निगमानंद की शहादत के दो साल बाद भी गंगा की दुर्दशा जारी

nigmananda

(कौशल किशोर) आज से ठीक दो वर्ष पूर्व गंगापुत्र निगमानंद की शहादत देशभर में बड़ी खबर थी। विदेशी अखबारों ने भी कवर स्टोरी छाप कर सलीबारोही को सलाम किया था। उन्होंने गंगा रक्षा के लिए जीवन और मृत्यु की परवाह नहीं किया। इसकी स्वीकारोकित में 115 दिनों की यातनाओं से गुजरकर अंतविराम आता है। इस बीच क्रमिक अनशन पर बैठे गंगापुत्र को 68वें दिन उत्तराखंड पुलिस ने उठाकर डाक्टरों के हवाले कर दिया था। बीच के 47 दिनों में वह भीष्म पितामह की तरह कांटों के ताज में सजते और संवरते रहे। लंबे अर्से तक कोमा में रहने के बाद वह चुपचाप दुनिया को अलविदा कह गये।

इस बीच उनकी मौन चीख में दबी आवाज को उठाने के लिए सीबीआर्इ जांच भी हुर्इ। मामले से जुड़े विभिन्न पहलुओं की ओर पद्मश्री गिरिराज किशोर और गोपाल शर्मा जैसे वरिष्ठ समाजसेवियों और पत्रकारों ने भी इशारा किया है। गोविंदाचार्य जैसे राजनैतिक गुरुओं के सौजन्य से ‘निगमानंद सेना’ का श्रृजन हुआ तो दूसरी ओर उनके पिता प्रकाशचंद्र झा के श्रोत से गंगापुत्र निगमानंद को समर्पित ‘अक्षिंजल’ नामक नो प्रॉफिट सोसायटी बनने लगी। इस गैर-सरकारी संस्था के माध्यम से नर्इ पीढ़ी की चेतना को गिरीश के विषय में समझ विकसित करने की पहल की जायगी। इन सब के अतिरिक्त मातृ सदन उन्हें न्याय दिलाने की लड़ार्इ पहले से ही लड़ रही है। इस बीच सीबीआर्इ की रिपोर्ट आ चुकी है, जिसके विरुद्ध मातृ सदन ने अपील किया है। माननीय न्यायालय में संघर्ष का सिलसिला जारी है।

वास्तव में निगमानंद वर्ष 1998 से ही गंगा में हो रहे रेत, बजरी और पत्थरों के खनन का मुखर विरोधी रहे थे। उन्होंने कर्इ बार सत्याग्रह किया था। महात्मा गांधी द्वारा अनुमोदित सत्याग्रह का मार्ग चुनकर अनशन को आंदोलन का हथियार बनाया। इसी क्रम में वर्ष 2008 में उन्होंने 73 दिनों का अनवरत अनशन कर प्रदेश सरकार को झुका दिया था। परंतु चुहे-बिल्ली के खेल में उठा-पटक चलता रहा। 19 दिसंबर 2010 को उत्तराखंड उच्च न्यायालय की पीठ ने कुंभ मेला क्षेत्र में खनन और स्टोन क्रशर से जुड़े एक मुकदमा में स्थगनादेश निर्गत किया था। जस्टिस तरुण अग्रवाल और ब्रह्म सिंह वर्मा इस आदेश से जुड़े थे। उनके निर्णय के विरुद्ध यजनानंद ने 28 जनवरी 2011 से अनशन शुरु किया। 18 फरवरी 2011 की रात उसने अपना हाथ काटकर विरोध किया। हालत गंभीर होने के कारण सत्याग्रह को क्रमिक अनशन घोषित किया गया। 19 फरवरी 2011 को यजनानंद की जगह निगमानंद को अनशन पर बैठाया गया था। पर उनकी हालत बिगड़ने पर किसी और को नहीं बैठाकर आश्रम प्रबंधकों ने उन्हें मौत के मुंह में धकेल दिया था।

गंगा की व्यथा के विरुद्ध शांतिपूर्ण स्वर को दबाने के बाद कुछ समय तक खूब आवाजें उठती रही। शहादत के समय राजनीति के प्रकांड पंडित तमाम मीडिया को साथ लेकर अंत्येष्टि में उपस्थित थे। इलेक्टानिक चैनलों से मीडियाकर्मी पूरे ताम-झाम के साथ सलीबारोहण समारोह को यादगार बनाने में लगे रहे। इस दौरान प्रदेश के कांग्रेसी नेताओं के अतिरिक्त मेनका गांधी, गोविंदाचार्य और संघ परिवार के कर्इ सदस्य भी मौजूद रहे थे। शकील अहमद, दिग्विजय सिंह और जयराम रमेश जैसे कांग्रेसी भाजपा को कठघरे में खड़ा करने लगे। हैरत से भरे इस खेल में नियंत्रण कुछ खास नेताओं के हाथ में था। जिसके कारण दुनियाभर की नजरें कुछ समय के लिए गंगापुत्र पर सिमट गयी। उन दिनों सूबे के मुखिया यह कहकर पल्ला झाड़ते रहे कि अनशन उच्च न्यायालय के विरुद्ध किया जा रहा है, इसलिए प्रदेश सरकार का इस मामले में कोर्इ लेना-देना नहीं बनता है। आनन-फानन में ही इस मामले में सीबीआर्इ जांच के आदेश भी दे दिये गये थे।

स्थानीय नेताओं से लेकर देश के बड़े-बड़े नेता और मंत्री शहादत में राजनीति तरासने मैदान में उतर गये। रोटियां सेंकने में लगे कार्यकर्ताओं की फौज हरिद्वार में गंगातट पर मंडराने लगी। कांग्रेसी नेताओं ने तत्कालीन मुख्यमंत्री निशंक पर सीधा निशाना साधा। सामाजिक और राजनैतिक कार्यकर्ताओं के साथ साधु-संत भी शहीद गंगापुत्र को कंधा देने पहुंच गये। उनकी शहादत के पूर्व इस बात का अंदाजा कर्इयों को नहीं था। आज निगमानंद के नाम पर खड़े कुछ खास लोग कर्इ तरह के दावे कर रहे हैं। सरबजीत और निगमानंद की शहादत के बीच का फासला तय करना बहुत आसान नहीं है। गंगापुत्र के सत्याग्रह ने निशंक सरकार में असंतुष्ट भाजपाइयों के लिए अलाकमान के कान भरने का सुनहरा अवसर प्रदान किया था। यधपि निशंक उनकी शहादत को सरबजीत की तरह स्टेट आनर से नवाज कर मुक्ति का मार्ग पा सकते थे। पर दुर्भाग्यवश उनकी राजनैतिक बुद्धि इतनी विकसित नहीं थी और आचार्य उन्हें भूल सुधारने का मौका नहीं देना चाहते थे। उस दौड़ में प्रदेश की सत्ता में फिर से खंडूरी की वापसी की कर्इ वजहों में यह भी एक था।

आज गंगा के साथ नदियों और पानी का बाजार खड़ा है। इसके नियंताओं ने इसे चलाने में राजनेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं की पूरी फौज झोंक दी है। इस मंडली का निगमानंद प्रकरण में सक्रिय होना आवश्यक था। गंगापुत्र की मृत्यु से पूर्व ही स्वामी शिवानंदजी ने गुरु-शिष्य संवाद दिग्विजय सिंह और जयराम रमेश जैसे कांग्रेसी नेताओं से कर लिया था। अन्ना के जनलोकपाल आंदोलन की तैयारियों के साथ ही भाईसाहेब दिग्विजय सिंहजी के नेतृत्व में अनशनकारियों की गंगा संस्करण में प्रगति भी होने लगी थी।

सत्याग्रही निगमानंद को गंगापुत्र भीष्म की तरह कांटों का ताज तो मिला। पर पूर्वज और आचार्य से इच्छामृत्यु का वरदान पाने से वह वंचित रह गये थे। निगमानंद के महाप्रयाण के उपरांत कबीर वाली हालात उत्पन्न हुर्इ। इस बार भी दफनाने और जलाने को लेकर विवाद हुआ। फर्क था तो केवल निष्प्राण देह के सम्मुख हिन्दु और मुसलमान नहीं बल्कि गृहस्थी और संन्यासी आमने-सामने थे। बाज़ार की अहेतुकी कृपा से यह सुन्दर क्षण उपस्थित हो सका था। अंतिम संस्कार अपनी रीति के अनुसार करने को लेकर जंग छिड़ी थी। पिता को मुंहतोड़ जवाब देने के लिये गुरु ने अखाड़े के संतों से दोस्ती गांठ नर्इ रणनीति बनार्इ।

सत्याग्रही की शहादत के बाद पारिवारिक सूत्रों से जुड़े सदस्यों और शहीद के मित्रों ने एक नया मुद्दा उठाया कि निगमानंद स्वामी भवानंद सरस्वती के शिष्य थे। उन्होंने यह दावा किया है कि निगमानंद ने कोलकाता और इलाहाबाद उच्च न्यायालयों में शपथ पत्र दाखिल कर इसकी पुष्टि की थी। वर्ष 1995 में गृहत्याग के उपरांत स्वरुपम कुमार ‘गिरीश’ ने वृंदावन में स्वामी भवानंद सरस्वती से दीक्षा लेकर स्वामी निगमानंद सरस्वती हो गये। उन्होंने वर्ष 1996 में तीन मुकदमा भी दाखिल किया था। मातृ सदन और स्वामी शिवानंद से जुड़े पुराने श्रोत यह बताते हैं कि निगमानंद और गोकुलानंद के प्रति उनका व्यवहार अपने अन्य शिष्यों की तरह नहीं था।

निगमानंद के खूब करीब से जुड़े रहे अनुभव झा कहते हैं कि उनके तथाकथित गुरु कालांतर तक शिवानंद झा कहलाते रहे हैं। उन्होंने मातृ सदन से जुड़े रहे संतों का जिक्र कर कर्इ अहम प्रश्नों को उठाया है। पुराने समय में चीन में कहा जाता था कि यदि बुद्ध के अनुयायियों ने पकड़ लिया तो भूखा रखकर मार देंगे और सरकारी अधिकारियों ने पकड़ा तो पत्थर मार-मार कर वही हाल करेंगे। हरिद्वार स्थित मातृ सदन सत्याग्रही संतों का निर्वाण स्थल बन गया है। धर्म की आड़ में पनपता यह अभियान किसी नशे से कम नहीं है। यदि मार्क्स निगमानंद के समय में हुआ होता तो वह इसे कोकीन जैसा नशीला बताता। निगमानंद की शहादत का लाभ लेने में लगा बाज़ार उन्मुक्त भाव से सतत प्रगतिशील है।

ईशा के जन्म के इक्कीसवीं शताब्दी में यदि कोई गंगा से प्रेम कर बैठा तो भारत में उसके लिए सजा-ए-मौत का फरमान है। गंगा से जुड़े इस प्रकरण में खूब हंगामा हुआ। इस बीच भी नदी में खनन की समस्या पूर्ववत बनी रही। मातृ सदन से जुड़े लोग आज भी इसी में उलझे हैं। निगमानंद के संघर्ष को लेकर सत्ता प्रतिष्ठान ने उपयुक्त कार्यवाही नही की है। साथ ही राजनैतिक हितों की पूर्ति का कोर्इ अवसर अछूता भी नहीं छोड़ा। सीबीआर्इ जांच का दायरा इतना संकीर्ण रखा गया कि कहने को जांच भी हो जाय और दोषियों को कोर्इ तकलीफ भी नहीं हो। आम भारतीय गंगा और गंगापुत्रों के प्रति बढ़ते अत्याचार को सहज भाव से देखने और सहने को बाध्य हो चुके हैं। वर्तमान हालात में केंद्र और राज्य की सरकार से किसी पहल की आशा व्यर्थ ही है।

साभार: स्वराज खबर
कौशल किशोर ‘द होली गंगा’ पुस्तक के लेखक हैं।

Published by Swaraj Khabar on 13th June 2013

http://swarajkhabar.com/nigamananda-after2years/

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2 thoughts on “निगमानंद की शहादत के दो साल बाद भी गंगा की दुर्दशा जारी

  1. Unfortunately Gangaputra Nigamananda was forgottenjust after two years of his sacrifice. Beautiful article that covers so many things associated with that movement. Thanks for the article that remembers the crusader who died for the Ganga.

  2. निगमानंद हमारे समय का हीरो था. उनकी शहादत के ठीक सालभर बाद शहंशाह-ए-ग़ज़ल मेहदी हसन साहेब का इंतकाल हुआ. दुर्भाग्यवश दोनों ही महान पुरुष तेरह तारीख को ही इस जगत को छोड़ा और दोनों को ही दुर्दिन देखने पड़े. यक़ीनन वे इस युग के महान नायक थे जिन्हें इज्ज़त से याद किया जाना एक सभ्य समाज की निशानी होती है.

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