नदीघाटी माफिया सभ्यता का सरकारी सरोकार

(कौशल किशोर) भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल के रातोंरात निलंबन से उपजा विवाद सुरसा की तरह फैल रहा है। उत्तर प्रदेश की सरकार के इस फैसले का विरोध चहुंओर हो रहा है। केंद्र और राज्य की सरकारें आमने-सामने है। देवबंदी मुस्लिम उलेमा से लेकर इसी समुदाय के दूसरे संगठन भी सच्चाई का साथ देने मैदान में उतरने लगे हैं। इस गहराती समस्या की मुख्य वजह प्रदेश सरकार की झूठ ही है। यह ऐसा संगीन झूठ है, जिसके बाद अपराधों का सृजन होता है। इस प्रकरण में सूबे की राजनीति नैतिकता की सारी हदें पार करती जा रही है।

राज्य की सरकार दावा करती आ रही है कि इस निलंबन का खनन के कारोबार से कोई संबंध नहीं है। उपजिलाधिकारी पद पर तैनात इस महिला अधिकारी पर गौतमबुद्ध नगर के कादलपुर में निर्माणाधीन (अवैध) मसजिद की दीवार तुड़वाकर सांप्रदायिक दंगों की नौबत खड़ी करने का आरोप है। यहां दो बातें साफ हैं। नोएडा में अवैध खनन के विरुद्ध प्रशासनिक कार्यवाही के लिए दुर्गा पहले से ही चर्चा में थी। दूसरी ओर चर्चाओं में प्रदेश की सरकार भी मुस्लिम समुदाय को तुष्ट करने के लिए रही है। समुदाय विशेष के तुष्टिकरण की समाजवादी चर्चा के सामने यह मसला अब भी राई बराबर ही है। इस मसले पर जिलाधकारी की रिपोर्ट में कहा गया है कि दीवार को गांव वालों ने ही तोड़ा, दुर्गा ने नहीं। यदि सूबे की सरकार को तथाकथित आरोप पर भरोसा होता तो मौके पर दुर्गा के साथ कार्यवाही में लगे पुलिस अधिकारी पर पहली गाज गिरती। चूंकि यह सब कुछ जिलाधिकारी के आदेश पर किया गया था तो वास्तविक जिम्मेदारी भी उन्हीं की होती है। परंतु इन दोनों अधिकारियों के साथ अब तक ऐसा कुछ नहीं हुआ। अलबत्ता आनन-फानन में देर रात निलंबन आदेश भेज कर 41 मिनट में ही सारी कार्यवाही सुनिश्चित कर ली गयी। ऐसी हालत में सूबे की सरकार कठघरे में खड़ी तो होती ही है।

दुर्गा शक्ति नागपाल का मामला यहीं नहीं ठहरता है। खनन माफिया के साथ भू माफिया के खिलाफ की गई कार्यवाही भी सामने आती है। राजनीतिक दलों के साथ सुगबुगाहट दूसरे क्षेत्रों में भी दिखती है। यह स्वभाविक लोकतांत्रिक प्रतिक्रिया है। स्थानीय सामाजिक और राजनैतिक कार्यकत्ताओं से लेकर केंद्र सरकार तक सूबे की सरकार के इस निर्णय का विरोध करने लगी है। साथ ही ठीक मौके पर संरक्षण प्राप्त गुंडे भी सक्रिय हो जाते हैं। अवैध खनन की शिकायत करने वाले किसान की दिन-दहाडे़ हत्या होती है। इसी क्षेत्र के रायपुर गांव के निवासी पालेराम चैहान पिछले चार वर्षों से खनन का विरोध कर रहे थे। गंगा बेसिन में खनन के विरुद्ध संघर्ष में दो वर्ष पूर्व गंगापुत्र निगमानंद को भी जान गंवानी पड़ी थी। इनके अतिरिक्त खनन कार्यों में लगे डंपर और अन्य वाहनों द्वारा कुचले गये आम लोगों की लंबी फेहरिस्त है। पर सूबे की सरकार के पास इसका कोई स्पष्ट व्यौरा नहीं है।

खनन माफियाओं की सांठगांठ सरकार में सतत बढ़ती रही है। आज सूबे की समाजवादी सरकार में यह चरम पर दिखती है। खनन से जुड़ी प्रशासनिक समस्या नई नहीं है। और न ही दुर्गा शक्ति नागपाल इसका शिकार हुई पहली प्रशासनिक अधिकारी ही। पिछली सदी के अंतिम दिनों में गंगा में अवैध खनन का कड़ाई से विरोध करने वाले प्रशासनिक अधिकारियों को उत्तर प्रदेश सरकार का कोपभाजन बनना पड़ा था। आनन-फानन में शासन ने जिलाधिकारी और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक समेत अवैध खनन के विरुद्ध कार्य करने वाले सभी अधिकारियों को स्थानांतरित कर दिया था। उस समय 1989 बैच की महिला आईएएस आराधना शुक्ला और 1993 बैच के आईपीएस अधिकारी वितुल कुमार निशाने पर थे। इस बीच खनन का गोरख धंधा खूब फला-फूला। राष्ट्रीय राजधानी से सटे इलाके में यमुना, हिंडन, काली, आदि नदियों के तटों को साफ करने के बाद आस-पास के खेत-खलिहान भी अछूते नहीं रहे। यही हाल गंगा और उसकी दूसरी सहायक नदियों का है।

भारत की नदियों से रेत, बजरी और पत्थर उठाने का सिलसिला बहुत पुराना है। पर खनन का व्यवसायीकरण अस्सी के दशक में ही हो सका। गंगा बेसिन में बड़े पैमाने पर खनन होने लगा। एक दशक में ही नदीघाटी माफियाओं के चंगुल में था। खनन के लिए बड़ी मशीनों का इस्तेमाल किया जाने लगा। आज हजारों करोड़ का यह व्यापार सैकड़ों करोड़ की राजस्व क्षति का कारण है। बेतहाशा खनन से पेयजल और सिंचाई की समस्या खड़ी हुई। साथ ही नब्बे के दशक में खनन का व्यवसाय आम-आदमी को मौत के घाट उतारने का सबब बनने लगा। व्यावसायिक खनन गंगा और यमुना जैसी नदियों की स्व़च्छता और पवित्रता को समाप्त करने में अहम साबित हुआ है। विनिर्माण क्षेत्र में विकास के लिए नदियों को नष्ट कर दिया गया। नदीघाटी की वर्तमान हालत इतनी बुरी है कि क्षतिपूर्ति संभव नहीं है। खनन से उपजी गहरी खाईयों के भरने में भी वर्षों लगेंगे।

अंधाधुंध विकास का दो ताजा नमूना सामने है। केदारखंड तबाह हो चुका है। और अमेरिका के मिशिगन राज्य का डेट्रायट शहर दिवालिया घोषित हो चुका है। यह उसी विकास का नतीजा है, जो वास्तव में विनाश को आमंत्रित करता है। वक्त रहते नहीं चेतने से इन दोनों ही स्थितियों से कहीं गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। प्रदेश सरकार को खनन से तबाह नदीघाटी की कोई चिंता नहीं है। सूबे के अतिरिक्त देश के अन्य इलाकों में भी खनन से गंभीर समस्याऐं उपजी हैं। राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण ने देश भर में रेत, बजरी के खनन से हो रही पर्यावरण की अपूरणीय क्षति का संज्ञान लिया है। लिहाजा पर्यावरण विभाग से मंजूरी लिये बिना खनन का कार्य नहीं किया जा सकता है। परंतु इतने से ही समस्या हल नहीं होती। माफियाराज में इसका निदान आवश्यक होने के बावजूद भी बहुत मुश्किल है।

प्रदेश सरकार अपने झूठ को सच साबित करने में लगी है। इस क्रम में नित नए खुलासे हो रहे हैं। इस बीच एक वरिष्ठ समाजवादी नेता ने केंद्र को सभी आईएएस अधिकारियों को हटा लेने की चुनौती दी है। यह कोई कोरी धमकी नहीं है। सत्ताधारी पार्टी के कार्यकर्ता इस मौके का इंतजार करते रहे हैं। इन सब गतिविधियों पर गौर करने पर मुलायम नेतृत्व वाली समाजवादी योजना साफ हो सकती है। मुलायम सिंह यादव जब दूसरी बार सूबे के मुख्यमंत्री बने थे तो उनसे मिलने के लिए जग्गू को परीक्षक नियुक्त किया था। उन दिनों जगमोहन नामका नाई जग्गू नाम से ख्यात था। मुख्यमंत्री की दाढ़ी बनाने के साथ ही मसाज और सेवा में निपुण जग्गू को विशेष कार्य अधिकारी नियुक्त किया गया, जिसे खुश किये बगैर प्रशासन और पुलिस के आला अधिकारी भी मुख्यमंत्री से नहीं मिल सकते थे। समाजवादी पार्टी ने ऐसे लोगों का कैडर तैयार कर रखा है, जिसके बूते आईएएस अधिकारियों की छुट्टी की जा सकती है!

खनन माफिया का खौफ बढ़ रहा है। सम्प्रति समस्याओं को दूर करने वाली राजनीति समस्या बन रही है। देश के सर्वाधिक जनसंख्या वाले सूबे में बगावत का स्वर तीव्र होता जा रहा है। गांव के लोग राज्य सरकार को मुक्त कर स्वायतशासी ग्रामीण तंत्र की व्यवस्था की मांग पर विचार कर रहे हैं। इस सब की इकलौती वजह सरकार की झूठ है। पुराने लोग कहते थे, एक झूठ सौ झूठ की जड़ होती है और एक अपराध सौ अपराध का। ऐसा ही कुछ इस मसले में भी हो रहा है। नेतृत्व और झूठ अमेरिकी लोकतंत्र में महाभियोग का कारण बनी थी। बिल क्लिंटन के राष्ट्रपति रहते यह समस्या खड़ी हुई थी। आखिरकार क्लिंटन ने सच स्वीकार कर दुबारा सत्ता में वापसी की थी। क्या भारतीय लोकतंत्र में सच का कोई महत्व नहीं रह गया है? यह एक अहम सवाल है, जो देश के सामने मुंह बाए खड़ा है। सूबे के मुखिया इस जिम्मेदारी से बचने के लिए अभिनव प्रयोग में व्यस्त हैं। नदीघाटी माफिया सभ्यता के सरकारी सरोकार में राजहठ का यह सिलसिला कहां जाकर थमेगा दावे से कहा नहीं जा सकता है।

(कौशल किशोर ‘द होली गंगा’ पुस्तक के लेखक हैं)

Image

Advertisements

One thought on “नदीघाटी माफिया सभ्यता का सरकारी सरोकार

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s