हिमालय में महापंचायत की बैठक

कौशल किशोर Follow @HolyGanga

अलसुबह उड़ी में सेना के कैंप पर हमला हुआ। और उस दिन एक महापंचायत भी हिमालय में हुई। वास्तव में यह हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में पहले से तयशुदा एजेंडे पर विभिन्न प्रांतों की पंचायत से जुड़े सामाजिक-राजनैतिक लोगों की लंबी बैठक थी। देश में पंचायती राज संस्थानों की पैरोकार आल इंडिया पंचायत परिषद 1958 से इस तरह का अयोजन करती आ रही है। इसे महासमिति की बैठक या महापंचायत कहते हैं। यहां 73वें संविधान संशोधन और 14वें वित्त आयोग की सिफारिशों के अलावा कई अन्य महत्वपूर्ण मामला भी छाया रहा। एक ओर दहशतगर्दी की आग में जल रहे जम्मू-कश्मीर से पहुंचे पंचायत प्रतिनिधि की दबी आवाज सुनाई दी। तो उत्तर प्रदेश में पंचायत के स्तर पर योग्य लोगों को परिषद से जोड़ने की कवायद को देशभर में दुहराने की जरुरत पर चर्चा होती है। साथ ही यह महासमिति पंचायती राज संस्थानों को मजबूत बनाने के लिए एक व्यापक जन आंदोलन को खड़ा करने की कोशिश करती प्रतीत होती है।

दरअ़सल महापंचायत की इन बैठकों का असर आजादी के बाद के इतिहास में पंचायती राज संस्थानों के क्रियाकलापों के रुप में साफ दिखता है। स्वतंत्र भारत में स्वराज, पंचायती राज अथवा तीसरी सरकार (डेमोक्रेटिक डिसेंट्रलाइजेशन) के नाम पर जो कुछ भी हुआ, उसके पीछे जो शक्तियां रही, वही महापंचायत के कर्त्ता-धर्त्ता, पुरोधा और फाउडिंग फादर्स माने जाते हैं। इसमें सबसे भारी योगदान देने वालों ने तो अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया। स्वराज के इसी सपने को साकार करने के लिए आजादी से पहले लाला लाजपत राय, भगत सिंह और आजाद जैसे शहीद हुए तो स्वतंत्र भारत में मेहता, शास्त्री और जयप्रकाश जैसे विभूतियों का जीवनदान देखने को मिलता है। महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज के सपनों को पंख लगाने के लिए लोक नायक जयप्रकाश नारायण, गुजरात के दूसरे मुख्यमंत्री बलवंतराय मेहता और बिहार के तीसरे मुख्यमंत्री पंडित बिनोदानंद झा का योगदान अनुकरण के योग्य माना जाता है। उन्होंने ही पंचायतों की परिषद बनाई, जिसकी इससे पहले ऐसे 90 और बैठकों के रिकार्ड मिलते हैं। आज भी इनके प्रभावों को नकारना संभव नहीं है। 1957 की बलवंतराय मेहता कमिटी और फिर बीस साल बाद अशोक मेहता कमिटी की सिफारिशों के अभाव में क्या नब्बे के दशक में हुए 73वें संविधान संशोधन की चर्चा भी संभव थी? भारतीय राजनीति में हुए रिफार्म की इन ईबारतों को गढ़ने में महती भूमिका अदा करने वाली महासमिति भविष्य में क्या करने जा रही है? इसे समझना सरकार और नागरिक समाज के लिए आज बेहद जरुरी है। 

अभी बहुत वक्त नहीं बीता है। प्रधानमंत्री झारखंड में पंचायती राज दिवस मना रहे थे। उन दिनों ग्रामसभा और लोकसभा की तुलना होने लगी, तो ग्रामोदय से भारतोदय तक का सपना भी आकार-प्रकार लेने लगा। पिछले साल चौदहवें वित्त आयोग की सिफारिशों में डा. वाई.वी. रेड्डी ने पंचायतों को आवंटित किए जाने वाले बजट में अप्रत्याशित रुप से वृद्धि किया था। आज मोदी सरकार दो लाख दो सौ बिरानवे करोड़ की मोटी रकम पंचायतों के विकास के लिए सीधा मुहैया कराने को प्रतिबद्ध है। इन सब के बावजूद पंचायत परिषद से जुड़े लोग भाजपा से जुड़े स्वदेशी जागरण मंच और भारतीय किसान संघ जैसे अनुसांगिक संगठनों की तरह नाराजगी जाहिर कर रहे हैं। सरकार की लोकप्रियता को प्रभावित करने वाले मसलों में निश्चय ही यह भी अपनी अहमियत रखता है। यहां पहुंचे पंचायतों की राजनीति में सक्रिय प्रतिनिधियों की दिन भर चली चर्चा में मैंने चालीस के करीब विद्वानों की बातों पर गौर किया। उनका मतेक्य इस बात में था कि वित्त आयोग ने जिला परिषद को किनारे करने का काम कर पंचायती राज संस्थानों को कमजोर किया है। 

हिमाचल प्रदेश राज्य पंचायत परिषद की प्रमुख प्रेमलता ठाकुर वित्त आयोग के प्रभावी पंचवर्षी प्रावधानों की ओर इंगित कर बड़े तीखे सवाल उठाती हैं। उनकी नाराजगी ब्लॉक और जिला स्तर पर पंचायत प्रतिनिधियों को पूर्व में प्राप्त वित्तीय शक्तियों को कम करने के कारण है। सूचनाओं को आनलाइन करने के क्रम में होने वाली त्रुटियों से उपजने वाली समस्याओं से वंचित लोगों को कष्ट पहुंचता है। यह दूसरी जटिल समस्या है। इसके निराकरण के लिए कोई सार्थक प्रयास नहीं किया गया। यहां आनलाइन डाटा और आधार कार्ड के इस्तेमाल से लोगों को रिलीफ पहुंचाने के क्रम में होने वाली समस्याओं पर गंभीर मंथन चला। राजस्थान की चुनिंदा घटनाओं का हवाला भी दिया गया। विख्यात सामाजसेवी अरुणा राय और वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार ने बेवश और लाचार लोगों को आधार डाटा मिसमैच से होने वाली असुविधाओं पर विचार करने को प्रेरित किया है। यह एक ऐसी समस्या है, जिसे देखकर पंचायतों से जुड़े लोगों का छुब्ध होना लाजिमी है। इन्हीं तथ्यों का संज्ञान लेकर ग्रामसभा से जुड़े कुछ लोग अब तकनीकी और समस्या के बीच का समीकरण समझने में लगे हैं। उन्हें पता है कि कंप्युटर टेक्नोलोजी का इस्तेमाल कई जगह अच्छा है। पर इसके नुकसान भी हैं। यहां एक सवाल उठता है कि क्या सरकार तकनीकी का व्यापार करने का साधन मात्र बन कर रह गई है? या फिर सचमुुच अंतिम जन की सेवा के प्रयासों में होने वाले त्रुटियों से लोग रु-ब-रु हो रहे हैं। यदि तकनीकी लोगों के पास पहुंच कर उनकी सेवा करने में सक्षम बनाती है, तो निश्चय ही उसका इस्तेमाल होना चाहिए। पर यदि वही वंचित तबके की सेवा में बाधा बन रही हो, तो निश्चित तौर पर उस तकनीकी का विरोध होना चाहिए। इस विषय में सरकार को भारतीय परंपरा का अनुकरण करना चाहिए, जो सबसे पहले वंचितों और दिव्यांगों की सेवा सुनिश्चित करने की पैरवी करता है। अतिथि देवो भव और वसुधैव कुटुम्बकम की पैरवी करने वाले समाज में यह वंचितों को जीवन की आधारभूत जरुरतों से मरहूम होते हुए दिन-ब-दिन देखने का मामला है। 

नब्बे के दशक में राव सरकार के दौरान 73वां संविधान संशोधन किया गया था। तभी से इसे लागू करने की बातें चल रही हैं। पंचायतों की सूची में शामिल 29 विभागों की स्थिति पर केन्द्र सरकार का रुख सामने है। बीते पंचायती राज दिवस पर वैंकैया नायडू ने राज्यों से पैरवी की जरुरत को रेखांकित कर इसे एक बार फिर दुहराया था। सही मायनों में इन शक्तियों के अभाव में ग्राम स्वराज के स्वप्न का साकार होना आसान नहीं होगा। इस महापंचयत में परिषद ने सभी राज्यों में इस व्यवस्था को लागू कराने के लिए संघर्ष का रास्ता चुना है। आशा  के अनुरुप ही मैंने उनकी प्रतिति को यथार्थ में परिवर्तित करने से जुडे़ महत्वपूर्ण पहलुओं पर प्रकाश डाला था। इस क्रम में पिछले पांच सालों में हुए कुछ छोटे, मंझोले और बड़े कद-काठी के आंदोलनों का जिक्र जरुरी था। ऐसा करते हुए मैंने यह बताने का जतन किया कि किस तरह से इन आंदोलनों में सक्रिय लोगों का समर्थन और सहयोग हासिल किया जाय। और इससे ग्राम स्वराज का लक्ष्य अर्जित करने के प्रयासों को बल मिले। 

महासमिति गैरबराबरी को ग्रामीण और शहरी नामक दो किश्मों में विभाजित करती है। इस क्रम में कुपोषण और भूख से तड़पती जनता के दर्द का विश्लेषण होता है। साथ ही भोजन का अधिकार से लेकर काम के अधिकार तक की तमाम बातों पर चर्चा छिड़ती है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के तीन सौ से ज्यादा ग्राम पंचायतों के लिए नई मुहिम शुरु करने की बात भी उठती है। दिल्ली के ग्रामीण क्षेत्र का दुर्भाग्य है कि यहां 1983 से ही पंचायतों के चुनाव नहीं होते। परंतु पंचायतों को मिलने वाले बजट को खर्च करने के लिए विभाग बदस्तूर कायम है। अरविन्द केजरीवाल के मोहल्ला सभा के सामने पंचायत परिषद की मुहिम वास्तव में कैसी होगी? यह अभी नहीं कहा जा सकता है। पर इस मामले पर अब चर्चाएं लगातार होने लगी हैं। 

केन्द्र और राज्य की सरकारों को पंचायती राज प्रतिष्ठानों की समस्या दूर करने में सहयोग का रुख अख्तियार करने की जरुरत है। इस क्रम में उन्हें पंचायत प्रतिनिधियों के असंतोष को भी समझना होगा। आज वस्तुस्थिति ऐसी है कि जमीन पर पंचायती राज संस्थान और इनके प्रतिनिधि राज्य और केन्द्र की योजनाओं को लागू करने की एजेंसी के रुप में सिमटने को विवष हैं। इस महासभा के बाद हुए प्रेस वार्ता की आखिरी घोषणा मुझे साफ-साफ याद है। सभापति ने कहा था कि पंचायत परिषद कोई कांग्रेस पार्टी या किसी दूसरे पार्टी का नहीं है, इसमें हर पार्टी के लोग हैं। यही बात मेरे केविएट का सार था। और ऐसा कायम नहीं रहने की ददशा में गांधी, मेहता, शास्त्री, बिनोदानंद झा और लोक नायक के सपनों की एक साथ हत्या होगी। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 51 में वर्णित दायित्वों का निर्वहण करने के लिए इस थाती को सहेजना बेहद आवश्यक है। यह कार्य सरकार, समाज और व्यक्ति विषेष के स्तर पर बेहतर तारतम्य स्थापित कर ही सुनिश्चित हो सकती है।

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