कश्मीरी पंडितों की वापसी और हिन्दू महासभा की राजनीति

Swami Agnivesh
कौशल किशोर Follow @HolyGanga

नाथूराम गोडसे ने 1948 में महात्मा गांधी को गोली मारकर उनकी हत्या की थी। गोडसे का ताल्लुक हिन्दू महासभा से था। 30 जनवरी के उस हादसे में प्रयोग किये गये हथियार की भी अपनी एक कहानी है। उस दौर की राजनीति ने धर्म के नाम पर देश का विभाजन किया और गांधीजी ने इसका असफल विरोध किया। पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) और पश्चिमी पाकिस्तान के बीच एक नए भारत का उदय हुआ। नफरत की खेती से उपजे इसी विभाजन का परिणाम गांधीजी की हत्या के रुप में सामने आया था। क्या आज भी इन देशों में वर्गीय तनाव की आधारशिला पर ही कट्टरपंथी संगठनों की राजनीति टिकी हुई है? जम्मू और कश्मीर की सरकार द्वारा कश्मीरी पंडितों की वापसी का मामला उठाने के बाद यह प्रश्न एक बार फिर सामने है।

जम्मू और कश्मीर की सरकार घाटी से भगाए गए पंडितों को बसाने की योजना बनाई है। श्रीनगर और दूसरे स्थानों पर उनके लिए अगल से काॅलोनी बनाने का प्रयास हो रहा है। पंडितों को अलग-थलग बसाने की योजना निश्चय ही अपरिपक्व राजनीति की निशानी है। इसका परिणाम भी सामने है। 18 अप्रैल 2015 को यासिन मलिक ने कश्मीरी पंडितों के नेताओं समेत सिक्ख और इसाई धर्म के नेताओं को साथ लेकर 30 घंटे का धरना-प्रदर्शन श्रीनगर में आयोजित किया। इस प्रदर्शन में सैकड़ों कश्मीरी युवक ‘साथ जियेगें-साथ मरेगें’ का नारा लगाते हुए सांप्रदायिक सौहार्द की अपील कर रहे थे। प्रदर्शनकारियों का समर्थन करने पहुंच कर स्वामी अग्निवेश ने हिन्दू धर्म का प्रतिनिधित्व किया। यह हिन्दुत्व की सहिष्णुता और भाईचारा का प्रतीक है। अलगाववादी संगठन जेकेएलएफ (जम्मू-कश्मीर लिबरेसन फ्रंट) के लिए कभी हिंसा के मार्ग पर चलने वाले यासिन मलिक ने 1995 में ही शांति और संवाद का मार्ग चुन कर सराहनीय काम किया। ऐसी दशा में हिन्दू महासभा द्वारा घाटी में शांति बहाल करने की प्रक्रिया का विरोध करना अनुचित है। हिन्दू धर्म की मर्यादा के अनुसार भी यह कार्य निंदनीय ही है।

23 अप्रैल 2015 को हरियाणा के जींद में हिन्दू महासभा से जुड़े धर्मपाल सिवाच और रमेश पानू ने स्वामी अग्निवेश का सिर काटकर लाने वाले के लिए पांच लाख रुपये के इनाम की घोषणा की है। इसके साथ ही कहा गया कि उन्हें पांच जूते मारने वाले को एक लाख रुपये का इनाम दिया जाएगा। इलेक्ट्रानिक मीडिया के कई चैनलों के अतिरिक्त दैनिक जागरण और पंजाब केसरी जैसे प्रतिष्ठित पत्रों ने इसे प्रकाशित कर जलती आग में घी डालने का काम किया है। हिंसा को बढ़ावा देने के इस मामले में बंधुआ मुक्ति मोर्चा के महासचिव प्रो. श्योताज सिंह ने क्नाॅट प्लेस थाने में प्राथमिकी दर्ज करवाई है। इन सब के साथ ही सोसल मीडिया पर यह मामला छा रहा है।

हिन्दू महासभा के तथाकथित नेताओं ने हिंसा भड़काने के इस प्रयास को अमलीजामा पहनाने के लिए मनगढंत बातों का सहारा लिया है। पत्रों में प्रकाशित सिवाच की टिप्पणी में साफ कहा गया है कि स्वामी अग्निवेश ने मसर्रत आलम के रिहाई की मांग की है। हालांकि स्वामी अग्निवेश ने इस विषय में कोई टिप्पणी तक नहीं किया है। तथाकथित नेताओं द्वारा यह कहना कितना उचित है कि यासिन मलिक के धरना में शामिल होने के कारण उन्हें भगवा-वस्त्र धारण करने का कोई हक नहीं है। यह संन्यासियों के कार्यक्षेत्र में अतिक्रमण है। वास्तव में कोई संन्यासी ही किसी योग्य व्यक्ति को इस परम्परा से जोड़ सकता है। अयोग्यता की दशा में निषेध का प्रावधान भी इसी नियम के अन्तर्गत है। स्वामी अग्निवेश ने कश्मीरी पंडितों की घाटी में वापसी के मुद्दे पर मुसलमानों के सहयोग को बढ़ावा देकर भाईचारा और सांप्रदायिक सौहार्द में अभिवृद्धि का प्रयास किया, तो दूसरी ओर हिन्दू महासभा का रुख असहिष्णुता और हिंसा को बढ़ावा देने की प्रवृत्ति को उजागर करता है।

महर्षि दयानन्द सरस्वती ने अंग्रेजीराज में देशभक्ति का अलख जगाया था। आज स्वामी अग्निवेश निर्भिकता से उनकी परम्परा को निभा रहे हैं। उनके नेतृत्व में बंधुआ और बाल मजदूरी के खिलाफ किया गया लम्बा संघर्ष उनकी राष्ट्रभक्ति की मिसाल है। ऐसे समाजसेवी साधु को देशद्रोही कहने वालों को अपनी ओर देखने की जरुरत है। गांधीजी जैसे महात्मा की हत्या कराने वालों से प्रेम और सौहार्द की अपील करना मेरे बस की बात नहीं है। पर आम लोग यह साफ-साफ समझ रहे हैं कि मोदी की सरकार ने हिन्दुत्व के नाम पर वैमनस्य परोसने वाले अपने ही सहयोगी संगठनों को लव-जिहाद और घर वापसी के अतिरिक्त किसी और काम का नहीं छोड़ा है। क्या ऐसी दशा में इसी तरह के हथकण्डे अपना कर उन्हें चर्चा में बने रहने का मौका मिल सकता है? यह एक और प्रश्न है, जो मुंह बाए खड़ा है।

इस तरह की आपराधिक गतिविधियों का स्वतः संज्ञान लेते हुए गृह मंत्रालय को तत्काल प्रभावी कार्यवाही करना चाहिए था। प्रशासन द्वारा अबतक कोई कार्यवाही नहीं करना दुर्भाग्यपूर्ण है। क्या यह दक्षिणपंथी राजनीति के हाथांे में सत्ता होने का परिणाम है? यदि ऐसा नहीं तो यही कहा जा सकता है कि सरकारें महात्मा गांधी, स्वामी श्रद्धानन्द और गंगापुत्र निगमानन्द जैसे कर्मयोगियों के बलिदान की बाट जोह रही होती है। मीडिया की रिपोर्ट में इस तरह की दकियानुसियों को जगह मिलना खबरपालिका को गरिमाविहीन ही करती है।

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