वीर-बलिदानी लालाजी

लाल-बाल-पाल के लाल-लाजपत राय का स्मरण कर रहे कौशल किशोरsops.in

आज से ठीक 87 साल पहले इसी दिन (30 अक्टूबर) को लाहौर में साइमन कमीशन का विरोध करने निकले लाला लाजपत राय के सीने पर लाठियां भांजी गई थीं। तब देश में अंग्रेजों का राज था। 1928 में साइमन कमीशन के विरुद्ध उनका ऐतिहासिक प्रदर्शन उनकी बहादुरी की सच्ची मिसाल है। उनके लिए 63 वर्ष की अवस्था में स्कॉट और सांडर्स का हमला प्राणघातक साबित हुआ। आखिरकार 17 नवंबर को लालाजी ने देह त्याग दी। इस बीच उन्होंने भी ठीक 18 दिनों का एक महाभारत ही लड़ा है। उनके निधन को एनी बेसेंट ने एक महानायक की शहादत करार देते हुए कहा था कि बेहद मुश्किल होता है एक जन आंदोलन का नेतृत्व करते हुए सबसे आगे रहकर आक्रमण को ङोलना। उस दौर में दूसरी भारी-भरकम आवाज देशबंधु चितरंजन दास की विधवा बसंती देवी की उभरी थी। इसी ललकार का नतीजा था कि चंद्रशेखर आजाद की हंिदूुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के नायक भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु ने मिलकर सांडर्स वध की योजना रची और फांसी पर झूलना कबूल किया। यह सब आजादी की लड़ाई का क्रांतिकारी घटनाक्रम है। यह उचित ही है कि मोदी सरकार लाजपत राय के जन्म का 150 साल पूरा होने पर उनके सम्मान में 5,10 और 150 रुपये के विशेष सिक्के ढालने जा रही है। देश के इस लाल को सम्मानपूर्वक शेरे पंजाब और पंजाब केसरी भी कहा जाता है। लालाजी के जीवनकाल का विस्तार 19वीं सदी के अंतिम तीन दशकों और 20वीं सदी के पहले तीन दशकों के बीच है। इस दौर की भारतीय राजनीति में लालाजी जैसा कोई दूसरा सितारा खोजना आसान नहीं। यह उनकी विलक्षणता का प्रभाव था कि लाल-बाल-पाल के युग में विपरीत ध्रुव भी आकर्षित होते रहे। स्वतंत्रता संग्राम में उनका योगदान सचमुच अद्वितीय है। 19वीं सदी में लालाजी ने अंग्रेजी और हंिदूुस्तानी के माध्यम से शिक्षा की पैरवी की। भारतीय भाषाओं में शिक्षा देने को उचित ठहराकर लालाजी भाषा आंदोलन के भी अग्रिम पंक्ति के नायक साबित हुए।

लालाजी को इंग्लैंड और अमेरिका प्रवास के दौरान बटर्ेड रसेल और जॉन डेवी की शिक्षा पद्धति को करीब से समझने का अवसर मिला था। इन दोनों विद्वानांे ने भी शिक्षा का उद्देश्य चरित्र निर्माण ही माना था। लालाजी ने लौकिक पुरुषार्थ की प्राप्ति को महत्वपूर्ण मानकर दयानंद-एंग्लो-वैदिक स्कूल-कॉलेज शुरू किए, जिसकी आज 800 के करीब शाखाएं देशभर में फैली हुई हैं। शिक्षा को राष्ट्रनिर्माण की अहम कड़ी मानने वाले लालाजी ने इसे राज्य की जिम्मेदारी बताते हुए सबसे पहले बजट आवंटित करने की पैरोकारी की थी। आज जब नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति बन रही है तब इस विषय में लालाजी के विचारों का अवलोकन बेहद आवश्यक है। भारत की शिक्षा व्यवस्था की समस्या पर लिखी उनकी पुस्तक के जरिये शिक्षा के क्षेत्र में कायाकल्प संभव है।

बलिदान से पांच साल पहले लालाजी ने दंगों के समय पीड़ित पक्ष को बचाने और सांप्रदायिक सौहार्द कायम करने के लिए कारगर तरीका अपनाया था। उन्होंने दंगाइयों को रोकने के लिए उसी धर्म को मानने वाले लोगों से आगे बढ़कर हिंसा रोकने की पुरजोर वकालत की थी। उपराष्ट्रपति डा. हामिद अंसारी कहते हैं कि विभिन्न धर्मो को मानने वाले 100 विशिष्ट लोगों की सूची में लालाजी पहले स्थान पर हैं। सभी धर्मो को समान महत्व देने की पैरवी करने वाले लालाजी सेक्युलर नायक थे। लालाजी ने 1920 में द तिलक स्कूल ऑफ पॉलिटिक्स शुरू किया था। लोकमान्य, महामना और उत्कलमणि के करीबी मित्र रहे लालाजी ने राजनेताओं की नई पीढ़ी के निर्माण में रुचि ली। उन्होंने आजादी के बाद देश को राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन, बलवंतराय मेहता और लाल बहादुर शास्त्री जैसे राजनीतिज्ञ दिए। 1965 में विमान अपहरण के बाद गुजरात के दूसरे मुख्यमंत्री बलवंत राय मेहता और उनकी पत्नी की संदिग्ध मौत का मामला भी शास्त्री जी जैसा है। मोदी सरकार मेहता दंपति की संदिग्ध मौत के कारण जानने पर विचार करे तो बलिदानियों के विषय में कुछ नई जानकारी मिल सकती है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

शिक्षा को राष्ट्रनिर्माण की अहम कड़ी मानने वाले लालाजी ने इसे राज्य की जिम्मेदारी बताते हुए सबसे पहले बजट आवंटित करने की पैरोकारी की थी

Lalaji-Jagran

http://epaper.jagran.com/ePaperArticle/30-oct-2015-edition-National-page_6-21538-101752920-262.html

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