सतत विकास का कठिन लक्ष्य

कौशल किशोर Follow @HolyGanga
1 जनवरी 2016 से भारत समेत दुनिया के 193 देशों में गरीबी और भूख को दूर करने के लिये तय किया गया ‘सस्टनेबल डेवलपमेंट गोल’ प्रभावी हो रहा है। यह गरीबी के सभी रुपों को हर जगह से समाप्त करने का संकल्प है जो गरीबी और भूखमरी को मिटाने के साथ आर्थिक और सामाजिक गैर-बराबरी जैसी गंभीर समस्याओं को भी दूर करेगी। इस लक्ष्य को साधना चुनौतियों से भरा है। विकासवाद के आधुनिक युग में सामाजिक और आर्थिक विषमता की गहरी खाई साफ दिखाई देती है। आज पृथ्वी पर हर कोने में मुट्ठी भर दौलतमंद लोग ऐशोआराम की जिन्दगी बसर करते हुए आधुनिकतम सुविधाओं का लाभ उठा रहे हैं, तो दूसरी ओर दुनिया भर में करीब 80 करोड़ लोग हाशिये पर हैं, जो कुपोषण का शिकार हैं। इस असमानता को दूर करने के लिए संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों ने प्रतिबद्धता दिखाई है। इसके तहत तय किए गए लक्ष्यों को 2030 तक पूरा करना है। सामाजिक न्याय के सन्दर्भ में यह एक कारगर पहल साबित हो सकता है। भारत जैसे विकासशील देशों के लिए, जहां आजादी के 68 सालों बाद भी लाखों लोगों को दो जून की रोटी मयस्सर नहीं है, यह एक महत्वपूर्ण और महात्वाकांक्षी अभियान है। हमारे देश में भूखमरी, गरीबी और असमानता जैसी समस्याएं सरकार और समाज के सामने यह बेहद जटिल चुनौती पेश कर रही हैं।
पिछले साल संयुक्त राष्ट्र के सत्तर साल पूरा होने पर 25 से 27 सितंबर के बीच न्यूयार्क में हुए शिखर सम्मेलन को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी संबोधित किया था। वैश्विक समुदाय के इसी सम्मेलन में सर्वसम्मति से लक्ष्य और उद्देश्य तय किए गए। इस घोषणा से दो साल पहले ही नागरिक समाज और सबसे गरीब एवं कमजोर तबके की आवाज रहे समूहों के साथ गहन सार्वजनिक परामर्श शुरु किया गया था। इसका नतीजा गरीबी, भूख और बीमारी से मुक्त विश्व की कल्पना के रुप में सामने आया, जिसमें सभी के लिए समृद्धि और जीवन को कामयाब करने का मंत्र संन्निहित है। सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी) मुख्य रुप से मानव, पृथ्वी, समृद्धि, शांति और साझेदारी जैसे पांच बुनियादी बातों पर केंद्रित है। शिक्षा, लैंगिक समानता और जलवायु परिवर्तन से जुड़े प्रायः सभी अहम मुद्दे इन उद्देश्यों में शामिल हैं। इनके अतिरिक्त यह घोषणापत्र भय और हिंसा से मुक्त समाज की कल्पना को साकार करने का प्रयास भी है, लेकिन क्या अगले 15 वर्षों में यह सपना साकार हो सकेगा? यह बेहद जटिल प्रश्न है। सतत विकास लक्ष्य के मुख्य बिन्दु इस प्रकार हैं-
2030 गरीबी के सभी रुपों की समाप्ति। अभी विकासशील देशों में 5 में से 1 व्यक्ति प्रतिदिन 1.25 डाॅलर से कम आय में अपना जीवन व्यतीत कर रहा है। 
भूखमरी की समाप्ति, खाद्य सुरक्षा और बेहतर पोषण के साथ टिकाऊ कृषि को बढ़ावा।
कुपोषण के सभी रुपों को समाप्त करते हुए खाद्य उत्पादकों की आय को दो गुणा करना।
सभी आयु के लोगों में स्वास्थ्य सुरक्षा और स्वस्थ जीवन को बढ़ावा देना। नवजात तथा 5 वर्ष से कम उम्र के ऐसे बच्चों की मृत्यु रोकना जिन्हें बचाया जाना संभव है। 
एड्स, तपेदिक, मलेरिया आदि का उन्मूलन और हेपेटाइटिस और अन्य संक्रामक रोगों पर काबू पाना।
सड़क दुर्घटना में होने वाली वैश्विक मौतों को आधा करना। खतरनाक रसायनों, हवा, मिट्टी, पानी आदि के प्रदूषण से होने वाली बिमारियों एवं मौतों की संख्या को कम करना।
लैंगिक समानता प्राप्त करने के साथ ही सभी महिलाओं एवं लड़कियों का सशक्तिकरण। बाल विवाह, जबरन विवाह, भ्रूण हत्या पर पूरी तौर पर रोक। बाल श्रम के सभी रुपों की समाप्ति।
सभी को स्वच्छ जल की उपलब्धता सुनिश्चित करना। खुले में शौच की प्रवृत्ति पर रोक।
जलवायु परिवर्तन और उसके प्रभावों से निपटने के लिए तत्काल कार्रवाई करना।
भारत में गरीबी के खिलाफ जंग का इतिहास लंबा और पेचीदा है। तीसरी दुनिया के दूसरे गणतंत्रों में भी गरीबी का हाल एकदम पृथक नहीं है। बीते 15 सालों में संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों ने ‘मिलेनियम डेवलपमेंट गोल’ पर काम किया है। 2000 में ही गरीबी की पराकाष्ठा और भूखमरी को दूर करने के लिये आठ लक्ष्यों पर सहमति व्यक्त कर घोषणापत्र जारी किया गया था, परंतु उसे जमीन पर ठीक-ठीक उतारा नहीं जा सका। फलतः उन्हें भी एसडीजी में शामिल किया गया है। आज भारत में ही करीब बीस करोड़ लोग कुपोषण के शिकार हैं। यहां छोटे बच्चों के कुपोषण और पर्याप्त खाद्य सामग्री की अनुपलब्धता की समस्याएं वर्षाें से चली आ रही हैं। इस दिशा में मध्य प्रदेश और बिहार ने बीते एक दशक में उल्लेखनीय प्रगति की है। बच्चों के कुपोषण का मामला आंगनबाड़ी को सौंपा गया था। एक अर्से से यह कार्यक्रम विश्व बैंक के सहयोग से चल रहा है। सन 2000 से 2013 के बीच इसके लिए बजट एक हजार करोड़ से बीस हजार करोड़ तक पहुँच गया। बाद में विश्व बैंक ने इसे फेल करार दिया और नतीजा सामने है कि 2015-16 के बजट में उसे आधा से भी कम कर दिया गया। भारत में प्रशासनिक व्यवस्था और राजकाज से जुड़े मामलों में वैश्विक संस्थाओं के दखल के विषय में सार्वजनिक मंचों पर जानकारी कम ही रही है। सूचना क्रांति के आधुनिक युग में यह दुर्भाग्यपूर्ण है। इस गंभीर समस्या के कायम रहते गरीबी और भूखमरी का निदान शायद ही मुमकिन हो। राजकाज से जुड़े सभी विषयों में जनता की जानकारी बढ़ाना आवश्यक है। इसलिए और भी, क्योंकि अब एक नई समस्या प्रदूषण ने भी गंभीर रुप ले लिया है। हर स्तर पर फैलता प्रदूषण वैश्विक तापमान को बढ़ा रहा है और उसके चलते जो समस्याएं उभर रही हैं वे सतत विकास लक्ष्य को और कठिन बनाने का काम कर रही हैं।
अभावग्रस्त लोग सम्मानजनक जीवन से भी वंचित रहते हैं। नानक जैसे संत ने पिता से व्यापार के लिये मिले धन से साधुओं को भोजन से तृप्त कराना अपना कर्तव्य समझा था। आज भी गुरु नानक की परंपरा के वाहक लाखों लोगों को बिना किसी शुल्क के भोजन परोस रहे हैं। देश में ऐसी दूसरी अनेक परंपरागत संस्थाएं भी हैं। भारत का धर्म ‘भूखे को भोजन और प्यासे को पानी’ देने का रहा है, फिर भी आंकड़े भूख और बदहाली का ब्योरा दे रहे हैं। युएनडीपी की रिपोर्ट के अनुसार करीब 19 करोड़ भारतीय आज भी भूखे सोने को विवश हैं। इस असफलता में राजनैतिक और प्रशासनिक इच्छाशक्ति के अभाव के अलावा अभिजात्य वर्ग की उदासीनता भी स्पष्ट दिखती है। पिछले दिनों एक साहित्य-सम्मेलन में हिस्सा लेने भारत आये फ्रांस के अर्थशास्त्री थाॅमस पिकेटी ने भारतीय संभ्रांत वर्ग को इतिहास से सीख लेने की नसीहत दी। यह सुझाव असमानता दूर करने में अभिजात्य वर्ग की उदासीनता को साफ-साफ इंगित करती है। उन्होंने इस वर्ग पर टैक्स बढ़ाने की पूरजोर वकालत भी की थी। सामाजिक समस्याओं से जुड़े विशाल लक्ष्यों को सिद्ध करने के लिये बड़े पैमाने पर जनसहभागिता जरुरी होती है। इस अभाव के कारण भविष्य में भी असफलता के आसार बने रहेंगे। कोई भूखा नहीं सोये, इस लक्ष्य को सामने रखकर देशभर में कई संस्थान वर्षों से सक्रिय हैं। ऐसे स्वयंसेवी समूहों ने विगत वर्षों में उल्लेखनीय काम किया है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
हाल ही में मानव अभ्युदय संस्थान के तत्वाधान में विभिन्न सामाजिक कार्यकर्ताओं और अनेक संगठनों ने मिलकर भेद-भाव और आर्थिक गैर-बराबरी को दूर करने के लिये ‘भारतीय न्याय मंच’ का गठन किया है। इसके मंच से अर्थशास्त्र के पंडित रोशनलाल अग्रवाल गरीबी रेखा नहीं, बल्कि अमीरी रेखा खींचने की पैरवी कर थाॅमस पिकेटी की बातों को विस्तार देते प्रतीत हुए। गरीबी रेखा के बजाय अमीरी रेखा का निर्धारण किए जाने की बात पहले भी उठती रही है। हमारे नीति-नियंताओं को यह समझना होगा कि विषमता और भूखमरी को दूर कर ही सामाजिक न्याय का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। गरीबी के खिलाफ जंग सरकार और नागरिक समाज के सहयोग और समन्वय से ही जीती जा सकती है। इसे साधने के लिए सभी को तत्परता दिखानी होगी।
Jagran-SDG
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