गौवंश रक्षा मुहिम 

कौशल किशोर | Follow @HolyGanga

सात नवंबर का दिन गौवंश रक्षा आंदोलन के इतिहास में अहम है। ठीक पचास साल पहले इसी दिन गौवंश रक्षा हेतु साधु-संतों ने बलिदान दिया था। 7 नवंबर 1966 के आंदोलन में प्रभुदत्त ब्रह्मचारी, करपात्री महाराज, विनोबा भावे और तत्कालीन संघ प्रमुख गोलवरकर प्रमुख नेता थे। समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया इस मुहिम को समर्थन देने वालों में प्रमुख थे। देश के विभिन्न भागों से दिल्ली पहुंचने वाले आम लोगों की संख्या लाखों में थी। सभी ने मिलकर संसद भवन घेरकर तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार के हाथ-पांव फूला दिए थे। आखिर उस दिन हुतात्मा चौक पर ऐसा क्या हुआ कि सरकार ने प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलवाई और कुर्बानियों का सिलसिला शुरू हुआ। गौवंश रक्षा की इस मुहिम के शहीदों की संख्या खुला-रहस्य है।

आज इस आंदोलन की पृष्ठभूमि, वर्तमान स्थिति और भविष्य की रूपरेखा के विषय में गौर करने का दिन है। हजारों लोग इसी उद्देश्य से दिल्ली पहुंचे हैं। 1857 की क्रांति के पीछे एक प्रमुख वजह गौवंश रही है। महर्षि दयानन्द सरस्वती का आर्य समाज 1875 से इसकी पैरवी कर रहा है। आजादी की लड़ाई के अंतिम कालखंड में महात्मा गांधी ने गौवंश रक्षा की बात को अंग्रेजी राज का खात्मा करने से भी यादा जरूरी करार दिया था। इसी मुद्दे पर स्वतंत्र भारत का सबसे विशाल जन आंदोलन दर्ज है। आज गो भक्त उस आंदोलन के हुतात्माओं की याद में गोल्डन जुबली मना रहे हैं। 

इस बीच फर्जी गौरक्षकों का मामला भी उछला है। गुजरात के ऊना में गौरक्षा के नाम पर सक्रिय बदमाशों ने दलितों की बेतहाशा पिटाई कर बवाल मचाया था। इस घटना से प्रधानमंत्री का दुखी होना लाजिमी है। उन्होंने 80 फीसदी गौरक्षकों को फर्जी बताकर राय सरकारों को डोजियर तैयार करने का निर्देश दिया था। इस बीच, गौरक्षा आंदोलन के गोल्डन जुबली का दायरा फिजां में पनपने लगा। पचास साल पहले चंद फर्जी गौरक्षकों ने उत्पात मचाया था। क्या सचमुच अब गौरक्षकों के बीच फर्जी लोगों की भागीदारी 80 फीसदी तक पहुंच गई है? या फिर टाउनहाल में प्रधानमंत्री की जुबान फिसल गई थी? प्रधानमंत्री ने अपने उसी संबोधन में पॉलिथिन खाकर मरने वाली गायों की ओर गो रक्षकों का ध्यान आकृष्ट किया था। इन पचास सालों में पैदा हुई यह नई समस्या है। इसे नजरअंदाज कर सचमुच गो रक्षा की बात नहीं हो सकेगी। यह गायों का दुर्भाग्य है कि वास्तव में इस विषय में मजबूरी और पाखंड गड्डमड्ड हो गया है। संत गोपाल दास और भाजपा के पूर्व महासचिव गोविंदाचार्य जैसे लोग सचमुच इस आंदोलन को गति देने में लगे हैं। लेकिन दुर्भाग्यवश इस पर राजनीति ही होती रही है।

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s