महापंचायत की बैठक

कौशल किशोर | Follow @HolyGanga 

हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में पहले से तयशुदा एजेंडों पर विभिन्न प्रांतों की पंचायत से जुड़े सामाजिक-राजनैतिक लोगों की बैठक हुई। पंचायती राज संस्थानों की पैरोकार आल इंडिया पंचायत परिषद 1958 से इस तरह का अयोजन करती रही है। इसे महासमिति की बैठक या महापंचायत कहते हैं। इस बैठक में 73वें संविधान संशोधन और 14वें वित्त आयोग की सिफारिशों के अलावा कई अन्य महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा हुई। एक ओर आतंक की आग में जल रहे जम्मू-कश्मीर से पहुंचे पंचायत प्रतिनिधि की दबी आवाज सुनाई दी। तो उत्तर प्रदेश में पंचायत के स्तर पर योग्य लोगों को परिषद से जोड़ने की कोशिश को देशभर में दुहराने की जरुरत पर चर्चा हुई। महासमिति पंचायती राज संस्थानों को मजबूत बनाने के लिए एक व्यापक जन आंदोलन को खड़ा करने की कोशिश करती दिखी

कुछ दिन पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी झारखंड में पंचायती राज दिवस मना रहे थे। उन दिनों ग्रामसभा और लोकसभा की तुलना होने लगी, तो ग्रामोदय से भारतोदय तक का सपना भी दिखाया गया। 2015 में चौदहवें वित्त आयोग की सिफारिशों में डा. वाई.वी. रेड्डी ने पंचायतों को आवंटित किए जाने वाले बजट में अप्रत्याशित रुप से वृद्धि की थी। आज मोदी सरकार दो लाख दो सौ बिरानवे करोड़ की मोटी रकम पंचायतों के विकास के लिए सीधा मुहैया कराने को प्रतिबद्ध है। इन सब के बावजूद पंचायत परिषद से जुड़े लोग भाजपा से जुड़े ‘स्वदेशी जागरण मंच’ और ‘भारतीय किसान संघ’ जैसे संगठनों की तरह नाराजगी जाहिर कर रहे हैं। लगभग चालीस विद्वानों में इस बात पर सहमति थी कि वित्त आयोग ने जिला परिषद को किनारे कर पंचायती राज संस्थानों को कमजोर किया है। 

हिमाचल प्रदेश राज्य पंचायत परिषद की प्रमुख प्रेमलता ठाकुर वित्त आयोग के प्रभावी पंचवर्षी प्रावधानों की ओर इंगित कर बड़े तीखे सवाल उठाते हुए कहा कि जिला स्तर पर पंचायत प्रतिनिधियों को पूर्व में प्राप्त वित्तीय शक्तियों को कम किया गया है। सूचनाओं को आॅनलाइन करने के क्रम में होने वाली त्रुटियों से होने वाली समस्याओं से वंचित लोगों को कष्ट पहुंचता है। आॅनलाइन डाटा और आधार कार्ड के इस्तेमाल से लोगों को रिलीफ पहुंचाने के क्रम में होने वाली समस्याओं पर गंभीर मंथन हुआ। राजस्थान की चुनिंदा घटनाओं का हवाला भी दिया गया। सामाजसेवी अरुणा राय औ पत्रकार रवीश कुमार ने बेबश और लाचार लोगों को आधार डाटा मिसमैच से होने वाली असुविधाओं पर विचार करने को प्रेरित किया है। यह एक ऐसी समस्या है, जिसे देखकर पंचायतों से जुड़े लोगों का छुब्ध होना लाजिमी है। इन्हीं तथ्यों का संज्ञान लेकर ग्रामसभा से जुड़े कुछ लोग अब तकनीकी और समस्या के बीच का समीकरण समझने में लगे हैं। उन्हें पता है कि कंप्युटर टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कई जगह अच्छा है। पर इसके नुकसान भी हैं। 

यहां एक सवाल उठता है कि क्या सरकार तकनीकी का व्यापार करने का साधन मात्र बन कर रह गई है? या फिर सचमुुच अंतिम जन की सेवा के प्रयासों में होने वाले त्रुटियों से लोग रु-ब-रु हो रहे हैं। यदि तकनीकी लोगों के पास पहुंच कर उनकी सेवा करने में सक्षम बनाती है, तो निश्चय ही उसका इस्तेमाल होना चाहिए। पर यदि वही वंचित तबके की सेवा में बाधा बन रही हो, तो निश्चित तौर पर उस तकनीकी का विरोध होना चाहिए। ‘अतिथि देवो भव’ और ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की पैरवी करने वाले समाज में यह वंचितों को जीवन की आधारभूत जरुरतों से मरहूम होते हुए दिन-ब-दिन देखने का मामला है। नब्बे के दशक में नरसिंह राव सरकार ने 73वां संविधान संशोधन किया। तभी से इसे लागू करने की बातें चल रही हैं। पंचायतों की सूची में शामिल 29 विभागों की स्थिति पर केन्द्र सरकार का रुख सामने है। ग्राम स्वराज के स्वप्न का साकार होना आसान नहीं होगा। महापंचयत में परिषद ने सभी राज्यों में इस व्यवस्था को लागू कराने के लिए संघर्ष का रास्ता चुना है। 

महासमिति गैरबराबरी को ग्रामीण और शहरी नामक दो वर्ग में बांटती है। कुपोषण और भूख से तड़पती जनता के दर्द का विश्लेषण होता है। साथ ही भोजन का अधिकार से लेकर काम के अधिकार तक की तमाम बातों पर चर्चा हुई।

महापंचयत के बाद आखिरी घोषणा में कहा गया था कि पंचायत परिषद न तो कांग्रेस पार्टी या न ही किसी दूसरे पार्टी की है, इसमें हर पक्ष और पार्टी के लोग हैं। 

(लेखक आल इंडिया पंचायत परिषद और बलवंत राय मेहता पंचायती राज संस्थान से जुड़े हैं)

This article is published in the 2nd fortnight issue of October 2016 @Yathavat, the prestigious fortnightly Hindi magazine, on page 39

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