गलाकाट राजनीति के बीच गलाकाट हिंसा

(कौशल किशोर) दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले द्विपक्षीय आक्रमण की राजनीति रंग दिखाने लगी है। प्याज के व्यापार के बाद खौफ के साम्राज्य की ही बारी आती है। हाल में तमाम राजनैतिक दलों ने राष्ट्रीय राजधानी में प्याज का धंधा शुरु किया। जमाखोरी में लगे पूंजी के खिलाडि़यों के इस खेल में यह नया मोड़ है। पूर्वी दिल्ली के विवेक विहार और लक्ष्मी नगर इलाके से आधे दर्जन लोगों की गलारेत कर हत्या की खबरें आ रही है। रविवार की रात लक्ष्मी नगर के एक फ्लैट से पचासीवर्षीय बुजुर्ग महिला रमापति और उनकी पचपनवर्षीय बेटी रजनी ठाकुर की लाशें बरामद हुई। फिर सोमवार की शाम बजरंगलाल बोकाडि़या के साथ उनके ड्राइवर और दो घरेलू सहायकों की लाशें विवेक विहार स्थित घर के बेडरुम से बरामद हुई है। हम तो डर ही गये।
दो ही दिनों में आधे दर्जन लोगों की गला रेत कर हत्या का सनसनीखेज मामला राजधानी की फिजां में गूंज रहा है। गैंग अपना काम करता है और पुलिस अपना। पर राजनैतिक अर्थशास्त्र का यह गणित लक्षणों को देखकर इलाज के बदले सबूतों की मौजूदगी खोजने की वकालत करती है। आजादी के बाद पैंसठ सालों में भय और बाजार ने मतदाताओं को प्रभावित करने में अहम भूमिका निभाई है। प्याज के बढ़ते भाव के बाद भय कायम करने वालों की उपयोगिता शेष रह गयी थी। बाजार और सत्ता के समीकरण का नियंत्रण भयाक्रांत करने वाले अपराधी तत्वों के सौजन्य से ही होता है। पूर्वी दिल्ली की घटना से वह कमी पूरी हो रही है।
बाजारवाद की चीख के सामने देश की राजधानी का मध्यम वर्ग दम तोड़ने को विवश है। अभाव से जूझती नई पीढ़ी के नौजवानों की क्रयक्षमता का विकास अपराधीकरण का सबब बन रहा है। भारतीय सामाजिक व्यवस्था में यह बाजारु परिवर्तन भावी अनिष्ट का सूचक है। चुनाव का समय नजदीक आने पर समीकरण सेट करने का सिलसिला और तेज हो जाता है। सत्ता हस्तांतरण के पीछे यही दस्तूर तय हुआ था। आजाद भारत का सृजन इन्हीं नीतियों के आधार पर होने से ही तो आर्थिक विकास की संभावना बनती थी। पिछले कुछ दिनों से दिल्ली के कई पॉश इलाके में पुलिस की गाडि़यां से निकलती चेतावनी की नसीहतें सुनकर आशंका खड़ी हुई थी। उत्तर प्रदेश में चड्डी-बनियान गैंग की कार्यशैली कुछ खास जुदा नहीं थी। दिल्ली का गलारेतक गैंग राजनैतिक अर्थशास्त्र की नई फसल तो नहीं ही है। जमाखोरी के बाजारवाद की कई रंगीन व्याख्या होती रही है। प्याज का संकट नया नहीं है। और पूर्वी दिल्ली में मारे गये लोग इस तरह के हादसों का पहला शिकार भी नहीं है। कड़कड़डुमा कोर्ट रोड पर लोगों ने पांच घंटे का चक्काजाम कर विरोध किया है।
विरोध के कई तरीके आजाद भारत में दिखाई देते हैं। इनमें से कुछ तो एकदम नवीन भी हैं। आखिर तकनीकि संपन्नता का युग ठहरा! राजनीति के पक्के खिलाडि़यों के असली नुमाइंदे मैदान में सत्याग्रह के बदले दुराग्रह पर ही उतारु होते हैं। राजनैतिक और आर्थिक लाभ की दृष्टि ही आधुनिक दूरदर्शिता है। गांधी के देश में गांधी को नोटछाप बनाकर सम्मानित करने का प्रचलन हो चला है। गांधीवादी सत्याग्रही तरीके से विरोध करने वालों का हश्र बुरा ही होता है। सामने ही इसके अनूठे उदाहरण मौजूद हैं। आज महान पर्यावरण वैज्ञानिक प्रो. जी.डी. अग्रवाल (स्वामी सानंद) गंगा-गंगा कर रहे हैं। गौ माता की जाप में लगे संत गोपाल दास मरने की कगार पर हैं। निगमानंद की आत्मा दोनों ही विभूतियों का बाट जोह रही है।
राष्ट्रीय राजधानी में पुराने हिंसक गैंग का नवोदय हुआ है। दो रातों से भला हो रहा है दिल्ली के गलाकाट गैंग का! निशाने और भी हैं और रातें भी। अब तो इन्हीं की असीम अनुकंपा से मालामाल होगी पुलिस और मजबूत होगी सियासत। आखिर नियामतों पर हक तो उन्हीं गलारेतू बीरों का बनता है, जिन्हें अंधेरी रात का फायदा उठाना आता हो। देश की भुल्लकड़ जनता तो तीसरे दिन पिछली बात भूल ही जाती है। अब घोड़े वाला चश्मा पहनाने में महारत प्राप्त कर चुकी संस्थानों की फौज खड़ी करने के बावजूद इतना भी न हो तो चुल्लू भर दारु में डूब मरने वाली बात ही होगी।
कौशल किशोर ‘द होली गंगा’ पुस्तक के लेखक हैं।
Courtesy: Swaraj Khabar
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