बलात्कार विरोधी आंदोलनों का जंतर-मंतर

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कौशल किशोर

राष्ट्रीय राजधानी समेत कुल पांच प्रदेशों में विधानसभा चुनावों की सरगर्मी जोरों पर है। इस बीच गोवा की पुलिस और तरुण तेजपाल सुर्खियों में हैं। पीछे साहेब और माधुरी का लुकाछिपी वाला खेल देशी खबर बाजार में विदेश घूमकर आया था। इस साल तो मध्य प्रदेश के राघवजी भी देशभर में खूब मशहूर हुए। पिछले साल दुनियाभर में मनु सिंघवी छा रहे थे। इन सब के बीच धर्म और न्याय के मंदिर से भी बदहवास चीखें उठीं। सर्वोच्च न्यायालय के कुछ जजों पर आरोप लगे हैं, तो दूसरी ओर संत समाज के प्रतिनिधि स्वर रहे आसाराम जेल में हैं। नारायण साईं पुलिस के लिए वीरप्पन का बाप साबित हो रहा है। इन सब घटोत्कच्च जैसे दानवकाय मामलों के नीचे क्या कुछ दब रहा है? यह अब यक्ष प्रश्न हो चला है।

चुनाव लोकतंत्र का अहम यज्ञ है। आम जनता की राजकाज में सहभागिता सुनिश्चित करने की इस प्रक्रिया में अहम मसलों पर गहराई से विचार करने की पुरानी परंपरा अब खत्म हो रही है। इतिहास-भूगोल से छेड़-छाड़ के अतिरिक्त महिलाओं से बलात्कार के मुद्दे भी चुनावी महौल को रोचक बना रहे हंै। आजकल तरुण तेजपाल ने तहलका मचा रखा है। पूर्व भाजपा अध्यक्ष बंगारु लक्ष्मण के स्टिंग से तहलका शुरु करने वाले तेजपाल के खिलाफ चुल्लूभर पानी में डूब मरने लायक गंभीर आरोप हैं। भाजपा शासित गोवा की पुलिस और तहलका टीम का हिस्सा रही महिला पत्रकार की चुनौती प्रगति पथ पर है। इस बीच महिला उत्पीड़न और पत्रकार के प्रायश्चित पर भी बहस छिड़ी है। भाजपा प्रवक्ता मीनाक्षी लेखी ने छेड़-छाड़ की इस घटना को राज्य के साथ कारित अपराध का दर्जा होने का जिक्र कर शोमा चैधरी और तहलका प्रबंधन की दलील को जबरदस्त चुनौती दी। यहां एक अस्पष्ट सा प्रश्न उठता है, क्या इस तरह की उत्पीड़न का मामला किसी तरह से ‘निगोशिएबल आॅफेंस’ हो सकता है? तेजपाल ने न्यायालय से अग्रिम जमानत की गुजारिश की है। पर इस कवायद में सशक्त आधार के बावजूद मजबूत कारण का अभाव है। आखिरकार यह महिला उत्पीड़न का दूसरा मजबूत पैंतरा जरुर साबित हो सकता है।

राजनीति के जंतर-मंतर पर ढे़र सारे आंदोलन बरसों से जारी हैं। गाय और गंगा को पूजने वाले समाज के पुजारी सतत् सत्याग्रह कर रहे हैं। ढ़ाई साल पहले आंदोलन बाजार में अन्ना का अवतार हुआ था। उन्हीं दिनों दिल्ली का जंतर-मंतर टोपीबाजों से ठसाठस भरा पाया गया था। भ्रष्टाचार के दानव से मुक्ति के लिए आप के युधिष्ठिर की सिविल सोसायटी पूरी लय में आने को मचल रही थी। फिर पिछले साल 16 दिसंबर को हुए गैंगरेप हादसे के बाद देशभर में माहौल गरम होने लगा। महिला सशक्तिकरण अभियान में ऐसी जागरुकता और सक्रियता पहले कभी नहीं देखी गई थी। उस समय भी नहीं जब सन् 2004 में इरोम शर्मिला के नेतृत्व में दर्जनभर मणिपुरी महिलाओं ने सेना मुख्यालय के सामने नग्न होकर प्रदर्शन किया था। दामिनी-दमन कांड की तरह ही उस समय भी जटिल समस्या सरकार के सामने खड़ी हुई थी। सैन्यकर्मियों पर बलात्कार के आरोप थे। महिलाओं ने सरकार और सेना को ललकारा था। देश के पूर्वाेत्तर में रक्षा हेतु समर्पित सेना के जवानों द्वारा ही मर्यादाओं को तार-तार करने का मामला सुर्खियों में था। तो दूसरी ओर राजधानी में फटेहाल जीवन जीने को विवश निम्नवर्गीय युवक दरिंदगी पर उतारु हुए थे। नवीन जागृति अभियान के प्रायः सभी पुरोधा उस वक्त मौन थे। आज भी शर्मिला की वह लड़ाई बदस्तूर जारी है। महिला मामलों के पैरोकारों ने उस मुद्दे से दूरी कायम रखकर अपना ही चरित्र उजागर किया है।

बाजार के पोषण के लिए आंदोलन और बाजारवादी व्यवस्था के विरुद्ध आंदोलन में आकाश-पाताल का फासला है। एक समाज को बाजारु दोषों से भरने के मकसद का प्रतिबिंबन है, तो दूसरा इसके ठीक विपरीत। पर स्वतंत्र भारत के इतिहास में दोनों किस्म के आंदोलनों की भरमार है। अन्ना का लोेकपाल और फेमिनिस्ट आंदोलनों के सापेक्ष प्रो. जी.डी. अग्रवाल का गंगा मुक्ति अभियान और संत गोपाल दास का गौसेवा संघर्ष देश की फि़जां में है, लेकिन दोनों धु्रवों का फर्क गंगापुत्र निगमानंद और हिमलायपुत्री इरोम शर्मिला की गति देखकर बेहतर समझा जा सकता है। बाजार के असर से अन्ना राग के गायन हेतु सितारों की शिरकत होती है, और गंगापुत्र के बलिवेदी पर शहादत के अरमानों के साथ अभिनव पुष्प खिलते हैं। स्वामी सानंद ने निगमानंद की दूसरी शहादत दिवस पर सौ दिनों से भी लंबा अनशन कर इतिहास कायम किया है।

बाजार तमाम हथकंडे अपनाता है। समाज के मौसम का मिजाज बदलने के लिए मसीहा भी पैदा करता है। पर बाजारु रौनक टिकाऊ और मौलिक नहीं होते हैं। उसके मसीहा की बत्ती भी गुल होती रहती है। इसके ठीक विपरीत सत्याग्रह मार्ग का अनुसरण करने वाले ईसा मसीह की तरह सलीबारोहण के पश्चात ही सही मायनों में विकसित होते हैं। सभी आंदोलनकारी गांधीजी की तरह खुशनसीब भी नहीं रहे हैं। अब नाम के बेजा इस्तेमाल की चिंता में ही मंडली के मसीहा रो रहे हैं। इस बीच आम आदमी के नाम पर पार्टी भी बन गई। अरविंद केजरीवाल नेता बन गए। मीडिया दरबार का स्टिंग आॅपरेशन लोगों के इस नए वहम को भी दूर करने को आमादा है। नित नए खुलासों के दौर वहां भी जारी हैं। राजकाज के बाजार में चेहरे पेश करने का अपना वक्त और रिवाज है।

महिला सशक्तिकरण की पूरजोर राजनीति का दौर चरम पर है। आज महिला उत्पीडन के हादसे माहौल गरमा रहे हैं। इन मसलों के बीच मुद्दे और मसाले अपनी जगह पहले से कायम हैं। राजनीति के खेल में गरमी पैदा करने वाले मैग्नीशियम जैसे उत्प्रेरक तत्वों की खोज सदियों पुरानी है। गौर से देखने पर साफ होता है कि गरमी पैदा करने की इस कवायद में वह सब छिपाने की कोशिश हो रही है, जिससे बाजार हतोत्साहित होता हो। राजकाज के युक्ति-मुक्ति में जनांदोलनों का बड़ा महत्व है। राजनीति के इस जंतर-मंतर में बाजार और आंदोलनों की अपनी ही अहमियत है। आज दोनों एक दूसरे के पूरक होते जा रहे हैं। राजनीति के असली खेल का प्लेटफार्म दोनों की मौजूदगी में ही सजता है। जंतर-मंतर पर आंदोलन सजा और आंदोलनों के फिर अपने जंतर-मंतर, लटके-झटके और बाबा-नेता भी सजे। सब मिलकर महिलाओं को वास्तव में शालीन और गरिमामय जीवन से वंचित करने का सुंदर स्वांग रचा है। गतवर्ष महिला उत्पीड़न के विरुद्ध आवाज उठने पर जस्टिस वर्मा कमीशन बनी। आनन-फानन में नया कानून भी आ गया। पर अपराधी निरंकुश ही रहे। दिन-ब-दिन ऐसे अपराधों में वृद्धि ही दर्ज की जा रही है। यदि परिणाम देखकर गुणवत्ता का आंकलन करने का रिवाज है तो लोगों के सामने तस्वीर साफ है। यों तो एक अर्से से देशभर में रेप और महिला उत्पीड़न के न्यूनतम दैनिक आंकड़़े अर्द्धशतक उंचा मुकाम हासिल करते रहे हैं, पर सालभर से इस चीत्कार ने देश को बुरी तरह से हिला रखा है।

स्वराज और सरकार के बीच की खाई विकराल हो रही है। सरकार बाजारवाद को बढ़ावा देने में लगी है। मार्केट और सेक्स का चोली-दामन का रिश्ता है। इसे समझकर ही सरकार यौन मामलों से जुड़े अपराधों को रोकने की कारगर पहल करने को तैयार नहीं है। विज्ञापनों में प्रकाशित ‘भागो भागो साहब आया’ का शोर मचाने से स्त्री मुक्ति की राह आसान नहीं होती है। चैदह साल की कच्ची उम्र में जान गंवाने वाली आरुषि की चीख पांच सालों से गूंजती रही। आखिरकार न्यायालय ने भी इस दोहरे हत्याकांड में माता-पिता को ही दोषी पाया है। अपने चरित्र में संन्निहित नैतिकता के बूते बच्चों को सिखाने में असफल रहे लोगों के समाज में रक्षक और भक्षक के बीच का फासला खत्म होना लाजिमी है। इस अराजकता को दूर करना बहुत मुश्किल काम है। यह मुश्किल घटोत्कच्च के नीचे दबे रणबांकुरों का दुरुस्त पता पाकर ही सुलभ हो सकता है।

(कौशल किशोर ‘द होली गंगा’ पुस्तक के लेखक हैं)
Courtesy: Swaraj Khabar

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