पंचायती राज के बिना ग्रामोदय से भारतोदय का सपना अधूरा

कौशल किशोर | Follow @HolyGanga 

​आज महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज के सपने को साकार करने की कोशिशों को सौ साल से ज्यादा वक्त बीत चुका है। इस क्रम में हुए कार्यों पर गौर करने पर लोकनायक जयप्रकाश नारायण, बलवंतराय मेहता और पंडित बिनोदानंद झा का नाम सबसे ऊपर मिलता है। इन विभूतियों का अविस्ममरणीय योगदान है कि देशभर की पंचायतों को एकसूत्र में बांधने के लिये पंचायतों की परिषद बनाई गई। दरअ़सल 1958 में ही अखिल भारतीय पंचायत परिषद की स्थापना हुई थी। तब से अब तक परिषद की महासमिति ने कुल 91 बैठकें की हैं। इन बैठकों को महापंचायत कहा जाता है। इन्हीं महापंचायतों का नतीजा है कि पंचायती राज को तीसरी सरकार के रुप में संवैधानिक दर्जा प्राप्त हुआ। हाल में हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में हुई पिछली महापंचायत में साफ हो गया था कि यह उपलब्धि इस संकल्प का आखिरी विराम कतई नहीं है।

ग्राम स्वराज ही गांधी के हिन्द स्वराज का मूलमंत्र है। इस सपने को साकार करने के लिए पंचायत परिषद के नेताओं का बलिदान सर्वोच्च कोटि का माना जाता है। आज अखिल भारतीय पंचायत परिषद ग्राम स्वराज के सपने को जमीन पर उतारने के लिए पूरी निष्ठा के साथ प्रतिबद्ध है। हाल में इन्हीं विषयों में गंभीर विचार-विमर्श पर बल दिया गया है। पिछली महासमिति में संविधान के 73वें संशोधन और 14वें वित्त आयोग की सिफारिशों पर जोरदार बहस हुआ और कई अतिमहत्वपूर्ण निर्णय लिए गए। इन्हें जमीन पर उतारने के लिए आज देशभर में जन जागरण अभियान चलाया जा रहा है।

नब्बे के दशक में नरसिंह राव सरकार के दौरान 73वां संविधान संशोधन किया गया था। तभी से इसे लागू करने की बातें चल रही हैं। पंचायतों की सूची में शामिल 29 विभागों की स्थिति पर केन्द्र सरकार का रुख सामने है। बीते पंचायती राज दिवस पर वैंकैया नायडू ने भी एक बार फिर इसे दुहराया था। परिषद का मानना है कि संविधान के इस संशोधन को सही मायनों में जमीन पर उतारे बगैर ग्राम स्वराज का स्वप्न साकार नही हो सकेगा। महापंचयत में परिषद ने सभी राज्यों में इस व्यवस्था को लागू कराने का निर्णय लिया है। इसके लिए अब एक मात्र संघर्ष का रास्ता ही शेष बचा है। उत्तर प्रदेश में पंचायत के सभी स्तरों पर योग्य लोगों को जिम्मेदारियां सौंपी जा रही है, तो पंजाब और दिल्ली ने इस कवायद को दुहराने की जरुरत पर बल देना शुरु किया है। इस सूची में देश के सभी राज्य और केन्द्रशासित प्रदेश शामिल हैं। आज व्यापक जन संपर्क की जरुरत है। पंचायती राज संस्थानों की मजबूती और ग्राम-स्वराज के लिये एक प्रभावी आंदोलन की आवश्यकता है।

ऐसा प्रतीत होता है कि पिछले साल डा. वाई.वी. रेड्डी ने 14वें वित्त आयोग की सिफारिशों में पंचायतों के लिए 10 फिसदी बजट बढ़ा कर उन्हें मजबूत करने का प्रयास किया है। निश्चय केन्द्र ने पंचायतों को दो लाख दो सौ बिरानवे करोड़ की बड़ी रकम उपलब्ध कराने का प्रावधान किया है। क्या इसमें पांच सालों के लिए निर्धारित रकम को एक मुस्त दर्शाने से वाहवाही की मंशा जाहिर होती है? महापंचायत में पहुंचे पंचायतों की राजनीति में सक्रिय प्रतिनिधियों की दिन भर चली चर्चा में प्रायः सभी विद्वानों का मतेक्य इस बात में था कि वित्त आयोग ने जिला परिषद को किनारे करने का काम कर पंचायती राज संस्थानों को कमजोर किया है। इसी वजह से आज परिषद के लोग भाजपा से जुड़े स्वदेशी जागरण मंच और मजदूर तथा किसानों के हितों की पैरोकार उनके अनुसांगिक संगठनों की तरह ही जनविरोधी नीतियों के प्रति खुलकर नाराजगी जाहिर कर रहे हैं। सरकार की लोकप्रियता को प्रभावित करने वाले मसलों में निश्चय ही इसकी अपनी अहमियत है। किसी भी सूरत में इसे नकारना अनुचित ही होगा।

इक्कीसवीं सदी में कुपोषण की समस्या विकाराल हो रही है। इसे दूर करने के लिए आंगनवाडी नामक कार्यक्रम शुरु किया गया। वर्ल्ड बैंक पोषित इस स्कीम का बजट 2000 से 2013 के बीच बीस हजार करोड़ तक पहुंच गया था। सोलहवीं लोक सभा चुनाव के बाद सत्ता में आई सरकार ने इसे आधा से भी कम कर दिया। यह एक ऐसी समस्या है, जिसका विरोध मेनका गांधी जैसे सरकार के अपने सहयोगियों ने भी किया है। झारखंड जैसे सूबे में आज भी तीस फिसदी बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। आंकड़े बताते हैं कि विकास के दौर में पिछड़े राज्यों की हालत ज्यादा खराब है। कुपोषण के शिकार भूखे बच्चों की समस्या का संज्ञान लेकर परिषद ने सभी स्तरों पर इसे उठाने का निर्णय लिया है।

देश में भूखमरी की स्थिति दिन-ब-दिन भयावह होती जा रही है। रिपोर्ट में दर्ज है कि आज हिन्दुस्तान में भूखे सोने को विवश कितने लोग हैं। करीब सत्तर लाख भारतीय पीने के लिए स्वच्छ जल से भी वंचित हैं। एक व्यक्ति भोजन व्यर्थ करते हुए सोचता नहीं है कि दूसरा व्यक्ति ऐसा भी है, जिसके पास दो जून की सूखी रोटी भी नहीं है। यह किसी भी सभ्य समाज की गरिमा के अनुकूल नहीं माना जा सकता है। पिछले साल न्यूयार्क में हुए संयुक्त राष्ट्र के सत्तरवें शिखर सम्मेलन के दौरान अगले 15 सालों में भूख को एकदम निर्मूल करने का संकल्प लिया गया था। यह संकल्प सरहानीय है, परंतु केन्द्र और राज्य की सरकारों के बूते इस जंग को जीतना संभव नहीं है। पंचायत परिषद इस विषय में की जा रही कोशिशों को प्रभावी और व्यापक बनाने की दिशा में सतत प्रयत्नशील है। तीनों स्तरों पर कार्यरत पंचायत प्रतिनिधियों की प्राथमिकताओं में यह अग्रणी है। इस विषय में सफलता अर्जित करने के लिए अभिजात्य वर्ग की उदासीनता दूर होनी चाहिए। परिषद ने भोजन और काम के अधिकारों को मौलिक आवश्यकता के रुप में चिन्हित किया है। वंचित ग्रामीण समाज इस समस्या के कारण पलायन को विवश है। यह महानगरों पर बढ़ते बोझ की एक बड़ी वजह साबित होती है। सरकारों को इस विषय में गंभीरता दिखानी होगी। ‘राइट टू फूड’ और ‘राइट टू वर्क’ को देश-विदेश में सराहा गया। इसे मजबूत और प्रभावी बनाने की जरुरत है।

दिल्ली में तीन सौ से ज्यादा पंचायतें हैं। ग्रामीण और शहरी का भेद दिल्ली के इन गांवों में साफ दृष्टिगोचर होता है। अस्सी के दशक में इन पंचायतों में आखिरी बार चुनाव हुए थे। 1983 से अब तक इन गांवों में पंचायत चुनाव नहीं हुए हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ग्राम सभा के सापेक्ष मोहल्ला सभा की पैरवी कर रहे हैं। यह इस क्षेत्र में एक गंभीर मामला है। गांवों को पंचायत के अधीन ही होना चाहिए। राज्य पंचायत परिषद से जुड़े नेताओं मानना है कि दिल्ली की पंचायतें लोकनायक, बलवंतराय मेहता और महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज के सपनों को साकार करने के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। इस लड़ाई को लड़ने की योजना पर दिल्ली राज्य पंचायत परिषद काम कर रही है। अखिल भारतीय पंचायत परिषद ने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के सभी सहमना संस्थानों को एकजुट होकर इस मुद्दे पर सक्रिय होने की अपील किया है।

हाल में केन्द्र और राज्य की सरकार में शामिल जनप्रतिनिधियों की वित्तीय क्षमता में अभिवृद्धि हुई है। विधायकों और सांसदों को प्राप्त होने वाले भत्तों में हुई अप्रत्याशित वृद्धि सुर्खियों में रही है। पंचायतों के लिए चुने गए जनप्रतिनिधि गांव, ब्लॉक और जिला स्तर पर सतत कार्यरत हैं। उन्हें विधायकों और सांसदों की तरह वित्तीय सुविधाएं नहीं प्राप्त हैं। अर्थाभाव के कारण विभिन्न सामाजिक-राजनैतिक कार्याें पर इसका सीधा असर पड़ता है। अखिल भारतीय पंचायत परिषद देशभर के पंचायत प्रतिनिधियों को बेहतर वेतन-भत्ता दिए जाने की पूरजोर पैरवी करती है। राज्य और केन्द्र की सरकारों को इस विषय में सहानुभूतिपूर्वक विचार करना चाहिए। ग्रामोदय से भारतोदय का सपना ऐसा किए बगैर सपना ही रह जाएगा। इसे साकार करने और परिषद के अन्य कार्यों को सुचारु रुप से जारी रखने के लिए नए पदाधिकारियों को नियुक्त किया गया है।

अखिल भारतीय पंचायत परिषद के अध्यक्ष सुबोधकांत सहाय वर्षों से कांग्रेस पार्टी से जुड़े हैं। यहां 2003 से लगातार तीन बार चुनाव जीतने का रिकार्ड उनके नाम है। हालांकि इस बीच हुए कई कार्यों पर सवाल भी खड़े होते हैं, जिन्हें दूर करने के लिए सार्थक पहल भी नहीं हुए। इसका मतलब यह भी नहीं है कि एक गैर-राजनीतिक संस्थान को किसी पार्टी से जोड़ने से समस्याएं हल होने वाली हैं। परिषद यह बात बार-बार दुहराती रही है कि यह न कांग्रेस पार्टी की है और न ही किसी दूसरी पार्टी की है। इसमें हर पार्टी के लोग हो सकते हैं। दलीय राजनीति के दलदल से दूर मूलतः पंचायतों के लिए समर्पित यह एक स्वायत्तशासी संस्थान है, जो केरल और पश्चिम बंगाल की पंचायतों में बढ़े राजनैतिक दलों के हस्तक्षेप का भी समर्थन नहीं करती है। इसकी स्थापना तीनों स्तरों पर कार्यरत पंचायती राज संस्थानों को मजबूती प्रदान करने के लिए हुई। इस कार्य के लिए देशभर की पंचायतों से प्रतिनिधियों को चुनने का काम राज्य की स्थानीय परिषदों को दिया गया है। मेहता के संविधान में तीन प्रतिशत ब्लॉक के प्रतिनिधित्व का प्रावधान किया गया था। संसद और विधान भवनों में मौजूद दलों को अभी तक इस परिषद की व्यवस्था में पैठ बनाने में सफलता नहीं मिली है। परंतु क्या राजनैतिक दलों ने पंचायत परिषद में पैठ बनाने का निर्णय लिया है? आज पंचायत परिषद इस सवाल से जूझते हुए ग्राम स्वराज के सपने को साकार करने में लगी है।

Published in Hindi Monthly PAHAL 

http://pahalamilestone.com/?p=7923 

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