गंगा की व्यथा-कथा

कौशल किशोर @HolyGanga

Courtesy: News18
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मैं गंगा मुक्ति आंदोलन के विषय में कैसे कहूं। गंगा तो स्वयं ही मुक्ति देने वाली है। मेरी बात सुनकर एक मित्र जोरदार ठहाका मारते हैं। कुछ ठहर कर वह इस आन्दोलन से जुड़े पांच लोगों का नाम भी पूछते हैं। गंगापुत्र निगमानंद, बाबा नागनाथ और स्वामी सानन्द कहकर मैं चुप हो जाता हूँ। पर अब मेरे लिए हंसी रोकना आसान नहीं था। विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन से जुड़े विशेषज्ञों ने भले ही इस आन्दोलन की योजना बनाने में रुचि नहीं लिया है। गंगा की एक छोटी धार पर पेड़ की छांव में बनने वाली योजना दमदार हो सकती है। आजकल इन्हीं मसलों को लेकर वहां भी कर्इ लोग आन्दोलित हैं। इसका नतीजा भी सामने है। गंगा और हिमालय के प्रबन्धन में फेर-बदल हुआ है। यह सुनकर मित्र शान्त हो गये।
गंगा की मुä कि मार्ग अत्यंत कठिन हालातों से गुजरता है। सदियों पुराना यह आंदोलन अब नए युग में प्रवेश कर रहा है। और इस गदर के शहीदों पर हंसने वालों की कोर्इ कमी नहीं है। सच्चार्इ तो यह है कि बाजार में भी इसी गंगा की कोख से उत्पन्न हुर्इ क्रांति धूम मचा रही है। बड़े खिलाडि़यों का यह खेल भी खूब दिलचस्प है।
पिछले तीन सालों में दो बार गंगा की मुä किे लिए बलिदान सुर्खियों में रहा है। उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में जमीन लाल हो चुकी है। ऐसे में इस सत्याग्रह के बारे क्या कहा जाय! गंगा मुä कि यह आंदोलन भारतीय इतिहास में अपने किश्म का विलक्षण कार्यक्रम है। इसे व्यä करने के क्रम में बाबा नागनाथ गंगादर्शन के अंतिम-रश्म की व्याख्या कर डालते थे। मैं कानपुर के जाजमऊ क्षेत्र में जीव-जंतुओं और वनस्पतियों पर भी एक निगाह डालने का निवेदन करुंगा।
इस मामले में आम जनता की रुचि जगजाहिर है। यह व्यथा-कथा गंगा के उदभव की गाथा की तरह ही प्रतीत होती है। भागिरथी आर्यावर्त के प्रतापी सूर्यवंशी सम्राटों के त्याग और तपस्या की निशानी मानी जाती है। यहां भी अंशुमान और दिलीप की तरह निराशा और फिर घोर निराशा है। गंगा और गंगापुत्रों की व्यथा सुनने-समझने के बाद ऐसा ही लगेगा। आज उसी मुäदियिनी कही जाने वाली गंगा की मुä किे लिए बलिदानाें का क्रम जारी है। ऐसी परिसिथति में इसे गंभीरता से देखना आवश्यक है। वास्तव में नागनाथ और निगमानंद गंगा को अविरल और निर्मल देखना चाहते थे। पर बाहर उन्हें अविरल गंगा और निर्मल गंगा के बदले हर-हर गंगे का स्वर ही सुनार्इ देता रहा! समाज पर पैंनी नजर रखने वाले लोग 13 जून 2011 को गंगापुत्र निगमानंद की शहादत से सन्नाटे में थे। फिर 11 जुलार्इ 2014 को बाबा नागनाथ के बलिदान ने भी एक पल के लिए कुछ लोगों को चौंका दिया था। हरिद्वार और काशी में इन गांधीवादी सत्याग्रहियों के साथ कभी स्वामी सानंद भी तपस्या करने बैठे थे। ये सब कुछ भूदान आंदोलन के प्रणेता की स्मृतियों में ले जाने के लिए पर्याप्त है। गांधी के देश में इससे बुरा क्या हो सकता है? मुशिकल सवाल है।
गंगा नदी की हालत साफ-साफ कहती है कि इसके कछार में रहने वाले आम लोग भी ठीक वैसी ही हालत में हैं। और कमोबेश सरकारें भी वैसी ही हैं। क्या यह प्रदूषण और बदहाली देश की मजबूरी है? किसी युग में गंगा और इसकी दूसरी सहायक नदियों का जल समुची नदीघाटी में पेयजल की तरह प्रयोग के योग्य था। क्या अब इसकी कल्पना भी की जा सकती है? आज गंगा की यही सबसे जटिल व्यथा है। पूंजी के आधुनिक खेल में इसकी ओर सतत अनदेखी होती आ रही है। यह अनदेखी ही है या कुछ और? नदी में प्रवाहित जल स्नान के योग्य भी नहीं रहा। आचमन तो दूर की बात है। अब यह आंदोलित होने का विषय भी नहीं रह गया। यहां कर्इ बिन्दुओं का स्पष्ट होना आवश्यक है। अविरल और निर्मल जल से जुड़ा मुíा सर्वोपरि है। कर्इ बार इसे परिभाषित करने की जरुरत पड़ी है।
बिना किसी अवरोध के नदी का नैसर्गिक प्रवाह ही अविरल माना जाता है। जलाशय में तब्दील करने से वह शील भंग होता है। इसलिए पहले बांधों, पुलों, सुरंगों, आदि में इसे बाधित करना निषिद्ध था। निर्मल जल से आशय अक्षिंजल से है। यह पीने से इतर अन्य पवित्र कार्यों में उपयोग के योग्य होने का मानक माना जाता है। गंगा के नाम भी हजार हैं। इन सूत्रों का रहस्य बड़ा निराला है। इस अविरल प्रवाह को पापनाशिनी कहकर समाज सम्मानित करता रहा। अविरलता की तरह ही निर्मलता भी गंगा जल का प्राकृतिक गुण था।
भागिरथी सदैव अविरल और निर्मल रही होगी। ऐसा कहना संभव नहीं होगा। आजादी से पहले तक इसकी निर्मलता के प्रमाण मिलते हैं। पर अविरलता के विषय में ऐसा नहीं है। काव्यों में जा–ु की जा–वी से लेकर भीष्म के तीरों से बंधी नदी तक का व्यौरा है। आधुनिक काल में र्इस्ट इंडिया कंपनी ने गंगनहर बनाकर यह काम आरंभ किया था। हाल में सर प्रोबे काटले की यह मंहगी कृति खासा चर्चा में रही है। पहले विश्वयुद्ध के 100 साल और गंगनहर के 160 साल पूरा होने पर शुरु हुए ‘जश्न-ए-गदर में इस पर खूब हंगामा होता रहा है। दरअस़ल इससे गंगा की अविरलता प्रभावित होती थी। इस मुíे का राष्ट्रीय आंदोलनों के केंद्र में पहुंचना तय था। सिपाही विद्रोह से पूर्व के कालखंड में ही यह क्रांतिकारियों को आंदोलित करने का प्रमुख कारण बना था। आजादी से करीब सौ साल पहले गंगनहर के निर्माण (1848-1854) के दौरान ही विरोध के सबसे तीव्र स्वर उभरे थे।
उन दिनों ऐसा होना स्वभाविक था। गंगा-राइटस जनस्मृतियों में सबसे अमूल्य धरोहर की तरह रची-बसी थी। वह समाज नदी की अविरलता के महत्व को भली-भांति समझता था। आकाश गंगा को पाताल गंगा में समेटने का दुस्साध्य काम करने वाले राजा जनक के जादूर्इ सरोवरों को गढ़ने की परंपरा भी नष्ट नहीं हुर्इ थी। समाज तालाबों, कुओं और बावडि़यों को रचने-गढ़ने में माहिर था। उस दौर में हिंदु महासभा और राजवाड़े गंगनहर का घोर विरोेधी बनकर उभरे थे। कालक्रम में यह गंगा की धाराओं की तरह ही व्यापक हुआ था।
वास्तव में गंगा कोर्इ एक नदी नहीं बलिक हिमालय और हिन्द महासागर को जोड़ने वाली प्राकृतिक जलधाराओं का अतिविशिष्ट ‘गंगा रिवर सिस्टम है। इसमें भारतीय उपमहाद्वीप की कर्इ महत्वपूर्ण नदियां शामिल हैं। गोमती, रामगंगा, यमुना, चंबल, सरयु, सोन, गंडक, कोशी, बागमती और दामोदर जैसी नदियां इसमें समाकर गंगा कहलाती हंै। इन सभी नदीघाटियों में यह आंदोलन आग की तरह फैल गया था। इसकी विशालता देश की आधुनिक राजनैतिक सीमाओं का अतिक्रमण कर गया। नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, म्यांमार और चीन (तिब्बत समेत) के हिस्सों में भी चिंगारी पहुंच गर्इ। अंग्रेजों के खिलाफ कर्इ स्थानों पर छोटे-छोटे विद्रोह पहले से ही चल रहे थे। गंगा की मुä कि मसाला आंदोलनकारियों को एक करने में कारगर हुआ था। शायद आगे ऐसा कभी नहीं होगा।
आखिरकार महामना मालवीय के युग में अविरलता का मुíा परवान चढ़ा था। महामना मदन मोहन मालवीय हिंदु महासभा के प्रतिनिधि थे। उनके नेतृत्व में वायसराय से हुए समझौते के बाद 1916 में भागीरथ-बिंदु से अविरल प्रवाह पुन: स्थापित हुआ। यह र्इस्ट इंडिया कंपनी की गंगनहर परियोजना में एक मामूली सा फेर-बदल था। अंग्रेजी राज में भारतीय लोगों को इतने से काम के लिए 68 सालों तक संघर्ष करना पड़ा था। जबकि कंपनी को इसे अमलीजामा पहनाने में कुल 6 ही साल लगे थे। यही संघर्ष उस वेदना के मूल में था, जो महामना के अंतिम दिनों में काशी प्रवास के दौरान उन्हें सताता रहा था।
आजादी के बाद हालात बहुत बदले हैं। आरंभिक दो दशकों में राष्ट्रीय राजधानी में यमुना का जल मटकियों में भरकर लाने का रिवाज कायम रहा। सैकड़ों तालाबों, बावडि़यों और कुओं ने दिल्ली के लाखों लोगों को जीवनरक्षक जल देना जारी रखा था। यह ड्रेनेज सिस्टम के लिए भी अनुकूल था। यधपि इस बीच जलविधुत परियोजनाओं का श्रीगणेश हो गया था। पर तृपित पाने की पुरानी परंपरा पूर्ववत चलती रही। यह कतर्इ नहीं कह सकते कि इन दो दशकों में गंगा और यमुना जैसी पवित्र नदियां पूर्णत: स्वच्छ और निर्मल रही होगी। सत्तर के दशक में नए सिरे से गंगा की व्यथा-कथा प्रकट होना आरंभ हुआ था।
बिहार में इमरजेंसी से पहले ही गंगा में आग लगने की खबरों ने तहलका मचाया था। इस बार प्रदूषण नामक दानव गंगा की निर्मलता हरण कर बैठा था। जेपी आंदोलन से जुड़े रहे विजय कुमार प्रदूषण और जलदारी के खिलाफ कार्यकर्ताओं की सक्रियता के विषय में रोचक विवरण प्रस्तुत करते हैं। इसी दौर में पनबिजली परियोजनाओं के विरुद्ध भी आवाजें उठीं। चिपको आंदोलन से जुड़े रहे सुंदरलाल बहुगुणा सत्याग्रहियों को कुचलने की लंबी दास्तान सुनाते रहे। अस्सी के दशक में गंगा की अविरलता और निर्मलता का मुíा उत्तराखंड और बिहार में जोर-शोर से उठने लगा था। इसी कालखंड में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने इसे स्वच्छ और निर्मल बनाने की घोषणा किया था। गंगा एक्सन प्लान का सूत्रपात कर उन्होंने खूब वाहवाही लूटी। बाजार में तब से ही यह मुíा सुर्खियों में रहा है।
भूमंडलीकरण का दौर आने पर 1990 के दशक में गंगा की हत्या की गयी। कभी संपूर्ण स्वराज की मांग करने वाला समाज गंगा-राइटस से भी वंचित हो गया। इस दौर में साफ हुआ कि गंगा किस बाजार में है। वह पूंजी के हाथों की पुतली बन चुकी थी। नदी पर स्थानीय समुदाय का नियंत्रण नहीं रह गया। इस बीच जनता और जनप्रतिनिधियों के बीच भी गहरी खार्इ का निर्माण हुआ। गंगा की धाराओं को सुरंगों में जमींदोज कर विलुप्त करने का उपक्रम शुरु हुआ। क्या विश्वबैंक ने सरकारों का काम योजनाओं को अमलीजामा पहनाने तक ही सीमित नहीं कर दिया? यह कर्ज का मर्ज ही कुछ ऐसा है। अब हालात ऐसे हो गए कि कुर्बानियां ही शेष रही। यही दौर निगमानंद जैसे क्रांतिकारी चेतना का अभ्युदय काल है। गंगा के लिए उन्होंने 1998 से अंतिम क्षणों तक अनवरत संघर्ष कर मिसाल कायम किया।
एक दशक बाद काशी में बाबा नागनाथ ने आमरण-अनशन शुरु किया था। उसी साल पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने गंगा को राष्ट्रीय धरोहर घोषित किया। फिर राष्ट्रीय गंगा नदीघाटी प्राधिकरण बनाकर इसे आइआइटी कंसोर्टियम और इटीआर्इ डायनमिक्स को सफार्इ का व्यापार करने हेतु सौंप दिया। यहां ध्यान रखना चाहिए कि पहले उन्होंने इसे भारत की आत्मा का प्रतिनिधि बताया था। वर्तमान प्रधानमंत्री ने तो गंगा के लिए अलग मंत्रालय ही बना दिया। पहली बार सांसद चुने जाने से पूर्व उन्होंने बनारस में कहा था, ‘मुझे न किसी ने भेजा है, न मैं यहां आया हूं, मुझे तो मां गंगा ने बुलाया है। यह र्इशारा भविष्य की किन योजनाओं का सूचक था? अब कुछ और साफ हुआ है। यहां इतना ध्यान रखना चाहिए कि गंगा की पुकार सुनने का दावा करने वाले प्रधानमंत्री स्वयं बनारस से चुने गए हैं। इस नाते भी उनकी नैतिक जिम्मेदारी बनती थी कि व्यास-पूर्णिमा के अवसर पर गंगा की मुä किे लिए प्राणोत्सर्ग करने वाले बाबा को एकबार याद करते। इस मामले में मोदी सरकार से बेहतर मनमोहन सरकार का ही रुख रहा। आपको याद होगा प्रो. जीडी अग्रवाल (स्वामी सानंद) के अनशन के कारण उन्होंने एकबार उत्तराखंड में कुछ खास बांध परियोजनाओं पर रोक लगाया था। और एकबार तो भेंट का प्रस्ताव देकर सत्याग्रह समाप्त करने की अपील भी किया था। इस बनारसी बाबा के साथ मोदीजी ऐसा करने से भी चूक गए। गंगा मामलों की मंत्री उमा भारती भी लंबे समय से ‘मिशन-गंगा में लगी रही हैं।
गंगा एक्सन प्लान से गंगा मंत्रालय के बीच करीब तीन दशक का फासला है। इसी बीच गंगा की दुर्दशा सबसे तेज गति से हुर्इ है। वस्तुसिथति का व्यौरा तो यही सच उजागर करता है। सीवर ट्रीटमेंट की व्यवस्था के साथ ही रासायनिक खाद और कीटनाशकों का बाजार बुलंद हुआ था। गंगा की सफार्इ के नामपर कृषि-भूमि को विषैला बनाने का लक्ष्य साधा गया। नदीघाटी में किसानों के लिए आत्महत्या की नौबत आ गर्इ। तबाही का नया अध्याय कर्इ सीढि़यां तय करने के बाद पिछले साल केदारनाथ में उपसिथत हुआ था। तैरने वाला समाज आज डूब रहा है। डूब मरने का यह सिलसिला सुंदरबन से केदारनाथ तक पहुंच गया है। यह नफरत की राजनीति की उपज है।
आजादी के 67 साल बाद सरकार गंगा के लिए अलग मंत्रालय बनाकर इस व्यथा का निदान करने जा रही है। कम से कम सरकारी घोषणाएं तो गंगा का कायाकल्प करने का दावा करती ही हैं। अभी ज्यादा दिन नहीं बीते हैं, उच्चतम न्यायालय में गंगा के मुíे पर सरकार की बड़ी फजीहत हुर्इ थी। भारत सरकार के सामने आज र्इस्ट इंडिया कंपनी की जगह विश्वबैंक मौजूद है। अविरल गंगा और निर्मल गंगा की राह में सबसे बड़ी मुशिकलें वहीं से खड़ी की जाती हैं।
इस आंदोलन में सर्वत्र बेबशी और लाचारी ही विराजमान दिखेगी। आजादी से पहले गंगा की धारा से छेड़-छाड़ नदीघाटी के लोगों को पसंद नहीं था। क्या अब लोग ऐसा पसंद करने लगे हैं? निश्चय ही ऐसा भी नहीं है। पुराने राजवाड़ों से लेकर आमजन तक के रुझान को इन तीन सत्याग्रहियों का हश्र देखकर समझा जा सकता है। फिर भी अलग-अलग जगह लोग आवाजें उठा रहे हैं। लोक सेवक मंडल से जुड़े दीपक मालवीय ने कानपुर में ‘गंगा-एलायंस शुरु किया। यह गंगा के लिए संघर्षरत सभी संगठनों और विचारधाराओं को एकजुट करने का बेहद मुशिकल अभियान है।
आज नदियों की पीड़ा चर्चा में है। इस क्रम में छोटी नदियों का मामला भी ध्यान में रखने योग्य है। कल्पना में भी गंगा की शुद्धता इन सभी को स्वच्छ कर ही संभव होगी। गंगा मंत्रालय के गठन के बाद क्या भविष्य में गंगा स्वच्छ और पवित्र हो सकेगी? ‘गंगा-राइटस आचमन और स्नान के लिए शुद्ध और पवित्र जल की जरुरत को रेखांकित करता है। पर इसके लिए तैयारी का अभाव है। वर्तमान में सरकार और समाज के बीच की कड़ी भी दुरुस्त नहीं है। आज बहुत कुछ ठीक विपरीत ध्रुवों पर खड़ा है। ऐसी दशा में संभव है कि अविरल गंगा और निर्मल गंगा के बदले भविष्य में हर-हर गंगे का ही स्वर सुनार्इ दे।
लेखक सामाजिक कार्यकत्र्ता और स्वतंत्र पत्रकार हैं।
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