लाला लाजपत राय के 151वें जन्मदिन पर

कौशल किशोर | Follow @HolyGanga
Lala Lajpatrai
Lalaji
आज भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के अमर शहीद लाला लाजपत राय के जन्म को 151 साल पूरे हो रहे हैं। अंग्रेजी तारीख के अनुसार इसी दिन उनका जन्म ढुडीके नामक गांव में हुआ था। बीते कई दशकों से पंजाब के इस छोटे से गांव का मौसम इस अवसर पर एकदम बदल जाता है। यहां इन दिनों अच्छी चहल-पहल रहती है। आठ-दस दिनों तक मेला लगा रहता, जिसमें सभी भेद-भाव भूल कर लाखों लोग शामिल होते हैं। यहां बड़ी संख्या में लोगों के भाग लेने का सिलसिला पिछले पचास सालों में उत्तरोत्तर बढ़ा है। कभी इसे मजबूती प्रदान करने का निर्णय तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादूर शास्त्री ने लिया था। लालाजी को प्यार करने वाले पंजाबी समाज में ही सीमित नहीं हैं। देश के दूसरे हिस्सों में आज भी ऐसे अनेक संगठन सक्रिय हैं, जिन्हें आजादी के आन्दोलन में उनके बलिदान का महत्व बखूबी पता है। लालाजी की कर्मभूमि लाहौर थी, जो विभाजन के कारण पाकिस्तान का हिस्सा है। वहां भी लालाजी को याद करने वाले कम नहीं हैं। 
 
लालाजी स्वतंत्र भारत के निर्माताओं में सबसे अगली पंक्ति के महानायक हैं। गांधीजी ने उन्हें एक संस्थान माना है। अगर आप उन्हे संस्थानों का समूह कहते हैं तो भी कोई अतिशयोक्ति नहीं। आर्य समाज का संविधान गढ़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले रायबहादूर मूलराज का मानना था कि उस दौर में लालाजी की अपील के बगैर पंजाब नेशनल बैंक की स्थापना संभव ही नहीं था। उन्होंने लालाजी को इसके लिए राजी करने में तीन साल इंतजार किया। पता नहीं एलआईसी के लिए काम करने वाले कितने लोग इस तथ्य से वाकिफ हैं कि लालाजी द्वारा स्थापित लक्ष्मी इंश्योरेंश कंपनी उनकी मातृ संस्थानों में से एक है। उन्होंने आॅल इंडिया ट्रेड युनियन कांग्रेस की स्थापना किया और वर्ल्ड ट्रेड युनियन की सभा में भारत का प्रतिनिधित्व भी किया। लाहौर में आर्य-समाज ने महर्षि के प्रति जीवंत स्मारक बनाने का प्रस्ताव रखा था। यह सपना ‘दयानंद एंग्लो वैदिक’ शिक्षण संस्थान के रुप में प्रस्फुटित हुआ। लालाजी इसके संस्थापकों में बेहद मजबूत कड़ी साबित हुए। असहयोग आन्दोलन में विद्यार्थियों की भूमिका के मुद्दे पर लाला हंसराज और लालाजी के बीच मतभेद पनपा। नतीजतन लालाजी डीएवी स्कूल छोड़ कर चले गए। इसके बाद उन्होंने तिलक स्कूल को बढ़ावा देने में दिलचस्पी लेना शुरु किया, जो बाद में लोक सेवकों की नवीन परंपरा के रुप में विकसित हुआ। यहीं उन्होंने आजादी और उसके बाद के भारत का नवनिर्माण करने के लिए राजनेताओं और लोकसेवकों की नई पीढ़ी तैयार किया। इस क्रम में राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन, बलवंतराय मेहता और लाल बहादूर शास्त्री जैसे राजनेताओं ने उनके सपनों का भारत बनाने के लिए सहर्ष अपना जीवन अर्पित किया। देश की सेवा के लिए समर्पित इन महापुरुषों के अतिरिक्त भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु जैसे नाम भी लालजी से जुड़े हैं। कभी-कभी सत्य के लिए मरना आसान होता है और सत्य के साथ सतत जीना बेहद मुश्किल। लोकसेवा के क्षेत्र में लोकमान्य विकसित करने वाली संस्थान की जरुरत आज पहले से कहीं अधिक है। परंतु उनके द्वारा शुरु किए गए राजनीति के तिलक स्कूल का इक्कसवीं सदी में कोई नामलेवा तक नहीं है। 
 
लालाजी द्वारा स्थापित संस्थानों की लंबी फेहरिस्त है। प्रायः इन सभी स्थानों पर उत्साह के साथ उनका जन्म-दिवस मनाया जाता है। इसमें वैश्य समूहों के अतिरिक्त दूसरे समाजसेवी संगठनों की भी सक्रियता दिखती है। हालांकि इनमें से कई लोग ऐसे अवसरों को रिवाज मात्र मानकर निभाते हैं। फिर भी यह सच है कि आज लाखों लोग उनको बड़े प्रेम से याद करते हैं। पिछले साल लालाजी के 150वें साल के महोत्सव से जुड़कर मैंने इसके विभिन्न पहलुओं को करीब से समझने का प्रयास किया। उनके सपनों को साकार करने का बीड़ा उन लोगों व समूहों ने उठाया है, जिनका उनके परिवार अथवा संस्थानों से कोई नाता-रिश्ता नहीं है। ऐसे तीन प्रयास अतुलनीय हैं। लालाजी ने स्कूल आॅफ स्टेट्समैनशिप की जरुरत को महसूस किया था। मानव अभ्युदय संस्थान में इसकी परिकल्पना के साथ ‘अपने देश की बात’ शुरु हुई। जय हिन्द मंच के अध्यक्ष सुरेश शर्मा ने लालाजी से प्रेरणा लेकर चार सौ से ज्यादा शहीदों का सम्मान किया है। लालाजी को प्रवासी मानने वाले महेश कांत पाठक और अविनाश कुमार सिंह जैसे सामाजिक कार्यकर्ताओं ने दिल्ली और पंजाब के विभिन्न हिस्सों में रहने वाले प्रवासियों के बीच स्वदेशी, स्वराज और स्वाबलंबन के सूत्र को परिभाषित करने का बीड़ा उठाया है। 
 
वास्तव में लालाजी के व्यक्तित्व का जादू दो ध्रुवों के बीच का समीकरण साधने में दृष्टिगोचर होता है। कांग्रेस और आर्य समाज को आजादी का आन्दोलन बनाने में उनकी महती भूमिका है। आज उनकी शहादत के बाद आठ दशक से ज्यादा वक्त गुजर चुका है। लाल-बाल-पाल के युग को एक सदी होने को आया। ऐसी दशा में नई पीढ़ी के लोग पूछ सकते हैं कि आज लालाजी क्यों प्रासंगिक हैं? वर्तमान परिप्रेक्ष्य में भारतीय गणतंत्र के समक्ष कई बड़ी चुनौतियां मुंह बाए खड़ी हैं। सामाजिक-आर्थिक पैमाने पर विषमता में अनवरत अभिवृद्धि हो रही है। वैमनस्य की राजनीति नए दौर का पागलपन साबित हो रहा है। और असहिष्णुता का विस्तार देश के हर कोने तक फैल गया है। इस विषय में आगे बढ़ने से पहले स्वतंत्र भारत के निर्माताओं के सपनों पर भी एक बार गौर करना चाहिए। लाल-बाल-पाल की त्रिमूर्ति को स्वदेशी और स्वराज के मुद्दे पर राष्ट्रव्यापी बहिष्कार का सूत्रपात करने के कारण जाना गया। निश्चय  ही बाल गंगाधर तिलक, श्री अरविन्द और विपिन चंद्र पाल लालाजी के अभिन्न मित्र थे। इनके अलावा उनके बेहद करीबी मित्रों में महामना मदनमोहन मालवीय प्रमुख हैं। हिन्दू महासभा और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की पैरवी के क्रम में उन्होंने धर्म को राजनीति से दूर रखने की वकालत किया था। ऐसे सभी तथ्यों को ध्यान में रखकर महामना और लालाजी को प्रो. विपिन चंद्रा जैसे सेक्युलर इतिहासकारों ने भी उदार सांप्रदायिक कहा है। 
 
आज देश के एक बड़े हिस्से में शीतलहर बनाम असहिष्णुता की लहर साफ दिखती है। उत्तर भारत में इखलाक मियां की हत्या और दक्षिण भारत में शोध छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या जैसे मामले वैमनस्य और असहिष्णुता के नए प्रतीक बनकर उभरे हैं। इन हादसों से जुड़े घटनाक्रम और हालात सब कुछ साफ-साफ बयां करता है। ऐसे घटनाक्रम भारतीय लोकतंत्र पर कलंक का धब्बा है। हाशिये पर खड़े लोगों को असहाय और मजबूर साबित करना जनतंत्र की मजबूती नहीं, बल्कि लोकतंत्र के लिए संकट काल का सूचक होता है। ऐसी दशा में लालाजी कितने प्रासंगिक हैं? इसका उत्तर उपराष्ट्रपति डाॅ हामिद अंसारी देते हैं। समाज में व्याप्त असहिष्णुता के सम्बन्ध में चर्चा करते हुए उन्होंने 1923 के सांप्रदायिक सौहार्द के लिए जारी किए गए सौ विशिष्ट लोगों की अपील का जिक्र किया। गौर करने की बात है कि इस सूची में लालाजी पहले स्थान पर सटीक और कारगर योजना के साथ हैं। उन्होंने सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने वाले समुदाय के नेताओं का ही शांति और सौहार्द कायम करने के लिए आह्वान किया था। यह उदारता सचमुच बेमिशाल है।
 
सांप्रदायिक शक्तियों के ध्रुवीकरण का दुष्परिणाम देश को ही भुगतना होता है। सरकार रोहित को याकूब मेमन की फांसी के विरुद्ध हुए प्रदर्शन से जोड़कर राष्ट्रद्रोही करार देती है। तो विपक्ष को दलित विमर्ष का नया प्रसंग शुरु करने के लिए एक नौजवान के बलिदान की जरुरत थी। क्या याकूब मेमन और नाथूराम गोडसे जैसे लोगों के मुद्दे पर चर्चा करना कोई राष्ट्रद्रोह का कर्म है? ऐसा कहना निहायत ही अवैज्ञानिक है। यह कुतर्कों पर आधारित मनगढ़ंत बात है। ऐसी विचारधारा भविष्य में विज्ञान और तत्वज्ञान के क्षेत्र में मौलिकता का शत्रु ही साबित होगा। सात महीने से छात्रवृत्ति बन्द करने के प्रश्न पर सरकार क्यों मौन है? क्या भविष्य के कार्ल सेगान की हत्या के लिए ऐसा करना जरुरी था? क्या यह मानवीय सृजनशीलता और कल्पनाशक्ति के उड़ान को रोकने का प्रयास नहीं है? यहां देश के भविष्य और उच्च शिक्षा से जुड़ी चुनौतियां दलित विरोधी मुहिम में उलझकर रह गई हैं। यह प्रयास किसी सकारात्मक राजनीति का हिस्सा नहीं हो सकता है। और न ही इससे समाज का कोई हित होने वाला है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रवर्तकों को भी इस तरह के घृणित कृत्यों का कोई विशेष लाभ नहीं मिलने वाला है। फिर भी इस विषय में कोई सकारात्मक पहल नहीं हो रही है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है।
 
मोदीजी के ख्यालों में बराबर देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादूर शास्त्री होते हैं। 1964 में शास्त्रीजी कैरो से लौटते वक्त अचानक कराची में उतरते हैं। उस दिन पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति अय्यूब खान तमाम प्रोटोकाॅल भूल कर उनकी आगवानी करने पहुंचे थे। हाल ही में मोदीजी ने अचानक लाहौर में उतरने का फैसला किया। उन्होंने अपने पाकिस्तानी समकक्ष को जन्मदिन की मुबारकबाद देने का बहाना अच्छा ढ़ूंढ़ लिया था। लालाजी को आदर्श मानने वाले शास्त्रीजी ने देश के लिए जीवनदान दिया था। सरकार को वैमनस्य और असहिष्णुता के मुद्दे पर लालाजी और शास्त्रीजी का अनुकरण करना चाहिए। वैमनस्य और असहिष्णुता का समूल नाश करने के इस प्रयास में निश्चय ही देशवासियों का सहयोग और समर्थन मिलेगा। 
 
आज देश की आजादी के लिए बलिदान देने वाले देशप्रेमियों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित करने का दिन है। ऐसा करने के लिए स्वदेश और स्वराज से स्वभाविक प्रेम बेहद जरुरी है। इसके साथ ही वैमनस्य और असहिष्णुता दूर करने का सार्थक संकल्प भी लेना होगा। ऐसा सुनिश्चित कर ही समाज के अंतिम और मध्यम क्रम के लोगों को मजबूत किया जा सकता है। खैर! आज आम जनता और सरकार बखूूबी समझती है कि चुनी हुई सरकारें लालाजी जैसे अमर शहीदों का कर्मफल भोग रही हैं।
(स्वराज और स्वदेशी का मंत्र साधकर बहिष्कार को अमोघ अस्त्र बनाने  और सफलता अर्जित करने वाले लाल-बाल-पाल के लाल  को  जन्मदिन पर स्मरण कर रहे कौशल किशोर)
lala
Pahal a Milestone

 

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