भीड़-भगदड़ और हिंसा की राजनीति

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कौशल किशोर [23 अक्टूबर 2013]
मध्य प्रदेश में दशहरा के मेले पर भीड़ और भगदड़ में सौ से ज्यादा लोगों के मरने की खबरें थी। पीछे जाटों और मुस्लिमों के बीच हिंसा से देश दहल उठा था। साल के आरंभ में प्रयाग कुंभ से मौनी अमावस्या पर हादसों की खबर थी। देश में माहौल गमगीन शुरु हुआ। बाद में हिंसा की राजनीति ने देश में मुश्किल हालात पैदा किये हैं।

इलाहाबाद जंक्शन पर मची भगदड़ में 35 से ज्यादा लोग मारे गए थे। साथ ही कुंभनगर में मची भगदड़ में दो लोगों की जान गयी थी। पुलिस बल द्वारा लाठी चार्ज करने की घटना और रेल्वे स्टेशन पर पुल की रेलिंग टूटने से मची भगदड़ को हादसा से जोड़कर देखा जा रहा था। कुंभ कमिटी के अध्यक्ष आजम खान ने दुर्घटना से आहत होकर त्याग पत्र का एलान कर दिया था। प्रदेश सरकार के नगर विकास मंत्री के इस कदम से राजनीतिक गहमागमी तेज हो गयी। मकर संक्रान्ति और बसंत पंचमी के बीच मौनी अमावस्या का शाहीस्नान प्रयाग कुंभ पर्व का अतिमहत्वपूर्ण अवसर होता है। इस अवसर पर गंगास्नान हेतु देश-दुनिया के श्रद्धालुओं की सबसे बड़ी भीड़ यहां जुटती है। मेला प्रशासन ने करीब तीन करोड़ लोगों के त्रिवेणी संगम पर एकत्रित होने का अनुमान किया था। इसकी व्यस्था में एक अर्से से अहम तैयारियां भी होती रही। फिर भी मुख्य स्नान पर्व पर गंभीर हादसा होता है। यह व्यवस्था की कमी को उजागर करता है। साथ ही कई ओर ईशारा भी करता है। फिर मध्य प्रदेश में नवरात्रों के मेले में पांच लाख लोगों की व्यवस्था में सौ से ज्यादा लोग मारे गए थे। राज्य सरकार की अपनी पार्टी ने इतने ही लोगों की भीड़ का आयोजन किया था। क्या खूब चाक-चैबंद थी। राजनीतिक आयोजनों और आम लागों के मेलों में फर्क साफ दिखता है। लोगों के मरने से सरकार की सेहत पर कोई खास फर्क नहीं पड़ता है।

पिछले कई ऐसे आयोजनों में ज्यादा दुघर्टनाएं भीड़ और भगदड़ की वजह से ही हुई। भारत मेें प्रायः इस तरह की घटना में मरनेवाले लोगों की सही जानकारी विवाद की बात होती। विभिन्न एजेंसियां भिन्न आंकड़े पेश करती है। कुम्भ के अमृतकाल में मौत के विषय में कई तरह की बातें उठी। तटिय हिस्सों में फैलिन तुफान से मुक्ति को व्यग्र होती है जनता। तो मध्य भारत में प्रशासनिक अक्षमता के कारण मेले में लोगों को जान गंवानी पड़ती है।

प्रयाग महाकुंभ के इतिहास में पहले से कई ऐसे हादसे दर्ज थे। वही हाल क्षेत्रिय मेलों का भी रहा है। बड़ी-छोटी व्यवस्था की खामियां पूर्व में भी उजागर होती रही हैं। आजादी के बाद भारतीय गणतंत्र का पहला प्रयाग कुम्भ 500 से ज्यादा लोगों के मारे जाने के करण याद किया जाता। 1954 के हादसे में तीर्थयात्रियों को शाही सवारों ने हाथी-घोड़ों से रौंदा था। इसके बाद 1986 के हरिद्वार कुम्भ में पुल टूटने से हुई दुर्घटना में अनेक यात्री मारे गए। पिछले हरिद्वार कुंभ में मध्य अप्रैल 2010 के मुख्य शाही स्नान पर कई तीर्थयात्री मारे गए थे। इसी तरह भीड़ और भगदड़ के बीच वह हादसा भी हुआ था।

2010 में अखड़ा के एक महामण्डलेश्वर की कार के नीचे बुढि़या और बच्चा के दब जाने से भगदड़ मची। मेले से भीड़ छटने के बाद करीब 40-50 और लाशें बरामद होने की खबरें आई। इस तरह की घटना में जमा लोगों की भी जिम्मेदारी बनती है। श्रद्धालुओं और तीर्थयात्रियों की बड़ी भीड़ में भगदड़ मचना खतरनाक होता है। कई लोगों की जानें जाती हैं। अमूमन बच्चे और बूढ़े दब-कुचल कर जान गवां बैठते हैं। पिछले धमिक आयोजनों में इस तरह के हादसों का इतिहास है। फिर भी इसे रोकने का कोई ठोस प्रयास नहीं किया गया है। बीते इतिहास और वर्तमान में हिंसक वारदातों की छाप साफ अंकित है। आस्था और धर्म की राजनीति में गोधरा जैसा कांड ही पनपता है। हाल में उत्तर प्रदेश की जातिय हिंसा तटिय प्रदेश में फैलिन का कोप और उसी समय मध्य प्रदेश में मेले में भगदड़ राजनीति क्या कुछ अंदेशा व्यक्त करती है। अब समय आ गया है कि सरकार स्थानीय समुदाय के साथ मिलकर इस तरह के हादसे रोकने की कारगर पहल  करे।

Courtsy: Swaraj Khabar

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