दिल्ली में प्याज के आंसू व हर्ष की राजनीति

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कौशल किशोर
भाजपा ने हर्षवर्धन को दिल्ली के मुख्यमंत्री पद का दावेदार पेश किया है। यह अरविंद केजरीवाल के बेईमान बनाम इमानदार की जंग में बड़ी चुनौती है। आजकल नागनाथ और सांपनाथ की राजनीति का युग है। इसमें राजनाथ और दीनानाथ जैसे खिलाड़ी होते जरुर हैं। मोदी की पार्टी ने केजरीवाल के खिलाफ दिल्ली के दीनानाथ की घोषणा अच्छी मस्सकत के बाद की है। इसी बीच डाक्टर हर्षवर्धन की तुलना आप नेता ने मनमोहन सिंह से कर चुटकी भी लिया। अब मुकाबला प्याज के दाम और हर्षवर्धन के इमान के बीच है।
देश में गांधी बनाम मोदी का जंग छिड़ा है। बड़ी समस्या है कि इस जंग में असली मुद्दे गुम हो रहे हैं। प्याज अपनी जगह कायम है। लोगों ने इसकी मोटी कीमत अदाकर खास राजनैतिक दलों के चुनाव खर्च का इंतजाम कर ही दिया है। दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले बहुपक्षीय आक्रमण की राजनीति रंग में है। प्याज के व्यापार के बाद खौफ के साम्राज्य की बारी आती है। नृशंस अपराधों से दहली दिल्ली में वह कमी भी पुरी हो जाती है। राजनैतिक दलों ने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में अपराधों के बाद प्याज का धंधा शुरु किया था। इस बार एकदम जुदा अंदाज में। गांधीटोपी पर इबारतें लिखकर प्याज बेचने की राजनीति रमणीक होती है।
जमाखोरी में लगे पूंजी के खिलाडि़यों के खेल में मोड़ आया। सरकारी रिपोर्ट में भी प्याज के जमाखोरी की बात आइ। पूर्वी दिल्ली से आधे दर्जन लोगों की गलारेत कर हत्या की भी खबरें थी। ऐसी बातें देश के कइ कोने से आती रही हैं। पीछे उत्तर प्रदेश में चडडी-बनियान गैंग की र्कायशैली कुछ ऐसी ही थी। लोगों की गला रेत कर हत्या का सनसनीखेज मामला राजधानी की फिजां में गूंजती है। फिर माहौल बनता है। गैंग अपना काम करता है और पुलिस अपना। राजनैतिक अर्थशास्त्र के इस गणित में लक्षणों को देखकर इलाज का विधान नहीं है। सबूतों की मौजूदगी खोजने की वकालत के बाद न्याय की देवी द्वार खोलती है।
आजादी के बाद पैंसठ सालों में भय और बाजार ने मतदाताओं को प्रभावित करने में अहम भूमिका निभाई है। प्याज के बढ़ते भाव के बाद भय कायम करने वालों की उपयोगिता शेष रह गयी थी। बाजार और सत्ता के समीकरण का नियंत्रण भयाक्रांत करने वाले अपराधी तत्वों के सौजन्य से ही होता है। पूर्वी दिल्ली जैसी घटनाओं से वह कमी पूरी हो जाती है।
बाजारवाद की चीख के सामने देश की राजधानी का मध्यम वर्ग दम तोड़ने को विवश है। अभाव से जूझती नई पीढ़ी के नौजवानों की क्रयक्षमता का विकास अपराधीकरण का सबब बन रहा है। भारतीय सामाजिक व्यवस्था में यह बाजारु परिवर्तन भावी अनिष्ट का सूचक है। चुनाव का समय नजदीक आने पर समीकरण सेट करने का सिलसिला और तेज हो जाता है। सत्ता हस्तांतरण के पीछे यही दस्तूर तय हुआ था। आजाद भारत का सृजन इन्हीं नीतियों के आधार पर होने से ही तो आर्थिक विकास की संभावना बनती थी। आज दिल्ली के कई इलाके में पुलिस की गाडि़यों से निकलती चेतावनी की नसीहतें सुनकर चौंकना स्वभाविक प्रतिक्रिया हो गइ है। गलारेतक गैंग राजनैतिक अर्थशास्त्र की नई फसल तो नहीं है। इस जमाखोरी के बाजारवाद की कई रंगीन व्याख्या होती रही है। प्याज का संकट भी नया नहीं है। प्याज की मार खाकर भाजपा पहले भी सरकार गंवा चुकी। पूर्वी दिल्ली में मारे गये लोग इन हादसों का पहला शिकार भी नहीं हैं। कड़कड़डुमा कोर्ट रोड पर लोगों ने पांच घंटे का चक्काजाम कर विरोध भी किया था। अब भी कुछ शेष बचता है, क्या?
विरोध के कई तरीके आजाद भारत में दिखते हैं। इनमें से कुछ तो एकदम नवीन हैं। आखिर तकनीकि संपन्नता का युग ठहरा! राजनीति के पक्के खिलाडि़यों के असली नुमाइंदे मैदान में सत्याग्रह के बदले दुराग्रह पर उतारु होते हैं। तभी फैलिन जैसा चक्रवात भी मददगार साबित होता है। राजनैतिक और आर्थिक लाभ की दृष्टि ही आधुनिक दूरदर्शिता है। गांधी के देश में गांधी को नोटछाप बनाकर सम्मानित करने का प्रचलन है। अब गांधीवादी सत्याग्रही तरीके से विरोध करने वालों का हश्र बुरा होता है। सामने इसके अनूठे उदाहरण मौजूद हैं। पर्यावरण वैज्ञानिक जी.डी. अग्रवाल (स्वामी सानंद) गंगा-गंगा करने को अभिशप्त हैं। गौ माता की जाप में लगे संत गोपाल दास गंगालाभ की कगार पर हैं। गंगापुत्र की आत्मा दोनों ही विभूतियों का बाट जोह रही होगी। अवसरवाद का वक्त है! चंद्रबाबू नायडू और जगन ने तेलांगना मुद्दे पर सत्याग्रहियों की जमात का परिचय दुहराकर फिर साबित किया है। पर मोर्चे पर प्याज की कीमत के विरुद्ध कोइ  अभियान खास कारगर नहीं हो सका।
अब भाजपा ने मुख्यमंत्री की घोषणा कर हर्षवर्धन को पेश किया है। क्या महानगर के लोग अपराध, महंगाइ और जमाखोरी जैसे आफतों से राहत पा सकेगें? अपराध से मालामाल होती पुलिस और मजबूत होती सियासत बंद होगी। वैसे नियामतों पर हक तो उन्हीं गलारेतू बीरों का है। और अंधेरी रात का फायदा उठाने वालों की राजनीति है। देश की भुल्लकड़ जनता तो तीसरे दिन पिछली बात भूल ही जाती है। घोड़े वाला चश्मा पहनाने में महारत प्राप्त कर चुकी संस्थानों की फौज खड़ी करने के बावजूद इतना न हो तो डूब मरने वाली बात होगी। खैर! भाजपा को दिल्ली का मुख्यमंत्री चुनने में लगा वक्त कइ बातें जाहिर करता है। वैसे पार्टी की प्रदेश इकाई में हर्षवर्धन के मुकाबले कम ही लोग ईमान और धर्म के मामले में भी दमदार हैं।
कौशल किशोर ‘द होली गंगा’ पुस्तक के लेखक हैं।
Swaraj 25Oct13
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