गंगा का श्रृंगार

गिरीश का जन्म इमरजेंसी के दौरान डीएमसीएच में हुआ था। वह बचपन से अनुशासनप्रिय और गंभीर था। उसके पिता सिंचाइ विभाग में अभियंता थे और दादा सूर्यनारायण स्वतंत्रता सेनानी। तरुणवय में उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया था। वह मिथिला में केवटी क्षेत्र के गौरव थे। निकट के गांवों से जरुरतमंद लोग मदद की आशा लेकर बराबर पहुंचते। वह भी पूरी कोशिश करते कि गम के मारे इंसानों की आश व्यर्थ न जाए। दादा से गिरीश को विरासत में तीक्ष्ण बुद्धिदृढ़ निश्चय और अदम्य साहस मिला था।

      तीन भाइ-बहनों में सबसे छोटा गिरीश दादी के खूब करीब था। आशीष सबसे बड़ा था। उनकी एक बहन थीकंचन। बचपन में गिरीश को दादी की कहानियां प्रिय थीं। उनकी कथाएं भागिरथी से शुरु होकर गंगा में विलीन हो जाती। इन संवादों के बीच संवरते जीवन के त्रिपथगामिनी की भांति ही अनंत श्रोत थे। जयकाली देवी भी नदियों की कथाओं को परियों और देवदूतों की गाथा से भी कहीं बेहतर चित्रित करतीं। पति की सेवा के बाद जो समय बचता वह बच्चों को समर्पित था।

      कमला सातों बहनों से गिरीश बचपन में परिचित हो गया था। गांव के पूर्वी सीमा पर कमलानदी की एक धार बहती थी। बरसात के दिनों में इसमें खूब पानी बहता। पर लीनसीजन में धूल उड़ती। दादी बताती कि उनके बचपन में ‘लीनसीजन में भी नदी करीब सत्तर-अस्सी फीट चौड़ी और पंद्रह-बीस फीट गहरी होती। सदानीरा सरिता में विभिन्न प्रकार के जलयान थे। एकदा नौकायन का जिक्र कर उन्होंने कहा कि क्षेत्रिय व्यापारी यातायात हेतु नदी का प्रयोग करते। सौकोसी की छोटी धारा हृषिकेशी में समाकर कोलकाता और ढ़ाका तक का जलमार्ग सुगम करती। मिथिला के पानफल और सब्जियों के काश्तकारों के घरों में शुभ-लाभ वाले व्यापारी भी होते। वह बाजार की मांग पूरी करने हेतु इन नगरों में अपना उत्पाद बेचते थे।

      नौकाविहार प्रसंग बालहठ का कारण बना। बालक गिरीश ने जिद ठान ली तो दादी ने उसकी मंशा पूरी करने को आश्वस्त किया। वह मुस्कुराकर बोलीहम कल चलेंगें’। अगले दिन सूर्य-ग्रहण था। गिरीश समझ न सका कि ग्रहणस्नान को प्रेरित करने के उद्धेश्य से यह प्रसंग छिड़ा था। वर्षों पहले उन्होंने गिरीश को त्रिमुहानी की कथा सुनाइ थी। नदी के तीन मुखों का व्यौरा समझने में उसने भी दिलचस्पी ली थी। अगले दिन वह दादा-दादी और कंचन के साथ त्रिमुहानी पहुंचकर नौकायन के बीच नदी के मुहानें खोजता रहा। गंगा की यह सहायक नदी मिथिलावासियों द्वारा विशेष रुप से पूजित थी। सदियों से समाज के हर वर्ग और जाति के लोगों के निर्विवाद समायोजन की प्रतीक रही कमला साफ और सुंदर थी। गिरीश के दिलो-दिमाग पर इसकी आकृति बरबस खिंच गयी।

      गिरीश के पिता का स्थानांतरण अगले साल अचानक ही हुआ। वह पटना जा रहे थे। यह जानकर गिरीश को खुशी का ठिकाना न रहा। उन दिनों आशीष पटना में ही इंजिनियरिंग की तैयारी करताघर से दूर होने पर परिवार के लोग चिंता करते। परंतु इस ट्रांसफर से सभी खुश थे। अब उन्हें आशा हुइ कि आशीष फिर माता-पिता के साथ रह सकेगा। पर गिरीश की खुशी की वजह कुछ और ही थी। वह गंगातट पर रहने की कल्पना में खो गया। पाटलिपुत्र की महिमा रातभर उसके मन में कौंधती रही। पटना पहुंचने पर सब्जीबाग में किराये का एक मकान परिवार का आसियाना बना। गिरीश का दाखिला नजदीक ही सेंट जोसफ कान्वेंट में हो गया। हाइस्कूल में पहले ही दिन शशि और सानू से उसकी दोस्ती हुइ। दीर्घकाय शशि वर्षों में कक्षा उत्तीर्ण करता। उसने गिरीश को छंदगामिनी का श्रृंगार दिखाने की बात कहकर चौंका दिया था।

      शाम को सानू और शशि उसके घर पहुंचे। गिरीश की मां कल्पना झा ने दरवाजा खोला था। वह उन्हें गिरीश के कक्ष में ले गयीं। उनकी उपस्थिति से अनजान वह तन्मयता से तबला बजाता रहा। थोड़ी देर खड़ी रहने के बाद मां ने पुकारा। सानू ने उन्हें रोकने की कोशिश की पर तबतक देर हो चुकी थी। तत्क्षण गिरीश के हाथ थम गये और वह उठकर उनकी ओर बढ़ा। उसकी आंखों में मां ने दोस्तों के साथ छंदगामिनी पहुंचने की व्याकुलता को पढ़ लिया था। 

      करीब ही नदी बह रह रही थी। शीघ्र ही तीनों दोस्त जंगमतीरे परिभ्रमण कर रहे थे। चलते-चलते सानू चंपा के पेड़ के पास पहुंचकर ठहर गया। उसे वहां बैठकर जलधारा को निहारना अच्छा लगता। ऐसा करने से थकान भी मिट जाती थी। डालों पर खूब सुंदर पीले फूल खिले थे। चहुंओर खुशबू फैल रही थी। गिरीश वहीं बैठ गया। शशि और सानू भी उसके दाएं-बाएं बैठ लिये। शशि ने गिरीश की ओर गौर से देखा। उसकी आंखें दूर तक फैली नदी की धारा पर पर निश्चल भाव से टिकी थी। शशि को ऐसा लगा जैसे कोइ सिद्ध योगी समाधि में पहुंच गया हो। वह गिरीश से आपबीती सुनाने को लालायित था। परंतु कुछ भी कहने का साहस नहीं जुटा पाया। थोड़ी देर बाद कुछ विचार कर उसने सानू से बात आरंभ की। उसने कहा, ‘याद है सानू जब तुमने मुझे पहली बार छंदगामिनी का श्रृंगार दिखाने की बात कही तो मैंने सोचा किसी मदिराक्षी के दर्शन प्राप्त होंगे’।

      ‘फिर तो यहां आकर तुम्हें बड़ी निराशा हाथ लगी होगी’। सानू ने झट से कहा। नहीं! बिल्कुल नहीं। ऐसी तृपित किसी मृगनयनी के श्रृंगार में नहीं। पर गिरीश की हालत तो एकदम भिन्न है। देखकर तो ऐसा लगता जैसे इसे पहले से ही सबकुछ पता हो’। शशि बोला।

      ‘क्या पता है? गिरीश ने प्रश्न किया।

      ‘तुम्हें तो छंद और छंदगामिनी दोनों का ही ज्ञान है। ऐसा बुद्धू मैं ही निकला। उस दिन ये सानू कैसे मुझपर हंस रहा था। फिर इसने मुझे गंगा का श्रृंगार देखने की विधि सिखाया’।

      ‘और वह क्या थी?

      ‘तुम्हें तो वह भी पता ही होगा। इसने कहा था कि शांत चित्त होकर मां से श्रृंगार दिखाने का आग्रह करो और अपनी दृष्टी लहरों पर  केन्द्रित रखो तो तुम्हें अदभुद नजारा दिखेगा। शशि कहकर चुपचाप तरंगों की ओर देखने लगा।

      कलकल बहती नदी की तरंगें छंदों में गा रही थी। गिरीश को तबले की थाप जल की सतह पर खेलती दीखी। उसके लिए वह कर्णप्रिय संगीत और लहरों से उठता समीर किसी अतिन्द्रीय आकर्षण से कम नहीं था। वह सृष्टी के रहस्यों की गहराइ में खोता गया। इस बीच बरबस बुदबुदाहट सी उसके मुंह से निकली। पर वह नदी में घडि़याल के उछलने की तेज आवाज में दब गइ। तभी उन्हें जल की सतह पर एक विशालकाय जीव दिखायी दिया। किंतु यह घडि़याल नहींसूंस था। गंगानदी में दीखने के कारण इसे रिवर डॉल्फिन’ कहते हैं।

      सानू बचपन से ही नदीतट पर खेलने आता। पर इतने करीब से उसने सूंस नहीं देखा था। अचानक उसके मन में प्रोफेसर वर्मा का चित्र कौंध गया। वह पर्यावरणविद थेजो स्कूल में उसी दिन विशेष लेक्चर देने आए थे। वह कुछ आगे बढ़ता कि तपाक से शशि बोल पड़ा अरे यह वही विशाल सूंस हैअखबार में जिसकी फोटो छपी थी। इसने पिछले हफ्ते शरारती सुषमा की नाव पलट दी थी’। उसे चुप कराते हुए सानू बोला, ‘हां मोटा-ताजा तो है। पर यह वह नहीं है। तुम भी व्यर्थ में लड़कियों की कहानियों में उलझे रहते हो’।

      मां की गोद में चहकते शिशु की तरह सूंस जल में खेलता रहा। इस बीच मंत्रमुग्ध गिरीश उसे निहारता रहा। उसे जलीय श्रृष्टी बोधगम्य होने लगी। शाम ढल रही थी। सूर्य अस्त हो चला था। घर लौटना भी जरुरी था। अंधेरा होने पर मां को चिंता होती। यह सोचकर गिरीश घर की ओर लौटा। रास्ते में तीनों गंगा के इस श्रृंगार के बारे में बातें करते रहे। अलविदा कहने से पूर्व उन्होंने अगली शाम पुन: वहीं मिलने का वादा किया।

कौशल किशोर द होली गंगा पुस्तक के लेखक हैं।

First-Published-Story

The story was published in largest circulation Hindi Daily Jagran on July 1, 2013.It can be downloaded from the  following link:

http://epaper.jagran.com/epaperimages/01072013/delhi/30del-pg11-0.pdf

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