1965 का भारत-पाक युद्ध और मेहताजी का बलिदान

दो देशों के वास्तविक युद्ध के बीच शहीद होने वाले राजनेता कम ही हैं, निश्चय ही ऐसे शहीदों में बलवंतराय मेहता का स्थान सबसे ऊंचा है: कौशल किशोर 

आज से ठीक 51 साल पहले इन दिनों भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध चल रहा था। इसी दरम्यान गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री बलवंतराय मेहता शहीद हुए थे। वह इस युद्ध का तेरहवां दिन था। 19 सितम्बर 1965 को दिन ढलने से पहले पाकिस्तानी वायु सेना ने भारतीय वायु-क्षेत्र में प्रवेश कर एक सिविलियन विमान (बीचक्राफ्ट मॉडल 18) को हवा में उड़ा दिया। इस हादसे में मेहता दम्पत्ति समेत कुल आठ लोगों की मौत हुई। युद्ध और बलिदान का स्वतंत्र भारत में रचित इतिहास जिन शहीदों का नाम स्वर्णाक्षरों में संजोए है, उनमें बलवंतराय मेहता (19.02.1900-19.09.1965) और लालबहादूर शास्त्री (02.10.1904-11.01.1966) निश्चय ही सर्वोपरि हैं। दोनों ही राजनेताओं ने सार्वजनिक जीवन में कर्त्व्यनिष्ठा की मिसाल कायम किया है। ऐसे महान विभूतियों का असामयिक निधन देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण साबित हुआ।

लाहौर में लाला लाजपत राय ने राष्ट्र निर्माण के लिए लोकसेवकों को गढ़ने का संकल्प लिया था। इसी लोक सेवा की परंपरा में उन्होंने सर्वस्व अर्पित किया। उनकी शहादत के 36 साल बाद मेहताजी ने बलिदान दिया। उन्होंने 20 साल की अवस्था में ही महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में योगदान देकर एक नया जीवन शुरुआत किया था। स्वतंत्रता संग्राम को धार देने के लिए 1921 में भावनगर प्रजा मंडल शुरु किया, तो बारदोली सत्याग्रह से लेकर भारत छोड़ो आंदोलन तक उन्होंने खासी सक्रियता का परिचय दिया। इस बीच सात साल अंग्रेजों के जेल में बिता दिए। उन्होंने गांधीजी के सुझाव पर कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण की और सर्वेंट्स आफ दी पीपल सोसाइटी भी अंगीकार किया। 1957 के लोकसभा चुनाव में भावनगर (गोहिलवाड) सीट से कांग्रेस के प्रतिनिधि के तौर पर चुने गए। साथ ही जवाहर लाल नेहरु जब कांग्रेस से अध्यक्ष बने तो उन्हें महासचिव चुना गया था। 

यह साठ के दशक का बेहद चर्चित मामला है। आज कम लोग इस विषय में बराबर जानकारी रखते हैं। साथ ही दूसरे युद्धों की अपेक्षा 1965 युद्ध के विषय में ‘पब्लिक डोमेन’ में जानकारी कम है। हैरान करने वाली बात है कि दोनों देशों में लोग जीत का जश्न मनाते हैं। वैश्विक पटल पर इस युद्ध के बाद भारत की साख बढ़ी और दक्षिण एशिया की महाशक्ति बन कर उभरा। इस जंग में चीन, अमेरिका, ग्रेट ब्रिटेन, तत्कालीन सोवियत युनियन और संयुक्त राष्ट्र संघ की अहम भूमिका रही। युद्ध का नतीजा और तासकंद में हुआ समझौता लाल बहादूर शास्त्री के शहादत की कहानी कहती है। यह कैसा दुर्योग है कि इस समझौते के झट बाद शास्त्रीजी की रहस्यमय तरीके से मौत हुई। इस मामले में उनकी पत्नी ललिता शास्त्री के सवालों पर लंबे समय से सरकारों ने गौर नहीं किया। पिछले साल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा नेताजी से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक करने की पहल पर उनके छोटे पुत्र अनिल शास्त्री ने इस रहस्यमय मौत की फाइलों को सार्वजनिक करने का आग्रह किया। पता नहीं कब तक इस विषय में आग्रह करने का सिलसिला चलेगा? इस क्रम में एक बार फिर मैं बलवंतराय मेहता के बलिदान से जुड़ी जानकारियों को सार्वजनिक करने की जरुरत महसूस करता हूं। मेहताजी की शहादत के चौथे दिन सीज फायर घोषित हुआ। और समझौता वार्ता की रात दूसरी त्रासदी घटित हुई। 

दूसरे विश्व युद्ध के बाद इस जंग में तोपों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हुआ था। 1962 में चीन से हारने के बाद भ्रामक स्थिति कायम हुुई थी। पाकिस्तान में बेहतर अमेरिकी हथियारों के बूते भारत को युद्ध में हराने का भ्रम पनपने लगा था। गरमी शुरु होते ही पाकिस्तानी सेना ने पहले पश्चिमी छोर पर कच्छ में और फिर कश्मीर घाटी में घुसपैठ किया। यह अभियान पाकिस्तानी अभिलेखों में आपरेशन डेजर्ट-हॉक, जिब्राल्टर और ग्रैंड स्लैम के नाम से दर्ज है, तो भारतीय रिकार्ड में इन्हें आपरेशन एब्लेज और रिडल नाम दिया गया था। आखिरकार 6 सितंबर को भारतीय वायु सेना ने आक्रमण किया और इसी के साथ युद्ध शुरु हो गया। इसी दिन जंग में पाकिस्तानी वायु सेना के स्क्वैड्रन लीडर सरफराज रफीकी की मौत हुई थी। यह भारतीय वायु सेना के फ्लाइट लेफ्टिनेंट डीएन राथौड़ की वीरता का नतीजा था। 

इसके दूसरे ही हफ्ते में पाकिस्तान ने तमाम नियमों को ताक पर रखकर यह दुस्साहस किया था। गुजरात के कच्छ क्षेत्र में बीस किलोमीटर अंदर भारतीय वायु क्षेत्र में घुस कर ऐसा किया गया। उस समय बीचक्राफ्ट के पायलट जहांगीर इंजीनियर थे। भारतीय वायु सेना की इतिहास के आरंभिक दौर में प्रसिद्ध हुए चार पारसी भाईयों में वह दूसरे हैं। सबसे बड़े भाई एसपी मेरवान इंजीनियर युद्ध से एक साल पहले तक वायु सेना के प्रमुख रहे, तो सबसे छोटे भाई मीनू इंजीनियर सबसे सजे-धजे योद्धा के रुप में रिटायर हुए। इस हत्याकांड के दिन भुज स्थित एयर फोर्स युनिट में तैनात तत्कालीन स्क्वैड्रन लीडर बीसी राय रडार निरीक्षक थे। उन्होंने घटनाक्रम और परिस्थितियों का अवलोकन कर कहा कि पाकिस्तान को बलवंतराय मेहता की गतिविधियों के विषय में जानकारी थी और उनके अपहरण की योजना विफल होने पर इस हत्याकांड को अंजाम दिया गया। इसके विषय में चर्चा करते हुए उन्होंने इंजीनियर भाईयों में से तीसरे रॉनी का विषेष रुप से जिक्र किया है, जो उस दिन वायु सेना के पश्चिमी छोर पर स्थित एक दूसरे केन्द्र पर तैनात थे। इस मामले को परत-दर-पर खंगालने से साफ उजागर होता है कि किस तरह पाकिस्तान ने गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री का अपहरण करने की शाजिष रची। और असफल होने पर फ्लाइंग आफिसर को एक सिविलियन विमान उड़ाने के लिए विवष किया। भारत-पाक इतिहास का यह अत्यंत घृणित हत्याकांड है। 

इस युद्ध से कई अप्रत्याशित घटनाएं जुड़ी हैं। पाकिस्तान में पांच साल पहले यह मामला उभरा था। शोक संदेश और माफीनामा के सवाल पर। इस युद्ध के पाकिस्तानी शहीद सरफराज रफीकी के इंतकाल पर शोक व्यक्त करने के लिए डीएन राथौड ने एयर कोमोडोर कैसर तुफैल से संपर्क किया। तुफैल इस युद्ध के एक दशक बाद पाकिस्तानी ऐयर फोर्स में शामिल हुए थे। फिर उन्होंने इस हादसे में पाकिस्तानी विमान उड़ा रहे फ्लाइंग अधिकारी कैज हुसैन से विस्तृत बातचीत की और घटना का व्यौरा डिफेंस जॉर्नल में प्रकाशित हुआ। इसके बाद कैज हुसैन ने भारतीय शहीदों के परिजनों से संपर्क कर शोक प्रकट करने का निर्णय लिया। वह लाहौर के एक व्यापारी नावेद रियाज के माध्यम से शहीद पायलट जहांगीर इंजीनियर की बेटी फरीदा सिंह से संपर्क साधने में सफल हुए। 5 अगस्त 2011 को भेजे गए उनके ईमेल का जवाब फरीदा सिंह ने 10 अगस्त को लिखा है। इन पत्रों में गजब की समझदारी दिखती है। क्या सचमुच दोनों देशों के लोगों के बीच ऐसी ही उदारता और आपसी सौहार्द का भाव है? अमन की आशा और आगाज-ए-दोस्ती जैसे कार्यक्रमों के साथ ही शह और मात का सियासी खेल बदस्तूर चल रहा है। फाइफाइटर जेट और अत्याधुनिक हथियारों का जखीरा विशाल हो इसकी कोशिश चल रही है। साथ ही दहशतगर्दी में भी उत्तरोत्तर वृद्धि हो रही है। इन सब के बावजूद स्नेह और भाईचारा की बातें आशा जगाती हैं। 


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