जल्लीकट्टू और पशुओं के प्रति क्रूरता का प्रश्न 

कौशल किशोर (Follow @HolyGanga)
jallikattu
Jallikattu (Pic. Credit: The Hindu)
मुद्दाः पिछले पांच सालों में इसमें हजारों लोगों के घायल होने और दर्जन मौत की खबरें सामने हैं, परंतु जल्लीकट्टू जैसे आयोजनों का एक विशेष महत्व है
सर्वोच्च न्यायालय ने तमिलनाडु में होने वाले जल्लीकट्टू के आयोजन पर रोक लगा दी है। इस अंतरिम आदेश के प्रभावी रहने की दशा में इस साल बैलों के खेल का आयोजन नहीं हो सकेगा। इस आदेश के तत्काल बाद ही विरोध का तीव्र स्वर भी उभरने लगा है। द्रमुक, एमडीएमके और पीएमके जैसी तमिलनाडु की क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टियों ने राज्य और केन्द्र की सरकार पर दबाव बनाना शुरु कर दिया है। कन्याकुमारी लोकसभा सीट से चुने गए भाजपा सांसद और मोदी सरकार में जहाजरानी राज्यमंत्री पी. राधाकृष्णन प्रदर्शनकारियों के समर्थन में खड़े हैं। प्रदेश की मुख्यमंत्री जयललिता ने भी आनन-फानन में केन्द्र सरकार को पत्र लिखकर इस मामले में तत्काल अध्यादेश जारी करने के अनुरोध को मजबूती से दोहराया है। इससे यह बेहद गरम राजनैतिक मुद्दे में तब्दील हो चुका है। इसके बाद एक बार फिर सरकार और न्यायपालिका के बीच की जंग आमने-सामने है। तमिलनाडु की तमाम बड़ी शक्तियां इस मामले में एकजुट होती दिखाई दे रही हैं। इस साल के आरंभ में यह एक अहम मसला है, जिसका हश्र समय ही बताएगा।
भारत की आम जनता स्वाभाविक तौर पर न्यायपालिका के निर्णय का सम्मान करती है, पर इस मामले में जनता की प्रतिक्रिया चौंकाने वाली है। आज स्थानीय समाज और राजनीति में सक्रिय लोगों का विरोध सड़क पर दिख रहा है। मदुरै, आलंगनाल्लूर, पालामेडु, अवनीपुरम, आदि जिलों में हड़ताल, चक्का जाम और प्रदर्शन का सिलसिला तेज हो गया है। आखिर क्या वजह है कि इस आदेश के तत्काल बाद लोग सड़कों पर उतर आए? क्या आज दक्षिण भारत में विरोध करने वाले लोगों की बातों पर ध्यान देने की जरुरत नहीं है? क्या सचमुच केन्द्र सरकार तमिल नेताओं की बात मानकर नया अध्यादेश जारी करेगी? जल्लीकट्टू के आयोजकों ने गांवों, कस्बों और नगरों में जगह-जगह इस खेल के आयोजन की विस्तृत व्यवस्था कर रखी है। ऐसी दशा में पशुओं के प्रति क्रूरता और हिंसा को रोकने के नाम पर उच्चतम न्यायालय ने इस खेल को रद करने का निर्णय लिया है। इस अंतरिम आदेश के बाद अगली सुनवाई के लिए 15 मार्च का दिन निर्धारित किया गया है। यहां इतना तो साफ है कि न्यायालय का रुख केन्द्र और राज्य सरकार की मंशा के अनुरुप बिल्कुल नहीं है। भारत सरकार के पर्यावरण और वन मंत्रालय द्वारा बीते सात जनवरी को एक अधिसूचना जारी की गई थी। इसमें जुलाई 2011 के नियमों में संशोधन कर जल्लीकट्टू और बैलगाड़ी दौड़ जैसे पारंपरिक खेलों में प्रशिक्षित सांड़ के प्रदर्शन पर लगा प्रतिबन्ध हटा लिया गया। इस पर भारतीय पशु कल्याण बोर्ड, पेटा और दूसरे संगठनों ने मिलकर सुप्रीम कोर्ट में सरकार को चुनौती दी। गौर करने की बात है कि मुख्य न्यायाधीश टी.एस. ठाकुर की अध्यक्षता वाली अदालत में सूचीबद्ध इस केस की सुनवाई न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा और एन.वी. रमना की पीठ में हुई, क्योंकि उस पीठ से जुड़ी जस्टिस आर. भानुमति ने इस मामले से स्वयं को अलग कर लिया था। इस विषय में आई मीडिया रिपोर्ट में इसके कारणों पर कोई चर्चा नहीं हुई है। निश्चय ही तमिलनाडु उच्च न्यायिक सेवा से करियर की शुरुआत करने वाली जस्टिस भानुमति के लिए ऐसा करने के पीछे कोई युक्तिसंगत कारण रहा होगा। पता नहीं इस रहस्य से पर्दा कब उठता है, पर यह तो स्पष्ट हो गया है कि इस मामले में न्यायपालिका की प्रतिष्ठा दांव पर लगी हुई है।
कृषि और पशुपालन पर आश्रित तमिल समाज में गौवंश की रक्षा से जुड़े खेलों का विशेष महत्व है। भारत के प्रायः सभी हिस्सों में साल की शुरुआत में नवान्न का त्योहार प्रागैतिहासिक काल से मनाया जाता रहा है। मकर संक्रान्ति, लोहरी, पोंगल जैसे विभिन्न क्षेत्रों में इसके भिन्न-भिन्न नाम हैं। साथ ही इन पर्व-त्योहारों पर क्षेत्र विशेष की छाप भी साफ दिखाई देती है। तमिलनाडु में पोंगल चार दिनों के विशेष महोत्सव के रुप में मनाया जाता है। प्रत्येक दिन के आयोजन की खास विशेषताएं हैं, जो भोगी पोंगल, थाई पोंगल, मट्टू पोंगल और कन्नम पोंगल जैसे इसके विभिन्न नामों से भी परिलक्षित होता है। तीसरे दिन का आयोजन पशुपति नाथ अर्थात् भगवान शिव को समर्पित है। तमिल मान्याताओं के अनुसार मट्टू भगवान शंकर का बैल है। इस दिन का उत्सव कृषि कार्यों में काम आने के कारण पशुओं को समर्पित है। इसका एक अहम हिस्सा जल्लीकट्टू जैसे खेल का आयोजन है। इस खेल के लिए बैल को विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है। ऐसे प्रशिक्षित सांड़ को जल्लीकट या जल्लीकट्टू कहते हैं।
वास्तव में गोवंश के सबसे मजबूत प्राणी के प्रदर्शन से जुड़ा यह पर्व लंबी तैयारियों का नतीजा है। यह बेहद महत्वपूर्ण सांस्कृतिक गतिविधियों का केन्द्र है। इस कारण तमिलनाडु के अलग-अलग गांवों में साल भर मेले लगते हैं। प्रायः हर गांव के देवालय की अपनी जल्लीकट्टू होती है, जिसके साथ सभी की संवेदना जुड़ी होती है। तंदुरुस्त और मजबूत सांड़ को वश में करने का यह खेल निश्चय ही मुश्किल और खतरनाक है। पिछले पांच सालों में इसमें हजार से ज्यादा लोगों के घायल होने और करीब डेढ़ दर्जन लोगों की मौत की खबरें हमारे सामने हैं, परंतु देशी नस्ल के पशुओं, विशेषकर गोवंश के संरक्षण में जल्लीकट्टू जैसे आयोजनों का विशेष महत्व है। इसे किसी भी सूरत में नकारा नहीं जा सकता है। आधुनिक कृषि में मशीनों का प्रयोग बढ़ा है। इसका नतीजा सामने है। बैलों की उपयोगिता खत्म हो चुकी है। पशुपालक किसान आज बैलों को कसाईयों के हाथ बेचने की होड़ में लगे हैं। ऐसी दशा में जल्लीकट्टू जैसे खेल गौवंश रक्षा के अत्यंत सीमित बचे साधनों में अतिमहत्वपूर्ण है। इस क्रम में एक प्रश्न यह भी खड़ा होता है कि क्या गौवंश के प्रति क्रूरता रोकने का यह मामला भविष्य में उनके समूल नाश का कारण नहीं साबित होगा। असल में यही वह प्रश्न है, जिसे विचार कर तमिल जनता न्यायालय की अवमानना करने पर आमादा है। तमिल समाज को जानने वाले लोग इस बात को समझते हैं।
इस अंतरिम आदेश में वर्णित तथ्यों के अवलोकन से मूक पशुओं के प्रति उच्चतम न्यायालय की अप्रतिम संवेदनशीलता उजागर होती है। जीव-जन्तुओं के प्रति क्रूरता और हिंसा रोकने के मामले में न्यायालय की यह संवेदनाशीलता अगर सही दिशा में कुछ कदम और आगे की ओर अग्रसर हो तो मृतप्राणी भक्षकों का असहज होना कोई अस्वभाविक प्रतिक्रिया नहीं होगी। बहरहाल जल्लीकट्टू की तात्कालिकता और पारंपरिक त्योहारों की गहमा-गहमी को ध्यान में रखने से यह तो स्पष्ट ही है कि प्रशासनिक अधिकारियों के लिए इस आदेश का अनुपालन सुनिश्चित करना बेहद मुश्किल चुनौतियों का सामना कर ही संभव हो सकेगा। हालांकि समाज के एक बड़े वर्ग का विश्वास अभी भी इस बात पर है कि सरकार की तरफ से उन्हें कुछ न कुछ राहत अवश्य मिलेगी, क्योंकि यह एक प्राचीन परंपरा है जो सदियों से चली आ रही है।
-लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं-
Jallikattu-Jagran
Jallikattu in Jagran

jalli
Editorial in Swaraj Khabar
Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s