बदलते दौर के रीति-रिवाज

देशभर में त्योहारों का यह सीजन हर्षोल्लास से मनाया गया। वित्तमंत्री ने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में धनतेरस पर हुए व्यापार का व्यौरा देते हुए इसे आर्थिक विकास में हो रही तेजी से जोड़ा था। इन पर्वों पर एक नजर डालने से पांच प्रदेशों के विधानसभा चुनावों के साथ ही 2014 के महासमर की छाप भी साफ दृषिटगोचर होती है। उत्सवों के महोत्सव में चहुंओर धूम मची रही। आतिशबाजी के शोर और धुंए में पर्व-त्योहारों की वास्तविक प्रासंगिकता नैपथ्य में ही सिमटती दिखती। उत्सव की धूम में मसगुल समाज के अधिकांश लोग आयोजनों के मूल उद्धेश्यों से अनभिज्ञ प्रतीत होते हैं।

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दिवाली के साथ मनाये जाने वाले त्योहारों की पूरी श्रृंखला है। परंपरागत रुप से मनाये जाने वाले त्योहारों की आवश्यकता और महत्व आज की नर्इ पीढ़ी की समझ से ओझल हो रही है। भारतीय उपमहाद्वीप में उत्सवों के श्रृजन और समायोजन की पृष्ठभूमि रोचक और आवश्यक रुप से हितकारी रही है। पारंपरिक रुप से कायम पर्व-त्योहारों के साथ भी यह नियम बराबर लागू होता है। देश की आजादी के अभियान में बाल गंगाधर तिलक और मदनमोहन मालवीय का विशेष योगदान रहा। महाराष्ट्र में तिलक ने स्वतंत्रता संघर्ष को मजबूत करने के उíेश्य से ‘गणपति पूजन का श्री गणेश किया था। उसी दौर में गंगापुत्र महामना ने ‘गंगा आरती की शुरुआत कर आम लोगों को गंगा अभियान से जोड़ने का आहवान किया था। संयुक्त प्रांत में र्इस्ट इंडिया कंपनी द्वारा सर प्रोबे काटले की अध्यक्षता में गंगनहर बनाया गया। यह निर्माण कार्य सन 1854 में संपन्न हुआ था। भीमगोडा बैराज से गंगा की अक्षुण्णता नष्ट होती थी। उस दौर में हिन्दुस्तानी समाज ने बि्रटीश सरकार के इस प्रयास का विरोध शुरु किया। तीन साल बाद हुए सिपाही विद्रोह के कर्इ कारणों में यह भी एक था। प्रथम विश्व युद्ध के दिनों में महामना मालवीय ने हिंदु महासभा के मंच से इस मुíे को उठाया। इसी क्रम में उन्होंने हरिद्वार में हर की पौड़ी के सामने गंगा की अविरलता की मांग को लेकर आमरण अनशन शुरु किया। उनका अनशनस्थल आज ‘मालवीय-द्वीप के नाम से जाना जाता है। महामना के समर्थन और सहयोग के लिए रियासतों के राजवाड़े दल-बल के साथ खड़े हुए थे। आज ‘गणपति पूजन और ‘गंगा आरती में लगे श्रद्धालुओं और आम लोगों का हुजूम इन आयोजनों के वास्तविक उद्धेश्यों को भूल चुका है। कमोबेश यही हाल शरदोत्सव से जुड़े दूसरे आयोजनों के साथ भी है। कार्तिक मास की पहली तेरहवीं पर धनतेरस के साथ त्योहारों का सीजन शुरु हो जाता है। समुद्र मंथन से निकले दिव्य चिकित्सक धन्वंतरी की जयन्ती का यह पर्व आज धन-धान्य की अभिवृद्धि का सूचक है। उत्सवों का यह अवसर अमावस का अंधेरा दूर करने के साथ ही दीपों के उत्सव पर तरुणार्इ प्राप्त करता है। इसके बाद के दूज का चांद देखने से पहले दिन में भैयादूज मनाते हैं। यह पर्व भार्इ-चारा और प्रेम का प्रतीक है। कृष्ण पक्ष में आरंभ होने वाले अनुष्ठानों का यह सिलसिला शुक्ल पक्ष की षष्ठी के उपलक्ष्य में मनाये जाने वाले महोत्सव के बाद ही समाप्त होता है। इसके बाद गोपाष्टमी पर पशु-पक्षियों का त्योहार आता। छठ के नाम से विख्यात यह त्योहार चार दिनों का महोत्सव है, जो कार्तिक शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को आरंभ होकर सप्तमी के सूर्योदय के बाद ही समाप्त होता रहा है। लंबे अर्से से ‘छठ मार्इ की अर्चना में लगे साधकों को जानने-समझने के क्रम में यह सुनकर आश्चर्य होता रहा कि सूर्य की आराधना में मार्इ की संज्ञा दिये जाने का क्या प्रयोजन है? विशेष शोध से ज्ञात होता कि इस पर्व का सम्बन्ध सूर्य के माता अदिति की उपासना से है। कार्तिक ­­­शुक्ल षष्ठी तिथि पर माता अदिति का जन्मोत्सव होने के कारण ‘छठ मार्इ नाम से जाना जाता है। शास्त्रीय मान्यता के अनुसार अदिति के बारह पुत्र हैं। जिन्हें आदित्य कहा जाता है। आदिदेव सूर्य भी इन्हीं में से एक हैं। छठ का उत्सव गंगा बेसिन के केन्द्र-स्थल में प्रागैतिहासिक काल से ही मनाया जाता रहा है। सौकोसी नदियों की निर्बाध सर्पिली गति के बीच राम और कृष्ण के कालखंड में भी छठ पूजन का विवरण मिलता है। मिथिलावासी यह त्योहार अंगिका और मगध क्षेत्र के लोगों के साथ मिलकर मनाते रहे हैं। रार्इपेरियन समाज में इस चार दिवसीय उत्सव का सिलसिला नदी और सूर्य के सम्बन्धों को सहेजता रहा। यह आराधना नदी के जल में खड़े होकर किया जाता है। जहां नदी तक पहुंचना मुशिकल हो वहां लोग अन्य जल श्रोत की शरण लेते हैं। उत्सव अस्ताचल सूर्य की उपासना के साथ जवान होता। फिर उगते सूरज को सलाम कर निर्वाण प्राप्त करता है। इस कड़ी में कर्इ छोटे-छोटे रीति-रिवाज हैं। पुरातन काल से इस आराधना से भू, अगिन और जल तत्व की शुद्धता और पवित्रता सुनिशिचत होती रही। इसे वर्षपर्यंत कायम रखने के लिए बाद में चैत्र मास में भी पूजन का रिवाज कायम हुआ। पर अब वह प्रभाव सिमटकर रह गया है। परिणाम सामने हैं। कर्इ समस्याएं मुंह बाए खड़ी हैं। भविष्य में गंभीर अनिष्ट की संभावनाएं बनी हैं। आधुनिक समय में धन्वंतरी पर्व और अदिति आराधना के बीच का शारदोत्सव प्रकृति के संरक्षण और संवद्र्धन की निशानी बनकर रह गयी है। लगातार छत्तीस घंटे के निर्जला व्रत, उसकी तैयारियों और विधि-विधान में आंतरिक और वाहय शुचिता का असाधारण महत्व है। इस अनुष्ठान में लगे साधकों के लिए नियमों का पालन रसायन विज्ञान के प्रयोगशाला के नियमों की तरह ही जटिल और जरुरी है। परंतु जानकारी के अभाव में यह महज कर्मकांड बनकर रह गया है। इस दुस्साध्य साधना में लगे लोगों को इन प्रयोजनों के वास्तविक उद्धेश्यों को समझने का प्रयास करना चाहिए। ज्ञान के अभाव में उपजी परिसिथति कठोर व्रत का पालन करने वाले साधकों को भी हठयोगी की श्रेणी में ही खड़ा करेगी। हम सब नए युग के लोग हैं। गोपाष्टमी पर गाय और गोपाल तो क्या, हम गोपाल दास को भी याद नहीं करते। पीछे हमने गंगादशहरा पर ही कौन से गंगापुत्र के बलिदान को याद किया था। छोड़ो महामना और महात्मा की बातें। करपात्री और निगमानंद जैसों को भी क्या अब कोर्इ याद करता है। शरदोत्सव के समापन का पूर्ण चंद्र सामा और चकेबा की विदार्इ का अवसर होता। इस दौरान गीत-संगीत साथ चलता है। छठ के बाद स्वर लहरी सामा और चकेबा को आमंत्रित करती। दिवाली की अमावस पर शुरु होने वाली लौ कर्इ रुप लेती है। इन पर्व-त्योहारों के बीच हर साल पटाका फैक्ट्री में आग से मरने की खबरें आती। बारुद जलता है दानव की भांति। यह बरसों से उत्सव में प्रदूषण का कारण है। प्रदूषण के इस दानव से मुकित आसान भी नहीं है। इसकी जड़ें उन्नीसवीं सदी में डायनामाइट का बाजार खड़ा होने के बाद साफ मिलती है। दूसरे विश्व युद्ध के बाद भारतीय बाजार में इसके निशाने पर शरदोत्सव ही रहे। यह उत्सव महात्मा और महामना जैसे पुराधाओं की मिसाल के साथ बिनोवा के युग में मनाया जाता रहा। उस दौर में शोर-शराबे का ताम-झाम कम ही था। गांधीजी की कर्इ सभाओं मेें ध्वनि विस्तारक उपकरण उपलब्ध भी नहीं थे। अब युग नया है। और बात है। उत्सव के आनंद की बेला होती। मौज-मस्ती का माहौल होता। इस बीच पर्यावरण की अपूरणीय क्षति होती है। जलवायु को ऐसे बदलने का उपक्रम करना ठीक नहीं है। समाज के साथ ही नेतृत्वकारी शकितयों को भी इस मामले में सचेत होने की जरुरत है। वक्त रहते नेपथ्य में सिथत महत्वपूर्ण तत्वों को मंच पर अनुकूल स्थान मिलना चाहिए। यदि ऐसा नहीं होता तो भारतीय सांस्कृतिक विरासत का हाल भी इरान, मिश्र और रोम जैसा ही होगा। गंगापुत्रों के बलिदान का व्यर्थ जाना दुर्भाग्यपूर्ण होगा। पीछे गौ भकित में लीन संत गोपाल दास का क्या बुरा हाल रहा। गंगापुत्र सानंद तड़पते रहे हैं। आज जरुरत है अपनी खुशियों के बीच दूसरे कराहते जीवों को सुनने और समझने की। इन उत्सवों से जुड़े प्रसंगों में लोक-कला का अनूठा संगम है। युगों-युगों से कायम लोक-परंपरा के उत्सवों और पहचान चिन्हों के महत्व को अनदेखी करना कदापि उचित नहीं। इनके वैज्ञानिक महत्व पर गहन चिंतन की जरुरत है। बेहतर भविष्य की राह इन्हीं मार्गों के अवलंबन से निकलती है। कौशल किशोर ‘द होली गंगा पुस्तक के लेखक हैं।

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