासी संगठन से जुड़े कार्यकर्ता इस संकट को दूर करने में अहम योगदान दे रहे हैं। देश के विभिन्न हिस्सों में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के आलोक में जागरूकता अभियान चलाने से सुखद भविष्य की उम्मीद बंधती है। आपसी भाईचारा और सौहा‌र्द्र कायम करने के उद्देश्य से जारी यह अभियान भारतीय संस्कृति के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है। आम चुनाव के महासमर में यदि मतदाता इस बात पर विचार कर अपने प्रतिनिधि का चुनाव करते हैं तो यह एक सार्थक प्रयास साबित होगा। ऐसा न होने से यह रोग भारतीय संस्कृति की उदारता को नष्ट कर देगा।

[लेखक कौशल किशोर, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं]

DelhiVotes10Apr

Destruction Designed by our own Hands

Destruction Designed by our own Hands

(Kaushal Kishore) The terrible catastrophe caused by heavy rains and floods in various parts of North India has shaken the entire nation. It is not a natural disaster, but retribution of the destruction to Mother Nature for the sake of haphazard and indiscriminate development. Uttarakhand and Himachal Pradesh sustained heavy damages to life and goods on account of heavy rains in different regions. It has also stricken the governments of Delhi and Haryana. The water levels of the Ganga, Yamuna and other tributaries are on rise. The flooding caused by two-three days of raining cats and dogs bent on overthrowing the massive structures of the development. In fact, this is not the outcome of fiery gaze of the nature, but an artificial devastation.

Himalayas and the monsoon are closely connected. The early arrival of monsoon is a sign of upcoming danger. It also suggests the changing patterns of weather. Landslide is the serious problem in mountain region during rainy days. The projects emerged on the name of development have destroyed the natural structure of the mountain. They also play a key role in changing weather patterns. Nature, in her original state, uniformly distributes the vapor accumulated in the atmosphere. The result of forcible humanitarian intervention comes in the form of cloud bursts. Today, many samples of the blind development along with numerous hydropower projects are present in the Himalayas. 70 projects are still under construction in Uttarakhand alone. The number of such disasters and intensity of its wrath will only increase in the future.

In an olden era the northern part of the country spread over the Himalayas was forest region. That evergreen and dense forest is destroyed now. The flora and fauna in these mountain ranges are bare minimum in the 21st century. This lack causes the severe catastrophe like comet fall in the beginning of the rain. The plant species that naturally grow on the rocky grounds of Himalayas have magnificent properties. In addition to control soil erosion they have immense medicinal properties as well. The destruction of these plants, which were effective in preserving and improving soil structure, began in the 19th century during the time of Frederick Wilson itself. Not only in Garhwal and Kumayun but in the entire Himalayas, the forests of Banjh (Himalayan species of oak) were destroyed, and it transformed into the Chir (pine) forests. As a result, quality of soil was destroyed. The vegetation that maintains the structure of outer surface of the landscape in mountain region also vanished. After independence the state adopted the same tradition. Irreparable damages to the environment and biodiversity were carried out in this process.

Since independence small and smaller states were established in the mountain regions on the name of development itself. But the pace of development and its concept both have nothing to do with the actual development. They are far apart from the concept of sustainability. The orgy of development that caused this catastrophe of huge destruction is a part of guile-filled politics. Destruction was promoted and advertised as development, so that people believed it as truth. However, the environmental and ecological studies on the effects of hydroelectric projects and other schemes of development were dully carried out by the experts before their creation. Technical experts mention these facts and feature in the study that reports large hydropower projects like the Tehri Dam. Even though, no adequate consideration into these aspects is meant to ask for man-made disasters. Its repercussions are in open now. Rain drops falling from the sky began to turn catastrophic while reaching the bottom.

The state has changed the standard of safeguard and conservation of the Mother Nature.  Tourism and eco-tourism developed in place of pilgrimage in the remote areas of the Himalayas. It is also correlated to the concepts of development and destruction of the state. The difference between austerity and leisure is uneven. In such a tragic situation, can it be called natural disaster in the Himalayan regions? Were the experts serving the government did not know the value of forest cover and its outcome? Had they no idea about the landslides in the Himalayas that was weakened by the multitude of explosions? Is it not the result of devastation caused in the name of development? And if it is so, this is not the brutality caused by the anger of the nature, but a terrible man-made disaster. It is a natural reaction to human oppression. It is a must not only for the state but for the common man also to accept this bitter truth. Massive destructions have been caused to the Mother Nature in Himachal Pradesh and Uttarakhand in past several decades on the name of power generation and irrigation.

The beauty and majesty of the Himalayas proved to be its worst enemy. The development was done largely after clearing thick forests, mountains were cut using explosives wildly, and long tunnels were created. All these were enough to undermine the mountain. Huge quantity of dynamite was used to build wide roads in the beautiful valley of the nature. The same dynamite, when the nature returns, it becomes cause of vociferous public reactions. The Himalayas that stands in such a delicate condition will naturally cause such havoc during the rainy seasons. In the Himalayan regions, whatever happens today is entirely due to man-made disaster. In absence of adopting curative measures before time, even worse consequences are awaited. The state also termed it as the wrath of nature only to run away from the call of duty. This is the output of selfishness, greed and corruption prevailing in the statecraft. The state and society ought to accept it with ease, and they should try to overcome those defects in the future. The tribal communities adopt the indigenous techniques to avoid disaster like the tsunami, but the learned people, who claims to be knowledgeable, remains to die at the time of drowning.

Such destructive events reveal that the old indigenous technology of development is better. It is time for society and state to awake and wake up. Stop tampering with nature and her currents, and then adoption of uninterrupted and clean path of creation is the only appropriate solution.

(The author is an expert in environmental matters)

http://www.jagran.com//editorial/apnibaat-planned-devastation-by-our-hands-10500079.html

अपने हाथों रची गई तबाही

उत्तर भारत के विभिन्न हिस्सों में भीषण वर्षा और बाढ़ से मची भयानक तबाही ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। यह प्राकृतिक आपदा नहीं है, बल्कि अंधाधुंध विकास के नाम पर प्रकृति के साथ किए गए अत्याचार का प्रतिकार है। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में भीषण बारिश से जान-माल की भारी क्षति हुई है। इससे दिल्ली और हरियाणा तक की सरकारें त्रस्त हो उठीं। गंगा, यमुना और दूसरी सहायक नदियों का जलस्तर उफान पर है। दो-तीन दिनों की बारिश से उत्पन्न बाढ़ की विभीषिका विकास के विशाल ढांचों को उखाड़ फेंकने पर आमादा हो गई है। वास्तव में यह प्रकृति का कहर नहीं, बल्कि कृत्रिम आपदा ही है।

हिमालय और मानसून का गहरा संबंध है। समय से पूर्व मानसून का आगमन खतरे का संकेत होता है। यह मौसम के बदलते मिजाज का भी द्योतक है। बरसात के दिनों में पर्वतीय क्षेत्र में भूस्खलन की समस्या गंभीर होती है। विकास के नाम पर उपजी परियोजनाओं ने पर्वत के नैसर्गिक स्वरूप को बिगाड़ दिया है। मौसम का मिजाज बदलने में भी इनकी अहम भूमिका है। प्रकृति अपनी नैसर्गिक अवस्था में वायुमंडल में जमा वाष्प को समान रूप से वितरित करती है। जबरन किए गए मानवीय हस्तक्षेप का नतीजा बादलों के फटने के रूप में सामने आता है। आज हिमालय में जलविद्युत परियोजनाओं के साथ ही अंधे विकास के अनेक नमूने मौजूद हैं। अकेले उत्तराखंड में 70 परियोजनाओं पर काम चल रहा है। भविष्य में ऐसी आपदाओं की संख्या और उसकी विभीषिका और बढ़ेगी ही।

किसी युग में हिमालय में फैला देश का उत्तरी भाग वन क्षेत्र था। वह सदाबहार और सघन वन अब नष्ट हो चुका है। 21वीं सदी में इन पर्वत श्रृंखलाओं पर वनस्पतियां न्यूनतम शेष रह गईं। इस अभाव के कारण ही बारिश की शुरुआत में ही उल्कापात जैसा तांडव खड़ा हुआ है। हिमालय की पथरीली भूमि पर नैसर्गिक रूप से उगने वाली वनस्पतियों में विशेष गुण होते हैं। भूसंरक्षण के अतिरिक्त इनमें अपार औषधीय गुण भी हैं। भूमि को सहेजने और संवारने में कारगर रहीं इन वनस्पतियों का विनाश 19वीं सदी में फ्रेडरिक विल्सन के समय से ही शुरू हो गया था। गढ़वाल और कुमायुं ही नहीं समूचे हिमालय से बांझ [ओक की हिमालयी प्रजाति] को नष्टकर चीड़ [पाइन] के जंगलों में तब्दील कर दिया गया। परिणामस्वरूप मृदा की गुणवत्ता नष्ट हुई। साथ ही पर्वतीय भूमि की वाह्य सतह को जोड़कर रखने वाली वनस्पतियां नष्टप्राय: हो गईं। आजादी के बाद वही परिपाटी स्वदेशी शासन व्यवस्था ने अपनाई। इस क्रम में पर्यावरण और जैवविविधता की अपूरणीय क्षति हुई है।

आजादी के बाद पर्वतीय क्षेत्र में छोटे-छोटे राज्य विकास के नाम पर ही गढ़े गए थे, परंतु विकास की गति और अवधारणा, दोनों का ही वास्तविक विकास से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं है। विकास की वह योजना जिसके कारण विनाश का यह तांडव शुरू हुआ, छल-कपट से भरी राजनीति का हिस्सा है। विनाश को विकास कहकर इस कदर प्रचारित किया गया कि लोग उसे ही सच मान बैठे। ऐसा नहीं है कि जलविद्युत परियोजनाओं और विकास की दूसरी योजनाओं को बनाते समय पर्यावरण और पारिस्थितिकी का अध्ययन नहीं किया गया। तकनीकी विशेषज्ञों ने इन तथ्यों का जिक्र भी टिहरी डैम जैसी परियोजनाओं की रिपोर्ट में किया था। फिर भी इस ओर कोई ध्यान नहीं देना मानव निर्मित आपदाओं को निमंत्रण देना ही है। इसका दुष्परिणाम सामने है। आसमान से गिरती बारिश की बूंदें ऊपर से नीचे पहुंचने तक कहर बरपाने लगी हैं।

शासन व्यवस्था ने प्रकृति के संरक्षण और संवर्धन का मापदंड ही बदल दिया है। हिमालय के सुदूर क्षेत्रों में तीर्थाटन के स्थान पर पर्यटन और इको-टूरिज्म विकसित हुआ है। यह भी विकास और विनाश की सरकारी अवधारणाओं के सापेक्ष ही है। तपस्या और मौज-मस्ती के बीच जमीन-असमान का फर्क होता है। क्या ऐसी स्थिति में हिमालयी प्रदेशों में त्रासदी को प्राकृतिक आपदा कहा जा सकता है? क्या सरकारी तंत्र में सेवारत विशेषज्ञ पहाड़ के वनस्पतिविहीन होने का परिणाम नहीं जानते थे? क्या विस्फोट से कमजोर हुए हिमालय में भूस्खलन की समस्या का अंदाजा उन्हें नहीं था? क्या यह विकास के नाम पर मचाई गई तबाही का परिणाम नहीं है? और यदि ऐसा है तो यह प्रकृति की क्रूरता का कोप नहीं, मानव निर्मित भयानक आपदा है। यह मानवीय अत्याचार की नैसर्गिक प्रतिक्रिया है। शासन ही नहीं आम जन को भी इस कटु सत्य को स्वीकार करना चाहिए। पिछले कई दशकों से विद्युत उत्पादन और सिंचाई के नाम पर हिमाचल और उत्तराखंड में प्रकृति के साथ भीषणतम खिलवाड़ किया गया है।

हिमालय का सौंदर्य और ऐश्वर्य ही उसका सबसे बड़ा दुश्मन साबित हुआ। विकास के लिए बड़े पैमाने पर जंगलों को साफ किया गया, विस्फोटकों का बेतहाशा इस्तेमाल कर पहाड़ काटे गए, लंबी सुरंगें बनाई गई हैं। यह सब पर्वत को कमजोर करने के लिए काफी था। प्रकृति की सुंदर वादियों में चौड़ी सड़क निर्माण करने के लिए बारूद का इस्तेमाल किया गया। वही बारूद आज प्रकृति लोगों को वापस कर रही है तो हायतौबा मची है। ऐसी नाजुक हालत में खड़ा हिमालय बारिश होते ही तबाही का कारण तो बनेगा ही। आज हिमालयी प्रदेशों में जो कुछ भी हो रहा है वह पूरी तरह मानव निर्मित आपदा ही है। समय रहते न चेतने पर इसके और भी भयंकर परिणाम होंगे। इसे प्रकृति का कहर कहकर सरकारें भी पल्ला झाड़ती रही हैं। यह स्वार्थ, लालच और भ्रष्टाचार के बोये बीज की उपज है। इसे समाज और सरकार को सहजता से स्वीकार कर भविष्य में उन दोषों को दूर करने का प्रयास करना चाहिए। सुनामी जैसी आफत से जनजातीय समुदाय के लोग तो बचने की युक्ति अपना लेते हैं, पर खुद को ज्ञानी बताने वाले लोग डूब कर मरने को ही अभिशप्त होते हैं।

इस तरह की घटनाओं से पता चलता है कि विकास की पुरानी देशज तकनीक ही उम्दा है। समाज और सरकार के लिए यह चेतने और जागने का वक्त है। प्रकृति और उसकी धाराओं के साथ छेड़छाड़ बंद कर सृजन के अविरल और निर्मल मार्ग को अपनाना ही उपयुक्त निदान है।

[लेखक पर्यावरण मामलों के विशेषज्ञ हैं]

Jagran22juneA review of the Himalayan Tsunami (The flash-flood on 16-17 June 2013) Article was published on 22 June 2013 in Jagran, the largest selling Hindi Daily

सांपनाथ और नागनाथ के बीच फंसे राजनाथ, दीनानाथ कौन ?

Author of The Holy Ganga

Author of The Holy Ganga

(कौशल किशोर)
भाजपा चुनाव समिति के अध्यक्ष पद पर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की ताजपोशी के बाद राजनैतिक ज्वार तीव्र हो उठा है। पार्टी के वरिष्ठतम नेता लालकृष्ण आडवाणी के तीन प्रमुख पदों से इस्तीफा देने और फिर उसे वापस लेने के बीच के घटनाक्रम की समीक्षा देशभर में हो रही है। एनडीए के प्रमुख घटक दलों के अलावा अन्य राजनैतिक दल भी इस गहमा-गहमी में सक्रिय हो उठे हैं। सियासी पार्टियों की अंदरखाने की राजनीति से भूचाल खड़ा होना कोर्इ नर्इ बात नहीं है। कल्याण सिंह से लेकर जे. कृष्णमूर्ति और गुरुस्वामी प्रकरण की जिम्मेदारी भी भाजपा नेताओं की गुटबाजी और निजी ऐजेंडे का ही परिणाम था। आज राजनाथ की पार्टी सांपनाथ और नागनाथ की लड़ार्इ में दीनानाथ को दफनाने की कवायद करती नजर आ रही है।

राजनाथ ने भाजपा अध्यक्ष की नर्इ पारी की शुरुआत बड़े अरमानों से की थी। इस बार उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती दीनानाथ की खोज करने की रही। दीनानाथ एक ऐसा जननायक जो एनडीए के घटक दलों में सामंजस्य बरकरार रख सके और 2014 के लोकसभा चुनाव में उनकी नैया पार लगा सके। एनडीए की पिछली पारी में यह दुरुह कार्य करने वाले जननायक अटल बिहारी वाजपेयी थे। उनके रिटायरमेंट के बाद यह जगह भी पार्टी में आडवाणी को ही मिली। इस बीच एक अर्से तक संघ उनसे खासा नाराज भी रहा। किसी वक्त गुजरात की बागडोर आडवाणी ने अपने खास सिपहसलार मोदी को सौंपा था। आज वही आडवाणी जनसंघ के आदर्शों की याद दिला कर नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षाओं को इंगित कर रहे हैं।

भाजपा और संघ परिवार की राजनैतिक अभियानों में श्यामा प्रसाद मुखर्जी और दीनदयाल उपाध्याय के अतिरिक्त रथयात्राओं का भी विशेष महत्व रहा। रथयात्रा युग के महानायकों में आडवाणी और मोदी ही अलग-अलग पीढ़ी में बड़े नेता रहे हैं। हिन्दु राष्ट्रवादी विचारधारा के साथ शुरु हुए जनसंघ में पंडित दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद की प्रतिध्वनि कुछ खास नहीं दिखा सकी थी। वह भारतीय राजनीति में सचमुच त्याग और बलिदान की मूर्ति थे। ऐसी हालत में सत्ताप्राप्ति की साधना का ध्येय लेकर पार्टी से जुड़े नेताओं को जोड़े रखना सहज नहीं रह जाता है। यह समस्या गांधी के साथ भी थी। उस दौड़ में सत्ता की आकांक्षा ने जनसंघ को भारतीय जनता पार्टी में तब्दील कर दिया था।

यह कुछ खास नेताओं के निजी एजेंडे के कारण ही संभव हो सका था। इस बीच राष्ट्रीय पटल पर एक बड़ी पार्टी के रुप में भाजपा को खड़ा करने में आडवाणी की रथयात्राओं की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। इसी वजह से वह भारतीय राजनीति में सबसे दमदार सिंधी साबित हो सके हैं। राम मंदिर निर्माण वास्तव में भाजपा की अंदरुनी एजेंडे में कभी नहीं था। आडवाणी और उनके साथियों की मंशा इस मुद्दे का भगवाकरण कर राजनीति की विसात पर मोहरों से खेलने का ही था। इस क्रम में हुए रथयात्रा के साथ ही देश के कर्इ हिस्सों में आगजनी और रक्तपात भी खूब हुआ। उन दिनों सांप्रदायिक दंगों से देश झुलस रहा था। अल्पसंख्यक समुदाय को नुकसान पहुंचाकर आडवाणी ने हिन्दु सहिष्णुता को कलंकित किया था। यह कार्यक्रम भी निजी एजेंडा ही देश और हिंदु समाज पर थोंपने के लिए किया गया था। इसके साथ हिंदुस्तान के आम लोगों के हितों का दूर तक कोर्इ नाता-रिश्ता नहीं था। कालांतर में भाजपा ने इसका भरपूर लाभ भी उठाया। यह राजनीति की गहरी चाल थी, जिसके प्रणेता आडवाणी ही थे। रथयात्राओं के उस दौड़ में आडवाणी कट्टर हिंदुवादी और अटल बिहारी वाजपेयी सेकुलर छवि के राजनेता बनकर उभरे थे। आगे चलकर यह भाजपा की गठबंधन की राजनीतिक सफर का मूलस्तंभ साबित हुआ। आधे युग में तीन बार वाजपेयी प्रधानमंत्री चुने गये।

मोदी को रथयात्रा के संयोजक कि जिम्मेदारी निभाने के लिए आडवाणी ने ही आगे बढ़ाया था। बाद में मोदी ने इसी रणनीति का प्रयोग कर गुजरात में सांप्रदायिक दंग कराये। इसे ही हिंदुत्व का नाम देकर भाजपा और संघ आम लोगों को लंबे अर्से से भ्रमित करती रही है। इस बीच जम्हूरियत का सबसे कलंकित नजारा भी सामने आता है। पिछली तीन बार के विधान सभा चुनावों में मोदी बड़े नेता बन गये हैं। उनकी विचारधारा और कार्यप्रणाली आडवाणी के सच्चे अनुयायी बनकर हिंदु-मुस्लिम विद्वेष की राजनीति की रही है। फिर भी विरोध, इस स्थिति में यह देखना अहम होगा कि भाजपा की राजनीति किस ओर जा रही है। संभव है कि महज निजी महात्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए आडवाणी यह सब कर रहे हों। यदि ऐसा नहीं है तो उन्हें पहले ही प्रधानमंत्री के रेस से बाहर होने की अपने इरादे का ऐलान कर देना चाहिए था।

आज भाजपा में मोर्चा मोदी बनाम आडवाणी है। किसी जमाने में पार्टी के दो शीर्ष नेता आडवाणी और वाजपेयी के दो अलग-अलग खेमें थे। उन दिनों मोदी पार्टी में आडवाणी के प्रमुख सिपहसलार थे। आडवाणी की नीतियों को प्रोत्साहित करने में लगे मोदी का आज वही विरोध कर रहे हैं। पूर्व में वाजपेयी ने आडवाणी को पत्र लिखकर सूचित किया था कि मोदी जैसे चरित्र का प्रोत्साहन न ही पार्टी हित में है और न ही देशहित में। उस समय आडवाणी ने मोदी का पक्ष लिया था। कर्इ राजनीति विश्लेषक मोदी द्वारा वाजपेयी की खिलाफत को आडवाणी की रणनीति का हिस्सा माना था। सिंध के पेशेवर वकील की बुद्धि में यह साफ था कि कट्टर हिंदुवादी छवि के साथ प्रधानमंत्री की कुर्सी वह नहीं पा सकता है। फलत: उन्होंने 2005 में पाकिस्तान यात्रा के दौरान जिन्ना को सेकुलर बताकर अपनी छवि सुधारना शुरु किया था। ऐसा करके उन्होंने एनडीए के घटक दलों के नेताओं को भले ही अपने पक्ष में कर लिया हो पर संघ की नाराजगी जगजाहिर हो गयी।

संघ परिवार और भाजपा का समीकरण बनता-बिगड़ता रहा है। यधपि सूदर्शन के बाद भागवत का दौड़ आने पर आडवाणी ने पाशा अपने पक्ष में कर लिया था। सालभर बाद एक न्यूज चैनल पर उन्होंने प्रधानमंत्री पद पर अपनी दावेदारी का खुलासा कर दिया था। लोकसभा चुनाव से पूर्व एनडीए के सहयोगियों ने आडवाणी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार माना था। 2009 में एनडीए की हार की एक बड़ी वजह बनी आडवाणी और उनकी पुरानी छवि जो उनके अपने ही कुटिल राजनीतिक चालों का परिणाम थी। नवीन पटनायक और नितीश कुमार जैसे नेता मोदी के विरुद्ध आडवाणी को चुनते रहे हैं। आज मोदी रामदेव जैसे बाबाओं के राजनेता हैं। राजनाथ ने पिछले सभी कार्यकालों में पार्टी का नुकसान ही किया है। उनसे कोर्इ बेहतर आशा करना पहेली जैसी पहल है। वैसे ऐसी हालत में राजनाथ की पार्टी के लिए दीनानाथ की खोज करना स्वभाविक है। देश की वह जनता जिसने राम मंदिर के आडवाणीकरण को देखा है, उसे मोदी रचित गोधरा का तांडव भी याद है। इसकी निशानी बची ट्रेन के अधजले डिब्बों को केंद्र में रेल मंत्री रहते नितीश कुमार ने आनन-फानन में नष्ट करवा दिया था। आज वही नितीश विरोधियों का नेतृत्व करते नजर आते हैं। प्रधानमंत्री पद ही इतना अहम् है.

राजनाथ की भाजपा के सामने खड़े दो बड़े सूरमा तो सांपनाथ और नागनाथ ही हैं। उनके विष की याद दिलाने को नवीन पटनायक, शरद यादव और नितीश जैसे दूसरे सूरमा भी हमेशा ही मैदान में रहे हैं। इस हालात में एनडीए की ओर से प्रधानमंत्री की दावेदारी किसकी होनी चाहिये यह अहम सवाल है। भाजपा को गठबंधन के मुखिया का बेहतर रोल निभाने के लिए सभी को साथ लेकर चलने की कारगर पहल करनी थी। परंतु पार्टी के नेताओं ने आडवाणी की इस कोशिश को दर किनारे कर मोदी के हाथों नेतृत्व थमा कर अपने इरादे साफ कर दिये हैं। इसकी पड़ताल करने पर कर्इ ठोस सबूत मिलते हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि एनडीए के घटक दल 2014 के चुनावों से पूर्व गठबंधन को छोड़ देने का इरादा रखते हैं। ऐसा करने से कुछ प्रदेशों में क्षेत्रिय दलों को फायदा होता है। भाजपा के कर्इ बड़े नेताओं का भी मानना कुछ ऐसा ही है कि इससे उन्हें भी नरेंद्र मोदी को नेता मानने से आमचुनाव में सीट की बढ़त होती है। भविष्य में यह देखना होगा कि नागनाथ और सांपनाथ के इस जंग में राजनाथ श्यामा प्रसाद मुखर्जी और पंडित दीनदयाल उपाध्याय के सपनों के साथ कैसा सलूक करते हैं। राजनीति का दस्तूर रहा है कि सांपनाथ और नागनाथ की लड़ार्इ में दीनानाथ ही दफन होते हैं।

The Holy Ganga is the most suitable for devotees, scholars and environmentalists alike

Rajbir Deswal•November 8, 2009

The popular legend credits that the Ganga was brought on Earth by sage Bhagiratha who did penance and performed austerities to please the Gods, in order to cleanse the sins of his ancestors and to perform rituals for their salvation, with the holy waters. Sagar, who was the great-grandfather of Bhagiratha, had 60,000 sons who perished in a fire, after they incurred the wrath of Rishi Kapila.

The author Kishore, a known environmentalist and a Ganga activist, discusses the Ganga as a goddess and as the lifeline of India, its pollution problems and solutions. Each segment of the book tackles various issues related to the Ganga, which is more than a mere river for the Hindus, although water worship has been known to be practiced in many civilisations, except at a stage in Christianity, that too as late as in the 14th century. But this reviewer finds it more relevant to talk about Ganga’s boons, curses and contamination. A few mythological inputs from the book are worth mentioning.
Another legend has it that Ganga’s birth was a result of a curse, when during a Raas (dance of devotion and love) performed by Radha and Krishna, they melted, merged and liquidised in the purest form of love, that was Ganga herself. Lord Shiva himself was a witness to this dance. Later, when in another Raas, Radha, not recognising her own daughter Ganga, whose bewitching beauty had Krishna eye and ogle at her, cursed her to fall on Earth. When Krishna explained to Radha that it was being a natural part that he answered Ganga’s glances, Radha gave a boon to Ganga to be known as the purest in all times to come.

Ganga’s story of the curses and boons doesn’t stop here. Once when Ganga, the most beautiful and capricious, visited Lord Brahma, she had her thinly clad youthful richness exposed, when all other present turned their eyes away from her, but not King Mahabhisha. For his “harassing and offending” the honour and grace of Ganga, Brahma ordained he shall have to go to Bhoolok (Earth) to redeem himself, by being instrumental in Ganga’s matrimony, in a way that his son Shantanu would marry her.

Yet, another legend has it that Ganga once annoyed the angry sage Durwasa, with her playful and impish demeanour and outrage. Durwasa’s loin cloth (dhoti) worn over his lower limbs flew in a breeze when Ganga giggled and laughed, making the sage lose his temper and he cursed her to fall from the Heavens. On beseeching, she was spared but only to the extent that the eighth Vasu (one of the immortal sons of Manu who enraged sage Vashishtha by stealing his cow) was to be born to her. This Vasu was Dev Vrata, popularly known as Bheeshma Pitamah in the Mahabharta.

Another story related to the Ganga is that of Agatsya, a virtuous sage possessed with extraordinary gastronomic powers. Having been tormented by the demons that hid themselves in the ocean after troubling devtas, they approached this saint to drink all the ocean water, so that demons could be found and killed. Agatsya drank the entire ocean water and the devtas killed the hiding demons. When they were all returning to heaven, Lord Brahma prophesied that the ocean would remain dry, and will have to wait till the time king Bhagirath brought the Ganga on Earth, and filled the ocean with water.

Many facets of the Ganga are dextrously delineated in the book. She is described as the daughter of Vishnu. The purity of the Ganga is also described since it is considered to be the water with which Vishnu washed his lotus feet. She is also said to be emerging out of the Kamandal of Brahma. She is known as Jahnvi for when on her way to cleanse the sins of Bhagirath’s ancestors, she flooded the ashram of sage Jahnu, who drank all her water and let her come out of his right ear, but only on being beseeched by Bhagirath.

The book has details about the places en route to the Ganga River and their mythological and religious status. Various fairs like the Kumbh, Kanwar, Magh, etc. are discussed here. Temples, shrines and pilgrimage places find mention with apt details. Ganga’s pollution levels, water quality, Ganga as “the sink”, types of plastics, floods, outcome of climatic change, disastrous dams and ruinous mining are other subjects dwelt upon in detail here.

The Holy Ganga is the most suitable for devotees, scholars and environmentalists alike.

Book Review by Rajbir Deswal http://www.tribuneindia.com/2009/20091108/spectrum/book5.htm

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