सांपनाथ और नागनाथ के बीच फंसे राजनाथ, दीनानाथ कौन ?

Author of The Holy Ganga

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(कौशल किशोर)
भाजपा चुनाव समिति के अध्यक्ष पद पर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की ताजपोशी के बाद राजनैतिक ज्वार तीव्र हो उठा है। पार्टी के वरिष्ठतम नेता लालकृष्ण आडवाणी के तीन प्रमुख पदों से इस्तीफा देने और फिर उसे वापस लेने के बीच के घटनाक्रम की समीक्षा देशभर में हो रही है। एनडीए के प्रमुख घटक दलों के अलावा अन्य राजनैतिक दल भी इस गहमा-गहमी में सक्रिय हो उठे हैं। सियासी पार्टियों की अंदरखाने की राजनीति से भूचाल खड़ा होना कोर्इ नर्इ बात नहीं है। कल्याण सिंह से लेकर जे. कृष्णमूर्ति और गुरुस्वामी प्रकरण की जिम्मेदारी भी भाजपा नेताओं की गुटबाजी और निजी ऐजेंडे का ही परिणाम था। आज राजनाथ की पार्टी सांपनाथ और नागनाथ की लड़ार्इ में दीनानाथ को दफनाने की कवायद करती नजर आ रही है।

राजनाथ ने भाजपा अध्यक्ष की नर्इ पारी की शुरुआत बड़े अरमानों से की थी। इस बार उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती दीनानाथ की खोज करने की रही। दीनानाथ एक ऐसा जननायक जो एनडीए के घटक दलों में सामंजस्य बरकरार रख सके और 2014 के लोकसभा चुनाव में उनकी नैया पार लगा सके। एनडीए की पिछली पारी में यह दुरुह कार्य करने वाले जननायक अटल बिहारी वाजपेयी थे। उनके रिटायरमेंट के बाद यह जगह भी पार्टी में आडवाणी को ही मिली। इस बीच एक अर्से तक संघ उनसे खासा नाराज भी रहा। किसी वक्त गुजरात की बागडोर आडवाणी ने अपने खास सिपहसलार मोदी को सौंपा था। आज वही आडवाणी जनसंघ के आदर्शों की याद दिला कर नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षाओं को इंगित कर रहे हैं।

भाजपा और संघ परिवार की राजनैतिक अभियानों में श्यामा प्रसाद मुखर्जी और दीनदयाल उपाध्याय के अतिरिक्त रथयात्राओं का भी विशेष महत्व रहा। रथयात्रा युग के महानायकों में आडवाणी और मोदी ही अलग-अलग पीढ़ी में बड़े नेता रहे हैं। हिन्दु राष्ट्रवादी विचारधारा के साथ शुरु हुए जनसंघ में पंडित दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद की प्रतिध्वनि कुछ खास नहीं दिखा सकी थी। वह भारतीय राजनीति में सचमुच त्याग और बलिदान की मूर्ति थे। ऐसी हालत में सत्ताप्राप्ति की साधना का ध्येय लेकर पार्टी से जुड़े नेताओं को जोड़े रखना सहज नहीं रह जाता है। यह समस्या गांधी के साथ भी थी। उस दौड़ में सत्ता की आकांक्षा ने जनसंघ को भारतीय जनता पार्टी में तब्दील कर दिया था।

यह कुछ खास नेताओं के निजी एजेंडे के कारण ही संभव हो सका था। इस बीच राष्ट्रीय पटल पर एक बड़ी पार्टी के रुप में भाजपा को खड़ा करने में आडवाणी की रथयात्राओं की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। इसी वजह से वह भारतीय राजनीति में सबसे दमदार सिंधी साबित हो सके हैं। राम मंदिर निर्माण वास्तव में भाजपा की अंदरुनी एजेंडे में कभी नहीं था। आडवाणी और उनके साथियों की मंशा इस मुद्दे का भगवाकरण कर राजनीति की विसात पर मोहरों से खेलने का ही था। इस क्रम में हुए रथयात्रा के साथ ही देश के कर्इ हिस्सों में आगजनी और रक्तपात भी खूब हुआ। उन दिनों सांप्रदायिक दंगों से देश झुलस रहा था। अल्पसंख्यक समुदाय को नुकसान पहुंचाकर आडवाणी ने हिन्दु सहिष्णुता को कलंकित किया था। यह कार्यक्रम भी निजी एजेंडा ही देश और हिंदु समाज पर थोंपने के लिए किया गया था। इसके साथ हिंदुस्तान के आम लोगों के हितों का दूर तक कोर्इ नाता-रिश्ता नहीं था। कालांतर में भाजपा ने इसका भरपूर लाभ भी उठाया। यह राजनीति की गहरी चाल थी, जिसके प्रणेता आडवाणी ही थे। रथयात्राओं के उस दौड़ में आडवाणी कट्टर हिंदुवादी और अटल बिहारी वाजपेयी सेकुलर छवि के राजनेता बनकर उभरे थे। आगे चलकर यह भाजपा की गठबंधन की राजनीतिक सफर का मूलस्तंभ साबित हुआ। आधे युग में तीन बार वाजपेयी प्रधानमंत्री चुने गये।

मोदी को रथयात्रा के संयोजक कि जिम्मेदारी निभाने के लिए आडवाणी ने ही आगे बढ़ाया था। बाद में मोदी ने इसी रणनीति का प्रयोग कर गुजरात में सांप्रदायिक दंग कराये। इसे ही हिंदुत्व का नाम देकर भाजपा और संघ आम लोगों को लंबे अर्से से भ्रमित करती रही है। इस बीच जम्हूरियत का सबसे कलंकित नजारा भी सामने आता है। पिछली तीन बार के विधान सभा चुनावों में मोदी बड़े नेता बन गये हैं। उनकी विचारधारा और कार्यप्रणाली आडवाणी के सच्चे अनुयायी बनकर हिंदु-मुस्लिम विद्वेष की राजनीति की रही है। फिर भी विरोध, इस स्थिति में यह देखना अहम होगा कि भाजपा की राजनीति किस ओर जा रही है। संभव है कि महज निजी महात्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए आडवाणी यह सब कर रहे हों। यदि ऐसा नहीं है तो उन्हें पहले ही प्रधानमंत्री के रेस से बाहर होने की अपने इरादे का ऐलान कर देना चाहिए था।

आज भाजपा में मोर्चा मोदी बनाम आडवाणी है। किसी जमाने में पार्टी के दो शीर्ष नेता आडवाणी और वाजपेयी के दो अलग-अलग खेमें थे। उन दिनों मोदी पार्टी में आडवाणी के प्रमुख सिपहसलार थे। आडवाणी की नीतियों को प्रोत्साहित करने में लगे मोदी का आज वही विरोध कर रहे हैं। पूर्व में वाजपेयी ने आडवाणी को पत्र लिखकर सूचित किया था कि मोदी जैसे चरित्र का प्रोत्साहन न ही पार्टी हित में है और न ही देशहित में। उस समय आडवाणी ने मोदी का पक्ष लिया था। कर्इ राजनीति विश्लेषक मोदी द्वारा वाजपेयी की खिलाफत को आडवाणी की रणनीति का हिस्सा माना था। सिंध के पेशेवर वकील की बुद्धि में यह साफ था कि कट्टर हिंदुवादी छवि के साथ प्रधानमंत्री की कुर्सी वह नहीं पा सकता है। फलत: उन्होंने 2005 में पाकिस्तान यात्रा के दौरान जिन्ना को सेकुलर बताकर अपनी छवि सुधारना शुरु किया था। ऐसा करके उन्होंने एनडीए के घटक दलों के नेताओं को भले ही अपने पक्ष में कर लिया हो पर संघ की नाराजगी जगजाहिर हो गयी।

संघ परिवार और भाजपा का समीकरण बनता-बिगड़ता रहा है। यधपि सूदर्शन के बाद भागवत का दौड़ आने पर आडवाणी ने पाशा अपने पक्ष में कर लिया था। सालभर बाद एक न्यूज चैनल पर उन्होंने प्रधानमंत्री पद पर अपनी दावेदारी का खुलासा कर दिया था। लोकसभा चुनाव से पूर्व एनडीए के सहयोगियों ने आडवाणी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार माना था। 2009 में एनडीए की हार की एक बड़ी वजह बनी आडवाणी और उनकी पुरानी छवि जो उनके अपने ही कुटिल राजनीतिक चालों का परिणाम थी। नवीन पटनायक और नितीश कुमार जैसे नेता मोदी के विरुद्ध आडवाणी को चुनते रहे हैं। आज मोदी रामदेव जैसे बाबाओं के राजनेता हैं। राजनाथ ने पिछले सभी कार्यकालों में पार्टी का नुकसान ही किया है। उनसे कोर्इ बेहतर आशा करना पहेली जैसी पहल है। वैसे ऐसी हालत में राजनाथ की पार्टी के लिए दीनानाथ की खोज करना स्वभाविक है। देश की वह जनता जिसने राम मंदिर के आडवाणीकरण को देखा है, उसे मोदी रचित गोधरा का तांडव भी याद है। इसकी निशानी बची ट्रेन के अधजले डिब्बों को केंद्र में रेल मंत्री रहते नितीश कुमार ने आनन-फानन में नष्ट करवा दिया था। आज वही नितीश विरोधियों का नेतृत्व करते नजर आते हैं। प्रधानमंत्री पद ही इतना अहम् है.

राजनाथ की भाजपा के सामने खड़े दो बड़े सूरमा तो सांपनाथ और नागनाथ ही हैं। उनके विष की याद दिलाने को नवीन पटनायक, शरद यादव और नितीश जैसे दूसरे सूरमा भी हमेशा ही मैदान में रहे हैं। इस हालात में एनडीए की ओर से प्रधानमंत्री की दावेदारी किसकी होनी चाहिये यह अहम सवाल है। भाजपा को गठबंधन के मुखिया का बेहतर रोल निभाने के लिए सभी को साथ लेकर चलने की कारगर पहल करनी थी। परंतु पार्टी के नेताओं ने आडवाणी की इस कोशिश को दर किनारे कर मोदी के हाथों नेतृत्व थमा कर अपने इरादे साफ कर दिये हैं। इसकी पड़ताल करने पर कर्इ ठोस सबूत मिलते हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि एनडीए के घटक दल 2014 के चुनावों से पूर्व गठबंधन को छोड़ देने का इरादा रखते हैं। ऐसा करने से कुछ प्रदेशों में क्षेत्रिय दलों को फायदा होता है। भाजपा के कर्इ बड़े नेताओं का भी मानना कुछ ऐसा ही है कि इससे उन्हें भी नरेंद्र मोदी को नेता मानने से आमचुनाव में सीट की बढ़त होती है। भविष्य में यह देखना होगा कि नागनाथ और सांपनाथ के इस जंग में राजनाथ श्यामा प्रसाद मुखर्जी और पंडित दीनदयाल उपाध्याय के सपनों के साथ कैसा सलूक करते हैं। राजनीति का दस्तूर रहा है कि सांपनाथ और नागनाथ की लड़ार्इ में दीनानाथ ही दफन होते हैं।

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