दक्षिण भारत में तबाही 

कौशल किशोर (Follow @HolyGanga)

CNN-chennai-floodसोमवार से पेरिस में जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर 21वां (CoP21) वैश्विक सम्मेलन चल रहा है। ठीक उसी समय कुदरत की लाठी चेन्नई समेत दक्षिण भारत के कई हिस्सांे में कहर बरपाना शुरु करती है। मौसम विभाग के अनुसार मंगलवार  (1 December) की मध्य रात्रि तक चेन्नई में 119.73 सेंटीमीटर बारिश हो चुकी थी। वहां पिछले सौ सालों के इतिहास में यह मुसलाधार बारिश का सबसे उंचा रिकार्ड है। इससे पहले 1918 में नुंगबक्कम निगरानी केंद्र की रिपोर्ट में 108.80 सेंटीमीटर बारिश का जिक्र मिलता है। इस प्रकोप के कारण तमिलनाडु के अतिरिक्त आंध्र प्रदेश के चित्तूर, नेल्लूर और कई अन्य जिलों एवं पुदुच्चेरी के निचले इलाके जलप्लावित हैं। इन प्रदेशों में अबतक तीन सौ से ज्यादा लोगों की मौत इस आपदा की वजह से हो चुकी है। इन दिनों उत्तर भारत में सर्दी का मौसम होता है। इस मौसम में बंगाल की खाड़ी से चलने वाला मौनसून दक्षिण भारत के तटिय इलाकांे में बारिश का कारण होता रहा है। परंतु यह बारिश भूतकाल में इतनी घातक नहीं थी। पिछले नौ नवम्बर को शुरु हुए बारिश की पहली खेप चेन्नई में बाढ़ का कारण बनी थी। यह इस मौनसून की तीसरी बरसात है, जो बेहद भयानक और नुकसानदेह साबित हुई।

इस नुकसान का अंदाजा इन बातों से भी लगाया जा सकता है कि पिछले डेढ़ सौ वर्षों के इतिहास में पहली बार अंगे्रजी दैनिक ‘दी हिन्दू’ का चेन्नई संस्करण प्रकाशित नहीं हो सका। बाढ़ से प्रभावित क्षेत्र में एनडीआरएफ के एक हजार से ज्यादा जवान सौ से ज्यादा नावों के साथ राहत कार्यों में जुटे हैं। साथ ही नौ सेना, वायु सेना और तटरक्षक बल मुस्तैदी से प्रभावित लोगों को बचाने में लगे हैं। दिन-ब-दिन मृतकों की संख्या और नुकसान के आंकड़ों में वृद्धि हो रही है। तमिलनाडु सरकार ने 8,481 करोड़ रुपये का नुकसान होने की बात कही है। एसोचैम ने व्यापारियों को हुए पंद्रह हजार करोड़ रुपये के नुकसान का जिक्र किया है। बीते सालों का रिकार्ड देखें तो बारिश और बाढ़ के प्रकोप से उपजी यह समस्या देश की बेहद जटिल समस्या साबित हो रही है। यह प्रकृति के साथ विकास का सामंजस्य नहीं होने का नतीजा है। दरअसल इसे प्रकृति का कोप कहना नगर नियोजन की समस्या से मुंह फेरने की कवायद प्रतीत होता है।

जून 2013 में केदारनाथ की तबाही, अगले साल श्रीनगर और आजकल तटिय इलाकों में भीषण बाढ़ का प्रकोप जान-माल के अपूरणीय नुकसान की कहानी साफ-साफ कहती है। ये इक्कीसवीं सदी में तबाही की नई इबारतें हैं। फ्लैश-फ्लड का प्रकोप हिमालय के शिखर से लेकर समुद्र तटिय इलाकांे तक बराबर नुकसान का कारण साबित हो रहा है। करीब एक दशक पूर्व मुंबई में भी ऐसा ही हाल हुआ था। तटिय क्षेत्र में बारिश का पानी नदी-नालों के माध्यम से झटपट दरिया में पहुंचता रहा। परंतु जलसंवर्द्धन और जलनिकासी (ड्रेनेज) की व्यवस्था ठप्प होने से यह व्यवस्था चड़मड़ा गई। चेन्नई का सबसे बड़ा माॅल एक झील को नष्ट कर बनाया गया है। बेईमान नेताओं, भ्रष्ट नौकरशाहों और लालची बिल्डरों की मिलीभगत से महानगर का समूचा ड्रेनेज सिस्टम इस हद तक तबाह हो गया कि बारिश का पानी एक इंच आगे नहीं बढ़ पा रहा है। जलभराव की यह स्थिति ही बाढ़ की जटिल समस्या का मूल कारण है। इसके साथ दूसरी समस्या सैकड़ों करोड़ रुपये के राहत फंड के बंटवारे से जुड़ा है। यह व्यवस्था आधुनिक विकास माॅडल के सामने सबसे मुश्किल चैलेंज पेश करता है। विज्ञान और तकनीकी की विधाओं ने प्रकृति पर नियंत्रण हेतु हैरतअंगेज कारनामें किये हैं। फिर इसे प्रकृति का कोप कहने के क्या मायने हो सकते हैं? क्या यह एक ऐसा जुमला नहीं है, जिससे आम जन को सहज ही भ्रमित किया जा सके। निश्चय ही लूट की वर्तमान व्यवस्था को कायम रखने में यह सबसे कारगर जुमला साबित हुआ है।

पेरिस में जलवायु सम्मेलन को सम्बोधित करने के बाद इसी हफ्ते प्रधानमंत्री ने बाढ़ से तबाह दक्षिणी तट का हवाई मुआयना कर एक हजार करोड़ का पैकेज भेजा है। पूर्व प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने भी केदारनाथ की तबाही के बाद एक हजार करोड़ रुपये उत्तराखंड की सरकार को भेजकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली थी। क्या खैरात की यह परंपरा इस समस्या का वास्तविक निदान है? क्या इससे जान-माल के तबाही की भरपाई सचमुच हो पाती है? क्या यह अगली ऐसी आपदा से मुक्ति का मार्ग सुनिश्चित करती है? क्या यह भ्रष्टाचार के कुछ नए मामलों को जन्म नहीं देती है? सरकार और सिविल सोसाइटी को इसके वास्तविक समाधान का मार्ग खोजना चाहिये। एक ऐसा विकास माॅडल अपनाना चाहिए जिसमें विकास का सूत्र प्रकृति और पर्यावरण के संरक्षण और संवर्द्धन के लिये हो। इस बीच सिविल सोसाइटी के प्रबुद्ध लोगों ने भी इस आपदा से राहत के लिए सहयोग का हाथ बढ़ाया है। सोसल मीडिया पर लोगों ने अपना नाम-पता शेयर कर बताया कि हमारा घर, दफ्तर सुरक्षित है और इतने लोगों के खाने-रहने की व्यवस्था हो सकती है, आप यहां आ सकते हैं। यह एक नयी पहल है, जो निश्चय ही स्वागत योग्य है।
फिलहाल बारिश थमने से अडयार और कुंभ नदियों के जलस्तर में कमी आई है। यदि मुसलाधार बारिश का सिसिला थमा रहा तो इस विभीषिका से बदहाल चेन्नई और दूसरे इलाकों में चल रहे राहत कार्यों में तेजी आएगी। साथ ही यह अवसर नगर नियोजन को त्रुटीविहीन करने और विकास के वैकल्पिक माॅडल की ओर संजीदगी से विचार करने को विवश करता है। जलवायु संकट को दूर करने के लिये पेरिस पहुंचने वाले जनता के प्रतिनिधियों, विशेषज्ञों और कार्यकर्ताओं को इस विषय में विशेष रुप से गौर करने की जरुरत होगी।
Chennai Flood
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Pic Credit: CNN
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